Monday, December 7, 2020

किताबों की दुनिया - 220

ये जो मौजूद है इसी में कहीं 
इक ख़ला है तुझे नहीं मालूम 

तब कहाँ था वो अब कहाँ पर है 
पूजता है ! तुझे नहीं मालूम 

इश्क़ खुलता नहीं किसी पर भी 
दायरा है ! तुझे नहीं मालूम 

रोते-रोते ये क्या हुआ तुझको 
हँस पड़ा है ! तुझे नहीं मालूम 

जिस किताब का ज़िक्र हम करने जा रहे हैं उसके शायर के बारे में किताब के फ्लैप पर क्या  लिखा है आइये सबसे पहले वो पढ़ते हैं। "पहली बात कि ये इस शायर की शायरी में जब मुहब्बत दाख़िल होती है तो पूरी कायनात में फूल खिलने लगते हैं। गुस्सा फूटता है तो बदला नहीं बेबसी होती है। जब ये शायर हैरत के संसार में दाख़िल होता है तो पाठक भी हैरतज़दा हो जाते हैं और सबसे बड़ी बात ये कि ये बने बनाये ढर्रे पर नहीं चलना चाहता और ख़ुद ही सब अनुभव करना चाहता हैं। 
सबसे ख़ास बात ये शायर बहुत ईमानदारी से शायरी करता हैऔर जैसा कि इस किताब भूमिका में लिखा है 'ईमानदार शायरी यूँ ही अवाम को बैचैन करने वाली होती है। ये कुछ-कुछ ठहरे पानी में कंकर, बल्कि भारी पत्थर फेंकने का काम है। ज़ाहिर है पानी उछलेगा आवाज़ होगी और छींटे पड़ेंगे तो लोग मार से बचने की कोशिश ही करेंगे, मगर ईमानदार शायरी से कैसे बचा जा सकता है ? बंद कमरे के दरवाज़ों, दीवारों को पार कर सुनने की शक्ति पर दस्तकें ही नहीं देती अपितु हथौड़े बजाती है। "      
    
उसे भी ज़िद थी कि माँगूँ तो सब जहाँ देखे   
दराज़ मैं भी कहाँ हाथ करने वाला था   
दराज़ : फैलाना 

खुली हुई थी बदन पर रूवां रूवां आँखें 
न जाने कौन मुलाक़ात करने वाला था 

मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी 
चिराग़ जैसे कोई बात करने वाला था 

क़िताब 'सरहद के आर-पार की शायरी ' शीर्षक के अंतर्गत छपने वाली सीरीज जिसके बारे में आप पहले पढ़ चुके हैं में दो शायर होते हैं एक भारत से दूसरे पाकिस्तान से। इस बार भारतीय शायर हैं जनाब 'तुफ़ैल चतुर्वेदी' साहब जिनकी बेहतरीन शायरी के अलावा इस किताब में आप उनकी लिखी लाजवाब भूमिका भी पढ़ सकते हैं उन्होंने ने ही अपनी और पाकिस्तानी शायर की शायरी के संपादन की जिम्मेवारी भी उठाई है। पाकिस्तानी शायर हैं जनाब 'रफ़ी रज़ा' साहब जिनकी उर्दू ग़ज़लों का लिप्यांतरण नौजवान शायर 'इरशाद खान 'सिकंदर' साहब ने किया है।  
आज हम पाकिस्तानी शायर 'रफ़ी रज़ा' की शायरी और उनकी ज़िन्दगी पर थोड़ी बहुत बात करेंगे। थोड़ी बहुत इसलिए कि उनकी शायरी पर ही इतनी लम्बी बात हो सकती है कि जिसे समेटने में अच्छी-ख़ासी मोटी क़िताब भी छोटी पड़े। 
रफ़ी रज़ा साहब का नम्बर तुफ़ैल साहब ने दिया और रफ़ी साहब से अपने बारे में मुझे बताने की सिफ़ारिश सिकंदर भाई ने की, मैं दोनों का शुक्रगुज़ार हूँ क्यूंकि उनके सहयोग के बिना ये पोस्ट संभव नहीं थी। 
पाकिस्तान में चिनाब नदी के किनारे 'रबवह' (रबवा) जो पंजाब प्रोविंस में है में 9 अक्टूबर 1962 को मोहम्मद रफ़ी का जन्म हुआ। ये नाम उनकी ख़ाला ने बहुत इसरार करके रखवाया जो भारत के विलक्षण और लोकप्रिय गायक 'मोहम्मद रफ़ी' की जबरदस्त प्रशंसक थीं। बाद में मोहम्मद नाम कहीं पीछे छूट गया और सिर्फ़ रफ़ी रह गया। रज़ा तखल्लुस भी उन्होंने बाद में रखा। अहमदिया जमात में पैदा हुए रफ़ी रज़ा का जीवन आसानी भरा नहीं रहा। यहाँ ये बताना जरूरी हो जाता है कि अहमदिया इस्लाम का एक संप्रदाय है। इसका प्रारंभ मिर्ज़ा गुलाम अहमद (1835-1908) के जीवन और शिक्षाओं से हुआ। अहमदिया आंदोलन के अनुयायी गुलाम अहमद को मुहम्मद साहब के बाद एक और पैगम्बर (दूत) मानते हैं जबकि इस्लाम में पैगम्बर मोहम्मद ख़ुदा के भेजे हुए अन्तिम पैगम्बर माने जाते हैं। दुनिया भर के दूसरे मुसलमान इन्हें काफ़िर मानते है। इनके हज करने पर भी प्रतिबंध है। सन 1974 में अहमदिया संप्रदाय के मानने वाले लोगों को पाकिस्तान में एक संविधान संशोधन के जरिए गैर-मुस्लिम करार दे दिया गया था । एक मुस्लिम देश में ग़ैर-मुस्लिम माने जाने वाले समुदाय की क्या हालत होती है ये वही समझ सकता है जिसने इसे भुगता है।     .

