Monday, February 7, 2011

किताबों की दुनिया - 45

मेरे पीछे जमाना पड़ गया तो?
कहीं सबसे निभाना पड़ गया तो ?

हमें हंसने की आदत है ग़मों में
ख़ुशी में मुस्कुराना पड़ गया तो?

जिसे तुम भूल जाना चाहते हो
उसे सचमुच भुलाना पड़ गया तो?

किताबों की दुनिया श्रृंखला शुरू करते वक्त मैंने एक अलिखित नियम ये बनाया था कि मैं किसी भी शायर की दो किताबों का जिक्र नहीं करूँगा. लेकिन आपतो जानते ही हैं, हर नियम का अपवाद भी होता है तो फिर ये नियम अपवाद से कैसे बचता? आज जिस शायर का जिक्र कर रहा हूँ उसके बारे में सोचते ही उम्र के तीस पैंतीस साल कम हो जाते हैं. जवानी के वो दिन याद आते हैं जिन दिनों दुनिया में काले और सफ़ेद के आलावा बाकि सब रंग दिखाई देते थे.

इस हर दिल अजीज़ शायर के बारे में पहले लिख चुका हूँ इसलिए और अधिक न लिखते हुए सीधे उस किताब का जिक्र करता हूँ जो इनकी पहली किताब की तरह ही विलक्षण है.

किताब का शीर्षक है "आसमान से आगे" और शायर है..."राजेश रेड्डी" जो किताब की पहली ग़ज़ल से ही पाठक पर अपना जादू चलाना शुरू कर देते हैं:


न जाने कितनी सारी बेड़ियों को
पहन लेते हैं हम गहना समझ कर

समुंदर के खजाने मुन्तज़िर थे
हमीं उतरे नहीं गहरा समझ कर

भंवर तक हमको पहुँचाया उसी ने
जिसे थामे थे हम तिनका समझ कर

भला हो "वाणी प्रकाशन" का जिन्होंने राजेश की लगभग एक सौ दस ग़ज़लों का खज़ाना उनके चाहने वालों तक किताब की शक्ल में छाप कर दिया है. राजेश की पहली किताब "उड़ान" का तीसरा संस्करण प्रकाशन में है और कोई हैरत नहीं यदि ये किताब भी उसी के पद चिन्हों पर चलती हुई लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित करे. आसान गाई जाने वाली बहरों से सजी राजेश की ग़ज़लें अपने पाठक के साथ तुरंत तारतम्य बना लेती हैं.

रावण के ज़ुल्म सहके अदालत में राम की
सीता खड़ी हुई है गुनाहगार की तरह

हमको जहाँ-जहाँ भी नयी सोच ले गयी
दुनिया वहाँ-वहाँ मिली दीवार की तरह

मैं कब उन्हें बुलाता हूँ आते हैं खुद-ब-खुद
ग़म भी हैं मेहरबाँ मेरे अशआर की तरह

निदा फ़ाज़ली साहब ने इस किताब की भूमिका में एक कमाल की बात लिखी है "राजेश की ग़ज़लें पढ़ते हुए मार्क ट्वैन की बात याद आती है. उसने एक लेख में लिखा था -अगर ज़ेहन संतुलित हो तो हर वस्तु में सौन्दर्य होता है और अगर ये संतुलन न हो तो सुन्दर से सुन्दर वस्तु भी गुस्सा जगा सकती है.राजेश में अपनी ग़ज़ल में सामाजिक विरोधाभासों के प्रति क्रोध प्रगट करते हुए भी अपने कवि-ज़ेहन का संतुलन नहीं खोया और यह खूबी उनकी ग़ज़लों को ग़ज़लों की भीड़ में एक अलग पहचान देती है. "

झांकना अपने गिरेबाँ में नहीं आया उसे
जिसके दिल में आ गया पत्थर उठाने का ख़याल

चाहते तो हम भी हैं दरबार में जाना मगर
पाँव को रोके हुए है सर झुकाने का ख़याल

सोना-चांदी, हीरे-मोती, गहने-जेवर की हवस
दिल में क्यूँ टिकता नहीं मिटटी में जाने का ख़याल

राजेश यूँ तो उम्र में मुझसे दो साल छोटे हैं लेकिन अकल और समझदारी में सौ साल बड़े...जब से मैंने उन्हें जाना तब से ही धीर गंभीर प्रकृति का पाया...जयपुर में हमारे नाट्य दल का वो नेता हुआ करते थे...उनके लिखे और निर्देशित किये नाटकों में मुझे साथ काम करने का मौका मिला. शायरी का दामन राजेश ने स्कूल के दिनों से ही शायद पकड़ लिया था जिसे उसने आज तक नहीं छोड़ा है. अब इतने गहरे और लम्बे रिश्ते में मिठास तो भरपूर होनी ही है. राजेश की ग़ज़लें हम से बात करती लगती हैं, हमें अपना दोस्त बना लेती हैं और दोस्ती का हक़ निभाते हुए अपनी ख़ुशी और परेशानियाँ बांटती चलती हैं...

