Monday, February 15, 2010

किताबों की दुनिया - 24

जैसे उजड़े हुए मंदिर में हवा का झोंका
ऐसे आ जाएँ कभी लौट के आने वाले

मुझसे क्या पूछते हो मैंने उन्हें कब देखा
पेड़ की आड़ में थे तीर चलाने वाले

ढूंढ कर लाओ कोई हो तो सुलाने वाला
सैंकड़ों लोग हैं दुनिया में जगाने वाले

दुनिया वालों ने फकत उसको हवा दी थी 'निजाम'
लोग तो घर ही के थे आग लगाने वाले




ऐसे जबरदस्त शेर कहने वाले हैं जोधपुर में जन्मे और आज उर्दू शायरी के आकाश पर चमकते हुए सितारे जनाब " शीन काफ निजाम" उर्फ़ "शिव कुमार निजाम". उनकी एक किताब "वाग्देवी प्रकाशन" बीकानेर ने प्रकाशित की है " सायों के साए में" शीर्षक से, आज इसी किताब का जिक्र करेंगे.



पहले ज़मीन बांटी थी फिर घर भी बट गया
इंसान अपने आप में कितना सिमट गया

अब क्या हुआ की खुद को मैं पहचानता नहीं
मुद्दत हुई कि रिश्ते का कोहरा भी छट गया

गाँवों को छोड़ कर तो चले आये शहर में
जाएँ किधर कि शहर से भी जी उचट गया

शीन काफ निजाम साहब को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिए गए 'इकबाल सम्मान' के अलावा 'भाषा भारती सम्मान, उर्दू अकेडमी अवार्ड और बेगम अख्तर अवार्ड से भी नवाज़ा जा चूका है ,लेकिन इन सबसे बड़ा अवार्ड उन्हें उनके लाखों पाठकों और श्रोताओं ने अपना प्यार लुटा कर दिया है. निजाम साहब अपनी शायरी का जलवा अमेरिका यूरोप और खाड़ी के मुल्कों में भी दिखा चुके हैं.

जीत के ज़ज्बे ने क्या जाने कैसा रिश्ता जोड़ दिया
जानी दुश्मन भी मुझको अब मेरा अपना लगता है

इस बस्ती की बात न पूछो इस बस्ती का कातिल भी
सीधा-सादा, भोला-भाला,प्यारा प्यारा लगता है

दरवाज़े तक छोड़ने मुझको आज नहीं कोइ आया
बस, इतनी सी बात है लेकिन जाने कैसा लगता है

प्रसिद्द कवि अज्ञेय जी ने कहा है "मुझे कविता प्रायः याद नहीं रहती, लेकिन निजाम के कुछ शेर मुझे अकस्मात कंठस्थ हो गए और वो मेरी भाव संपत्ति का अंग बन गए." इस बात को उनकी इस किताब को पढ़ कर अच्छी तरह जाना जा सकता है.जो शेर बिना भारी भरकम शब्दों का सहारा लिए सीधे दिल में उतरते हों उन्हें याद करना मुश्किल नहीं होता. इंसान की मुश्किलों और खुशियों को सही लफ्ज़ देना ही शायरी है और निजाम साहब इसमें सिद्ध हस्त हैं.

पेड़ों को छोड़ कर जो उड़े उनका जिक्र क्या
पाले हुए भी गैर की छत पर उतर गए

यादों की रुत के आते ही सब हो गए हरे
हम तो समझ रहे थे सभी ज़ख्म भर गए

शायर कुमार पाशी का कहना है " निजाम के शेर पढ़ते हुए बार बार एहसास होता है कि उनके सामने उदास मंज़र फैले हुए हैं ,जिन की झलकियाँ वे लफ़्ज़ों में पेश करते हैं."

