Monday, July 18, 2011

किताबों की दुनिया - 56

"किताबों की दुनिया" में आपको आज मैं एक ऐसे शायर से मिलवा रहा हूँ जो मुझे अज़ीज़ ही नहीं मेरे मित्र भी हैं. ये मित्रता ऐसी है जो लगभग चार साल पहले फोन पर अचानक हुई पहली ही वार्तालाप में हो गयी. मित्रता की ये ही खूबी है जिस से होनी होती है तुरंत होती है और अगर नहीं होनी होती तो सालों के परिचय के बाद भी नहीं हो पाती. आप इसे एक रासायनिक क्रिया समझ लें जिसमें या तो क्रिया तुरंत होती है या होती ही नहीं. मैंने अंतरजाल की प्रसिद्द इ-पत्रिका 'अनुभूति' पर उनकी ग़ज़लें पहली बार पढ़ीं और मुबारकबाद देने को फोन किया बस फिर क्या था उनकी अपनत्व से भरी आवाज़ ने मुझे उस दिन से जो बांधा तो आज तक बांधे हुए है.

ऐसे बंधन का क्या सुख होता है ये हमसे पूछिए. आप भी अगर श्री आर.पी.घायल जी, जिनकी किताब "लपटों के दरमियाँ" का हम जिक्र करेंगे, से बात करेंगे तो इस बंधन के सुख का अनुभव ले सकेंगे. आईये ज़िन्दगी की लपटों के बीच सुकून के ठन्डे पानी की बौछार सी इस किताब का आनंद लें.


आदमी की भीड़ में अब खो रहा है आदमी
आँख अपनी खोलकर भी सो रहा है आदमी

ज्ञान कहते थे जिसे विज्ञान जब से हो गया
सैंकड़ों मन बोझ ग़म का ढो रहा है आदमी

एक लम्हे की ख़ुशी 'घायल' खरीदी किसलिए
ज़िन्दगी भर की ख़ुशी को रो रहा है आदमी

17 जुलाई 1949 को नालंदा (बिहार) में जन्में 'घायल' साहब मनमौजी किस्म के शायर हैं. वर्षों तक भारतीय रिजर्व बैंक के राजभाषा कक्ष में प्रबंधक की हैसियत से नौकरी करने के बाद रिटायर हो कर अब पटना में बस गए है. शायरी उनके लिए इबादत की तरह है जिसमें वो किसी किस्म का खलल नहीं चाहते. ये ही वजह है के उन्हें सार्वजानिक मंचों पर बहुत कम देखा गया है, अलबत्ता अपने किसी मित्र के घर पर हुई नशिस्त में उन्हें कभी कभार जरूर देखा सुना जा सकता है.

रेत का इक महल बन गयी ज़िन्दगी
रोज ढहने की आदत हमें पड़ गयी

दर्द देने का चस्का जो उनको लगा
दर्द सहने की आदत हमें पड़ गयी

आह को भी नज़र लग न जाए कहीं
छुपके रहने की आदत हमें पड़ गयी

'घायल' साहब लाख छुप के रहें लेकिन उनके चाहने वाले उन्हें ढूंढ ही लेते हैं. कारण स्पष्ट है उनकी शायरी थके मांदे लोगों की रूह को आराम पहुंचाती है.ज़माने के दर्द को समेटे उनकी सीधी सादी बातें पढने सुनने वालों के दिल में आसानी से उतर जाती हैं. 'घायल' साहब ने शायरी के माध्यम से अपने घाव छुपाने का हुनर सीख लिया है.

किसी की आँख में आंसू दिखाई क्यूँ भला देते
जो उसका पासबाँ उसके लिए पत्थर नहीं होता

किसी भी हाल में जन्नत से कम होती नहीं दुनिया
उदासी में अगर डूबा किसी का घर नहीं होता

कभी नफ़रत अगर 'घायल' मुहब्बत में बदल जाती
यकीनन आज दहशत का कहीं मंज़र नहीं होता

घायल साहब ने इस किताब में कहा है " ग़ज़ल मेरे लिए मेरा ईमान और खुदा की इबादत है. मेरा मानना है कि ग़ज़ल का गुलाब तो ज़ज्बे की ज़मीन पर ही खिलता है. ग़ज़ल की पहचान उसकी ग़ज़लियत होती है. महसूस कर कही गयी और सोच कर लिखी गयी ग़ज़ल में फर्क होता है. एहसास की खुशबू में नहाई हुई ग़ज़ल गाई और पढ़ी जाती है जबकि सोचकर लिखी ग़ज़ल सिर्फ पढ़ी जाती है."

