Thursday, December 18, 2008

किताबों की दुनिया - १

दोस्तों पढ़ना और वो भी किताबें खरीद कर पढ़ना मेरा बरसों पुराना शौक रहा है। मैंने सोचा आप से उन ढेरों किताबों में से, जो मेरी नज़रों से गुजरी हैं, चंद शायरी की किताबों की चर्चा करूँ. आज कल देख रहा हूँ की ग़ज़ल लिखने और सीखने का शौक अपने परवान पर है, इसी के चलते चलिए अच्छी शायरी की बात करें.

हाल ही में जयपुर में "राष्ट्रीय पुस्तक मेला" आयोजित हुआ था वहीँ घूमते हुए ग़ज़लों की जिस किताब पर निगाह पढ़ी उसका नाम था" सुबह की उम्मीद" जिसे लिखा था जनाब बी. आर.'विप्लवी' जी ने.



इसे मेरा अल्प ज्ञान कहें की मैंने इस से पहले न तो इस किताब का नाम सुना था और न ही लेखक का. एक अनजान किताब को खरीदने में जो जोखिम रहता है उसे उठाने की सोच दिल में आयी.

घर आ कर किताब को पढ़ा तो हैरान रह गया. मेरी उम्मीद से कई गुना खूबसूरत एक से बढ़ कर एक ग़ज़लें पढने को मिलीं.
किताब में 'विप्लवी' जी के बारे में अधिक कुछ लिखा नहीं मिलता लेकिन उनका लिखा खूब मिलता है वे भूमिका में कहते हैं की:
"काव्य या शायरी की दुनिया को जज्बाती समझा जाता है इसलिए इसे अक्सर आनंद लेने या रस लेने का साधन समझा गया है. मैं इस बात को यूँ मानता हूँ यह दिल की खुशी आदमी की भावनाओं में झंकार पैदा करके भी मिलती है और उसे झकझोर करके भी. इसलिए इसमें वो ताकत है कि सोये लोगों को जगाये और आगे कि लडाई के लिए तैयार करे.आज कि कविता या शायरी की यह जरूरत भी है."

विप्लवी साहेब ने शायरी की प्रेरणा और मार्ग दर्शन मशहूर शायर जनाब वसीम बरेलवी से प्राप्त किया.
वसीम साहेब फरमाते हैं की" विप्लवी जी जिस प्रकार हिन्दी संस्कार के फूलों को उर्दू तेहज़ीब की खुशबू में बसने का प्रयत्न कर रहे हैं, उसने उनकी गज़लिया शायरी को लायके- तबज्जो बना दिया है."

श्री गोपाल दास "नीरज" जी कहते हैं की "भाई विप्लवी जी की ग़ज़लें पढ़ कर मन मुग्ध हो गया. आजकल ग़ज़लें तो हर कोई लिख रहा है लेकिन बहुत कम लोग हैं जो ग़ज़ल को आत्मा तक पहुँचा पाए हैं"

श्री बेकल उत्साही जी कहते हैं की" विप्लवी जी ने अपनी गज़लों में रवानी के साथ मायनी को उजागर किया है, यह एक पुख्ताकार का काम है "

आयीये पढ़ते हैं विप्लवी जी का चुनिन्दा कलाम...

पहले पन्ने से ही अपनी शायरी का जादू दिखाते उन्होंने लिखा:

पैर फिसले,खताएं याद आयीं
कैसे ठहरे, ढलान लम्बी है

ज़िन्दगी की जरूरतें समझो
वक्त कम है दूकान लम्बी है

झूट,सच,जीत, हार की बातें
छोडिये, दास्तान लम्बी है

आज के हालत पर छोटी बहर में करिश्मा कुछ यूँ बिखेरा है:

कलम करना था जिनका सर जरूरी
उन्हीं को सर झुकाए जा रहे हैं

सुयोधन मुन्सफी के भेष में हैं
युधिष्ठिर आजमाए जा रहे हैं

लड़े थे 'विप्लवी'जिनके लिए हम
उन्हीं से मात खाए जा रहे हैं

उनके कलम की सादगी देखिये, किस सहजता से अपनी बात कहते हैं:

मुझे वो इस तरह से तोलता है
मिरी कीमत घटाकर बोलता है

वो जब भी बोलता है झूठ मुझसे
तो पूरा दम लगा कर बोलता है

ज़ुबां काटी,तआरुफ़ यूँ कराया
यही है जो बड़ा मुहं बोलता है

एक दूसरी ग़ज़ल के दो शेर और पेश करता हूँ

कुँआ खोदा गया था जिनकी खातिर
वही प्यासे के प्यासे जा रहे हैं

कहाँ सीखेंगे बच्चे जिद पकड़ना
सभी मेले तमाशे जा रहे हैं


एक ग़ज़ल जिसके सभी शेर मुझे बहुत पसंद आए:

ये कौन हवाओं में ज़हर घोल रहा है
सब जानते हैं,कोई नहीं बोल रहा है

मर्दों की नज़र में तो वो कलयुग हो कि सतयुग
औरत के हँसी जिस्म का भूगोल रहा है


जो ख़ुद को बचा ले गया दुनिया की हवस से
इस दौर में वह शख्स ही अनमोल रहा है

जीवन कि कड़वी सच्चाइयों को बहुत खूबसूरती से बयां करते उनके ये दो शेर पढ़ें:

अदाकारी जिन्हें आती नहीं वे मात खाते हैं
फ़क़त सच होने से ही बात सच मानी नहीं जाती

ये मुंसिफ अपनी आंखों पर अजब चश्मा लगाता है
बिना दौलत कोई सूरत भी पहचानी नहीं जाती

मोहब्बत 'विप्लवी' अब एक घर बैठे का ज़ज्बा है
किसी से भी कहीं कि खाक तक छानी नहीं जाती

पूरी किताब ऐसे एक से बढ़ कर एक उम्दा शेरों से भरी हुई है कि किसे सुनाये और किसे छोडें का चुनाव बहुत मुश्किल है अब इसे पढ़ें:

जूठनों पर कुक्करों सा आदमी का जूझना
आज भी सच है,सितारों पर भले चढ़ जाईये

अब सुना है जंगलों में शेर का है खौफ़ कम
गाँव में लेकिन बिना बन्दूक के मत जाईये


एक सौ छतीस पृष्ठों की इस किताब में कोई एक सौ ग़ज़लें है और सभी शानदार. ऐसे में उनमें से कुछ को छांटना बहुत दुष्कर काम है. नेरी गुजारिश है की हर शायरी के प्रेमी को इसे पढ़ना चाहिए. ये किताब वाणी प्रकाशन २१-ऐ दरिया गंज, नई-दिल्ली से छपी है और इसका मूल्य मात्र साठ रुपये है. आप इसके बारे में इ-मेल से जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं...पता है:vani_prakashan@yahoo.com , vani_prakashan@mantraonline.com , फ़ोन :011-23273167, 51562621

अब चलिए आख़िर में उनकी दो और गज़लों के चुनिन्दा शेर पढ़ते चलते हैं,पहली ग़ज़ल के शेर कुछ यूँ हैं:

वास्ता सीता का देके कहने लगे
इम्तिहानो से रिश्ते निखर जायेंगे

भूले भटके हुओं से कोई ये कहे
रहबरों से मिलेंगे तो मर जायेंगे

घर में रहने को कहता है कर्फ्यू मगर
जो हैं फुटपाथ पर किसके घर जायेंगे

और और दूसरी ग़ज़ल के ये तीन बेहतरीन शेर.....

उन्हीं से उजालों की उम्मीद है
दिए आँधियों में जो जलते रहे

उन्हीं को मिलीं सारी ऊचाईयां
जो गिरते रहे और संभलते रहे

हासिले ग़ज़ल शेर है:

छुपाता रहा बाप मजबूरियां
खिलौनों पर बच्चे मचलते रहे

अगली बार एक नयी किताब और नए अशआर लेकर फ़िर खिदमत में हाज़िर होंगे तब तक के लिए...नमस्कार. दसवेदानिया

38 comments:

विनय ओझा 'स्नेहिल' said...