जिसे भी देखिये नाराज़ है इस दौरे-हाज़िर से
मगर इस दौरे-हाज़िर से बगावत कौन करता है

बना लेते हैं अपनी-अपनी जन्नत को सभी दोज़ख़
मगर दोज़ख़ से पैदा अपनी जन्नत कौन करता है

कोई दैरो-हरम में जाये या बाहर रहे उनसे
उसे मालूम है उसकी इबादत कौन करता है

खुदा का घर बचाने के लिए लड़ते हैं सब लेकिन
जो घर बन्दों के हैं उनकी हिफ़ाज़त कौन करता है

इस किताब में प्रस्तुत ग़ज़लों के रदीफ़ काफिये नए और चौंकाने वाले हैं. सबसे खास बात जो मुझे इस संकलन में नज़र वो ये कि सारी की सारी ग़ज़लें निहायत सीधी साधी जबान में कही गयीं हैं याने लफ़्ज़ों के मानी जानने के लिए हमें कहीं इधर उधर नहीं देखना पड़ता. आप बस ग़ज़ल पढ़ें और वो सीधे बिना किसी रोकटोक के आप के दिल में उतर जायेगी. आसान लहजे में अपनी बात कहने का हुनर राजेश को आता है और क्या खूब आता है:

बहुत आसान है हर बात को मुश्किल बना देना
बहुत मुश्किल मगर लहजे की आसानी में रहना है.

क़फ़स से अपनी आज़ादी पे क्या खुशियाँ मनाऊं मैं
मुझे बाहर भी सैय्यादों की निगरानी में रहना है

रहूँ मैं दश्त में या शहर में, क्या फर्क पड़ता है
मुझे तो उम्र भर अपनी ही वीरानी में रहना है

जैसा के मैंने पहले ही आपको बताया है इस किताब को वाणी प्रकाशन वालों ने प्रकाशित किया है जिसका पता ठिकाना मैंने अपनी पिछली कई पोस्ट्स में दिया है लेकिन आपकी पिछली पोस्ट्स न देखने की आदत को भलीभांति जानते हुए मैं यहाँ उसे फिर से दे देता हूँ. वाणी प्रकाशन का पता है: 21-ऐ, दरियागंज, नयी दिल्ली, फोन न.011-23273167/23275710,इ-मेल:vaniprakashan@gmail.com और वेब साईट www.vaniprakashan.com है.

वैसे एक बात बता दूं जिसने मन में किताब खरीदने की ठान ली हो वो मेरे द्वारा यहाँ दिए पते ठिकाने का मोहताज़ नहीं होता किसी न किसी तरह से खरीद ही लेता है और भाई जिसने किताब नहीं खरीदने का फैसला कर लिया है उसके लिए मैं बार बार किताब पाने की जगह बतलाता रहूँ तब भी उस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा...खैर ये तो अलग बात है लेकिन मेरी आपसे सिर्फ इतनी सी गुज़ारिश है के यदि आप अच्छी और सच्ची शायरी को पसंद करते हैं तो ये किताब आपके पास होनी चाहिए. जीवन में जो उतार-चढाव आते हैं उन के दौरान तठस्थ रहने में ये आपकी मदद करेगी.

आंसुओं वाली हर बात को छोटा करके
मुस्कुरा लेते हैं हालात को छोटा करके

वक्त खुद आपके क़दमों में झुका आएगा
देखिये वक्त की औकात को छोटा करके

अश्क आँखों में तरसते हैं बरसने के लिए
लोग अब जीते हैं ज़ज्बात को छोटा करके

किताबों की दुनिया का आज का एपिसोड हम यहीं समाप्त करते हैं...और निकलते हैं आपके लिए एक नयी किताब की तलाश में...आप किस्मत वाले हैं लेकिन हमें तो भाई किताबें तलाशनी पड़ती हैं हमें कौन बताता है के फलाँ जगह से फलाँ शायर की किताब खरीदो...मिलते हैं जल्द ही एक नयी किताब और शायर के साथ.

