Monday, September 17, 2018

किताबों की दुनिया - 195

कांटा है वो कि जिसने चमन को लहू दिया 
 ख़ूने -बहार जिसने पिया है , वो फूल है 
 *** 
अपने पहलू में सजा लो तो इसे चैन आये
 दिल मेरा ग़म की धड़कती हुई तस्वीर सही 
 *** 
न जाने कौनसी मंज़िल पे आ पहुंचा है प्यार अपना
 न हमको एतबार अपना, न उनको एतबार अपना 
 *** 
भंवर से बच निकलना तो कोई मुश्किल नहीं लेकिन 
 सफ़ीने ऐन दरिया के किनारे डूब जाते हैं
 *** 
ओ बेरहम मुसाफ़िर हँसकर साहिल की तौहीन न कर 
 हमने अपनी नाव डुबाकर तुझको पार उतारा है
 *** 
अकसर उबल पड़ी है मेरी ओक से शराब 
 यूँ भी दुआ को हाथ उठाता रहा हूँ मैं
 *** 
थक गया मैं करते करते याद तुझको 
 अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ 
 *** 
ना जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम 
 दुनिया समझ रही है कि सब कुछ तेरा हूँ मैं 
 *** 
ना कोई ख़्वाब हमारे हैं न ताबीरें हैं 
 हम तो पानी पे बनाई हुई तस्वीरें हैं 
 *** 
न हो उनपे कुछ मेरा बस नहीं , कि ये आशिक़ी है हवस नहीं 
 मैं उन्हीं का था मैं उन्हीं का हूँ ,वो मेरे नहीं तो नहीं सही 

लाहौर शहर में सुबह के चार बजे हैं, बरसात हो रही है ,एक गोल चेहरे पर तीखी मूंछों वाला , काले घुंघराले बालों और चमकीली आँखों वाला इंसान आवाज़ लगाता है " ओये मुंडू उठ ओये चार बज गए ,तेल गरम करके लया फटाफट छेती !! मुंडू , उनका सेवक ,जो अभी तक गहरी नींद में था स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह अपने बिस्तर से उछलता है तेल गरम करता है एक कटोरी में डालता है और उस इंसान के पास आकर खड़ा हो जाता है जिसने अब सिर्फ लंगोट धारण कर रखा है और जो जमीन पे पेट के बल लेटा हुआ है। मुंडू को पता है कि क्या करना है - ये तो उसका रोज का काम है एक घंटा उस इंसान की जम के तेल मालिश। मालिश के बाद इन हज़रत का दंड पेलने का सिलसिला शुरू होता है , मुंडू का काम है गिनना जिसमें वो अक्सर गलती करता है लिहाज़ा सौ की जगह ढेड़ सौ दंड पेलना आम बात हो गयी है। पसीने में नहाये ये जनाब अब सीधे आकर अपनी टेबल पर बैठेंगे। आप सोच रहे होंगे कि मैं किसी पहलवान का जिक्र कर रहा हूँ ,आपकी सोच सही है इस तरह का इंसान पहलवान ही हो सकता है, लेकिन नहीं -अब ये हज़रत खिड़की से गिरती बारिश की बूंदों को देखते हैं और गुनगुना उठते हैं : "रात भर बूंदियां रक़्स करती रहीं , भीगी मौसिकियों ने सवेरा किया " आप भी मानेंगे कि ऐसा काव्य रचने वाला इंसान, पहलवान भले हो न हो लेकिन शायर जरूर होगा।

 पूछ रही है दुनिया मुझसे वो हरजाई चाँद कहाँ है 
 दिल कहता है गैर के बस में , मैं कहता हूँ मेरे दिल में 

 डरते-डरते सोच रहा हूँ वो मेरे हैं अब भी शायद 
 वर्ना कौन किया करता है यूँ फेरों पर फेरे दिल में 

 उजड़ी यादों टूटे सपनों शायद कुछ मालूम हो तुमको 
 कौन उठाता है रह-रहकर टीसें शाम-सवेरे दिल में 

