Showing posts with label poetry. Show all posts
Showing posts with label poetry. Show all posts

Monday, February 14, 2011

जब बसेरा थी गुफा


(पेश हैं निहायत सीधी सच्ची बातें इस सीधी सादी गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल में)

देश के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा
पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी भूमिका

बस गया शहरों में इंसां, फर्क लेकिन क्या पड़ा
आदतें अब भी हैं वैसी, जब बसेरा थी गुफा

झूठ, मक्कारी, कमीनी हरकतें अखबार में
रोज पढ़ते हैं सुबह, पर शाम को देते भुला

इस कदर धीमा, हमारे मुल्क का कानून है
फैसला आने तलक, मुजरिम की भूलें हम खता


छोड़िये फितरत समझना दूसरे इंसान की
खुद हमें अपनी समझ आती कहाँ है सच बता

दौड़ता तितली के पीछे अब कोई बच्चा नहीं
लुत्फ़ बचपन का वो सारा, होड़ में है खो दिया

दूसरों के दुःख से 'नीरज' जो बशर अनजान है
उसको अपना दुःख, हमेशा ही लगा सबसे बड़ा

Monday, January 31, 2011

मेरा दिल ये जैसे भुजंग हो

गुरुदेव पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर चल रहे तरही मुशायरे में उस्ताद शायरों के साथ खाकसार को भी शिरकत का मौका मिला था. प्रस्तुत है उसी तरही में भेजी मेरी ग़ज़ल आप सब के लिए. जिन साहेबान ने इस ग़ज़ल को वहाँ पढ़ा था उनके लिए इस ग़ज़ल में थोड़े हलके फुल्के बदलाव किये हैं ताकि थोड़ी बहुत ताजगी का एहसास हो .



नया गीत हो, नया साज़ हो, नया जोश और उमंग हो
नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो

है जो मस्त अपने ही हाल में, कोई फ़िक्र कल की न हो जिसे
उसे रास आती है जिंदगी, जो कबीर जैसा मलंग हो

वही रंजिशें वही दुश्मनी, मिला क्या हमें बता जीत से
तेरी हार में मेरी हार है, यही सोच लें तो न जंग हो

करें जो सभी वही हम करें, तो है बेसबब सी ये जिंदगी
है मजा अगर करें कुछ नया, जिसे देख ये जहाँ दंग हो

तुझे देख कर मुझे यूँ लगा कोई संदली सी है शाख तू
जो न रह सके तुझे छोड़ कर , मेरा दिल ये जैसे भुजंग हो

हो न लिजलिजा बिना रीढ़ का, है यही दुआ ऐ मेरे खुदा
दे वतन को ऐसा तू रहनुमा, जो दिलेर और दबंग हो