39 comments:

रश्मि प्रभा... said...

हमें हंसने की आदत है ग़मों में
ख़ुशी में मुस्कुराना पड़ गया तो?
....waah ...
rajesh sethi ji ko padhna achha laga

HOPE said...

Neeraji, I love your blog. Every morning I open your blog to see if you have written some thing. The way you introduce writers/poets on your blog is amazing. Hope to read many many more new poets on your blog. I also love your poems. The poems by Rajesh Reddy were excellent.

सदा said...

रहूँ मैं दश्त में या शहर में, क्या फर्क पड़ता है
मुझे तो उम्र भर अपनी ही वीरानी में रहना है

वाह ...बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

राजेश उत्‍साही said...

राजेश जी की ग़ज़लें सचमुच ऐसी हैं जिन्‍हें समझने के लिए बहुत दिमाग नहीं लगाना पड़ता,लेकिन वे दिल में उतर जाती हैं। शब्‍द भी आसान होते हैं।
*
आपने कहा आपको कौन बताता है किताब के बारे में। चलिए मैं बताता हूं। मेरठ के एक शायर हैं नजर एटवी। मैंने उन पर एक पोस्‍ट सुभाष राय जी के ब्‍लाग से सामग्री लेकर गुल्‍लक पर लगाई थी। चाहे तो आप उसे ही यहां लगा सकते हैं। या फिर और जानकारी जुटाकर नई पोस्‍ट भी बना सकते हैं।
मेरी पोस्‍ट का लिंक यहां है-

http://utsahi.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html#more

मुदिता said...

नीरज जी ..
बहुत अच्छी किताब की जानकारी दी है आपने ..हर शेर दिल में उतरता चला जा रहा है..इतने सरल शब्दों में इतनी गहरी बात कही है राजेश जी ने... ऐसे मोती माणिकों को चुन चुन कर हम तक पहुँचाने का बहुत बहुत शुक्रिया ...

वन्दना said...

सच मे हर बार की तरह एक नायाब मोती …………हर शेर खुद अपनी पहचान बन रहा है……………आभार्।

इमरान अंसारी said...

नीरज जी.....आपका आभार राजेश साहब की दूसरी किताब के बारे में बताने का.......राजेश साहब के शेर बहुत ही बढ़िया लगे......आपके शेरों में क्रांति की झलक दिखती है.....बात को बहुत सलीके से कहने का हुनर भी है......मेरा सलाम राजेश जी को.....

प्रवीण पाण्डेय said...

खुशी में मुस्कराना हज़म न हो पाये संभवतः। बहुत ही सुन्दर। पढ़ने की लिस्ट में डाल दी।

Pratik Maheshwari said...

नीरज जी,
आपकी किताबी दुनिया का संस्मरण पहली बार पढ़ा.. कहूँ तो वाकई में बहुत अच्छा लगा..
आप इतनी मेहनत कर के हम सब तक गिनी-चुनी अच्छी किताबें पहुंचा रहे हैं..उसके लिए बहुत आभार..

यह किताब ज़रूर पढूंगा..

ताऊ रामपुरिया said...

हमेशा की तरह बहुत ही सुंदर जानकारी मिली, आभार.

रामराम.

स्वाति said...

आपने हर बार की तरह एक अच्छी किताब की जानकारी दी है ...शुक्रिया ...

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

नीरज जी,

न जाने कितनी सारी बेड़ियों को
पहन लेते है हम गहना समझ कर

राजेश रेड्डी जी से मिलवाने के लिए शुक्रिया !
समुन्दर से मोती चुन कर लाना आसान तो नहीं है ,इसके लिए आपका जितना आभार व्यक्त किया जाय कम है !

pran said...

Rajesh Reddee kee shaayree ko
padhwaane kaa shukriya .Unkee
shaayree ke kyaa kahne hain, dil
mein utar jaatee hai.

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुन्‍दर प्रस्‍तुति..

शारदा अरोरा said...

कोई दैरो-हरम में जाये या बाहर रहे उनसे
उसे मालूम है उसकी इबादत कौन करता है
bahut kuchh hai bahut sundar ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बड़े भाई साहब,इत्तिफाक़न दोनों किताबें मेरे कलेक्शन में अरसे से मौजूद हैं.. वाक़ई बेहतरीन शायर हैं!!