 इस तरह तेल मालिश और दंड पेलने के बाद जहाँ अखाड़ा सजना चाहिए ख़म ठोकने और पेंतरे बदलने की मशक्कत होनी चाहिए वहां इसके ठीक विपरीत शेर कहे जा रहे हैं जिनमें झरनों का संगीत नदी की कल-कल, फूलों की महक, भंवरों की गुँजन, बादलों की गड़गड़ाहट, पपीहे की पीहू पीहू और महबूब की लचकती कमर का बखान पिरोया जा रहा है। ये शख्स जो जाति का पठान है और जिसने पेट पालने के लिए कभी गेंद बल्ले बेचे तो कभी रैकेट कभी लुंगियां बेचीं तो कभी कुल्ले कभी चुंगीखाने में कलर्की की तो कभी बस कम्पनियों में टिकट बेचे याने हर तरह का गैर शायराना काम किया और साथ ही की लाजवाब शायरी। शायरी दरअसल आपके अंदर होती है ,आप पहाड़ों की वादियों में, फूलों की घाटियों में या जिस्म के बाज़ारों में बैठें तो ही शायरी कर पाएंगे ऐसा तो कतई जरूरी नहीं और अगर आपके अंदर शायरी है ही नहीं तो साहब आप लाख दंड पेल लें आपके अंदर से एक मिसरा भी फूट जाए तो कहना।

 निकल कर दैरो-क़ाबा से अगर मिलता न मैखाना 
 तो ठुकराए हुए इन्सां खुदा जाने कहाँ जाते 

 तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-खाने की 
 तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते 

 चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी 
 वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते 

 हमारे आज के जो शायर साहब हैं न, शायरी उनमें कूट कूट कर भरी हुई है ये तेल मालिश और दंड पेलने की कवायद उस शायरी को अपने अंदर से बाहर कागज़ पर उतारने के लिए की जाती है। ये भी एक तरीका है मूड बनाने का हाँ ये तरीका जरा अलग है इसलिए हमें हजम नहीं होता। हम देखते आये हैं कि शायरी को अपने अंदर से बाहर निकालने के लिए शायर या तो लगातार सिगरेट पीते हैं या तो शराब, या दोनों एक साथ ,कुछ चाय की केतली सामने रखते हैं कुछ रात के सन्नाटे का इंतज़ार करते हैं तो कुछ महबूब के पहलू में लेटने का लेकिन कोई दंड बैठक निकाल कर पसीने पसीने हो कर शायरी करे ऐसा कभी देखा-सुना-पढ़ा ही नहीं। लेकिन जो है सो है। अब क्या पता शायद इसी कसरत की वज़ह से उनके अंदर से बाहर निकलने वाली शायरी की बदौलत उनका पूरी दुनिया में नाम है और उनके लाखों चाहने वाले हैं। जो उन्हें पहचान गए हैं उन्हें सलाम और जो नहीं पहचान पाए हैं उन्हें बताते हैं हमारे आज के शायर का नाम : क़तील शिफ़ाईप्रकाश पंडित द्वारा सम्पादित और राजपाल एन्ड संस् द्वारा प्रकाशित किताब "क़तील शिफ़ाई और उनकी शायरी" हमारे सामने है :


ऐ शामे-अलम कुछ तू ही बता ये ढंग तुझे कुछ आया है  
दिल मेरी खोज में निकला था और तुझको ढूंढ के लाया है

 इक हल्की हल्की धूप मिली उस कोमल रूप के परदे में 
 फागुन की ठिठुरती रातों को जब भादों ने गर्माया है 

 मैं फूल समझ कर चुन लूँगा इन भीगे से अंगारों को 
 आँखों की इबादत का मैंने पहले भी यही फल पाया है 