Goswami ji yeh nagina kahan se khoj nikala hai.Is khoj ke lie shukriya.bahut hi tarakki pasand gazlen hain jo system kee khamiyon ko bade ishare se benakab karti hain.Vinayojha snehil.

दिगम्बर नासवा said...

नीरज जी
ग़ज़ल का अच्छा पारखी ही ग़ज़ल का अंदाज़, ग़ज़ल का दर्द, ग़ज़ल का ज़हन समझ सक सकता है.
बहुत बहुत शुक्रिया, विप्लवी जिका परिचय करवाने की लिए.

किताब खरीदनी ही पढेगी अब तो

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत आभार नीरज जी आपका इस किताब के बारे मे बताने और आपकी राय से वाकिफ़ करवाने के लिये !

राम राम !

swati said...

bahut hi sundar neeraj bhaiya......aapka likha bhi itna hi achha lagta hai......
swati

seema gupta said...

ये कौन हवाओं में ज़हर घोल रहा है
सब जानते हैं,कोई नहीं बोल रहा है
" इस बेहतरीन और नायब गज़लकार से रूबरू करने का शुक्रिया.."

Regards

अल्पना वर्मा said...

पैर फिसले,खताएं याद आयीं
कैसे ठहरे, ढलान लम्बी है
--एक शेर क्या यहाँ तो अहर शेर काबिले तारीफ़ है!
बहुत ही सरलता और खूबी से हर शेर कहा है.बहुत ही उम्दा शायर हैं.
मानना पड़ेगा आप के हाथ एक नायाब नगीना लग गया है.
जानकारी के लिए आभार..और इतनी बेहतरीन ग़ज़ल पद्वाने के लिए भी धन्यवाद.
भारत आने पर यह किताब लेने की कोशिश करुँगी.

स्वाति said...

वाह नीरज जी
एक बहुत ही अच्छी किताब का परिचय कराया आपने , मुझे भी किताबे पढने का बहुत ही शौक है और हर साल जनवरी माह में हमारे नागपुर में राष्ट्रीय पुस्तक मेला लगता है मै वहा जाना नहीं भूलती , इस बार जरूर इस पुस्तक को खरीदूंगी , धन्यवाद .

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत...शानदार...जानदार...ईमानदार
प्रस्तुति....आगामी की प्रतीक्षा रहेगी.
============================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छी जानकारी दी आपने ..इस किताब के बारे में ..जरुर पढेंगे इसको ...

मीत said...

वाह साहब ! वाह !! कमाल .... लाजवाब कर दिया है ... "विप्लवी" जी की शायरी से आशना करवाने का तहे दिल से शुक्रिया. ये किताब ज़रूर ख़रीदी जायेगी. एक से बढ़ कर एक अश'आर. बहुत शुक्रिया नीरज भाई.

पंकज सुबीर said...

नीरज जी आपने जिस प्रकार पुस्‍तक के बारे में जानकारी दी है उससे तो किताब को पढ़ने की इच्‍छा बलवती हो गई है । चलिये ढूंढ कर पढ़ता हूं । वैसे आपने एक काम और अच्‍छा किया है और वो ये कि आपने ये काम कर के एक अच्‍छे साहित्‍य को लोगों तक पहुचाने का काम किया है । ये पुण्‍य का काम है ।

मुसाफिर जाट said...

बहुत बढ़िया बुक है, नीरज जी.

रश्मि प्रभा said...

waakai ghazal me khaasiyat hai,aksar log naam par jate hain,main shirshak par jaati hun,aapne jo risk liya wah kamaal ka nikla

Gyan Dutt Pandey said...

एक अनजान किताब को खरीदने में जो जोखिम रहता है उसे उठाने की सोच दिल में आयी.
-------------
नीरज जी आप उत्कृष्ट निवेशक हैं। जोखिम ले कर अच्छी पुस्तक चुनी है।

कंचन सिंह चौहान said...

पैर फिसले,खताएं याद आयीं
कैसे ठहरे, ढलान लम्बी है

bahut bahut dhanyavaad Viplavi ji se parichay karane ka...!

कुश said...

