Monday, November 23, 2009

किताबों की दुनिया - 19

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समन्दर कर दे
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे

तुझको देखा नहीं मेहसूस किया है मैंने
आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर* कर दे
पैकर* = आकृति

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे

बरसों से जब भी जगजीत सिंह जी की आवाज़ में ये ग़ज़ल उनके अल्बम 'ऐ साउंड अफेयर' को सुनता हूँ तो इसे बार बार रीवाइंड कर सुनने को जी करता है . एक तो जगजीत जी की आवाज़ और उसपर ये जादुई अशार मुझे बैचैन कर देते हैं .

इस खूबसूरत ग़ज़ल के शायर हैं जनाब "डा. शाहिद मीर" साहब. आज 'किताबों की दुनिया' श्रृंखला में उन्हीं की बेजोड़ किताब " ऐ समंदर कभी उतर मुझ में " का जिक्र करेंगे. दरअसल इस किताब में मीर साहब के चुनिंदे कलामों का संपादन किया है श्री अनिल जैन जी ने. संपादन क्या किया है गागर में सागर भर दिया है.



पहले तो सब्ज़ बाग़ दिखाया गया मुझे
फिर खुश्क रास्तों पे चलाया गया मुझे

रक्खे थे उसने सारे स्विच अपने हाथ में
बे वक़्त ही जलाया, बुझाया गया मुझे

पहले तो छीन ली मेरी आँखों की रौशनी
फिर आईने के सामने लाया गया मुझे

पद्म श्री "बेकल उत्साही" साहब ने लिखा है " हज़रत जिगर मुरादाबादी की खिदमत में रहता था तो वो बार-बार हिदायत करते 'बेटे, बहुत अच्छे इंसान बनो फिर बहुत अच्छे अशआर कहोगे' सच है कि अच्छा इंसान ही अच्छी सोच से अच्छी बातें करता है. शाहिद इस कसौटी पर खरे उतरते हैं."शाहिद मीर" ने राजस्थान के तपते सहरा, मध्य प्रदेश की ऊबड़ खाबड़ ज़मीन पर रह कर किस क़दर बुलंदियों को छुआ है जहाँ किसी फ़नकार और कलमकार को पहुँचने के लिए एक उम्र सऊबतें झेलकर भी पहुंचना मुश्किल है "

सूखे गुलाब, सरसों के मुरझा गए हैं फूल
उनसे मिलने के सारे बहाने निकल गए

पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग
फिर बस्तियों में आग लगाने निकल गए

'शाहिद' हमारी आँखों का आया उसे ख़याल
जब सारे मोतियों के खज़ाने निकल गए

एम.एससी, पी.एच डी. (औषधीय वनस्पति), किये हुए "शाहिद मीर" साहब बाड़मेर राजस्थान के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में उप प्राचार्य के पद पर काम कर रहे हैं. आपकी 'मौसम ज़र्द गुलाबों का' (ग़ज़ल संग्रह), 'कल्प वृक्ष' (हिंदी काव्य संग्रह) और 'साज़िना' (कविता संग्रह) प्रकाशित हो चुके हैं. उनका कहना है की " विज्ञानं का विद्यार्थी होने की वजह से बौद्धिक स्तर पर किसी एक दृष्टिकोण और वाद को सम्पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया."

तेरा मेरा नाम लिखा था जिन पर तूने बचपन में
उन पेड़ों से आज भी तेरे हाथ की खुशबू आती है

जिस मिटटी पर मेरी माँ ने पैर धरे थे ऐ 'शाहिद'
उस मिटटी से जन्नत के बागात की खुशबू आती है

उर्दू ज़बान की मिठास, कहने का निराला ढंग और सोच की नयी ऊँचाइयाँ आपको इस किताब को पढ़ते हुए जकड लेंगी. "बशीर बद्र" साहब ने "मीर" साहब के लिए ऐसे ही नहीं कहा की " कायनात के बहुत से रंग ज़र्द मौसमों और सुर्ख़ गुलाबों के पैकरों में हमारे सामने ब राहे-रास्त नहीं आते बल्कि उन खूबसूरत अल्फाज़ के शीशों में अपनी झलक दिखाते हैं, जिनमें "शाहिद मीर" ने खुद को तहलील कर रखा है."