 ये उस जमाने की बात है, लेकिन कम ज्यादा आज भी लागू होती है, वो ये कि अगर कोई शायर है तो उसकी एक अदद प्रेमिका भी होगी, इसलिए हमारे क़तील साहब की भी थी। और वो थी भी कोई ऐसी वैसी नहीं, सिनेमा की खूबसूरत अदाकारा थी, नाम था चंद्रकांता। उनका प्रेम रॉकेट की गति से परवान चढ़ा और डेढ़ साल में रॉकेट की गति से ही जमीन पर धड़ाम आ गिरा। चंद्रकांता तो कपडे झाड़ कर मुस्कराते हुए तू नहीं और सही और नहीं और सही गुनगुनाते हुए उठ खड़ी हुई लेकिन क़तील साहब वहीँ पड़े रह गए ,दिल पे गहरी चोट खाये हुए। एक तो शायर ऊपर से दिल पे लगी गहरी चोट याने सोने में सुहागा , लोगों ने सोचा अब तो क़तील साहब से विरह की ऐसी ऐसी ग़ज़लें पढ़ने सुनने को मिलेंगी कि अश्कों से तर दामन सूखने का नाम ही नहीं लेगा पर हुआ इसका उल्टा। क़तील ने चंद्रकांता की बेवफाई पर लिखने और कोसने के बजाए उन हालातों पर उन मज़बूरियों पर क़लम चलाई जिसकी वजह से चंद्रकांता उन्हें छोड़ गयी। 

 ये भी कोई बात है आखिर दूर ही दूर रहें मतवाले 
 हरजाई है चाँद का जोबन या पंछी को प्यार नहीं है 

 एक जरा सा दिल है जिसको तोड़ के तुम भी जा सकते हो 
 ये सोने का तौक़ नहीं, ये चांदी की दीवार नहीं है 
तौक़=फंदा 

 मल्लाहों ने साहिल -साहिल मौजों की तौहीन तो कर दी 
लेकिन फिर भी कोई भंवर तक जाने को तैयार नहीं है 

 पंजाब जो अब पकिस्तान के हिस्से में है की तहसील हरिपुर के जिले हज़ारा में 24 दिसंबर 1919 को क़तील साहब का जन्म हुआ। स्कूली और कालेज की पढाई रावलपिंडी में रह कर पूरी की। हर पिता की तरह क़तील के पिता भी यही चाहते थे कि उनका बेटा शायरी जैसे शौक न पाले और एक अच्छी सी नौकरी कर इज़्ज़त की ज़िन्दगी बसर करे और हर नालायक बेटे की तरह क़तील साहब ने पिता की बात नहीं मानी और वो किया जो उनके दिल ने कहा। रावलपिंडी में उनका पत्राचार प्रसिद्ध शायर जनाब 'अहमद नदीम क़ासमी साहब से शुरू हुआ। उनकी रहनुमाई में उन्होंने यथार्थवादी शायरी के गुर सीखे। इस से पहले क़तील साहब रोती बिसूरती लिजलिजी मोहब्बत में लिपटी शायरी किया करते थे और अपने उस्ताद शायर जनाब 'शिफ़ा कानपुरी ' साहब से इस्लाह लिया करते थे। शिफ़ा साहब के शागिर्द की हैसियत से उन्होंने अपना नाम क़तील शिफ़ाई कर लिया था जबकि उनका असली नाम 'औरंगजेब खान' था. 

 बज़्मे-अंजुम से नज़र घूम के लौट आई है 
 फिर वही मैं हूँ वही आलमे-तन्हाई है 

 गुनगुनाती हुई आती हैं फ़लक से बूँदें 
 कोई बदली तेरी पाज़ेब से टकराई है 

 पास रह कर भी ये दूरी मुझे मंज़ूर नहीं 
 इस से बेहतर तो मेरी आलमे -तन्हाई है 

 अभिनेत्री चंद्रकांता का क़तील साहब की ज़िन्दगी से रुख़सत होना खुद क़तील साहब के लिए ठीक हुआ या नहीं ये कहना मुश्किल है लेकिन ये हादसा उर्दू शायरी के लिए नेमत बन कर आया। उसके बाद क़तील ने जो शायरी की है उस से उर्दू साहित्य बहुत समृद्ध हुआ। उर्दू शायरी की डगर को उन्होंने ज्यादा साफ़ सुंदर और प्रकाशमान बनाया। मनीष अपने ब्लॉग "एक शाम मेरे नाम' में लिखते हैं कि "क़तील की शायरी को जितना पढ़ेंगे आप ये महसूस करेंगे कि प्रेम, वियोग बेवफ़ाई की भावना को जिस शिद्दत से उन्होंने अपनी लेखनी का विषय बनाया है वैसा गिने चुने शायरों की शायरी में ही नज़र आता है। जनाब सरदार ज़ाफ़री साहब ने क़तील साहब के बारे में एक जुमला कहा है कि पहाड़ी के ख़ुश्क सीने से उबलता हुआ एक चश्मा ( हरी-भरी वादियों से गुनगुनाता हुआ गुज़र रहा है। और इसका नग़मा सुनकर कलियां आंखें खोल देती हैं। इस चश्मे का नाम क़तील शिफ़ाई है।