इस किताब में उनकी ग़ज़लें एहसास की खुशबू में लिपटी हुई ग़ज़लें हैं इसीलिए उन्हें ना सिर्फ उन्हें पढ़ा गया है बल्कि उन्हें गाया भी गया है. मेरी बात पर यकीन करने के लिए आप बस पटना की प्रसिद्द गायिका रंजना जी की आवाज़ में गाई उनकी ग़ज़लें www.radiosabrang.com पर सुनें और आनंद लें.

उसके लिए तो कुछ नहीं मेरे लिए मगर
देखे बिना भी देखना कितना अजीब था

छू कर गया उसका बदन तो यूँ लगा मुझे
जैसे हवा का झोंका भी मेरा रकीब था

जिसके लिए तरसा किये दुनिया के लोग-बाग़
हैरत उन्हीं को थी के मैं उसके करीब था

इस किताब को 'सरोज प्रकाशन' पटना द्वारा प्रकाशित किया गया है. किताब की प्राप्ति के लिए आपको घायल साहब से उनके मोबाइल न.+919199810038 अथवा उनके मेल rpghayal08@yahoo.com(जिसे उनके द्वारा पढने की सम्भावना अपेक्षा कृत कम है) पर संपर्क कर बधाई देनी होगी और फिर किताब प्राप्ति के लिए पूछना होगा बस.

मेरे मित्र और छोटे भाई श्री नवीन चतुर्वेदी जी जो मुंबई निवासी हैं और छंद शास्त्र के प्रकांड पंडित हैं जिनका अपना बहुत प्रचलित ब्लॉग "समस्या पूर्ती" भी है ने ये नियम बनाया है के मेरी इस श्रृंखला में दिए गए शायरों से वो मोबाइल पर जरूर संपर्क करेंगे. उन्हें इस से जो लाभ मिला उसके बारे में आप स्वयं उनसे उनके मोबाइल न. +919967024593 पर संपर्क कर के पूछ सकते हैं.

मेरा बस आप सब से इतना सा अनुरोध है के अगर आप किताब खरीदने में रूचि नहीं रखते तो कम से कम उन शायरों से बात करके उनकी हौसला अफजाही तो कर ही सकते हैं.

जुता रहता है बैलों की तरह जो खेत में दिन भर
उसी का अपना बच्चा भूख से आंसू बहाता है

बनाये जिसके धागों से बने हैं आज ये कपडे
उसी का तन नहीं ढकता कोई गुड़िया सजाता है

जलाता है बदन कोई हमेशा धूप में 'घायल'
जरा सी गर्मी लगने पर कोई पंखा चलाता है

उम्मीद है मेरी तरह आपको भी घायल साहब की शायरी पसंद आई होगी. ये एक सच्चे सीधे सरल इंसान की सच्ची सीधी सरल शायरी है. इस किताब में जो सन 2004 में प्रकशित हुई थी ,उनकी 72 ग़ज़लें संगृहीत हैं , उनका ग़ज़ल लेखन अभी भी अबाध गति से चल रहा है जल्द ही उनकी दूसरी किताब भी बाज़ार में आ जाएगी. आप उन्हें कभी भी फोन करें एक आध नया शेर उनके पास हमेशा सुनाने को तैयार होता है. उनकी, शायरी के प्रति ऐसी दीवानगी देख कर हैरत होती है. वो पूरी तरह से शायरी को समर्पित इंसान हैं. मेरा सौभाग्य है के मैं उनसे मुंबई में श्री हस्तीमल जी हस्ती जी के घर पर हुई नशिस्त में रूबरू मिल चूका हूँ.

इस से पहले के मैं आपको नमस्कार कहूँ और एक और शायरी की किताब की खोज में जाऊं आपको उनके तीन नाज़ुक से शेर पढवाता चलता हूँ:

कसक तो थी मेरे मन की मगर बैचैन थे बादल
तुझे उस हाल में मैंने फुहारों की तरह देखा

खिले फूलों की पंखुडियां जरा भी थरथराई तो
तेरे होंठों के खुलने के नज़ारों की तरह देखा

मेरी तनहाइयाँ 'घायल' सताने जब लगीं मुझको
तुझे यादों के दरिया में किनारों की तरह देखा


(श्री हस्तीमल जी हस्ती के साथ श्री आर.पी. घायल)

33 comments:

सदा said...

कसक तो थी मेरे मन की मगर बैचैन थे बादल
तुझे उस हाल में मैंने फुहारों की तरह देखा

खिले फूलों की पंखुडियां जरा भी थरथराई तो
तेरे होंठों के खुलने के नज़ारों की तरह देखा

वाह ..बहुत खूब ..आपके माध्‍यम से हमें भी इन्‍हें पढ़ने का अवसर प्राप्‍त हुआ ..आभार के साथ शुभकामनाएं ।

स्वाति said...

एकदम सही बात है ....मित्रता की ये ही खूबी है जिस से होनी होती है तुरंत होती है और अगर नहीं होनी होती तो सालों के परिचय के बाद भी नहीं हो पाती.