  
दुख का इलाज ढूंढ रहा था बहाव में 
रो-रो के मैंने और दुखा ली हुई है आँख 
*
जाते-जाते न मुड़ के देख मुझे 
शाम के वक़्त शाम होने दे 
*
ये जो कनारे-चश्म तड़प सी है, रंज है 
ऐ दिल ! यक़ीन कर अभी रोया नहीं गया 
*
मैं बुझाता हूँ किसी इश्क़ में मर्ज़ी से अगर 
जा चमकता है कहीं और सितारा मेरा 
*
मैं शाख़े-उम्र पे बस सूखने ही वाला था 
लिपट गया कोई आकर हरा-भरा मुझसे 
*
इल्म ख़ुद भी बड़ी मुसीबत है 
इससे बढ़ कर वबाल है ही नहीं 
*
उसको अंदाज़ा मिरी प्यास का फिर 
रेत को पानी पिलाने से हुआ 
*
दुश्मन से ही लड़ा है अभी ख़ुद से तो नहीं 
मैदाने-कार-ज़ार में आया नहीं है तू 
 मैदाने-कार-ज़ार : युद्ध स्थल 
*
तू ने नफ़रत से मिरी जान तो क्या लेनी थी 
मैं यही काम मुहब्बत से किए जाता हूँ 