आज हर सम्त भागते हैं लोग
गोया चौराहा हो गए हैं लोग

अपनी पहचान भीड़ में खो कर
खुद को कमरों में ढूंढते हैं लोग

ले के बारूद का बदन यारों
आग लेने निकल पड़े हैं लोग

हर तरफ इक धुआँ सा उठता है
आज कितने बुझे बुझे हैं लोग

वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर वालों की ये विशेषता है कि वो अपने पाठकों को उच्च साहित्य की पुस्तकें अविश्वश्नीय मूल्य पर उपलब्ध करवा देते हैं.क्या आप भरोसा करेंगे की निजाम साहब की ये अनमोल पुस्तक जिसमें उनकी लगभग सौ ग़ज़लें, दोहे और लाजवाब नज्में संगृहीत है का मूल्य मात्र पैंतीस रुपये ही है? मुझे तो सच यकीन नहीं हुआ था लेकिन ये सत्य है.आप ये पुस्तक उनसे उनके मेल vagdevibooks@gmail.com पर अपना पता भेज कर मंगवा सकते हैं या फिर उनसे 0151-2242023 फोन नंबर पर संपर्क कर इसके बारे में जानकारी ले सकते हैं.

शीन काफ निजाम साहब को मैंने जयपुर की महफ़िलों में अक्सर सुना है और उनकी गहरी आवाज़ और अदायगी का कायल हूँ. आपने उनके शेर तो बहुत सुने होंगे लेकिन वो निदा फाजली साहब की तरह कमाल के दोहे भी कहते हैं तो चलिए अब पढ़ते और सुनते हैं उनकी लाजवाब शायरी और दोहे उन्हीं की जुबानी:

ये कैसा इनआम है ,ये कैसी सौगात
दिन देखे जुग हो गए, जब जागूं तब रात
****
पतझड़ की रुत आ गयी, चलो आपने देश
चेहरा पीला पड़ गया, धोले हो गए केश
****
करे जुगाली रात दिन, शब्दों की नादान
है पोथी का पारखी, अक्षर से अनजान
****
चौपालें चौपट हुईं सहन में सोया सोग
अल्लाह जाने क्या हुए, आल्हा गाते लोग
****
गोबर से घर लीप कर गोरी हुई उदास
दुहरायेगा कौन कल आँगन का इतिहास



आप वाग्देवी प्रकाशन वालों वालों को लिखें या बात करें तब तक चलते हैं एक और किताब खोजने आपके लिए. मेरा मकसद सिर्फ और सिर्फ अच्छी सच्ची शायरी की किताबों की जानकारी आपतक पहुँचाना भर है...मील के पत्थर हैं भाई हम तो सिर्फ ये बताते हैं मंजिल किधर और कितनी दूर है....चलना तो आपको ही है

45 comments:

वन्दना said...

पेड़ों को छोड़ कर जो उड़े उनका जिक्र क्या
पाले हुए भी गैर की छत पर उतर गए

यादों की रुत के आते ही सब हो गए हरे
हम तो समझ रहे थे सभी ज़ख्म भर गए

waah ..........bahut hi sundar sher.........seedhe dil mein utar gaye.........shukriya.

Kusum Thakur said...

आपका शायरों और उनकी किताबों से परिचय कराने का अंदाज़ लाजवाब है !!

ताऊ रामपुरिया said...

मुझसे क्या पूछते हो मैंने उन्हें कब देखा
पेड़ की आड़ में थे तीर चलाने वाले

ढूंढ कर लाओ कोई हो तो सुलाने वाला
सैंकड़ों लोग हैं दुनिया में जगाने वाले


बहुत लाजवाब, आज विडियो भी लगे हैं शाम को फ़ुरसत मे आनंद लेंगे. बहुत शुक्रिया जनाब आपका.

रामराम.

संजय भास्कर said...

आपका शायरों और उनकी किताबों से परिचय कराने का अंदाज़ लाजवाब है !!

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

शुक्रिया आप वाकई में बहुत खूबसूरत लफ़्ज़ों से रूबरू करवा देते हैं ..पढने की इच्छा स्वयम ही जाग जाती है शुक्रिया

तिलक राज कपूर said...