इस पुस्तक मेला में मैं भी गया था.. और खामोश नंगे हमाम में है और बरमासी लेकर आया.. और इसके लिए भी आप ही को धन्यवाद..

और आज आपने एक और पुस्तक के बारे में बता दिया.. लगता है आपका पुस्तक प्रेम हमारे बड़ा काम आने वाला है..

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह जी कितनी अच्छी किताब की जानकारी दी हैं। हम तो खरीदने के साथ लाईब्रेरी से लेकर पढते है। मिली तो पढेगे जरुर।

डॉ .अनुराग said...

वाकई आप तो खजाने के पास जा पहुंचे ....ओर कुछ मोती उठा लाये ....यहाँ बिखेरने का शुक्रिया

प्रहार - महेंद्र मिश्रा said...

उन्हीं को मिलीं सारी ऊचाईयां
जो गिरते रहे और संभलते रहे

bahut sundar gajal.badhi neeraj ji dil jeet liya. dhanyawad.

विनय said...

ज़रूर ख़रीदकर पढ़ेगें!

cmpershad said...

पुस्तक मेले में किताबों की कतार लम्बी है
उतर जाये सीने में गज़ल की कटार लम्बी है॥

गौतम राजरिशी said...

नीरज जी आपका किन शब्दों में शुक्रिया अदा करूं...मैं खुद भी गज़लों की तमाम किताबॊं का संकलम करता हूं और अभी कुछ दिनों पहले किसी मित्र ने मुझ्से विपल्व जी के इस गज़ल-संग्रह के बारे में जिक्र किया था.तबसे मैं बेताब था इस किताब के लिये...आपका लाख-लाख शुक्र कि आपने प्रकाशन के बारे में बताया...संपर्क करता हूं उनसे

अपने शेष संग्रह के बारे में भी जानकारी दें...मैं भी प्रयत्न करूंगा फिर अपने संग्रह के बारे में जानकारी बांटने की

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,

"विप्लवी" जी की शायरी से रु-ब-रु करवाने का तहे दिल से शुक्रिया,
आशा है आप का यह ब्लॉग पढ़ कर कोई न कोई टिप्पणीकार "विप्लवी" जी का भी परिचय हम सब से करवाएगा.
आपके इस असाधारण जोखिम बारे निवेश से हम टिप्पणीकारों को जो बिना निवेशित हुवे लाभांश (डिविडेंड) मिला है उसकी किन शब्दों में भरपाई करें , समझ नही आ रहा है.

आशा है प्रति सप्ताह आप इसी तरह लाभांश प्रेषित करते रहेंगे.

चन्द्र मोहन गुप्त
cmgupta.blogspot.com

राज भाटिय़ा said...

नीरज जी आप का धन्यवाद एक लेखक से मिलवाने ओर उन की किताब के बारे सही जानकारी देने क लिये, ओर उन के सुंदर सुंदर शेर पढवाने के लिये.
राम राम जी की

Manish Kumar said...

shukriya is pustak se parichay karane ka..

प्रकाश बादल said...

नीरज भाई,
बहुत बहुत शुक्रिया इतना बढिया संग्रह सुझाने का। मैने तो वी.पी.पी. से मंगवा डाला है लेकिन आप भी मेरा पता सुझा सकते हैं:



प्रकाश बादल,
ब्लॉक-4,टाईप-2,बैसमैंट,
वन विभाग कालोनी,
मिस्ट चैम्बर, ख़लीणी,
शिमला-171002, हिमाचल प्रदेश।

sandhyagupta said...

Mauka milte hi padhne ki koshish karungi.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

नीरज भाई साहब,
ये हुई ना खास बात्त !
अच्छी पुस्तकोँ से इतने लोगोँ को रुबरु करवाना और सदा के लिये विप्लवी जी जैसे उम्दा दर्ज़े के शायर को वेब पर सदा के लिये प्रतिष्ठित करने का काम आपने किया है वह काबिले तारीफ है - भला हो आपका ! :)
हरेक शेर मेँ सच का निचोड है वही दिलको छूता है... वही गज़ल और कविता की आत्मा है -
स स्नेह,
- लावण्या

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

विप्लवी जी का उम्दा कलाम प्रस्तुत करने के लिए आभार .