एक चलना है कि खिंचता ही चला जाता हूँ 
एक रुकना है कि ताकत से किए जाता हूँ  
 
रबवह(रबवा) में उन्होंने पहले 'तालीम उल--इस्लाम' स्कूल और फिर कॉलेज से ऍफ़ एस सी तक की तालीम हासिल की। तालीम के साथ-साथ देश दुनिया में फैले मज़हबों के बारे में भी जानकारी की। आठवीं क्लास तक आते-आते वो इस्लाम की तारीफ़ पढ़ चुके थे। 
पढ़ने का शौक रफ़ी साहब को दीवानगी की हद से आगे तक था। ये शौक़ उन्हें अपनी वालिदा से मिला। स्कूल की किताबों के अलावा वो जो जहाँ कहीं कुछ भी लिखा मिलता उसे बहुत दिलचस्पी से पढ़ते चाहे वो सौदा सुलफ़ के साथ आये कागज़ पर लिखा हो या दवाओं के साथ आये रैपर पर। दवाओं के रैपर पढ़ पढ़ कर तो उन्हें बहुत सी दवाओं के फार्मूले तक याद हो गए थे जो अमूमन मेडिकल सेल्स रिपेरजेंटेटिव को भी याद नहीं हुआ करते।
ऍफ़ एस सी करने के बाद वो रबवह छोड़ कर इंस्ट्रूमेंटेशन इंजिनीयरिंग के कोर्स के लिये, जो तीन साल का था, सरगोधा के पॉलिटेक्निक कॉलेज में पढ़ने चले गये। ये कोर्स तीन की जगह चार साल में पूरा हुआ ,क्यों ? इसके पीछे की कहानी ये बताती है कि किसी भी मुल्क में  डिक्टेटरशिप लागू होने पर आम इंसान की ज़िन्दगी पर क्या असर पड़ता है। डिक्टेटर को जो वो सोचता है उसे लागू करने की पूरी आज़ादी होती है वो अपनी भलाई के लिए कुछ भी कर गुजरने से गुरेज़ नहीं करता। उसे अवाम की कोई परवाह नहीं होती। ये 'जिया उल हक़' के शासन काल की बात है। तक्षिला के पॉलिटेक्निक कॉलेज में कुछ लड़कों ने जिया के ख़िलाफ़ बग़ावत की तैयारी के लिए हथियार कॉलेज के एक कमरे में छुपाने शुरू कर दिए। ये बात फ़ौजियों को किसी तरह पता चल गयी। जिया उल हक़ तक जब ये ख़बर पहुंची तो उसने, बजाय एक तक्षिला के पॉलिटेक्निक कॉलेज पर एक्शन लेने के, देश के सभी पॉलिटेक्निक कॉलेजों पर एक्शन ले लिया और उन्हें एक साल के लिए बंद कर दिया। इस तुग़लकी निर्णय से पूरे मुल्क़ के बेक़सूर छात्रों का जिनका इस बग़ावत से दूर दूर का भी रिश्ता नहीं था ,पूरा एक साल ख़राब हो गया। 
इंस्ट्रूमेंटेशन की पढाई के साथ साथ रफ़ी साहब ने प्राइवेटली बी. ऐ. की डिग्री जिसमें उर्दू एडवांस और लिटरेचर एडवांस के साथ साथ फ़ारसी भी शामिल थी , हासिल कर ली। इस तरह उन्हें उर्दू साहित्य की अच्छी खासी जानकारी हो गयी।         
       
ए वाइज़ा तू ख़ुदा की तरफ़ से है ही नहीं 
इसीलिए तिरा लहजा डपटने वाला है 
वाइज़ा : धर्मोपदेशक 
*
डर रहा था मैं गहरी खाई से 
पाँव फिसला तो मेरा डर निकला 
*
तो क्या दुआएँ करूँ सानहों के होने की 
गले मिले हैं सभी सानहे के होने  से 
सानहों : दुर्घटनाओँ 
*
जिसकी जुबां का ज़ख्म मिरी रूह तक गया 
कौन उससे पूछता तिरी तलवार है कहाँ 
*
तू मिल रहा है मुझसे मगर आग है किधर 
मिट्टी को क्या करूँ मैं ,मुझे जान चाहिये 
*
वो रौशनी मिरी बीनाई ले गयी पहले 
फिर उसके बाद मिरा देखना मिसाल हुआ 
*
ख़ुदा का नाम लिया और फिर भरा सागर 
लो मैं शराब को ख़ुद ही हराम करने लगा 
*
बहुत दिनों से ख़मोशी थी चीख़ कर टूटी 
जो ख़ौफ़ था मिरे अंदर दहाड़ कर निकला 
*
महक रही है कोई याद गुफ़्तगू की तरह 
सुलग सुलग के अगरबत्ती जल रही है कोई  
*
वो पहली मुहब्बत चली आती है बुलाने 
वो पहला ख़सारा मुझे रुकने नहीं देता 
ख़सारा : घाटा 