शीन काफ़ निज़ाम साहब की 'नीम की पत्तियॉं' पढ़ी थी करीब 25 साल पहले। आज भी याद है: शेर शीरीं हुए, गीत गोली नहीं...'। आज भी संग्रह में है। अदबी नफ़ासत से भरी इनकी रचनायें बार-बार बुलाती हैं पढ़ने को।
आपका विशेष धन्‍यवाद। इनकी नई पुस्‍तक से परिचय कराने के लिये।

डिम्पल said...

behad khoobsurat collection hai apki.

रश्मि प्रभा... said...

क्या हुआ की खुद को मैं पहचानता नहीं
मुद्दत हुई कि रिश्ते का कोहरा भी छट गया
...........yahan aakar ek khula aakashiye vistaar milta hai

सागर said...

सायों के साए में मेरे पास है और इसकी लगभग सभी ग़ज़लें और नज्में मुझे याद हैं... खासकर समंदर पर जो siries है ...

कुछ लाइन शेयर करना चाहूँगा

और कुछ देर शोर मचाये रहिये
आसमान है तो उसे सर पर उठाये रखिये

मेरी गजलों में ढल गया होगा
जाने कितना बदल गया होगा
बेसबब अश्क आ नहीं सकते
कहीं कोई पत्थर पिघल गया होगा
रास्तों को वो जानती ही कब थी
पांव ही था फिसल गया होगा
मंजिलें दूर क्यों हुई हैं 'निजाम'
शायद रास्ता बदल गया होगा

यह सब उन्ही का है... एक और
"और कितने जन्मों के जजीरे
यूँ ही
हमारे सामने इस्तकबाल को आते रहेंगे
और हम भी...
जब तक बहार का सन्नाटा
अन्दर के कोहरे मं
घुल मिल नहीं जाता

... शीन काफ निजाम मेरे फेवरेट शयरों में से एक हैं... आपने साँझा किया अच्छा लगा.... शुक्रिया

Vijay Kumar Sappatti said...

neeraj ji namaskar ...

ek aur shaandar kitaab aur kitaab se jyaada ek aur shaayar se ruburu hona ... aapki kalam ke sahare.. waah ye silsila to aisa ban padha hai ki , hume intjaar rahta hai ..aapki post ka .. saare sher behatreen hai , gajab ke hai ...lekin iska jawaab nahi ....
ढूंढ कर लाओ कोई हो तो सुलाने वाला
सैंकड़ों लोग हैं दुनिया में जगाने वाले
....sir ji bahut dino se koi comedy rachna nahi daali hai ... jaldi se kuch likhiye ...

aapka
vijay

दिगम्बर नासवा said...

हमेशा की तरह इस बार भी आप गहरे पानी से मोती ढूँढ कर लाए हैं ..... शेरों से निज़ाम सागब के तेवर नज़र आ रहे हैं ... इतनी आसानी से पूरा फलसफा सिमेट दिया है ह्र शेर में और आपने ऐसे ही फलसाफॉन को चुन चुन कर पिरो दिया है इस लाजवाब श्रंखला में ...... बहुत बहुत शुक्रिया नीरज जी .......

pran said...

NEERAJ JEE,BEHAD KHUSHEE HOTEE
HOTEE HAI JAB AAP KISEE SHAYAR
AUR USKEE SHAAYREE SE PARICHAY
KARWAATE HAIN.

सागर said...

और नामवर सिंह कहते हैं " मुझे हैरत है इस उम्र में निजाम को यह बशिरत कैसे मिल गयी"
खुद निदा फाजली से शब्दों में...
"अपना अक्स तुममें देखता हूँ, तुम फर्द हो"

डॉ टी एस दराल said...

इतने बढ़िया शेर और गजलों वाली पुस्तक सिर्फ ३५ रूपये में !आश्चर्य है।
खैर हमने तो मुफ्त में ही पढ़कर आनंद ले लिया। आभार इस प्रस्तुति का।

रंजन said...