जुता रहता है बैलों की तरह जो खेत में दिन भर
उसी का अपना बच्चा भूख से आंसू बहाता है

बनाये जिसके धागों से बने हैं आज ये कपडे
उसी का तन नहीं ढकता कोई गुड़िया सजाता है
.बहुत खूब ....

शारदा अरोरा said...

shukriya ,Ghayal ji ki kitaab se parichy karvaane ka ...

दर्शन कौर धनोए said...

जुता रहता है बैलों की तरह जो खेत में दिन भर
उसी का अपना बच्चा भूख से आंसू बहाता है

बनाये जिसके धागों से बने हैं आज ये कपडे
उसी का तन नहीं ढकता कोई गुड़िया सजाता है

जलाता है बदन कोई हमेशा धूप में 'घायल'
जरा सी गर्मी लगने पर कोई पंखा चलाता है

आपकी यह कोशिश हमेशा नीरज साहेब हमारे सर आँखों पर रहती हें ...वरना यह छुपे हुए दीपकों की रौशनी हमे कहाँ मयस्सर होती ..

'घायल' साहेब की शायरी ने तो हमे भी घायल कर दिया ..नीरज सा. धन्यवाद आपका और घायल साहब का ..

वन्दना said...

जुता रहता है बैलों की तरह जो खेत में दिन भर
उसी का अपना बच्चा भूख से आंसू बहाता है

बनाये जिसके धागों से बने हैं आज ये कपडे
उसी का तन नहीं ढकता कोई गुड़िया सजाता है

जलाता है बदन कोई हमेशा धूप में 'घायल'
जरा सी गर्मी लगने पर कोई पंखा चलाता है

घायल जी की शायरी ने सच मे घायल कर दिया ………उनकी शायरी पढवाने और उनसे मिलवाने के लिये आपका हार्दिक आभार्।

अनुपमा त्रिपाठी... said...

ज़िन्दगी से जुडी हुई ..बहुत उम्दा शायरी ...
ज़िन्दगी को देख कर ..समझ कर ..बहुत कम लोग इस तरह अपने जज़्बात बयां कर पाते हैं ....बहुत बहुत बधाई घायल जी को ..और आभार ..नीरज जी ..

राजेश उत्‍साही said...

शुभकामनाएं।

रेखा said...

हस्तीमल हस्तीजी से मैं भी मिल चुकी हूँ उनकी उम्दा शेर याद दिलाने के लिए आभार

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो said...

sirji,
hamare shahar ke is shayar se rubaru karane ke liye shukriya. Agli bar jab ghar jaoonga to koshish hogi ki main unse jaroor mulaqat karoon.

अरुण चन्द्र रॉय said...

एक और किताब.. एक और शायर... एक और उम्दा परिचय... नीरज भाई साहब... अब तो इंतजार रहने लगा है किताब की दुनिया का... बेहतरीन !

प्रवीण पाण्डेय said...

घायल जी की सारी पंक्तियाँ दमदार लगीं। कभी बैठकर सुनने का मन है।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

किसी भी हाल में जन्नत से कम होती नहीं दुनिया
उदासी में अगर डूबा किसी का घर नहीं होता

इंसानी रिश्तों में मुहब्बत की मिठास का इतना खूबसूरत पैग़ाम देती शायरी तलाश करने के लिए नीरज जी आपको बधाई...घायल साहब बहुत उम्दा कहते हैं.

रविकर said...

एक लम्हे की ख़ुशी 'घायल' खरीदी किसलिए
ज़िन्दगी भर की ख़ुशी को रो रहा है आदमी ||

बहुत -बहुत आभार नीरज जी
सुन्दर और असरदार रचनाएं ||

घायल साहब को ढेर सारी बधाई ||
आपको भी ||

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही लाजवाब, शुभकामनाएं.

रामराम.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बड़े भाई! कहाँ कहाँ से आप खोज लाते हैं इन नगीनों को.. मकबूल शायर को तो हर कोइ पढ़/सुन लेता है, लेकिन कई शायर नज़र अंदाज़ हो जाते हैं.. आपने घायल साहब का परिचय कराया, हम धन्य हुए.. और ये तो हमारे शहर के ही निकले..
"अनुभूति" से याद आया, एक बहुत ही अच्छे शायर वहाँ मिले थे..अंसार कम्बरी. पर न जाने क्यों वहाँ से भी गायब हो गए और "कविता कोष" पर से भी... अगर कहीं मिलें तो हमसे भी मिलवाइए!!

Dr (Miss) Sharad Singh said...

एक अच्छी किताब से परिचित कराने के लिए आभार...

रंजन (Ranjan) said...

आपकी दीवानगी भी कोई कम नहीं...

वाकई बहुत शानदार शेर है..

जयकृष्ण राय तुषार said...