रफ़ी साहब को खेल कूद में बेहद दिलचस्पी थी। स्कूली दिनों में वो तकरीबन हर खेल की टीम में शिरक़त करते और टीम को जिताते लेकिन उनके इस हुनर को किसी खास टूर्नामेंट के वक़्त ,सिफ़ारिशी बच्चों की ख़ातिर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता। जब भी स्कूल के बाहर कोई टीम भेजनी होती उसमें उनकी जगह किसी रसूख़दार बच्चे का नाम होता। ये भेदभाव दुनिया भर में खेलों में ही नहीं बल्कि ज़िन्दगी में कहाँ नहीं होता? रफ़ी साहब इस बात को जानते थे लेकिन जब ये भेदभाव वो अपने साथ जरूरत से ज्यादा होते देखते तो इस नाइंसाफी पर खून के घूँट पी कर रह जाते। उन्होंने टीम वाले खेलों को छोड़ उन खेलों की तरफ़ रुख़ किया जिसमें आप अकेले अपने दमखम पर हिस्सा लेते हैं जैसे एथेलेटिक्स और खूब मैडल जीते। 
आठवीं जमात से रफ़ी साहब को लिखने का शौक़ परवान चढ़ा। उन्हें लगा कि कहानियाँ लिखने से ग़ज़लें और नज़्म लिखना आसान है। इसके लिए उस्ताद की तलाश शुरू हुई, कुछ मिले भी लेकिन वहां भी जब उन्होंने दोयम दर्ज़े के शायरों को वाह वाही पाते और उस्ताद को उनकी हौसला अफ़ज़ाही करते देखा तो उस्ताद की तलाश बंद कर दी और किताबों का सहारा लिया। किताबों को अपना उस्ताद बनाया उन्हीं से उरूज़ सीखा और ग़ज़ल में लफ्ज़ बरतने का सलीका भी। आज वो जिस मुकाम पर हैं वो अपने इस पढ़ने की आदत की वज़ह से ही हैं।  
उन्होंने अपनी ग़ज़ल सं 1979 में कही जो लाहौर के उस रिसाले में छपी जो अहमीदियों में बहुत मक़बूल था। बाद में उनकी ग़ज़लें बग़ावती तेवर वाली थीं जो जिया की हुकूमत के ख़िलाफ़ थीं लेकिन किस्मत से फ़ौजियों की नज़रों से बच गयीं वरना उन दिनों बग़ावत करने और शासक के ख़िलाफ़ लिखने वालों को उठा कर जेल में डाल दिया जाता था। 
धीरे धीरे वो पहले छोटी छोटी नशिस्तों में और फिर मुशायरों में ग़ज़लों में पढ़ते पढ़ते मक़बूल होते तो होते गए लेकिन उन्हें ये मकबूलियत थोथी लगी। उन्हें  ये बात समझ में आने लगी कि अगर शायरी की दुनिया में अपना नाम पुख़्ता तौर पर दर्ज़ करवाना है तो वो लिखना पड़ेगा जो सबसे अलग हो। चौंकाने वाली शायरी कुछ वक्त आपको वाह वाही दिला देती है लेकिन उसके बाद उसका कोई वजूद नहीं रह जाता। 

करती है हर घड़ी मिरे दिल में शुमारे-उम्र 
क़िस्तों में क़ैद से यूँ रिहा हो रहा हूँ मैं 
शुमारे-उम्र : उम्र की गिनती  
*
बदन थमाते हुए ये नहीं बताया था 
तमाम उम्र ये कोहे-गिराँ पकड़ना है 
कोहे-गिराँ : भारी पहाड़ 
*
ये सूरज बुझ रहा है जो उफ़क़ में 
मुझे अपनी कहानी लग रही है 
*
एक इस उम्र का ही काटना काफ़ी नहीं क्या 
इश्क़ का बोझ मिरी जाँ पे इज़ाफ़ी नहीं क्या 
इज़ाफ़ी : अतिरिक्त 
*
तुम मिल गए तो देखो तुम्हारी ख़ुशी को फिर 
चारों तरफ़ से दुख ने हिफाज़त में ले लिया 
*
सब्ज़ होने से हक़ीक़त तो नहीं बदलेगी 
लाख इतराए मगर अस्ले-शजर मिट्टी है 
अस्ले-शजर : पेड़ की वास्तविकता 
*
अब बोलने लगा हूँ ज़मीं के ख़िलाफ़ भी 
मुझको बना रहा है निडर इतना आसमान 
*
नतीजा कुछ भी निकले कुछ तो निकले 
मुसलसल इम्तिहाँ का क्या किया जाये 
*
सुनने से तो ख़ुशबू का तअल्लुक़ भी नहीं है 
क्यों बात वो करता है महकने के बराबर 
*
 ये फड़फड़ाता हुआ शोला खोल दे कोई 
बंधा चराग़ से क्यों आग का परिंदा है 

