Monday, January 24, 2022

किताबों की दुनिया - 249



हर ख़ुशी क़दम चूमे कायनात की उसके
रास आ गईं जिसको सुहबतें फ़क़ीरों की

सूर, जायसी, तुलसी और कबीर, ख़ुसरो को
बेबसी से तकती हैं दौलतें अमीरों की

जिस्म की सजावट में रह गए उलझ कर जो
रूह तक नहीं पहुंची फ़िक्र उन हक़ीरों की
हक़ीर : तुच्छ
*
वो अरमाँ अब तो निकलेंगे रहे जो मुद्दतों दिल में
ख़ुदा के फ़ज़्ल से चलने लगा मेरा क़लम कुछ-कुछ

मेरे एहसास पर भी छा गई वहदानियत देखो
मुझे भी आ रही है अब तो ख़ुशबू-ए-हरम कुछ कुछ
वहदानियत: ईश्वर के एक होने का सिद्धांत
*
बला की शोख़ है सूरज की एक-एक किरन
पयामे ज़िंदगी हर इक किरन की ख़ुशबू है

गले मिली कभी उर्दू जहांँ पे हिंदी से
मेरे मिज़ाज में उस अंजुमन की ख़ुशबू है
*
रोएंँगे तन्हाई में
क़ुर्बत में तो हंसलें हम
क़ुर्बत:सामीप्य

छोटी छोटी चीज़ों से
बच्चों जैसे बहलें हम
*
जिसकी फ़ितरत थी हमेशा से सताइश करना
क्या पता कैसे उसे आ गया साज़िश करना
सताइश: तारीफ़

नब्बे के दशक की एक ख़ुशनुमा सुबह। महालक्ष्मी रेसकोर्स मुंबई में एक शख़्स पीच कलर की टी शर्ट और ख़ाकी पैंट पहने मॉर्निंग वॉक पर है। चलते हुए लोगों से मुस्कुरा कर बातें करते हुए घोड़ों की पीठ पर प्यार से धौल जमाते हुए और जॉकियों की भीड़ में क़हक़हे लगाते हुए इसे रोज़ देखा जा सकता है। वॉक के बाद घोड़ों के ट्रेनर और जॉकियों से गप्पे लगाते हुए ये शख़्स वहीं के मशहूर गैलोप रेस्टॉरेंट में नाश्ता करता है। रेसकोर्स ही नहीं दुनिया के हर कोने में ग़ज़ल का शायद ही कोई ऐसा दीवाना हो जो इसे न जानता हो। इस हरदिल अज़ीज़ शख़्स का नाम जगजीत सिंह है जो घुड़दौड़ का आशिक़ है। आज गैलोप में ज़्यादा भीड़भाड़ नहीं है ,जगजीत सिंह साहब दो तीन दोस्तों के साथ अपनी पसंद की टेबल पर जा बैठे हैं। उनकी नज़रें अभी हाल ही में खरीदे घोड़े पर हैं जिसे ट्रेनर अपने हिसाब से दौड़ा रहा है। तभी एक लम्बा दुबला पतला इंसान टेबल पर आ कर जगजीत सिंह साहब से कहता है 'देख लेना सर, जल्द ही आपका घोड़ा रेस जीतेगा।' जगजीत साहब ने मुस्कुराते हुए उस शख़्स की और देख कर कहा 'आपके मुँह में घी शक्कर हुज़ूर लेकिन आपकी तारीफ़ ?' जवाब में उस लम्बे दुबले पतले शख़्स ने कहा कि सर आपके सवाल का जवाब अपने दो शेर में देने की गुस्ताख़ी कर रहा हूँ :

यूँ तो लोगों के बीच रहता हूँ
पर हक़ीक़त में मैं अकेला हूँ

मुझको दुनिया 'रक़ीब' कहती है
क्या बताऊँ किसी से मैं क्या हूँ

'अरे वाह वाह !! सुभानअल्लाह आप तो ग़ज़ब के शायर हैं, बैठिये कुछ और भी सुनाइए'। जगजीत साहब चहकते हुए बोले।' जी नहीं, मैं गैलोप का एडमिनिस्ट्रेशन देखता हूँ बहुत दिनों से आपसे बात करना चाहता था लेकिन हिम्मत ही नहीं हो रही थी आज पता नहीं कैसे अचानक अपने आपको रोक नहीं पाया उस शख़्स ने शर्माते हुए जवाब दिया। इस पर जगजीत जी ने हँसते हुए कहा 'अरे नहीं नहीं आज तो आप मेरे साथ बैठिए, मैं आपको चाय बना कर पिलाता हूँ फिर आप अपने दोस्त अहबाब से कहना कि मैं वो शायर हूँ जिसे जगजीत जी ने अपने हाथों से चाय बना कर पिलाई' उस दिन के बाद से इस शख़्स का जगजीत जी के साथ एक आत्मीय रिश्ता सा बन गया।