 खीरामे-नाज़ --और उनका खीरामे -नाज़ ? क्या कहना 
 ज़माना ठोकरें खाता हुआ महसूस होता है 
 खीरामे-नाज़ =सुन्दर चाल 

 किसी की नुकरई पाज़ेब की झंकार के सदके 
 मुझे सारा जहां गाता हुआ महसूस होता है
नुकरई = चांदी की


 'क़तील' अब दिल की धड़कन बन गई है चाप क़दमों की 
 कोई मेरी तरफ़ आता हुआ महसूस -होता है 

 क़तील साहब के एक दोस्त हुआ करते थे जनाब ए.हमीद उन्होंने क़तील की शख्सियत का ख़ाका कुछ यूँ खिंचा है "माज़ी में पीछे जाता हूं तो क़तील की एक शक्ल उभरती है : घने स्याह घुंघरियाले बाल, मज़बूत क़ुव्वत इरादे की अलामत, चौड़े नथुनों वाली सुतवां रोमन नाक, सुर्ख-ओ-सफ़ेद मुस्कराता हुआ ख़ूबसूरत चेहरा, हज़ारे की मर्दाना वजाहत का भरपूर मज़हर, वालिहाना जज़्बात और तेज़ फ़हम की अकास आंखें, शेरों में पायल की खनक, बातों में बेसा$ख्तगी व बेबाकी, कोई लगी-लिपटी नहीं, पीठ पीछे करने वाली बातों को मुंह पर कह देने वाला....नाराज़गियां मोल लेने वाला.... क़तील शिफ़ाई।''अब इन्हीं क़तील साहब की इस ग़ज़ल के शेर पढ़ें जो इश्क-ओ -मुहब्बत की खूबसूरत वादियों से दूर हक़ीक़त की सख़्त चट्टान की तरह हैं और आज भी उतने ही मौजू हैं जितने आज से पचास साल पहले थे :

 खून से लिथड़े चेहरे पर ये भूखी नंगी रअनाई 
 देख ज़माने देख ये मेरे ख़्वाबों की शहज़ादी है 
 रअनाई =सुंदरता

 पत्ती-पत्ती डाली-डाली कोस रही है मौसम को 
 लेकिन अपने बाग़ का माली इन बातों का आदी है

 शुक्र करो ऐ गुलशन वालो आज क़फ़स की कैद नहीं 
 बाग़ में भूखों मरने की हर पंछी को आज़ादी है 

 मुहब्बतों का शायर कहते हैं क़तील साहब को लेकिन उन्हें समाजी और खासकर महरूम तबके की फ़िक्र कुछ कम न थी।उनके नर्मो-नाज़ुक दिल में सब इंसानों के बराबर होने का सपना पलता था और इस धरती पर रची गई इंसानी ग़ैर-बराबरी बेचैन करती थी। अपने मुल्क के हालात उन्हें बेचैन किया करते थे। अपनी नज़्मों गीतों और ग़ज़लों में उनकी बेचैनी साफ़ तौर पर नज़र आती है। हर संवेदनशील इंसान चाहे वो शायर हो न हो अपने आसपास के बदलते बिगड़ते माहौल को देख कर व्यथित होता ही है ये अलग बात है कि अपनी व्यथा को व्यक्त करने के तरीके सब के एक जैसे नहीं होते। क़तील चूँकि शायर थे लिहाज़ा उन्होंने अपनी मानसिक वेदना का इज़हार अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया और क्या ही खूब किया।

 क़फ़स में आँधियों का नाम सुनके मुतमइन न हो 
 ये बागबां का हुस्ने- गुफ़्तगू है और कुछ नहीं 