शीन काफ जी को कई बार सुना है.. बहुत अच्छा लिखते है और बहुत अच्छे इंसान है...

पुस्तक की कीमत अगर एसी हो तो हर कोई पढ़े खरीद कर..

आभार...

M VERMA said...

पारखी नज़र परख ही लेते हैं
शुक्रिया

shikha varshney said...

aapke parichey karane ka andaj sachmuch nirala hai...

डॉ. मनोज मिश्र said...

उम्दा परिचय-उम्दा पोस्ट.

सुशीला पुरी said...

sir ! kahan se itni khubsurat gazlen bator laye ?

Kulwant Happy said...

आपकी पुस्तक चर्चा। बहुत अद्भुत होती है। सच में। क्योंकि झूठ बोलना आता ही नहीं।

Udan Tashtari said...

शीन काफ निजाम साहेब को सुनकर और उनके शेर पढ़कर किताब पढ़ने की इच्छा जाग उठी.

अबदुल्ला साहब का मंच संचालन देख रहा था. उनके साथ वाशिंग्टन में पढ़ने का सौभाग्य रहा.

बहुत बेहतरीन समीक्षा. आभार!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पुस्तक समीक्षा बहुत करीने से की है आपने!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

नीरज जी, आदाब
आपका आभार, कि आप शायरी की दुनिया की ऐसी नायाब हस्तियों से मिलवाते हैं..
अब क्या हुआ की खुद को मैं पहचानता नहीं
मुद्दत हुई कि रिश्ते का कोहरा भी छट गया
वाह....वाह
पेड़ों को छोड़ कर जो उड़े उनका जिक्र क्या
पाले हुए भी गैर की छत पर उतर गए
कितना ’सच्चा’ कहते निजाम साहब..

sunil said...

निजाम साहब न सिर्फ जोधपुर के बल्कि देश के नमी शायरों में से एक है उनकी एक रचना जो मुझे बेहद पसंद है पेशे खिदमत है


और कुछ देर यूँ ही शोर मचाए रखिए
आसमाँ है तो उसे सर पर उठाये रखिए

उँगलियाँ गर नहीं उट्ठे तो न उट्ठे लेकिन
कम से कम उसकी तरफ आँख उठाए रखिए

खिड़कियाँ रात को छोड़ा न करें आप खुलीं
घर की है बात तो घर में ही छिपाए रखिए

अब तो अक़्सर नज़र आ जाता है दिल आँखों में
मैं न कहता था कि पानी है दबाए रखिए

कौन जाने कि वो कब राह इधर भूल पड़े
अपनी उम्मीद की शमा को जलाये रखिए

कब से दरवाज़ों को दहलीज़ तरसती है 'निज़ाम'
कब तलक गाल को कोहनी पे टिकाये रखिए

राज भाटिय़ा said...

दरवाज़े तक छोड़ने मुझको आज नहीं कोइ आया
बस, इतनी सी बात है लेकिन जाने कैसा लगता
आप का लेख ओर अन्य रचनाये बहुत सुंदर लगी धन्यवाद

वन्दना अवस्थी दुबे said...

दुनिया वालों ने फकत उसको हवा दी थी 'निजाम'
लोग तो घर ही के थे आग लगाने वाले
वाह! कितना धन्यवाद करूं आपका. साधुवाद.

venus kesari said...

नीरज जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति रही

पढ़ कर पता चल जाता है कि सागर से मोती निकालना और किसी के लिए मुश्किल होगा नीरज जी के लिए नहीं

शानदार प्रस्तुति

योगेश स्वप्न said...

nizam sahab se parichay ke liye aabhaar.