Monday, January 17, 2011

लोग रह जाते हैं उसको देख कर हैरान से



चाहते हैं लौ लगाना आप गर भगवान से
प्‍यार करना सीखिये पहले हर इक इंसान से

खार के बदले में यारो खार देना सीख लो
गुल दिया करते हैं जो, वो लोग हैं नादान से

जब तलक उनको जरूरत थी मुझे अपना कहा
और उसके बाद फिर वो हो गए अनजान से

आजकल हैं लोग ऐसे क्यूँ जरा बतलाइये
सांस तो लेते हैं पर लगते हैं बस बेजान से,

एक दिन तन्हा वही पछताएंगे तुम देखना
तौलते रिश्‍तों को हैं जो फायदे नुकसान से


आप बेहतर है कि मेरे काम ही आएं नहीं
गर दबाना चाहते हैं बाद में एहसान से

बढ़ के कोई पांव छूता है बुजुर्गों के अगर
लोग रह जाते हैं उसको देख कर हैरान से

ढूंढते ही हल रहे हम उन सवालों का सदा
जो हमें लगते रहे हरदम बड़े आसान से

खेलने के गुर सिखाना तब तलक आसान है
जब तलक हो दूर ‘नीरज’ खेल के मैदान से

Monday, January 3, 2011

रात में चाँद है

आप सब को नव वर्ष की शुभ कामनाएं


दोस्‍त सब जान से भी प्‍यारे हैं
जब तलक दूर वो हमारे हैं

जो भी चाहूं वहीँ से मिलता है
मॉं के हाथों में वो पिटारे हैं

मुस्‍कुराते हैं हम तो पी के इन्‍हें
आप कहते हैं अश्क खारे हैं

जीत का मोल पूछिए उनसे
बाजियां जो हमेशा हारे हैं

बाजुओं पर यकीन है जिनको
दूर उनसे कहां किनारे हैं

उसकी नज़रों के वार क्‍या कहिये
तीर तरकश के सब उतारे हैं


जिनमें शामिल नहीं हो तुम हमदम
वो नज़ारे भी क्‍या नज़ारे हैं


जिंदगी नाम उन पलों का है
तेरे सिमरन में जो गुजारे हैं

दिन अकेले ही काट लो ‘नीरज’
रात में चाँद है सितारे हैं

Monday, November 29, 2010

जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रौशनी

दीपावली के शुभ अवसर पर गुरुदेव पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर एक तरही मुशायरे का आयोजन हुआ था जो अत्यंत सफल रहा. उस्ताद शायरों के बीच इस नाचीज़ को भी उस तरही मुशायरे में शिरकत का मौका मिला था. उस अवसर पर कही गयी अपनी गज़ल आप सब के लिए यहाँ पेश कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आएगी.



संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही
आसूदगी, इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी
वाबस्तगी: सम्बन्ध, लगाव, शाइस्तगी: सभ्यता, खुद-आगही: आत्मज्ञान, आसूदगी:संतोष

ये खीरगी, ये दिलबरी, ये कमसिनी, ये नाज़ुकी
दो चार दिन का खेल है, सब कुछ यहाँ पर आरिजी
खीरगी: चमक, दिलबरी: नखरे, आरिजी:क्षणिक

हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं
हमको लडाता कौन है ? ये सोचना है लाजिमी

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी

हो तम घना अवसाद का तब कर दुआ उम्मीद के
जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रौशनी

पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली

फ़ाक़ाजदा इंसान को तुम ले चले दैरोहरम
पर सोचिये कर पायेगा ‘नीरज’ वहां वो बंदगी ?

Monday, November 15, 2010

तुम हुए जिस घड़ी हमसफ़र

फोटो: गूगल साभार

(दोस्तों पेश है एक और छोटी बहर की गज़ल)

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर

राह, मंजिल हुई उस घड़ी
तुम हुए जिस घड़ी हमसफ़र

घर जला कर मेरा झूमते
दोस्तों की तरह ये शरर

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र


मुख़्तसर: छोटी, शरर: चिंगारियां ,

Monday, October 18, 2010

दें सदा बचपन को हम,फिर से करें अठखेलियाँ


दिल मिले दिल से फ़क़त इतना ज़ुरूरी है मियां
क्यूँ मिलाते फिर रहे हो प्यार में तुम राशियाँ

बारिशों का है तक़ाज़ा, सब तकल्‍लुफ़ छोड़कर
दें सदा बचपन को हम, फिर से करें अठखेलियाँ

घर तुम्हारा भी उड़ा कर साथ में ले जाएंगीं
मत अदावत की चलाओ, मुल्क में तुम आंधियाँ

किसलिए मगरूर इतने आप हैं, मत भूलिए
ख़ाक में इक दिन मिलेंगी आप जैसी हस्तियाँ

आ गए वो सैर को, गुलशन में नंगे पाँव जब
झुक गयीं लेने को बोसा, मोगरे की डालियाँ

खुशबुएँ लेकर हवाएं खुद ब् खुद आ जाएँगी
खोल कर देखो तो घर की बंद सारी खिड़कियाँ

झाँक लें इक बार पहले अपने अंदर भी अगर
फिर नहीं आयें नज़र शायद किसी में खामियां

चाहते हैं सब, मिले फ़ौरन सिला 'नीरज' यहाँ
डालता है कौन अब, दरिया में करके नेकियाँ


(इस गज़ल के फूल मेरे हैं लेकिन खुशबू गुरुदेव पंकज सुबीर जी की है)



Monday, October 4, 2010

गुल हमेशा चाहता हमसे रहा बदले में वो




जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

शजर : पेड़

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए
गौहर : मोती

गुल हमेशा चाहता हमसे रहा बदले में वो
जिसने हमको हर कदम पर बेवजह नश्तर दिए
नश्तर: कांटे

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए
अदावत: दुश्मनी

मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए
रहज़न: लुटेरे

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए



( आदरणीय गुरुदेव प्राण शर्मा जी की रहनुमाई में लिखी ग़ज़ल )

Monday, September 20, 2010

हमारे दिल में सभी के लिए दुआएँ हैं

गुरुदेव पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर हाल ही में संपन्न हुए तरही मुशायरे में ख़ाकसार को भी नामी गिरामी शो’अरा के साथ शिरकत करने का मौका मिला, उसी तरही मुशायरे में भेजी अपनी ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ.