भाई नीरज जी हिंदी गज़ल पर आप बेहद सार्थक और सराहनीय कार्य क्र रहे हैं बधाई और शुभकामनायें |

इमरान अंसारी said...

ज्ञान कहते थे जिसे विज्ञान जब से हो गया
सैंकड़ों मन बोझ ग़म का ढो रहा है आदमी

किसी भी हाल में जन्नत से कम होती नहीं दुनिया
उदासी में अगर डूबा किसी का घर नहीं होता

जुता रहता है बैलों की तरह जो खेत में दिन भर
उसी का अपना बच्चा भूख से आंसू बहाता है

नीरज जी.........बहुत शुक्रिया इतने उम्दा शायर से परिचय करवाने का.....बहुत मार्मिक शेरो से भरी है 'घायल' जी की ग़ज़लें........और हाँ मैंने पहले भी कई बार देखा था पर आज कह रहा हूँ आपके ब्लॉग पर मधुबाला जी की जो तस्वीरे हैं वो बिलकुल अनदेखी और बहुत खूबसूरत हैं ये तस्वीरें उनके प्रति आपकी दीवानगी को प्रदर्शित करती हैं ............मुझे बहुत अच्छी लगीं|

निर्मला कपिला said...

नीरज जी अब तो आपकी लाईब्रेरी पर ही डाका डालना पडेगा। घायल जी की शायरी देख कर तो यही लगता है आज ही उन्हें फोन लगाती हूँ। कमाल की शायरी पर कमाल की समीक्षा---
ज्ञान कहते थे जिसे विज्ञान जब से हो गया
सैंकड़ों मन बोझ ग़म का ढो रहा है आदमी
इस शेर से ही घायल जी की पुस्तक के बारे मे कहा जा सकता है कि पुस्तक पढने लायक है। धन्यवाद।

सदा said...

बहुत ही खूब कहा है आपने इस प्रस्‍तुति में ..आभार ।

दीपक बाबा said...

जिसके लिए तरसा किये दुनिया के लोग-बाग़
हैरत उन्हीं को थी के मैं उसके करीब था

दिगम्बर नासवा said...

घायल साहब की शायरी तो सच में घायल कर गयी ... बहुत गज़ब के शेर हैं ... आपने तो वैसे भी चुन चुन कर नगीने निकाले हैं ...

ज्ञान कहते थे जिसे विज्ञान जब से हो गया
सैंकड़ों मन बोझ ग़म का ढो रहा है आदमी

इस शेर ने बहुत प्रभावित किया है ...

daanish said...

घायल साहब की शाईरी पढ़ कर
दिल को अजब-सा सुकून हासिल हुआ
उनके अश`आर, इंसानी जज़्बे को
उजागर कर पाने में कामयाब हैं
उन्हें बधाई !
और आपको ऐसा प्यारा और फ़ाज़िल दोस्त
मिलने पर ढेरों बधाई !!

Navin C. Chaturvedi said...

पहली बार ऐसा हुआ, कि किसी से बात करनी चाही और हो न पाई| पहले तो नंबर का घोटाला फिर शायद 'घायल' जी अनपेक्षित फोन के लिए तैयार न होने के कारण खुल के बात न कर पाये और फिर मेरा मथुरा टू मुंबई प्रवास|

जान कर अच्छा लगा की ये महानुभाव पहले यहीं गोरेगांव में ही रहते थे| इन से मिलने की उम्मीद रहेगी|

इन से इन की शायरी को सुनना बाकी है अभी|

Kunwar Kusumesh said...

श्री आर.पी. घायल जी से और उनकी किताब से परिचय अच्छा लगा. आभार.

नीरज गोस्वामी said...

Comment received from Om Sapra Ji on e-mail:-

shri neeraj ji
congrats.
good write up about shri rp ghayal ji
thanks for increasing knowlege.
regds.
-om sapra

योगेन्द्र मौदगिल said...

bahut khoob.....


bhai ji...shaandar prastuti....

सुनीता शानू said...

नीरज जी घायल साहब को मैने इ-कविता ग्रुप में बहुत बार पढ़ा है सचमुच बेहतरीन लिखते हैं आज दोबारा पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।

Abnish Singh Chauhan said...

आदमी की भीड़ में अब खो रहा है आदमी
आँख अपनी खोलकर भी सो रहा है आदमी
आज के समय की सबसे बड़ी त्रासदी है यह और इसको इतने कम शब्दों में अभिव्यक्त कर दिया आपने- सराहनीय है . आप दोनों को मेरी बधाई

Udan Tashtari said...

घायल साहब की शायरी से परिचय कराने का आभार.अच्छा लगा.

abhi said...

घायल साहब की शायरी कमाल की है..

निवेदिता said...

आपके माध्‍यम से हमें भी इन्‍हें पढ़ने का अवसर प्राप्‍त हुआ .......आभार