इंस्ट्रूमेंटेशन के बाद उनकी दिलचस्पी इलेक्ट्रॉनिक्स की और हुई इसलिए उन्होंने इलेक्टॉनिक्स के क्षेत्र में तालीम हासिल की और पाकिस्तान में जब कम्यूटर आया तो वो उस इंडस्ट्री के साथ जुड़ गए। ये उनकी ज़िन्दगी का टर्निंग प्वाइंट था क्यूंकि इसी इंडस्ट्री ने उन्हें कैनेडा में बसने और नौकरी का मौका दिया और वो पाकिस्तान से कैनडा शिफ्ट हो गए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कम्यूटर कंपनियों में काम करते करते वो जल्द ही उकता गए और फ़ार्मेसी की और मुड़ गए  लेकिन वहां भी उनका मन ज़्यादा देर तक नहीं टिका । बेचैनी की हालत में किसी ने उन्हें 'एंटोमोलोजी' का कोर्स करने की सलाह दी। एंटोमोलोजी आप जानते होंगे कि इंसेक्ट्स और उनके इंसान के साथ संबंध का विज्ञान है। केनेडा की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से उन्होंने एंटोमोलोजी का कोर्स किया और वो अभी उसी से जुड़ी इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। 
ये सब करने के साथ साथ शायरी का सफ़र भी लगातार चलता रहा। शायरी में उन्होंने अपनी मेहनत से अपनी जगह बनाई।  रफ़ी साहब का मानना है कि आप जो कुछ भी करें दिल से करें और सबसे अलग करने की सोचें। पगडंडियों पर चलने वालों के पाँव के निशान उस पर ज़्यादा देर तक नहीं रह पाते, यदि आप अपने पाँव के निशान छोड़ना चाहते हैं तो आपको अलग रास्ते पर ही चलना होगा। एक पिटे हुए धारे से खुद की शायरी को अलग रखना बेहद मुश्किल काम है। रफ़ी साहब चाहते हैं कि उनकी शायरी पढ़ कर लोग पहचान लें कि ये क़लाम रफ़ी रज़ा का है। 

मिरे मिज़ाज को बख़ियागरी नहीं आती 
तअल्लुक़ात का धागा उधड़ता रहता है 
*
खिड़की से देखते हुए क्यों पीछे हट गईं 
क्या रौशनी गली की बुझाने लगी हो तुम 
*
सिमटने की कोई हद पार कर आया हूँ क्या मैं 
जो अब मेरा बिखर जाना ज़रूरी हो गया है 
*
कहना तो था कि ख़ुश हूँ तुम्हारे बग़ैर भी  
आँसू मगर कलाम से पहले ही गिर गया 
*
सोचते रहने में अंदाज़ा नहीं था मुझको 
सोचते रहने में मुहलत ने निकल जाना है 
*
न जाने किसको ज़रुरत पड़े अँधेरे में 
चराग़ राह में देखा था घर नहीं लाया 
*
सर उठाता हूँ तो ढह जाता हूँ 
कोई दीवार हूँ मिट्टी की तरह 