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Om prakash Sapra Ji from Delhi:-

Shri neeraj ji
namastey,
thanks for your mail.
gazals of sheen kaaf nizam as presented by you are very nice and have a good depth. thanks for sending this beautiful "GULDASTA''.
congrats,

regards,
-om sapra, delhi-9

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Dr.bhoopendra ji:-

नीरज जी ,
आपने शीन काफ निजाम का जो परिचय दिया उस से अनजान था .
आभार ,धन्यवाद
सादर,
भूपेन्द्र

Dr.bhoopendra
Rewa M.P

SAMEER said...

bhiaya se aapke bare me bahut suna hai mene..
i m sonu from sehore (Pankaj Purohit)
http://sameerpclab2.blogspot.com

डॉ .अनुराग said...

इत्तिफाक से इनकी अगली पीड़ी से मुलाकात हुई है ओर वे साहब भी इनकी तरह काबिलियत रखते है .....

सुलभ § सतरंगी said...

शुक्रिया इस परिचय के लिए.

निर्मला कपिला said...

आप साहितय की जौहरी हैं पता नहीं कहाँ से ढूँढं कर लाते हैं हमारे लिये ये अनमोल मोती। और शायरी से रूबरू करवाने की कला कोई आपसे सीखे। निज़ाम जी की शायरी ने किताब पढने के लिये उतसुकता बढा दी है । उन्हें सुन रही हूँ और हज़ार हज़ार दुया कर रही हूँ उनकी कलम यूँ ही चलती रहे उन्हें बहुत बहुत बधाई

नीरज गोस्वामी said...

E-Mail received from Sunil Ji:-

हर तरफ इक धुआँ सा उठता है
आज कितने बुझे बुझे हैं लोग
Regarding neeraj saab ye sher aap ko nazar karta hua aap..
sadar pranam karta hoo,
regarding nizam ke baare me padh kar accha laga. mera shoubhagya hai hai ki main rubru oonse 2 . 3. baar sahitiyak karykarm me mil chuka hoo. hala ki hamare hi pados me dr. sh. nand kisoore achnaya ji ke ghar akasar aate, jigri dost hai. aabhar aap ko ki aap ne oonki kitab ke baare me bataya,
aap ki betrin gazalon ka bhi aashirwad hamari web magzine ko prapt hoto rahege, ye kamna hai.
sadar

Sunil Gajjani
President Buniyad Sahitya & Kala Sansthan, Bikaner
Add. : Sutharon Ki Bari Guwad
Bikaner (Raj.)

kshama said...

Aapke blog pe pahunch gaye to lautna bhool jate hain log..

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

ये खिड़की में कब तक कल के ब्लॉगर रहेंगे। उनका भी ब्लॉग बना दीजिये न!

गौतम राजरिशी said...

इस "मील के पत्थर" के लिये तो शुक्रिया के सारे शब्द छोटे पड़ गये हैं अब।

Akanksha~आकांक्षा said...

आप तो पूरे साहित्य के जौहरी निकले. सबको ढूंढ़कर उनकी सुन्दर-सारगर्भित चर्चा कर रहे हैं..यह पोस्ट भी पूर्ववत लाजवाब !!

Shiv Kumar Mishra said...

नहीं पढ़ा था 'निजाम' साहब को कभी. एक से बढाकर एक शेर हैं आपकी समीक्षा में. यह किताब ले आता हूँ कहीं से. आपकी यह सीरीज ऐसी किताबों के लिए एक रेफेरेंस पॉइंट रहेगी.

अमिताभ मीत said...

हर बार की तरह कमाल की पोस्ट. गज़ब के शेर ले के आये हैं इस बार भी .........खूबसूरत .... खूबसूरत !!

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

hum nizam sahab ke pados me hokar bhi unse ru b ru nahi ho sake.unki kalam se parichit karane ka shukriya neeraj sahab!

सतीश सक्सेना said...

"मुझसे क्या पूछते हो मैंने उन्हें कब देखा
पेड़ की आड़ में थे तीर चलाने वाले"

वाह वाह नीरज भाई !,
रोज और खूबसूरत लग रहे हैं आप !
सादर

Suman said...

nice