चिलमन-सी मोतियों की अंधेरों पे डालकर
गुज़री है रात ओस सवेरों पे डालकर

शायद कोई परिंदा इधर भी उतर पड़े
देखें तो चंद दाने, मुंडेरों पे डालकर

आखिर तमाम सांप बिलों में समां गए
बदहालियों का ज़हर सपेरों पे डालकर

डायमंड बुक्स, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक को आप फोन न.011-41611861 या फेक्स न.011-41611866 पर सूचित कर मंगवा सकते हैं, अथवा उनकी वेब साईट www.dpb.in या मेल आई.डी. sales@diamondpublication.com पर लिख कर भी संपर्क कर सकते हैं. आप कुछ भी करें लेकिन यदि आप उर्दू शायरी के कद्रदां हैं तो ये किताब आपके पास होनी ही चाहिए.

उजले मोती हमने मांगे थे किसी से थाल भर
और उसने दे दिए आंसू हमें रूमाल भर

उसकी आँखों का बयां इसके सिवा क्या कीजिये
वुसअतें* आकाश सी, गहराईयाँ पाताल भर
वुसअतें*= फैलाव

आप जब तक इस 95 रु.मूल्य की किताब में प्रकाशित 149 ग़ज़लों का लुत्फ़ लें तब तक हम निकलते हैं आपके लिए एक और किताब की तलाश में, खुदा हाफिज़ कहने से पहले ये शेर भी पढ़वाता चलता हूँ आपको :

जिस्म पर ज़ख्म तीर वाले हैं
हम सलामत ज़मीर वाले हैं

ज़ायका लब पे सूखी रोटी का
सामने ख्वान* खीर वाले हैं
ख्वान* = बर्तन

आत्मा उनकी है अँधेरे में
जो चमकते शरीर वाले हैं


49 comments:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

सुन्दर विश्लेषण नीरज जी ! बहुत खूब, हमें तो पढने का भी वक्त ना के बराबर मिल पाता है, आपने तो हर चीज ढूंढ-ढूंढ के निकाली !

निर्मला कपिला said...

नीरज बहुत सुन्दर समीक्षा है और गज़ल के शेर एक से बढ कर एक हैं। शाहिद मीर जी को शत शत नमन पता नोट कर लिया है मंगवाते हैं किताब धन्यवाद और शुभकामनायें

mehek said...

bahut hi sunder vishleshan,khubsurat sher ke saath

"अर्श" said...

आर्डर तो कर चुका हूँ .... जल्द ही मेरे पास होगी यह मोती जो आपने
समंदर से उठा कर हमारे पास रखा है .... बधाई क्या दूँ बस सलाम करता
चलूँ...

अर्श

वाणी गीत said...

शाहिद मीर साहब की गजलों के साथ उनके परिचय के लिए बहुत आभार ...!!

सदा said...

इतनी बेहतरीन समीक्षा पढ़कर यही लफ्ज निकलते हैं लाजवाब प्रस्‍तुति, जिसके लिये आपका आभार एवं शुभकामनायें ।

सागर said...

पहले तो छीन ली मेरी आँखों की रौशनी
फिर आईने के सामने लाया गया मुझे


उसकी आँखों का बयां इसके सिवा क्या कीजिये
वुसअतें* आकाश सी, गहराईयाँ पाताल भर

वाह-वाह! ...इधर से गुज़रा था सोचा, सलाम करता चलूँ...

Prabuddha said...

नीरजजी, आपने तो इस समीक्षा के ज़रिए ब्लॉग के पाठकों को थाल भर मोती दे ही दिये !

vandan gupta said...