रफ़ी साहब का मानना है कि "एक नयी धारा या सोच या तर्ज़, जिसे कबूलियत भी मिले बल्कि क़बूलियते आम मिले, को शायरी में पैदा करना बहुत मुश्किल काम है क्यूंकि यदि अलग करने की फ़िक्र में आप शायरी की जुबान या उसकी स्टाइल या डिक्शन बदल देते हैं तो फिर उसकी तासीर कम हो जाने का डर रहता है। उर्दू ग़ज़ल का मसअला ये है बल्कि ख़ासियत ये है कि इसे तग़ज़्ज़ुल के बगैर क़ुबूलियत नहीं मिलती। तग़ज़्ज़ुल का मतलब ऐसे है जैसे जब आपको भूख़ लगती है और आपको खाना दिखाया जाता है तो उस खाने की खुशबू से उसको देखने से आपके मुँह में स्लाइवा बनना शुरू हो जाता है जिसे राल टपकना भी कहते हैं । ग़ज़ल में तग़ज़्ज़ुल वो राल ही है जो श्रोता सुनने से पहले खुद को तैयार करते हुए अपने ज़ेहन को एक खास रौ में ले के आता है एक ख़ास माहौल उसके ज़ेहन में होता है वो उसी को एक्पेक्ट करता और उसी पर रिएक्ट करता है। याने भर पेट खाने के बावजूद खाने को देखते रहने और उसे लगातार खाने को दिल करे। जिसे खा कर वो कहे कि अहा स्वाद आ गया। ये स्वाद ही तग़ज़्ज़ुल है। स्वाद जो आपके सेंसेस को जगा दे।  बासी फ़ीका अधपका  खाना सिर्फ़ बेहद भूखा इंसान ही खा सकता है। भरपेट इंसान को तो उसे देखना भी गवारा नहीं होगा खाना तो दूर की बात है ।  देखिये दुनिया भर में मसाले वही होते हैं नमक मिर्च हल्दी धनिया आदि उनका अनुपात ही खाने में स्वाद लाता है , ये अनुपात सीखना ही असली हुनर है।  
 अपनी शायरी में जो ये स्वाद याने तग़ज़्ज़ुल पैदा कर लेता है वो क़ामयाब हो जाता है।
शायरी सहज होनी चाहिए ,बहती हुई सी ,रवानी लिए हुए। चौंकाने वाली शायरी की उम्र लम्बी नहीं होती चाहे उसे कितनी भी मक़बूलियत मिली हो। कामयाबी के लिए एक बात ये भी है कि अपनी शायरी में आप मुश्किल लफ़्ज़ों के इस्तेमाल से परहेज़ करें। उन्होंने अपनी शायरी में उन लफ़्ज़ों का इस्तेमाल भी किया है  जिनमें फ्लो नहीं होता जैसे पछाड़ उखाड़ झाड़ आदि और इसे लोगों ने इसे पसंद भी किया।       
      
कौन कहता है कि ईमान से डर लगता है 
मुझको अल्लाह के दरबान से डर लगता है 

ग़ैर के डर का वो अंदाज़ा लगा सकता है 
जिस मुसलमां को मुसलमान से डर लगता है 

झाँकते क्यों नहीं ख़ुद अपने गिरेबान में आप 
आप को अपने गिरेबान से डर लगता है 

कल  सुनी गुफ़्तगू हैवानों की छुपा कर मैंने 
सभी कहते थे कि इंसान से डर लगता है 

रफ़ी साहब ने कुछ अलग किस्म की शायरी करने के लिए अपने साथ के और पुराने शायरों को पढ़ना शुरू किया और उनपर आलोचनात्मक लेख भी लिखने लगे। आलोचना में उन्होंने बहुत ईमानदारी से काम किया और आलोचना करते वक्त ये नहीं देखा कि शायरी उनके दोस्तों की है या दुश्मनों की। कुछ तो मज़हबी पाखण्ड के विरोधी विचारों के कारण और कुछ आलोचना में सच कहने के कारण उनके दुश्मनों की तादाद दोस्तों से बहुत ज़्यादा हो गयी। इससे उनकी सोच में बिल्कुल भी फ़र्क नहीं पड़ा। वो साफ़ तौर पर सबसे  कहते भी हैं कि फलाँ शख़्स की शायरी में मुझे ये कमी नज़र आ रही है यदि आप मेरी दलील से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते तो तो कोई बात नहीं आप बताएं कि मैं कहाँ ग़लत हूँ और यदि आप साबित करते हैं कि मैं ग़लत हूँ तो मुझे अपनी ग़लती मानने में कोई ऐतराज़ नहीं है लेकिन होता इसके उलट है लोग आलोचना से तिलमिला जाते हैं और व्यक्तिगत बातों पर कीचड़ उछालना शुरू  कर देते हैं। रफ़ी साहब ऐसी लोगों और उनकी बातों से घबराते नहीं हैं बिना डरे अपनी बात पुख्ता ढंग से कहते हैं। 
तुफ़ैल साहब ने किताब की भूमिका में लिखा भी है कि "ग़लत को ढोल बजा कर सबके सामने लाना इसलिए भी ज़रूरी है कि ऐसा न किया जाये तो दुरुस्त के साथ सदियों से होती आयी नाइंसाफ़ी बंद नहीं हो पायेगी। ये विरोध बड़े पैमाने पर लोगों में उलझन पैदा करता है। कान-पूँछ लपेट कर कूँ कूँ करते हुए किसी तरह ज़िन्दगी जीने वाले लोग ग़ुर्राने वाला लहजा नापसंद तो करेंगे ही।" 
रफ़ी साहब शायरी के अलावा एक्टिविस्ट भी हैं और बेहद ज़रूरतमंदों की मदद के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं।उर्दू में उनके दो ग़ज़ल संग्रह '  सितारा लकीर छोड़ गया' और 'इतना आसमान' प्रकाशित हो चुके हैं. देवनागरी में पहली बार राजकमल प्रकाशन ने उनकी शायरी को इसे प्रस्तुत किया है। आप अगर शायरी याने अच्छी और भीड़ से अलग किस्म की शायरी पढ़ने में रूचि रखते हैं तो ये क़िताब आपके पास जरूर होनी चाहिए जो कि अमेजन से ऑन लाइन मंगवाई जा सकती है। 
चलते चलते आईये पढ़ते उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के चंद शे'र:        

