Monday, May 11, 2009

किताबों की दुनिया - 10

दोस्तों देश में न जाने कितने शायर हैं और न जाने शायरी की कितनी किताबें छपती हैं...हमें सिर्फ उन्हीं किताबों का पता चल पाता है जिसे नाम चीन प्रकाशक छापते हैं या फिर जिनकी चर्चा किसी अखबार या मैगजीन में होती है. बहुत कम ऐसा होता है की आपको कभी एक अपरिचित प्रकाशक की कोई ऐसी किताब मिले जिसमें चौंका देने वाले शेरों की भरमार हो और जिसे लिखा भी किसी बहुत नामवर शायर ने न हो.



मेरा नाम उन खुशकिस्मत पाठकों में आप दर्ज़ कर सकते हैं जिसके पास ऐसी ही शायरी की एक अनूठी किताब है. आप नहीं पहचान पाएंगे मुझे ही बताना पड़ेगा की ये किताब है "आज़मी पब्लिकेशन, कुर्ला, मुंबई से प्रकाशित "पूछना है तुमसे इतना....." जिसे लिखा है जनाब "सैयद रियाज़ रहीम" साहेब ने.

मैं इतना टूट कर उससे मिला हूँ 
मेरा दुश्मन भी मेरा हो गया है 

लिखने वाले रियाज़ साहेब धारवाड़ (कर्णाटक) में जन्में और तालीम मुम्बई में पायी, जहाँ अब वो अपने भरे पूरे परिवार के साथ रहते हैं. एम. ऐ (उर्दू , अंग्रेजी) करने के बाद अध्यापन के पेशे में हैं और सन १९८० से शेर कह रहे हैं और खूब कह रहे हैं:

ये कैसा शोर है दुनिया में आखिर
के सच्चा चुप है झूठा बोलता है 

नहीं रोका हमारी ही खता है
वो जालिम अब दोबारा बोलता है

कभी तो चीखना बेकार सबका
कभी तो इक इशारा बोलता है 

मुहब्बत उठ गयी हिंदुस्ता से
के अब तिरशूल भाला बोलता है 

रियाज़ साहेब का कहना है की वो ऐसी शायरी पसंद करते हैं जिस शायरी में सादगी, मासूमियत हो और जो शायरी आदमी को आदमी बनाने की कोशिश करती हो. उन्हें कबीर, वली दकनी, मीर और नजीर की शायरी बहुत पसंद है.

गोली चली जब सीनों पर
पीछे वाले बैठ गये

खुशियाँ आयीं लौट गयीं
ग़म अपने थे बैठ गये

सच सुनना आसान न था
सबके चेहरे बैठ गये 

सुनने गीत मोहब्बत का 
गूंगे बहरे बैठ गये 

कहते थे जो डटे रहो 
वो सब साले बैठ गये 

"रियाज़" साहेब से मुलाकात भी इक हसीं इतेफाक थी. "हस्ती मल हस्ती" साहेब के घर पर नशिस्त थी जहाँ पहली बार उनसे मुलाकात हुई. बातों बातों में कब उन्होंने दिल जीत लिया पता भी न चला. उनकी इस किताब का विमोचन कुछ दिनों बाद होने वाला था जिसमें मैं जयपुर जाने की वजह से जा न सका. लौटने पर देखा उनकी किताब डाक से घर आयी हुई है. मैं उनकी मोहब्बत का कायल हो गया. वो अपना कलाम भी बहुत खूबसूरत अंदाज़ में पढ़ते हैं और छोटी बहर में कमाल करते हैं, प्यार से भरा इंसान ही ऐसी शायरी कर सकता है :

चेहरा चेहरा अपना पन
सारी दुनिया घर आँगन

तुम तो मेरे सामने हो
ढूंढ रहा है किसको मन 

कैसे उसको समझाऊँ 
अपना मन ही अपना धन 

झूट नहीं कहता हूँ मैं
देखो जाकर तुम दरपन

मात्र सौ रुपये की किताब ऐसी अनमोल ग़ज़लों को अपने में समोए है की लगता है मोतिओं का खजाना सस्ते में हाथ लग गया है. यूँ तो ये किताब आप आज़मी पब्लिकेशन को लिख कर खरीद सकते हैं लेकिन आसान तरीका तो ये होगा की आप रियाज़ साहेब से सीधे उनके मोबाईल 09930632838 पर फोन करें,मुबारक बाद दें और किताब मांग लें, मुझे उम्मीद है की वो अपने चाहने वालों को ना - उम्मीद नहीं करेंगे.