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समन्दर कर दे
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे
पहले तो छीन ली मेरी आँखों की रौशनी
फिर आईने के सामने लाया गया मुझे
'शाहिद' हमारी आँखों का आया उसे ख़याल
जब सारे मोतियों के खज़ाने निकल गए

aaj to sari gazalein aur har sher jaise dil ki gahraiyon mein utar gaya hai..........shukriya niraj ji itni umda shayri padhwane ke liye.

rashmi ravija said...

बहुत बहुत शुक्रिया नीरज जी,इन मोतियों से अशआर वाले किताब से परिचित करवाने के लिए...सच कहा यह किताब तो संग्रह में होनी ही चाहिए,इस तरह की किताबों के लिए मैं bookstalls पर दुकानों में अक्सर भटकती रहती हूँ,पर निराशा ही हाथ लगती है,...thanx again for providing the add.

अजय कुमार said...

एक अच्छे शायर और उनके बेहतरीन शायरी से रूबरू कराने का शुक्रिया

Apanatva said...

itanaa sunder kaam aap kar rahe hai ise hee mai sacchee sahity seva samajhatee hoo . nek kaam ke liye badhai .

रश्मि प्रभा... said...

आपकी इस दुनिया में दुर्लभ खजाने मिलते हैं

Urmi said...

वाह नीरज जी बहुत बढ़िया लगा! बेहद सुंदर प्रस्तुती! शाहिद मीर साहब की गजलों से परिचित करवाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

डिम्पल मल्होत्रा said...

पहले तो सब्ज़ बाग़ दिखाया गया मुझे
फिर खुश्क रास्तों पे चलाया गया मुझे

पहले तो छीन ली मेरी आँखों की रौशनी
फिर आईने के सामने लाया गया मुझे....achhe lage....

रंजन (Ranjan) said...

बहुत सुन्दर संग्रह.. खरिदनी होगी ये पुस्तक..

राज भाटिय़ा said...

हम तो आप के यहां ही जितना मिलता है पढ लेते है, अब कहा बुक करे, ओर कब आये बहुत झंझट है, ओर अगर आ भी जाये तो कब पढेगे??
लेकिन आप का यह किताबो का खजाना बहुत किमती लगा.
धन्यवाद

Ashutosh said...

बहुत सुन्दर संग्रह.
हिन्दीकुंज

Abhishek Ojha said...

ओह ये तो बहुत सुना है जगजीत सिंह की आवाज में. अब भी रिपीट में लगा कर बार-बार सुन लेता हूँ. लेकिन ये नहीं पता था किसने लिखा है. आभार.

रंजू भाटिया said...

वाह इस किताब को जरुर लेना होगा ..शुक्रिया इस की जानकारी के लिए .नीरज जी

डॉ टी एस दराल said...

सुंदर प्रस्तुति, आभार।

Renu goel said...

हमारी पसंदीदा ग़ज़ल का ज़िक्र हो और जानकारी भी हो ...इतना अच्छा मिलाप कहाँ मिलेगा ....नीरज जी , इतनी खूबसूरत गजलों को कौन छोड़ना चाहेगा ...ये संग्रह तो खज़ाना है ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

BHAAREE-BHARKAM MAGAR
Bahut chhota sa comment.
NICE.

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

चुन चुन के मोती निकाल लाते है आप . शाहिद मीर साहिब की गज़लो का गुलदस्ता सच में बेह्तरीन है

योगेन्द्र मौदगिल said...

Pranamya Prastuti.....
aabhaar...

Unknown said...

वाह एक परिचय बढ़ गया किताब से और वो भी बिना खोजे......
आज ही मांगता हूँ.....
धन्यवाद.....

देवेन्द्र पाण्डेय said...