जहाँ रोना था रो सके न वहाँ 
इसी ख़ातिर इधर उधर रोये 

लोग रोये बिछड़ने वालों पर 
और हम ख़ुद को ढूँढ़ कर रोये 

कोई चारा बचा नहीं होगा 
वर्ना क्यों मेरे चारागर रोये 
चारागर : चिकित्सक 

है ख़ुदा जब कि हर जगह मौजूद 
छुपछुपा कर कोई किधर रोये   





( ये पोस्ट रफ़ी रज़ा साहब के कैनेडा से भेजे वाइस मैसेज पर आधारित है )





30 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 08 दिसम्बर 2020 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

ROHIT KRISHNA NANDAN said...

अप्रतिम

Ashish Anchinhar said...

रफी साहब ने अपनी हालत अपने शेर में ही कर दिया है-

ग़ैर के डर का वो अंदाज़ा लगा सकता है
जिस मुसलमां को मुसलमान से डर लगता है

Unknown said...

बहुत खूब सराहनीय पोस्ट पढ़ने को मिली। रफ़ी रज़ा साहब को सलाम करती हूँ।

चोवा राम "बादल" said...

शानदार पोस्ट।आपको व रफी साहब दोनो को कोटिक नमस्कार।

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद... रोहित जी

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद अशीष भाई...

नीरज गोस्वामी said...

शुक्रिया...

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद

Kuldeep said...

शानदार पेशकश सर

Mumukshh Ki Rachanain said...

पढ़ लिया भाई, पढ़ लिया....
शौक हो तो फुरसत ही फुरसत है फिर तो उस शौक की पूर्ति के लिए
आप उस्ताद शायरों से एक ही प्लेटफॉर्म पर रूबरू कराने के बाद पुस्तक छपवा कर भी उन्हें जो सम्मान प्रदान करने का महान यज्ञ कर रहे हैं, उसके बारे में कितना भी अच्छा क्यूँ कहा न कहा जाए... कम ही पड़ेगा...

नीरज गोस्वामी said...

शुक्रिया कुलदीप जी

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद... गुप्ता जी

तिलक राज कपूर said...

उसे भी ज़िद थी कि माँगूँ तो सब जहाँ देखे
दराज़ मैं भी कहाँ हाथ करने वाला था
दराज़ : फैलाना

खुली हुई थी बदन पर रूवां रूवां आँखें
न जाने कौन मुलाक़ात करने वाला था

मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी
चिराग़ जैसे कोई बात करने वाला था

जहाँ रोना था रो सके न वहाँ
इसी ख़ातिर इधर उधर रोये

लोग रोये बिछड़ने वालों पर
और हम ख़ुद को ढूँढ़ कर रोये

कोई चारा बचा नहीं होगा
वर्ना क्यों मेरे चारागर रोये
चारागर : चिकित्सक

है ख़ुदा जब कि हर जगह मौजूद
छुपछुपा कर कोई किधर रोये


वाहः। बहुत ही खूबसूरत शेर हैं।

Onkar said...

बहुत सुन्दर

कर्नल तिलक राज (सेवा निवृत्त चीफ़ पी एम जी) said...