अंधेरों की साजिश पे ग़मगीन हो
दिये से दिये क्यूँ जलाते नहीं

शहीदों में लिखवा रहे हैं वो नाम 
जो ऊँगली तक अपनी कटाते नहीं

हम दुआ करते हैं की वो इसीतरह लिखते रहें और उनकी किताब दर किताब हम पढ़ते रहें, उनके खूबसूरत शेरों पर यूँ ही तालियाँ पीटते रहें....

धीरज रख्खो आज नहीं तो कल अच्छा हो जायेगा 
पगडण्डी पर चलते रहना ही रस्ता हो जायेगा 

किताब के आखिर में उर्दू हिंदी के बड़े शायरों और कवियों ने उनकी शायरी के बारे में जो कहा है उसका संकलन है जिसे पढ़ कर हमें उनकी कई दूसरी विशेषताओं का पता चलता है. कुछ भी कहें साहेब ये किताब शायरी के दीवानों की अलमारी में होनी चाहिए. चलते चलते एक आध शेर और....

आज है शातिर बूढों जैसी
कल थी बच्चों जैसी दुनिया 

राज सिंहासन छूट गया जब
कासा लेकर भटकी दुनिया 

जितने खुदा हैं सब ने मिल कर
बाँट ली अपनी-अपनी दुनिया 

शुक्रिया दोस्तों रियाज़ साहेब की शायरी का लुत्फ़ उठाने के लिए, आप का खुलूस ही हमें आपके लिए और अच्छी किताबें ढूँढने में मदद करता है.....इसे बनाये रखें.

44 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया किताब से वाकिफ करवाया आपने शुक्रिया

RAJNISH PARIHAR said...

जी बहुत अच्छी पुस्तक से परिचय करवाया आपने...!अगर पढना चाहें तो कहाँ से प्राप्त हो सकती है ये?बाकी झलक तो आपने दिखा ही दी है...

शारदा अरोरा said...

बहुत अच्छी शायरी से परिचय करवाया |

विनय said...

बहुत ख़ूब, अच्छी किताब है जी, ख़रीद के पढ़ लेंगे, आपने बताया सो धन्यवाद

Raviratlami said...

रियाज साहेब को हमारी भी मुबारकबाद. बाकी उन तक ये संदेश पहुँचाएँ कि यदि उन्हें उज्र न हो तो वो इस किताब की डिजिटल कापी प्रकाशक से प्राप्त करें और पीडीएफ रूप में ईबुक के रूप में तथा इंटरनेट पर साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाएँ.

कुश said...

अगर पी डी एफ में मिल जाये तो कमाल हो जाये..

डॉ .अनुराग said...

शायरी का मिजाज़ आप खूब समझते है ओर इस समंदर किनारे बसे शहर में शेरो को जिंदा रखने में अपनी हिस्सेदारी निभाये हुए है.....आपकी ये आदत बस फले फूले...एक ओर शायर से मिलवाने का शुक्रिया

प्रकाश गोविन्द said...

एक बेहतरीन किताब से परिचित
कराने का शुक्रिया !

महामंत्री - तस्लीम said...

नीरज जी, आपकी इस बात से हर कोई सहमत है कि सिर्फ गिनी चुनी किताबों की ही पत्र पत्रिकाओं में समीक्षा हो रही है। जबकि आज के दौर में ऐसे अनगिनत लोग हैं, जो अच्‍छा लिख रहे हैं। आपने अपने ब्‍लॉग के माध्‍यम से इस काम का जि
म्‍मा संभाल रखा है, इसके लिए आपकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। रियाज साहब और उनकी शायरी से मिलकर अच्‍छा लगा। ऐसे रचनाकारों के बारे में अधिक से अधिक लोगों को जानना चाहिए।

जाकिर अली रजनीश
-----------
SBAI / TSALIIM

seema gupta said...

बहुत अच्छी शायरी और बेहतरीन किताब से परिचित कराने का शुक्रिया .

regards

दिगम्बर नासवा said...

नीरज जी
आप इतनी खूबसूरत किताबों को चुन चुन कर लाते हैं.............आपकी समीक्षा इतनी लाजवाब होती है की मन चाहता है दोड़ कर किताब ले आऊं कहीं से और बस..............पढ़ते ही रहूँ. हर शेर इस किताब का जैसे दिल से निकल रहा हो.........