 सरूरे-मय कहाँ , कि दिल की तश्नगी बुझाएं हम 
 इस अंजुमन में साया-ए-सुबू है और कुछ नहीं 

 तुम्हें गुलों की बेबसी में हुस्न की तलाश है 
 ये जुस्तजू बराए जुस्तजू है ,और कुछ नहीं 

 क़तील अपने बारे में लिखते हैं कि ''यूं तो मुझे बारह-तेरह बरस की उम्र से ही मेरी सोच मुझे बेचैन सा रखती थी लेकिन महसूस करके शेर कहने की इब्तिदा 1935 ईस्वी से हुई जब अचानक मेरे शाह खर्च बाप का साया मेरे सर से उठ गया और मेरे शऊर ने मेरे रंगारंग तजुर्बों को अपने अंदर जज़्ब करना शुरू किया। मुझे ज़िंदगी में पहली बार इस हक़ीक़त को समझने की फ़ुरसत मिली कि लोग एक-एक चेहरे पर कई-कई चेहरे सजाए बैठे हैं।'' उनकी एक चेहरे पे कई चेहरे वाली बात को जनाब साहिर लुधियानवी ने 'दाग' फिल्म के गाने के लिए बहुत खूबी से इस्तेमाल किया है। साहिर और क़तील साहब में जबरदस्त याराना था दोनों लाहौर में पास पास रहते थे। साहिर ही तरह क़तील साहब ने भी पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी फिल्मों के लिए भी खूब गाने लिखे लेकिन अपनी शायरी के मयार से समझौता नहीं किया।उनके गीत 'घुँघरू टूट गए --" को तो दोनों मुल्कों के न जाने कितने गायकों ने आवाज़ दी है। फ़िल्मी गाने लिखने के दौरान ही उनका इश्क पाकिस्तान की मशहूर गायिका इकबाल बानो से परवान चढ़ा लेकिन शादी की देहलीज़ से ही वापस लौट गया।

 चमन वाले ख़िज़ाँ के नाम से घबरा नहीं सकते
 कुछ ऐसे फूल भी खिलते हैं जो मुरझा नहीं सकते

 समाअत साथ देती है तो सुनते हैं वो अफ़साने
 जो पलकों से झलकते हैं ज़बां पर आ नहीं सकते

 हमें पतवार अपने हाथ में लेने पड़ें शायद
 ये कैसे नाखुदा हैं जो भंवर तक जा नहीं सकते

 आप सोच रहे होंगे कि मैं 'क़तील " साहब की उन ग़ज़लों जिन्हें जगजीत सिंह , मेहदी हसन और गुलाम अली साहब ने गा कर अमर कर दिया है जैसे 'अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ ' , ' ये मोज़ज़ा भी मोहब्बत कभी दिखाए मुझे' , 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझे' , 'सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं ' , 'मिल कर जुदा हुए तो न रोया करेंगे हम' , 'यारों किसी क़ातिल से कभी प्यार न मांगो' , 'ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं' ,' शोला था जल बुझा हूँ' , 'किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह ' ,आदि का जिक्र क्यों नहीं कर रहा तो उसका कारण ये है कि वो ग़ज़लें इस किताब में नहीं है क्यूंकि ये किताब तो 1959 में प्रकाशित हुई थी 1959 से 11 जुलाई 2001 तक याने जब तक वो मौजूद रहे तब तक के 42 सालों के दौरान जो ग़ज़लें कहीं वो इस किताब में नहीं हैं वो किसी और किताब में होंगी लेकिन क्यूंकि इसमें नहीं है इसलिए इसमें जो ग़ज़लें हैं मैं सिर्फ उन्हें ही आप तक पहुंचाऊंगा। क़तील साहब के बारे में जानकारी मैंने जरूर इस किताब के अलावा इंटरनेट से प्राप्त सूचनाओं और प्रसिद्ध ब्लॉगर मनीष कुमार और राजकुमार केसवानी साहब के ब्लॉग से इकठ्ठा की है।

 वो फूल से लम्हें भारी हैं अब याद के नाज़ुक शानों पर
 जो प्यार से तुमने सौंपे थे आगाज़ में इक दीवाने को