आप जैसे विद्वान साहित्यकार को सलाम और हार्दिक शुभकामनाएँ।आप ग़ज़ल साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए एक संवेदनशील और समर्पित प्रेमी की तरह निरन्तर अमूल्य कार्य कर रहे हैं। रफ़ी रज़ा साहब की ज़िन्दगी की जद्दोजहद और जादुई शाइरी से रूबरू करवाने के लिए आपका बहुत बहुत आभार। यह आलेख आपकी मेहनत और साधना की मूँह बोलती बढ़िया तस्वीर है। मुबारक हो आपको !
कर्नल तिलक राज सेवा निवृत्त चीफ़ पी जी पंजाब एवं चण्डीगढ़।

नीरज गोस्वामी said...

आप जैसे पारखी के क्या कहने..धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

आप जैसे पारखी के क्या कहने..धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

बहुत शुक्रिया सर

नीरज गोस्वामी said...

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब, बेहतरीन शायर की बहेतरीन शायरी और शायरी की बेहतरी के लिए ये लफ्ज़-"आप जो कुछ भी करें, दिल से करें और सबसे अलग करने की सोचें। शायरी को तग़ज़्ज़ुल के बग़ैर क़ुबूलियत नहीं मिलती।" मेरे दिलो-दिमाग़ को झकझोर गयी। मैं आपका बेहद अहसानमंद हूँ,,,,,

नंद किशोर पगारे

Manju Saxena said...

बहुत ही उम्दा शायरी...आला दरजे के क़लाम... ये वही लिख सकता है जिसने ज़िन्दगी... हालात और शायरी का बहुत गहराई से अध्ययन किया हो।
बहुत धन्यवाद...

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद मंजू जी

नीरज गोस्वामी said...

मैं ने यह पूरी सीरीज पढ़ी है । बहुत ही अद्भुत काम हुआ है । अभिनन्दन ।
नवीन सी चतुर्वेदी
मुँबई

mgtapish said...

मैं शाख़े-उम्र पे बस सूखने ही वाला था
लिपट गया कोई आकर हरा-भरा मुझसे
इल्म ख़ुद भी बड़ी मुसीबत है
इससे बढ़ कर वबाल है ही नहीं
वाह वाह क्या बात है नीरज जी आपकी लेखनी को नमन उम्दा किस्त ज़िन्दाबाद |
मोनी गोपाल 'तपिश'

नीरज गोस्वामी said...

भाई साहब बहुत बहुत शुक्रिया...

नीरज गोस्वामी said...

भाई साहब
प्रणाम।
रफ़ी रज़ा साहेब पर आपका आलेख।कैसा आत्मीय और पारिवारिक तरीके से आप लिखते हैं क़ुर्बान हूँ आपके इस अंदाज पर।इतनी खोजखबर और पड़ताल करते हुए शायर के तमाम ज़ाती पहलुओं को उभारने का सलीक़ा कोई आपसे सीखे। शायर के लेखन पर उसकी 10-05 ग़ज़लें पढ़कर लिखने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे लेकिन ऐसे अन्वेषणात्मक ढंग से लिखने वाले केवल मेरे भाई श्री नीरज गोस्वामी जी अकेले। डॉ. बशीर बद्र साहब एक शेर में शायर के दर्द को उकेरते हुए यूँ फ़रमाते हैं
आखिर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मक़बरा
हम ज़िन्दगी थे हमको किसी ने जिया नहीं।

आपने शायर के उसी व्यक्तिगत दर्द और भावनाओं को उसी संवेदना और चेतना के धरातल पर बख़ूबी पकड़ते हुए उकेरा है और सिद्ध किया है कि सत्य को बिना अप्रिय किये हुए भी बहुत सहजता से ज़ाहिर किया जा सकता है।नमन करता हूँ आपको, आपके अंदाज़ को और शुभकामनाएं करता हूँ इस ढंग के लिए।
सादर

अखिलेश तिवारी
जयपुर

vijendra sharma said...

आप
कमाल हैं नीरज जी

सेल्यूट आपको
वो भी बा वर्दी

Regards
विजेंद्र

Gyanu manikpuri said...

बहुत ही शानदार रफ़ी साहब की शायरी और आत्मकथा पढ़ने को मिला। शुक्रिया नीरज सर

Gyanu manikpuri said...

बहुत ही शानदार रफ़ी साहब की शायरी और आत्मकथा पढ़ने को मिला। शुक्रिया नीरज सर