रजनीश तिवारी said...

सभी शेर जो आपकी पोस्ट पर है बहुत बढ़िया हैं । एक बेहतरीन शायर से परिचय कराने का शुक्रिया !

सीमा रानी said...

बहुत आसान है हर बात को मुश्किल बना देना
बहुत मुश्किल मगर लहजे की आसानी में रहना है.

क़फ़स से अपनी आज़ादी पे क्या खुशियाँ मनाऊं मैं
मुझे बाहर भी सैय्यादों की निगरानी में रहना है

रहूँ मैं दश्त में या शहर में, क्या फर्क पड़ता है
मुझे तो उम्र भर अपनी ही वीरानी में रहना है


वाह नीरज जी ,आप सचमुच बहुत नेक काम कर रहे है,शायरी में रूचि होना और बात है पर हर वक़्त ये मुमकिन नहीं होता की आप को अच्छी किताब मिल ही जाये ऐसे में आपका ये पथ प्रदर्शन बड़ा काम आता है .ऊपर के अशआर तो मुझे बहुत अच्छे लगे पर जितने आपने लिखें है उन्हें पढ़कर किताब को पूरा ही पढना जरुरी लग रहा है .बहुत बहुत धन्यवाद आपको और इतनी सादा मगर खास ग़ज़लों के लिए राजेश जी को बहुत साधुवाद .

Manish Kumar said...

शुक्रिया रेड्डी जी की इस किताब से परिचय कराने का।

Abhishek Ojha said...

शुरू के तीन सबसे धांसू लगे.

Udan Tashtari said...

क्या गज़ब गज़ब शेर हैं:


वक्त खुद आपके क़दमों में झुका आएगा
देखिये वक्त की औकात को छोटा करके


वाह!

आनन्द आ गया...किताब की चाह हो आई.

नीरज गोस्वामी said...

Comment received through e-Mail:-

नीरज भाई,आप भी कमाल करते हो/
हमारा कितना ख्याल करते हो //
खोज लाते हो ये अश आर बहुत ही उम्दा /
वक़्त का क्यों मलाल करते हो ?//
बेहद खूबसूरत ग़ज़लों का ज़िक्र किया आपने ,सादर धन्यवाद,लेकिन आज कल आपके गीत ग़ज़ल पढने को नहीं मिल रहे ,ये शिकायत बनी ही हुई है /सादर
Dr.Bhoopendra Singh
T.R.S.College,REWA 486001
Madhya Pradesh INDIA

Akshita (Pakhi) said...

इक और नई किताब.... वसंत पंचमी पर ढेर सारी बधाई !!

_______________________
'पाखी की दुनिया' में भी तो वसंत आया..

saurabh she. said...

Niraj jee namaskar,
Ghajal ka ek chhatra hone ke nate aapke blog par aa kar achha laga.Rajesh Reddy sahab Munnawar Rana ke sath is pidhi ke shayad sbse bade shayar hain.Apne Udaan se sabko rubaru kara kar bada achha kiya hai.Unke kai sher mere humsaye hain.'Muquaddar me likhi hai umra bhar ki bekarari kya ,Hamare saath jayegi ye bechaini hamari kya...'

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,

राजेश रेड्डी जी की "आसमां से आगे" का हर शेर कमाल है. वाकई इतनी बेहतरीन कहन और आसान लफ़्ज़ों में, ये संतुलन बना पाना बहुत मुश्किल है मगर ये उनकी खूबी है. हर शेर पसंद आया मगर ये कुछ शेर तो ज़बान से उतरने का नाम ही नहीं ले रहे,

न जाने कितनी सारी बेड़ियों को
पहन लेते हैं हम गहना समझ कर

समुंदर के खजाने मुन्तज़िर थे
हमीं उतरे नहीं गहरा समझ कर

चाहते तो हम भी हैं दरबार में जाना मगर
पाँव को रोके हुए है सर झुकाने का ख़याल

जिसे भी देखिये नाराज़ है इस दौरे-हाज़िर से
मगर इस दौरे-हाज़िर से बगावत कौन करता है

अमिताभ मीत said...

शुक्रिया सर जी ... आप की बदौलत बेहतरीन शायरी पढने को मिलती रहती है ....

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on e-mail:-

रहूँ मैं दश्त में या शहर में, क्या फर्क पड़ता है
मुझे तो उम्र भर अपनी ही वीरानी में रहना है
dhanyavad reddi ji ki shandar gazalon se ru-ba-ru karane ka.