शुक्रिया आपका

डॉ. मनोज मिश्र said...

धन्यवाद परिचित करानें के लिए ,वाकई इनकी रचनाएँ दमदार हैं .धन्यवाद आपको .

Babli said...

बहुत बहुत शुक्रिया आपके टिपण्णी के लिए!
बहुत ही ख़ूबसूरत शायरी लिखा है आपने और साथ में बढ़िया किताब से वाकिफ कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

Shiv Kumar Mishra said...

धीरज रक्खो आज नहीं तो कल अच्छा हो जाएगा
पगडंडी पर चलते रहना ही रास्ता हो जाएगा

बहुत बड़े शायर से परिचय करवाया भैया.शायर जीवन जीना सिखाते हैं.रियाज साहब भी उन्ही में से एक हैं.

Abhishek Mishra said...

Aap hi ke madhyam se mil saki yeh jaankari.

डेबिट क्रेडिट said...

सैयद रियाज़ रहीम से परिचय कराने के लिए धन्यवाद.

मुझे सेर या सायरी की समझ नहीं के बराबर है परन्तु उनकी ये चार लाइन
बहुते अनमोल और मन को छूती हैं.

"अँधेरे की साजिस पे गमगीन हो,
दिये से दिये क्यूँ जलाते नहीं"

"मैं इतना टूट कर उससे मिला हूँ,
मेरा दुश्मन भी मेरा हो गया हैं"

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक बेहतरीन लेखक और एक अच्छी किताब से परिचय कराने के लिए शुक्रिया।

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

Shukriya

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

बेहतरीन किताब से परिचित
कराने का शुक्रिया ....

SWAPN said...

neeraj ji, aisi umda shayri aur aise azim shayar se parichay karane ke liye hardik dhanyawaad. aap to kohre men chhupe shayron ko hamse milane ka kaam bakhubi nibha rahe hain. shukriya.

रविकांत पाण्डेय said...

नीरज जी आपकी पारखी नज़र कहां-कहां से ऐसी चुनिंदा किताबें ढूंढ के लाती हैं?रियाज साहेब की शायरी तो कमाल की है। क्या गज़ब के शेर कहे हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया इतने अच्छे शायर से परिचय करवाने के लिये।

Shefali Pande said...

बहुत उम्दा शेर हैं ....जानकारी देने का आभार

"अर्श" said...

नीरज जी रियाज़ साहिब से मिलवाकर आपने तो धन्य कर दिया छोटी बहर में क्या कमाल के शे'र कही है जनाब ने ..

झूठ नहीं कहता हूँ मैं
देखो जाकर तुम दर्पण ...

सही कहा आपने के रियाज़ साहिब.. मासूमियत को महसूस करते है और उसे पाठकों को महसूस करने के लिए छोड़ भी देते है जो एक सच्ची शायरी की निशानी है ... बहोत ख़ुशी हुई रियाज़ साहिब से मिलकर... ढेरो बधाई उनको तथा आपको भी उम्दा प्रस्तुति के लिए ...

आपका
अर्श

"अर्श" said...

लो नीरज जी अब हमने रियाज़ साहिब से दरख्वास्त भी कर दी इस किताब के लिए...

अर्श

मोहन वशिष्‍ठ said...

जी बहुत अच्छी पुस्तक से परिचय करवाया आपने

मीत said...

भाई शायरी तो कमाल की करते है हैं आप ..... ये काम भी कमाल का कर रहे हैं ..... बहुत बहुत शुक्रिया इतनी अच्छी किताबों से परिचय करवाने के लिए और इतनी उम्दा शायरी से रू-ब-रू करवाने के लिए.

ओम आर्य said...

नीरज जी, एक ऐसे वक़्त में, जब किताबें मर रही हैं, उनकी दुनिया बसने के लिए आपको तहे दिल से शुक्रिया. और उन शेरों से परिचय के लिए भी, जो सच सिर्फ लगते नहीं बल्कि सच होते हैं.

रश्मि प्रभा... said...

एक परिचय के माध्यम से आप बहुत कुछ हमें दे जाते हैं.....

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

रियाज़ सा'ब से मिलवाने का शुक्रिया जी - आपसे अनुरोध है किताबोँ पर आपके आलेखोँ की किताब छपवाई जाये -
- लावण्या

venus kesari said...