आप कहेंगे वहां पंकज जी के ब्लॉग पर तो इसे पढ़ा ही था अब फिर से यहाँ क्यूँ पढ़ें? हम कहेंगे सही कह रहे हैं आप , ये कोई ग़ालिब का कलाम तो है नहीं जिसे बार बार पढ़ा जाए लेकिन अगर आप पूरी ग़ज़ल पढने के मूड में नहीं हैं तो न सही ग़ज़ल का मक्ता ही पढ़ते चलिए क्यूँ के यहाँ ये वो नहीं है जो वहां था, नहीं समझे?.... उस मकते से अलग है...:))


गुलों को चूम के जब से चली हवाएँ हैं
गयीं, जहॉं भी, वहॉं खुशनुमा फि़ज़ाऍं हैं

भुला के ग़म को चलो आज मिल के रक्स करें
फलक पे झूम रहीं सांवली घटाएँ हैं

सबूत लाख करो पेश बेगुनाही का
शरीफ शख्स को मिलती सदा सज़ाएँ हैं

तड़प हिरास घुटन बेकसी अकेलापन
अगर वो साथ है, तो दूर ये बलाएँ हैं

रकीब हों, के हों कातिल, के कोई अपना हो
हमारे दिल में सभी के लिए दुआएँ हैं

वही जो सुन के, पलट के भी देखता ही नहीं
उसी के वास्‍ते इस दिल की सब सदाएँ हैं

चला हजूम सदा साथ झूठ के " नीरज "
लिखी नसीब में सच के सदा खलाएं हैं



हिरास : निराशा
बेकसी : निःसहाय
ख़लाएँ :एकाकीपन

Sunday, September 5, 2010

मेघ छाएं तो मगन हो नाचता

मेरी दो सौ वीं पोस्ट के साथ ही आज ब्लॉग के तीन साल भी पूरे हुए....आज ये गीत गाने का मन कर रहा है: --

"मुझे ख़ुशी मिली इतनी कि मन में ना समाय, पलक बंद कर लूं कहीं छलक ही ना जाये"

ये ख़ुशी बिना आप सब के सहयोग के मिलनी असंभव थी. तो आप सबको तहे दिल से शुक्रिया मेहरबानी करम....



झूम कर आई घटा घनघोर है
डर रहा हूँ घर मेरा कमज़ोर है

मेघ छाएं तो मगन हो नाचता
आज के इन्‍सां से बेहतर मोर है

चल दिया करते हैं बुजदिल उस तरफ
रुख हवाओं का जिधर की ओर है

फासलों से क्‍यों डरें हम जब तलक
दरमियाँ यादों की पुख्ता डोर है

जिंदगी में आप आये इस तरह
ज्यूँ अमावस बाद आती भोर है

इस जहाँ में तुम अकेले ही नहीं
हर किसी के दिल बसा इक चोर है

बात नज़रों से ही होती है मियां
जो जबां से हो वो 'नीरज' शोर है


(इस ग़ज़ल के सिर्फ लफ्ज़ मेरे हैं, करिश्मा गुरुदेव पंकज सुबीर जी का है)

Monday, August 23, 2010

ज़र्द पत्ते तो सदा खुद ही गिरा करते हैं


बोल कर सच ही जियेंगे जो कहा करते हैं
साथ लेकर वो सलीबों को चला करते हैं

आ पलट देते हैं हम मिल के सियासत जिसमें
हुक्मरां अपनी रिआया से दगा करते हैं

साथ जाता ही नहीं कुछ भी पता है फिर क्यूँ
और मिल जाये हमें रब से दुआ करते हैं

धूप दहलीज़ से कमरों में उन्‍हीं के पहुँची
खोल दरवाज़े घरों के जो रखा करते हैं

फूल हाथों में, तबुस्सम को खिला होंटों पर
तल्खिया सबसे छुपाया यूँ सदा करते हैं

दोष आंधी को भले तुमने दिये हैं लेकिन
ज़र्द पत्ते तो सदा खुद ही गिरा करते हैं

इक गुजारिश है कि तुम इनको संभाले रखना
दिल के रिश्ते हैं ये मुश्किल से बना करते हैं