पहले तो सब्ज़ बाग़ दिखाया गया मुझे
फिर खुश्क रास्तों पे चलाया गया मुझे


रक्खे थे उसने सारे स्विच अपने हाथ में
बे वक़्त ही जलाया, बुझाया गया मुझे


पहले तो छीन ली मेरी आँखों की रौशनी
फिर आईने के सामने लाया गया मुझे

---डा० शाहिद मीर का नाम तो सुना था लेकिन परिचय से अनजान था
....हमेशा की तरह एक नायाब तोहफा, धन्यवाद।

Udan Tashtari said...

एक बार फिर हमेशा की तरह एक बेहतरीन पुस्तक से मिलवाया...एक से एक शेर. आनन्दित हो उठे और मूँह से निकला...वाह नीरज भाई, क्या पढ़ते पढ़ाते हो!! लगे रहिये!!

Manish Kumar said...

shukriya janaab ek baar phir!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग
फिर बस्तियों में आग लगाने निकल गए
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
वाह नीरज भाई ...बढ़िया शायर से मुलाकात करवाई आज आपने शुक्रिया जी
और ये शेर ,
" उसकी आँखों का बयां इसके सिवा क्या कीजिये
वुसअतें* आकाश सी, गहराईयाँ पाताल भर
वुसअतें*= फैलाव
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मधुबाला जी की तस्वीर के ठीक ऊपर
लगा दीजिये ...

:-)
- लावण्या

दिगंबर नासवा said...

वाह नीरज जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका ....... इन मोतियों को तो संजो कर रकना चाहिए ........ आपका धन्यवाद इस किताब से परिचित करवाने के लिए...संग्रह में होनी ही चाहिए इ पुस्तक ..... अप किताबों की व्याख्या इस अंदाज़ से करते हैं की मज़ा अ जाता है ..........

कडुवासच said...

... फ़िर एक चमकते हीरे से परिचय, धन्यवाद !!!

Kusum Thakur said...

"डॉ.शाहीद मीर" से मिलवाने के लिए और उनकी रचनाओं की प्रस्तुतीकरण के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !!

Ankit said...

नमस्कार नीरज जी,
जनाब शहीद मीर साहेब की गजलों से रूबरू करवाने के लिए शुक्रिया.
हर शेर एक अलग एहसास छोड़ जाता है, जैसे
"तुझको देखा नहीं मेहसूस किया है मैंने
आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर कर दे"
बेबसी को कितना अच्छी तरह और खूबसूरती से कहा है इस शेर में,
"रक्खे थे उसने सारे स्विच अपने हाथ में
बे वक़्त ही जलाया, बुझाया गया मुझे"
यूँ तो हर शेर कायल कर रहा है मगर ये शेर तो दिल को छु गया है,
"उजले मोती हमने मांगे थे किसी से थाल भर
और उसने दे दिए आंसू हमें रूमाल भर"

गिरीश बिल्लोरे मुकुल said...

Thanks for nice post

haidabadi said...

नीरज भाई
ग़ज़लों की किताबों को मुतारिफ़ तेरा नीरज
दुःख है मुझे मैं साहिबे दीवान क्यों नहीं
अरसा दराज़ से देख रहा हूँ आप गाहे बगाहे
अच्छे अच्छे ग़ज़लकारों की किताबों को रुशनास
करवातो हो आपकी इस फिराख दिली और दरिया दिली का मैं लोहा मानता हूँ यह
आपका ही शेवा है आज के छपास युग में हर कोई छपने के जुगाड़ में रहता है
मेरी नज़र में आपका ब्लॉग किसी धर्मयुग से कम नहीं है किसी हुनर मंद
को इज्ज़त और मुकाम बड़े सबाब का काम होता है और आप इसे अंजाम दे रहें हैं
में दिल की गहराईओं से आपको मुबारिक बाद देता हूँ और आपकी भूरी भूरी परशंषा
करता हूँ अपना एक शेर आपकी नज़र करता हूँ
वोह चार चाँद लगाता जिधर भी जाता था
जिसे समझाते थे ग़ालिब वोह मेरे निकला था
आदाब

चाँद शुक्ला हदियाबादी डेनमार्क

Alpana Verma said...