 इक साथ फ़ना हो जाने से इक जश्न तो बरपा होता है
 यूँ तनहा जलना ठीक नहीं समझाए कोई परवाने को

 मैं रात का भेद तो खोलूंगा जब नींद मुझे न आएगी
 क्यों चाँद-सितारे आते हैं हर रात मुझे समझने को

ये किताब आप https://www.pustak.org/books/bookdetails/4992 की साइट से या फिर राजपाल एन्ड संस् दिल्ली से भी मंगवा सकते हैं।  क़तील शिफ़ाई साहब पर अगर आप लिखने पे आएं तो लिखते ही चले जा सकते हैं ,मैं तो अपनी रौ में लिखता चला जा रहा हूँ लेकिन मुझे ये भी तो ध्यान रखना पड़ेगा कि आपका वक्त बहुत कीमती है और मुझे अब यहीं रुक जाना चाहिए इसलिए आपसे अब रुखसत की इज़ाज़त ले रहा हूँ। हाँ जाने से पहले आपको उनकी एक बहुत मशहूर ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता चलता हूँ , यूँ पढ़वाने की तमन्ना तो और भी बहुत कुछ थी लेकिन खैर -कहते हैं न कि सब कुछ पूरा कभी नहीं मिलना चाहिए थोड़ी सी कसक बाकी रहनी चाहिए तभी ज़िन्दगी में मज़ा बना रहता है :

 परीशां रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ 
 सुकूते-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ 

 हमें तो आज की शब् पौ फ़टे तक जागना होगा 
 यही किस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ 

 हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे 
 अभी कुछ बेकरारी है सितारो तुम तो सो जाओ

7 comments:

देवमणि पांडेय said...

http://sanskritisangam.blogspot.com/2014/08/blog-post_22.html?m=1

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18-09-2018) को "बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?" (चर्चा अंक-3098) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ said...

भाई साहिब

आज फिर जादू जगाया आपने
क़तील साहिब के बारे में जो नायाब जानकारी आपने
दी मुझे उसका इससे पहले कोई इल्म नहीं था। हाँ, उनके बहुत से अशआर मुझे भी याद थे। मैं अव्वल दर्ज़े का भुलक्कड़ आदमी हूँ और मैं कामयाब शेर उसे मानता हूँ जो मुझे भी याद रह जाए।

आपको एक बार फिर बधाई नगीनों का एक और बेजोड़ ज़ख़ीरा ढूँढ कर लाने और यहाँ प्रस्तुत करने के लिए।

दो अशआर और :

सदियों का रतजगा मेरी रातों में आ गया
मैं एक हसीन शख़्स की बातों में आ गया


क़तील अपने लिए वो कशिश ज़मीन में है
वहीं गिरेंगे जहाँ से गिरा दिए जाएं

और यह इबादत मेहदी हसन साहब की आवाज़ में:

तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों में चराग़
तू जो आए तो जगाता हुआ जादू आए
तुझको छू लूँ तो फिरे जामे तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए
तू बहारों का है उन्वान तुझे चाहूंगा


Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Amit Thapa said...


लिखना आपने आप में एक दुरूह कार्य है और जब आपको क़तील शिफ़ाई साहब जैसी शख्सियत के लिखना पड़े तो मुझ जैसे तुच्छ प्राणी को हज़ार बार सोचना पड़े।खैर पर अपने मन पसंदीदा शायर के बारे में लिखने का अवसर कैसा छोड़ा जाये और वो भी अपने प्रिय ब्लॉग पे। तो बस थोड़ा सा सोच विचार करके बाकि काम छोड़ छाड़ के लग गए इस काम पे।

क़तील शिफ़ाई साहब की पहली गजल जो मैंने सुनी थी वो थी "ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे" जगजीत जी की रेशमी आवाज में; बड़ी ही दर्द भरी ग़ज़ल है पर तब तक क़तील शिफ़ाई साहब का नाम नहीं सुना था और शायद ग़ज़ल का मतलब मेरे लिए जगजीत जी और चित्रा जी की आवाज ही थी।क़तील शिफ़ाई साहब की "दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह" ग़ज़ल सुनी गयी और उसके बाद उनका यूट्यूब पे एक मुशायरा देखते हुए जनाब नवाज देबंदी के मुँह से उनका नाम सुना तो उनके और उनकी ग़ज़लों के बारे में खोजबीन की गयी; एक से बढ़ कर एक दर्द भरी; प्रेम रस में डूबी हुई गजलें; जो बस एक दीवाना और बस एक दीवाना ही लिख सकता है।बाद में पता चला था की एक ग़जल जोकि मैं लड़कपन के समय में सुना करता था वो भी क़तील शिफ़ाई साहब की है "चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल" पंकज उधास जी की आवाज में।