Chandra Mohan Gupta

Amrita Tanmay said...

आपकी ...किताबों की दुनिया ..अच्छी लगी .इतनी व्यस्त दिनचर्या में पता भी नहीं चलता है कि अच्छी किताबें भी है .जानकारी देने के लिए हार्दिक धन्यवाद ..

Shardula said...

Wah! Itni khoobsoorat shayari...
aapka dhnyavad Neeraj ji yeh hum tak pahunchaane ke liye.

mark rai said...

हमें हंसने की आदत है ग़मों में
ख़ुशी में मुस्कुराना पड़ गया तो?........
...सुन्‍दर प्रस्‍तुति..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

राजेश जी की सुन्दर गजलों के बेहतरीन शेर वाकई काबिले तारीफ हैं|
इतनी सुन्दर रचना और रचनाकार से रूबरू कराने का आभार !

डॉ .अनुराग said...

राजेश जी को यहाँ वहां अक्सर पढ़ा है पत्रिकाओं में.......अब तो शायद कोई ऑडियो भी आ रहा है इनका.....खालिस गजलगो है.....अपने अंदाज के

संतोष कुमार said...

आदरणीय नीरज जी,

राजेश रेड्डी जी की "आसमां से आगे" का हर शेर कमाल है !
आपने राजेश जी पुस्तक से रूबरू करवाया इसके लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद !

तिलक राज कपूर said...

जिस शायर की शायरी को नामी ग़ज़ल गायकों ने अपना लिया, उसके बारे में ज्‍़यादह कुछ कहने को नहीं रह जाता फिर भी आपने कहने को बहुत कुछ पैदा कर लिया, वह भी खूबसूरत अंदाज़ में। बधाई।
आप जब कहते हैं कि 'आज जिस शायर का जिक्र कर रहा हूँ उसके बारे में सोचते ही उम्र के तीस पैंतीस साल कम हो जाते हैं.' और 'राजेश यूँ तो उम्र में मुझसे दो साल छोटे हैं लेकिन अकल और समझदारी में सौ साल बड़े.' तो आपके जवान बने रहने का रहस्‍य भी खुल जाता है।

यही आलम बना रहे और आप यूँ ही नयी नयी किताब के साथ अपने कलाम सामने लाते रहें तो सफ़र आसान बना रहेगा।

daanish said...

आपके उम्दा ख़ज़ाने से निकला हुआ
एक और क़ीमती गौहर ...
वाह ....
सच है ,,,, राजेश रेड्डी जी को पढ़ना
अपने आप में एक अनुपम अनुभव रहता है
आभार स्वीकारें .

Kunwar Kusumesh said...

सुन्दर समीक्षा पढ़ने को मिली.

Rakesh Kumar said...

Aapki sunder prastuti ko padhne ka
mauka mila.Aapse bahut kuch seekhne
ko milega,is baat ki khushi hai muze.Aapne mere blog "mansa vacha karmna" per aakar jo utsaha vardhan kiya hai mera,iske liye bhi
aabhari hun.

गौतम राजरिशी said...

रेड्डी साब की दोनों किताबें अपनी अमानत हैं और जिस हिसाब से उनकी नयी-नयी ग़ज़लें रिसालों में आ रही हैं, जल्द ही उनकी तीसरी भी आने वाली होगी।

nakul gautam said...

प्रणाम सर
मैं स्वयं को टिप्पणी करने के क़ाबिल नहीं समझाता, और इस्सलिये अक्सर टिप्पणी नहीं करता.
आज कर रहा हूँ. इसके २ कारण हैं.

एक से बढ़कर एक चुने गयीं ये पंक्तिया सीधे दिल में उत्तर गयीं. आप नीरक्षीर विवेच्य संपन्न हैं गुरुदेव. बहुत उम्दा पोस्ट है ये, हर बार की तरह.
दूसरा कारण ये की आपने लिखा है की आप ने इस पोस्ट में कहा है के "लेकिन आपकी पिछली पोस्ट्स न देखने की आदत को भलीभांति जानते हुए... "

ये असत्य है गुरुदेव. हम तो शुरू से पढ़ते पढ़ते आज यहां पहुंचे हैं. शायरी का मज़ा ले रहे हैं. और हाँ, ये ब्लॉग मेरे लिए एक ग्रन्थ समान है.
आपके इस ब्लॉग के लिए आपको बहुत बहुत आभार.