चाह मंजिल की मुझे क्यूँ हो बताओ "नीरज"
हमसफ़र बन के मेरे जब वो चला करते हैं

Saturday, August 14, 2010

तिरंगा उन्हीं की सुनाता कहानी

स्वतंत्रता दिवस की आप सब को हार्दिक शुभ कामनाएं

मुंबई में मेरे एक मित्र हैं सतीश शुक्ल जी जिनसे मैं अभी तक नहीं मिला हूँ लेकिन मित्रता का मिलने से कोई सम्बन्ध नहीं है, ये बात मैंने ब्लॉग जगत में आने के बाद ही जानी है. उनके बारे में विस्तृत जानकारी तो आप नीचे पढ़ ही लेंगे लेकिन आज स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर आईये पढ़ते हैं उनकी देश प्रेम से ओतप्रोत एक ग़ज़ल :-

शहीदे वतन का नहीं कोई सानी
वतन वालों पर उनकी है मेहरबानी

वतन पर निछावर किया अपना सब कुछ
लड़कपन का आलम बुढ़ापा जवानी

किया दिल से हर फैसला ज़िंदगी का
कोई बात समझी, न बूझी, न जानी

लड़े खून की आख़िरी बूँद तक वो
लहू की नदी भी पड़ी है बहानी

कफ़न की कसम, “हो हिफाज़त वतन की”
वसीयत शहीदों की है मुहँजबानी

वतन के लिए जो फ़ना हो गए हैं
तिरंगा उन्हीं की सुनाता कहानी

'रक़ीब' उनका क्यों ज़िक्र दो दिन बरस में
वो हैं जाविदां ज़िक्र भी जाविदानी

सतीश जी के बारे में संक्षिप्त परिचय यूँ है, ग़ज़ल पसंद आने पर आप उन्हें सीधे ही बधाई दे सकते हैं:

नाम : सतीश चन्द्र शुक्ला
उपनाम : रक़ीब लखनवी
प्रचलित नाम : सतीश शुक्ला "रक़ीब"
जन्म स्थान : लखनऊ , उत्तर प्रदेश , भारत
जन्म तिथि : अप्रैल 04 , 1961
पिता : श्री कृपाशंकर श्यामबिहारी शुक्ला
माता : श्रीमती लक्ष्मी देवी शुक्ला
भाई - बहन : ऊषा, शोभा, सुनील, सुधीर, आशा, शशि, सुशील एवं मंजू
पत्नी एवं पुत्री : अनुराधा - सागरिका

संपर्क : बी - 204, एक्सेल हाऊस, १३ वां रास्ता, जुहू स्कीम, जुहू, मुंबई - 400049.
: 022 2620 9913 / 2671 9913 / 09892165892
: sckshukla@rediffmail.com / sckshukla@gmail.com
: www.raqeeblucknowi.mumbaipoets.com

शिक्षा : एम. ए. , बी. एड. , डी.सी.पी.एस.ए.(कम्प्युटर)

वर्तमान सम्प्रति : इस्कॉन के जुहू , मुंबई स्थित गेस्ट हाऊस में सहायक प्रबंधक की हैसियत
से कार्यरत

प्रकाशन : "आज़ादी" सहारा इंडिया द्वारा अगस्त १९९२ में लखनऊ (उ. प्र.) से
: "कुछ कुछ" आज का आनंद द्वारा सितम्बर 2001 में पूना (महाराष्ट्र) से
: "मोहब्बत हो अगर पैदा" आज का आनंद द्वारा अक्टूबर 2001 पूना(महाराष्ट्र)से
: "खाक़ में मिल गए" आज का आनंद द्वारा नवम्बर 2001 पूना (महाराष्ट्र) से

पुरस्कार एवं सम्मान : मुंबई की सामजिक एवं साहित्यिक संस्था आशीर्वाद द्वारा विशेष सम्मान मई
2008 में.

Monday, August 2, 2010

जो न समझे नज़र की भाषा को

एक निहायत सीधी सादी मासूम सी ग़ज़ल जिसके हुस्न को संवारा है गुरुदेव पंकज सुबीर जी ने




आप आंखों में बस गए जब से
नींद से दुश्‍मनी हुई तब से

आग पानी हवा ज़मीन फ़लक
और क्या चाहिए बता रब से

पहले लगता था वो भी औरों सा
दिल मिला तो लगा जुदा सब से

जो न समझे नज़र की भाषा को
क्‍या कहा जाये फिर उसे लब से

शाम होते ही जाम ढलने लगे
होश में भी मिला करो शब से

हो गया इश्क आप से जानम
जब कहा, पूछने लगे कब से ?