कांटा है वो कि जिसने चमन को लहू दिया
ख़ूने -बहार जिसने पिया है , वो फूल है

इंसानी फिरतरत से हट कर है ये शेर क्योंकि आम इंसान सोचता है कांटे ने ख़ून निकाल दिया जबकि ख़ून निकलने का कारण वो फ़ूल है।

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

एक दीवाने की दर्द भरी इल्तिजा की कितना मा'ज़ूर है वो अपनी मोह्ब्बत में

ना कोई ख़्वाब हमारे हैं न ताबीरें हैं
हम तो पानी पे बनाई हुई तस्वीरें हैं

उफ़ कितना दर्द भरा है इस शेर में; कैसे एक दीवाने ने अपना सब कुछ खो दिया

न हो उनपे कुछ मेरा बस नहीं , कि ये आशिक़ी है हवस नहीं
मैं उन्हीं का था मैं उन्हीं का हूँ ,वो मेरे नहीं तो नहीं सही

निःस्वार्थ प्रेम की अनुभूति इस शेर में कर ली जाये; प्रेम वो है जो राधा और मीरा को कृष्ण से था ना कोई स्वार्थ और ना ही कोई गिला शिक़वा।

पूछ रही है दुनिया मुझसे वो हरजाई चाँद कहाँ है
दिल कहता है गैर के बस में , मैं कहता हूँ मेरे दिल में

अब बताइये वो अपना नहीं है; अपने पास नहीं है पर फ़िर भी उसको अपना कहना और उससे कोई शिकवा ना होना ये बस क़तील शिफ़ाई साहब ही कर सकते है।

निकल कर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मय-ख़ाना
तो ठुकराए हुए इंसाँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते

इस शेर को पढ़ कर ग़ालिब का शेर याद आ गया

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

नशा सब पे तारी होता है किसी को मय का; किसी को दौलत का और किसी को मोह्ब्बत का

तुम्हारी बे-रुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

कोई पैमाने की बात करता है और कोई आँखो से पिलाने की

इक सिर्फ़ हमीं मय को आँखों से पिलाते हैं
कहने को तो दुनिया में मय-ख़ाने हज़ारों हैं


खून से लिथड़े चेहरे पर ये भूखी नंगी रअनाई
देख ज़माने देख ये मेरे ख़्वाबों की शहज़ादी है

क्या कहे इस शेर के बारे में एक बार तो पढ़ने के बाद रोने का मन करने लगे; कितनी शिद्दत से शायर ने इंसान ने उसकी हक़ीक़त सामने
रख दी है।

चमन वाले ख़िज़ाँ के नाम से घबरा नहीं सकते
कुछ ऐसे फूल भी खिलते हैं जो मुरझा नहीं सकते

शायद क़तील शिफ़ाई साहब ने इस शेर में अपने ही रिश्तों का दर्द बिख़ेर दिया है। जिंदगी में गिले शिकवे सफलता असफलता तो आती ही रहती है पर वो इंसान ही कहा जो इन सब से डर जाये।

परेशाँ रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ

क्या किसी को मोह्ब्बत में इतना दर्द मिलना चाहिये पर शायद क़तील शिफ़ाई साहब ने इस दर्द को अपनी बेहतरीन शायरी में ज़ब्त कर लिया।

सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आओगे

अंत में नीरज जी का तहेदिल शुक्रिया अदा करते हुए क़तील शिफ़ाई साहब को उनके बेहतरीन हुनर के लिए लाखों सलाम

SATISH said...

Waaaah Kya kahney Neeraj Sahib ... Bahut khoob... Raqeeb

monu gaur said...

Nice post