बहुत सुन्दर समीक्षा.
बहुत बहुत शुक्रिया!

प्रकाश पाखी said...

डॉ शाहिद मीर साहब मेरे गृहनगर बाड़मेर में उप प्राचार्य पद पर है और अफ़सोस इस बात का है कि लम्बे समय से वहा जाना नहीं हो रहा है. .उनके लेखन पर आपकी पोस्ट बेहद उपयोगी लगी.आभार!

Prem said...

bahut badhiya sameeksha karte hain aap ,

daanish said...

"meer sahib" ki takhliqaat se ru.b.ru karvaane ka bahu bahut shukriyaa Neeraj Bhaaee...!
naaqid ki soorat meiN aap bahut achhe raah-numaa haiN...
sach meiN..!!

Gyan Dutt Pandey said...

नया शब्द पता चला - पैकर। अन्यथा अभी तक मूवर्स और पैकर्स ही जानता था।
और ये कल के ब्लॉगर की या उनके बारे में पोस्ट तो प्रस्तुत कीजिये नीरज जी।

padmja sharma said...

नीरज जी
आप अच्छी जानकारियाँ दे रहे हैं 'किताबों की दुनियाँ में' .सच ही है कि अच्छा रचनाकार बनने से पूर्व अच्छा इंसान बनना ज़रूरी होता है .

Rajeysha said...

जिस्म पर ज़ख्म तीर वाले हैं
हम सलामत ज़मीर वाले हैं

ये लाईन्‍स इसके ऊपर दि‍ख रहीं हैं, ऐसा क्‍यों है ?

तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे
दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रक्खे

गौतम राजऋषि said...

विलंब से आने के लिये क्षमाप्रार्थी हूं नीरज जी...नुकसान मेरा ही होने जा रहा था जो ये पोस्ट छूट जाती मुझसे। शाहिद साब की ग़ज़लों की किताब की बहुत दिन से तलाश थी मुझे। सारे पूछ्ताछ सिफ़र ही रहे थे अबतक....और अब अचानक से देवदूत बन कर आ गये आप।

शुक्रिया...शुक्रिया...शुक्रिया...

डॉ .अनुराग said...

ऐसा लगता है आपकी अलमारी में डाका डालना पड़ेगा मुझे ....नहीं तो मुलाकात पे दो चार किताबे लिए बगैर जायूँगा नहीं........

हरकीरत ' हीर' said...

वाह ...niraj जी kahaan से ये nayab gazlon के sangrah dhoodh dhoondh कर late हैं ......हर sher chhalni karta huaa ......

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समन्दर कर दे
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे

वाह....shubhaanallah .....!!

रक्खे थे उसने सारे स्विच अपने हाथ में
बे वक़्त ही जलाया, बुझाया गया मुझे

वाह.... kitani saral bhasha में ...इतना gahra she'r .....

उजले मोती हमने मांगे थे किसी से थाल भर
और उसने दे दिए आंसू हमें रूमाल भर

dekhiye kitani sral bhasha है ..

डा. शाहिद मीर को nman ...और श्री अनिल जैन का आभार .....

आभार आपका भी ...!!

( अनुराग जी डाके में मेरा भी हिस्सा रहेगा ......!! )

Shiv said...

जिस्म पर ज़ख्म तीर वाले हैं
हम सलामत ज़मीर वाले हैं

बढ़िया किताब और महान शायर के बारे में जानकारी मिली. जल्दी ही आ रहा हूँ और सारी किताबें उठाकर ले जाऊँगा.

Parul Singh said...

neeraj ji pahle to apke bahut hi achi jankario se bhare log ke liye shukriya bahut bahut...aap khud bhi bahut aacha likhte hai..kya apka ye blog roman main bhi dekha ja sakta hai
haan to karpya btaye kesse?
dhanyavad

Parul Singh said...

apke blog ki aadat aesi ho gyi roj sham ko eske liye time nikal hi leti hun mai...shukriya