शुभ मुहूरत की राह मत देखो
मन में ठानी है तो करो अब से

तुम अकेले तो हो नहीं 'नीरज'
ज़िन्दगी किसकी कट सकी ढब से ?

Monday, July 19, 2010

कोयले की आंच पे रोटी




तन्‍हाई की रातों में न तुम याद यूं आओ
हारूंगा मुझे मुझसे ही देखो न लडाओ

तुम राख करो नफरतें जो दिल में बसी हैं
इस आग से बस्ती के घरों को न जलाओ

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

Monday, July 5, 2010

पूजा की थाली हो गई


बात सचमुच में निराली हो गईं
अब नसीहत यार गाली हो गई

ये असर हम पर हुआ इस दौर का
भावना दिल की मवाली हो गई

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियां
वो समझ पूजा की थाली हो गई

तय किया चलना जुदा जब भीड़ से
हर नज़र देखा, सवाली हो गयी

कैद का इतना मज़ा मत लीजिये
रो पड़ेंगे, गर बहाली हो गयी

थी अमावस सी हमारी ज़िन्दगी
मिल गये तुम, तो दिवाली हो गयी

हाथ में क़ातिल के ‘‘नीरज’’ फूल है
बात अब घबराने वाली हो गई

Monday, June 21, 2010

थम सा गया है वक्त





होगी तलाशे इत्र ये मछली बज़ार में
निकले तलाशने जो वफ़ा आप प्‍यार में

चल तो रहा है फिर भी मुझे ये गुमाँ हुआ
थम सा गया है वक्त तेरे इन्तजार में


जब भी तुम्हारी याद ने हौले से आ छुआ
कुछ राग छिड़ गये मेरे मन के सितार में


किस्मत कभी तो पलटेंगे नेता गरीब की
कितनों की उम्र कट गयी इस एतबार में


दुश्वारियां हयात की सब भूल भाल कर
मुमकिन नहीं है डूबना तेरे खुमार में

ये तितलियों के रक्स ये महकी हुई हवा
लगता है तुम भी साथ हो अबके बहार में

वो जानते हैं खेल में होता है लुत्फ़ क्या
जिनको न कोई फर्क हुआ जीत हार में


अपनी तरफ से भी सदा पड़ताल कीजिये
यूँ ही यकीं करें न किसी इश्तिहार में


'नीरज' किसी के वास्ते खुद को निसार कर
खोया हुआ है किसलिये तू इफ्तिखार में

इफ्तिखार= मान, कीर्ति, विशिष्ठता, ख्याति


( अज़ीज़ दोस्त और छोटे भाई तिलक राज जी को शुक्रिया कहे बगैर ये ग़ज़ल मुकम्मल नहीं होगी )

Monday, June 7, 2010

मुश्किलों का गणित ये कैसा है



हाल बेताब हों रुलाने को
तू मचल कहकहे लगाने को

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को

सांस लेना मुहाल कर देगा
सर चढ़ाया अगर ज़माने को

बिजलियों का है खौफ़ गर तारी
भूल जा आशियाँ बनाने को

हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को

Monday, May 24, 2010

मैंने तेरा नाम लिखा है

दोस्तों आज मैं आपको अपने आदरणीय गुरुदेव श्री प्राण शर्मा साहब की वो कविता पढवाता हूँ जो मुझे बेहद पसंद है और जिसने बहुत प्रशंशा अर्जित की है.उम्मीद करता हूँ के आप सब भी इसे पढ़ कर मेरी तरह ही आनंदित होंगे. कुछ माह पूर्व ये कविता आदरणीय महावीर जी के ब्लॉग की शोभा भी बढ़ा चुकी है.


जीवन में एक बार कभी जो
वक्त मिले तो देखने जाना
ताजमहल के एक पत्थर पर
मैंने तेरा नाम लिखा है

तू क्या जाने तब भी मैंने
दुनिया का हर सुख बिसरा कर
तुझ को मन से ही था चाहा
तू क्या जाने तब भी मैंने
खुद से क्या जग से भी बढ़ कर
तेरा था हर काम सराहा
तू क्या जाने तेरी यादें
मन की छोटी मंजूषा में
अब तक सम्भाले बैठा हूँ
तेरी गर्वीली अंगड़ाई
तेरी प्यार भरी पहुनाई
जीवन में पाले बैठा हूँ
तेरी सुविधा की खातिर ही
नाम अपना घनश्याम लिखा है.