नीरज जी,
दो दिन पहले ही इस पोस्ट की झलक ब्लॉग लिस्ट में देख चूका हूँ मुझे नहीं पता की आपने पोस्ट क्यों डिलीट कर दी थी मगर किताब के बारे में जानने की उत्कंठा थी जो आज शांत हुई
शेरो की बानगी तो बेहतरीन है

आपका वीनस केसरी

गर्दूं-गाफिल said...

रियाज़ साहब से परिचय कराने के लिए धन्यवाद
रियाज़ साहब को इतनी खूबसूरत फनकारी के लिए मुबारकबाद

गौतम राजरिशी said...

नीरज जी...आहहाहा, इन अद्‍भुत शेरों और इस नायब शायर से जो परिचय करवाया है आपने...रियाज़ साब को सलाम।

Manish Kumar said...

आपकी इस श्रृंखला पर नज़र बनी हुई है इसी तरह अपनी पसंद बाँटते रहें।

Vijay Kumar Sappatti said...

aadarniya neeraj ji , aapka shukriya ki aapne itne aache shayar se hamara parichay karwaya hai ..

aapka aabhaar

Mrs. Asha Joglekar said...

Riyaz sahab se milwane ka shukriya. kanhan kanhan se aise aise nayab heere moti chun kar late hain aap ,aapki parkhi najar aur painee kalm donon ke kayal hain hum to.

Udan Tashtari said...

रियाज साहब और उनकी पुस्तक का परिचय आपकी कलम से पाकर मन प्रफुल्लित हो गया, बहुत बहुत आभार आपका.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

आपके इस पुस्तक के बारे में बताने पर धन्यवाद। यह कहना होगा कि बुक रिव्यू लिखने में आप बहुत सिद्धहस्त हो गये हैं।

Science Bloggers Association said...

सैयद रियाज रहीम ज्यादातर लोगों के लिए नया नाम हो, पर शायरी की दुनिया में उन्हें कौन नहीं जानता।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

रियाज़ साहब सिर्फ एक जानदार शायर ही नहीं शानदार इंसान भी हैं. पिछले करीब बीस सालों में मुबई की सड़कों पर न जाने कितनी पूरी की पूरी रातें हमने आवारगी करते हुए गुज़ारी हैं. एक बेहतरीन शायर और उसकी शायरी का ब्लॉग जगत में परिचय कराने के लिए नीरज जी आपका विशेष धन्यवाद!

kumar Dheeraj said...

नीरज जी आपकी शायरी ने मुझे विस्मित कर दिया है । आपने जो लिखा है बेमिसाल है । शायरी का हर लाइन ने सोचने को मजबूर किया है । यर्थार्थ से भरपूर आपकी लेखनी । आभार

Shama said...

Neeraj ji,
Aapki tippanee padhee...bohot sahee kaha aapne...yebhee hota hai,ki,mai tatasth hotee hun, lekin mankaa "cameraa" jisne har pal dilo-dimaagme band kar liya hota hai, use revind kar dekhne jayen,to waisaahee nazar aat hai...mere saathbhi kuchh,kuchh aisaahee hai...zarooree nahee,ki doobke likhtee hun...han, lekin adiktar( Hindi lekhanme) dardkee bayanee zyada hai..warna mai to behad, chulbulee pranee hun..mere banaye "April fool"ke qise dost parivaar me mashhoor hun...aur in sabke baareme meree Marathi kitabonme likh chukee hun...!
Gar isee blogpe( matlab purana The light by),Englishme likhe kuchh kisse padhen to aapko achha lagegaa..!
"A playful prankster, even in agony"...ye unmese ek hai...
Maargdarshanke liye behad shukrguzaar hun...bade dinobaad mila aur sachhe dilse..!

aapne jo kavyamay aalekh likh parichay diya hai is hasteekaa, uske liye mere paas alfazonkee mohtajee hai..maaf karenge?

RAJ SINH said...

नीरज ्भायी हम तो अपने ’राज सिन्हासन ’ पर जमे हैन. सुबीर जी का तदका लगता तो क्या होता पता नहीन पर हमे तो कुछ कसर नहीन लग रही .
फ़िल्हाल हमारे मित्र छौन्क सिन्ह ने कुछ ’तडका’ मारा है ."तडका" ब्लोग पे . आके कुछ छक लें .

RC.TAWANIYA राका said...

बहुत शानदार शायरी एवं लेखनी के भाव !!!

RC.TAWANIYA राका said...

बहुत शानदार शायरी एवं लेखनी के भाव !!!