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut hi sundar lekh , is kitab se parichit karwa kar hamen aapne sahitya premiyon ke liye ek bada accha kaam kiya hai ..

aapko bahut dhanyawad aur badhai


pls visit my blog for some new poems....

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

नीरज जी,
आपकी गज़लों को तो हमेशा ही पढ़ते हैं आज विप्लवी जी और उनकी गज़लों से परिचय कराने का शुक्रिया!

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाहवा नीरज जी... बधाई... विप्लवी जी को छिटपुट तो खूब पढ़ा है. अब किताब भी ले लेंगें.

venus kesari said...

नीरज जी नमस्कार
साहित्य पुस्तक के विषय में मेरे जैसे नव आगंतुकों को हमेशा ही यह समस्या बनी रहती है की किसे पढ़े किसे नही क्योकि बड़े नाम से तो हम वाकिफ हो ही जाते है मगर नाम जो कदरन नए हो या अनसुने हो उनको पढ़ पाना हमारे लिए एक मुश्किल काम साबित होता है क्योकि एक नजर में पता ही नही चलता की क्या साहित्य है और क्या कचरा,
मगर आपके द्वारा जिस तरह विप्लवी जी की पुस्तक की जानकारी मिली वास्तव में ये एक नायब तोहफा है हमारे लिए
कोटीश धन्यवाद
आपका वीनस केसरी

बवाल said...

आदरणीय नीरज जी, एक बहुत ही बेह्तर शायर से रूबरू करवाने का आपका यह अन्दाज़ लाजवाब रहा. बहुत आभार इसके लिए आपका.

श्रद्धा जैन said...

ek aur achhi kitaab
kitna kuch hai padne ko aur main jivan bus unhi vayarth kiye jaa rahi hoon
is baar bharat main delhi aakar kitaben khridi jaayengi
kuch aur achhi kitabon ke parichay ka intezaar rahega
aapne ek bhaut si sarthak kaam ka bida uthaya hai

main aapki aabhari rahungi

CHINMAY said...

wakai me viplavi ji gazale tareef ke kabil hai. aise bahut sare log hai jo kisi karan se samne nahi aa pate hai. ye sher to unhi ke liye hai.

मुझे वो इस तरह से तोलता है
मिरी कीमत घटाकर बोलता है

वो जब भी बोलता है झूठ मुझसे
तो पूरा दम लगा कर बोलता है

हिमान्शु मोहन said...

नीरज जी, बड़प्पन इसी में झलकता है आपका - कि आप जो नए लोगों की खुल कर प्रशंसा करते हैं - उनके नाम नहीं - काम की गुणवत्ता पर आधारित, वह कोई बड़े दिल वाला ही कर सकता है, बड़ा शायर और सुख़न की गहरी समझ वाला ही कर सकता है। आभार!

Dinesh pareek said...

bahut accha niraj ji

आखिर कब फिरेंगे घूरे के दिन
मैं जानता हूं
जब मेरे किसी मित्र के
शुभागमन पर
अंदर से
पत्नी की कर्कश आवाज आती है
चाय ले लीजिए
तो उस आवाज में
कितनी कुढऩ होती है
उबली हुई चाय की पत्ती
जैसी कड़ुवाहट होती है
मैं समझ जाता हूं
कि आज फिर
उधार ली गई
चीनी की चाय बनी होगी
मैं देखता हूं
जब बच्चे
मिठाई खाने की जिद करते हैं
और मैं उन्हें
स्वाध्याय का महत्व समझाकर
कुछ पत्रिकाएं खरीद लाता हूं
तो उनकी आंखों में
कितनी निराशा होती है
अपने खुश्क होठों पर
जीभ फेर कर
वह फोटो देख और चुटकुले पढ़ते हुए
मुंह का बिगड़ा जायका बदलने लगते हैं।
मैं सोचता हूं
कि आखिर कब फिरेंगे घूरे के दिन
और कब पूरे होंगे बारह साल
http://pareekofindia.blogspot.com/