जीवन में एक बार कभी जो
वक्त मिले तो देखने जाना
ताजमहल के एक पत्थर पर
मैंने तेरा नाम लिखा है

याद मुझे है अब तक सब कुछ
ताजमहल के पिछवाड़े में
तेरा मेरा मिलना जुलना
याद मुझे है अब तक सब कुछ
धीरे धीरे मेरे मन का
तेरे सुन्दर मन से खुलना
याद मुझे है अब तक सब कुछ
पीपल की शीतल छाया में
तेरा मेरा बैठे रहना
याद मुझे है अब तक सब कुछ
आँखों ही आँखों से मन की
प्यारी प्यारी बातें कहना
प्यार सदा जीवित रहता है
मैंने यह पैग़ाम लिखा है

जीवन में एक बार कभी जो
वक्त मिले तो देखने जाना
ताजमहल के एक पत्थर पर
मैंने तेरा नाम लिखा है

जी करता है अब भी वैसे
लाल, गुलाबी फूलों जैसे
दिन अपनी ख़ुशबू बिखराएं
जी करता है अब भी वैसे
सावन के बादल नर्तन कर
प्यार भरी बूँदें बरसायें
जी करता है अब भी वैसी
सोंधी सोंधी मस्त हवाएं
तन मन दोनों को लहरायें
वैसे ही हम नाचें झूमें
वैसे ही हम जी भर घूमें
वैसी ही मस्ती बिखराएँ
तुझ से मिलने की खातिर ही
एक जरूरी काम लिखा है.

जीवन में एक बार कभी जो
वक्त मिले तो देखने जाना
ताजमहल के एक पत्थर पर
मैंने तेरा नाम लिखा है

प्राण शर्मा

Monday, May 10, 2010

मैं लाकर गुल बिछाता हूं



तुझे दिल याद करता है तो नग्‍़मे गुनगुनाता हूँ
जुदाई के पलों की मुश्किलों को यूं घटाता हूं

जिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद में
हवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूं

अदावत* से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसले
हटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूं

*अदावत = दुश्मनी, घृणा

नहीं तहजीब ये सीखी कि कह दूं झूठ को भी सच
गलत जो बात लगती है गलत ही मैं बताता हूं

मुझे मालूम है मैं फूल हूं झर जाऊंगा इक दिन
मगर ये हौसला मेरा है हरदम मुस्‍कुराता हूं

नहीं जब छांव मिलती है कहीं भी राह में मुझको
सफर में अहमियत मैं तब शजर की जान जाता हूं

घटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी 'नीरज'
तुम्‍हारा अक्‍स इनमें ही मैं अक्‍सर देख पाता हूँ

ये ग़ज़ल अभी ख़त्म नहीं हुई एक मक्ता और ज़ेहन में आया है जिसे मैं आप तक पहुँचाने में खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ...{ये कमजोरी है जिस पर काबू पाना जरूरी है}...चलिए ये बताइए के जब हम हुस्न-ऐ-मतला कह सकते हैं तो हुस्न-ऐ-मक्ता क्यूँ नहीं? सोचिये और जब तक जवाब मिले तब तक मैं ये एक और मक्ता आपको नज़र करता हूँ.

उतरता हूँ कभी 'नीरज' मैं बन कर बीज धरती पर
फसल बनकर तभी तो झूमता हूँ लहलहाता हूँ

Monday, April 19, 2010

यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं



सब को अपना हाल सुनाना, ठीक नहीं
औरों के यूँ दर्द जगाना, ठीक नहीं

हम आँखों की भाषा भी पढ़ लेते हैं
हमको बच्चों सा फुसलाना, ठीक नहीं

ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

ज़िद पर अड़ने वालों को छोडो यारो
दीवारों से सर टकराना, ठीक नहीं

देने वाला घर बैठे भी देता है
दर दर हाथों को फैलाना, ठीक नहीं

सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं

(इस ग़ज़ल को,बिना छोटे भाई तिलक राज कपूर जी की मदद के, इस रूप में लाना मुमकिन नहीं था."धन्यवाद" शब्द उनके इस सहयोग के लिए बहुत छोटा है)