अक़्ल पर पत्थर हमारी पड़ गए हैं इसलिए
ख़ुद समझते ही नहीं औरों को समझाते हैं हम

लुत्फ़ आता है सितम तक़दीर के सहकर बहुत
मेहरबाँ तक़दीर होती है तो घबराते हैं हम
*
रस्मन हैं साथ-साथ वो चाहत नहीं है अब
रिश्तों में पहले जैसी तमाज़त नहीं है अब
तमाज़त: गर्मी की शिद्दत, तीव्रता
*
ख़ुदा को दैरो-हरम में कब से, तलाश करते हैं उसके बंदे
हर एक ज़र्रे के लब पे ख़ालिक़ की चारसू बंदगी मिलेगी

जहाने फ़ानी में रस्मे उल्फ़त का ख़्वाब लेकर 'रकी़ब' आया
नहीं पता था, नहीं ख़बर थी, यहांँ भी बेगानगी मिलेगी
*
कुछ को तो शबो-रोज़ कमाने की पड़ी है
पानी की तरह कुछ को बहाने की पड़ी है

झुकती ही चली जाए कमर बोझ से फिर भी
मुफ़लिस को अभी और उठाने की पड़ी है
*
गर्दिश ए वक़्त ख़ुद ही पशेमान हो
राहे पुरख़ार से यूंँ गुज़र जाइए
*
उम्र भर जो रहे देखते आईना
आईने से उन्हें आज परहेज़ है
*
डसा है सांंप ने अक्सर किसी को
मुक़द्दर में किसी के सीढ़ियांँ हैं

आप सोच रहे होंगे कि इस घटना का ज़िक्र ज़रूर इस शख़्स ने ख़ूब नमक मिर्च लगा कर लोगों से किया होगा क्यूंकि ये कोई साधारण घटना नहीं है। नब्बे के दशक में जगजीत साहब की तूती बोलती थी। उनके कॉन्सर्ट के टिकटों की कालाबाज़ारी हुआ करती थी और जिसके हाथ टिकट आ जाता वो अपने आप को ख़ुश-क़िस्मत समझता। उनके नए रेकार्डों और कैसेटों के आते ही ख़रीदारों की भीड़ लग जाती थी। जिसकी एक झलक पाने को लोग घंटों इंतज़ार करते थे ऐसे जगजीत सिंह आपको ख़ुद चाय बना कर ऑफर करें क्या ये साधारण बात है ? नहीं हरगिज़ नहीं लेकिन शायद आप इस शख़्स को अच्छे से नहीं जानते। इस स्वभाव से शर्मीले शख़्स ने जिसे लोग 'सतीश शुक्ला 'रक़ीब' के नाम से जानते हैं इस बात का ज़िक्र शायद ही एक आध जने से किया होगा। मुझे से भी इन्होंने अचानक एक दिन मेरे साथ खोपोली जाते हुए कार में इस घटना का ज़िक्र बेहद सरसरी तौर पर किया था तब तक जगजीत साहब इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह चुके थे और ताकीद भी की थी कि ये बात हर किसी को न बतायें क्यूंकि लोग विश्वास नहीं करेंगे और बातें बनाएंगे।

आज हम उन्हीं सतीश शुक्ला 'रक़ीब' साहब के पहले ग़ज़ल संग्रह "सुहबतें फ़क़ीरों की" को पढ़ रहे हैं और आपसे शेयर भी कर रहे हैं। इस सजिल्द किताब को 'भारतीय साहित्य संग्रह' नेहरू नगर, कानपुर ने सन् 2021 अगस्त में प्रकाशित किया है। ये किताब अमेज़न पर ऑन लाइन उपलब्ध है इसे आप प्रकाशक से 7007810944 पर फ़ोन कर के भी मँगवा सकते हैं।
   

       बनकर जो उड़ा भाप तो बरसात में लौटा
इक बूंद हूँ पानी की समंदर में मिला हूँ

हंँस-हंँस के सितम अपनों के झेले हैं मुसलसल
रिश्तो की अज़िय्यय का सफ़र काट रहा हूँ
अज़िय्यत :यातना
*
नहीं कुछ गिला कि तूने मुझे ठोकरों पे रक्खा
मगर आरज़ू यही है कि गले का हार होता
*
है ज़रूरी इबादत में दिल भी झुके
बेसबब सर झुकाने से क्या फ़ायदा
*
सुनो ए जुगनुओ तुम जाओ जा के सो जाओ
मेरे नसीब में है जागरण ख़ुदा के लिए

रक़ीब ख़ार सिफ़त लोग मुश्तइल होंगे
न छेड़ ज़िक्रे-गुले ख़ंदा-ज़न ख़ुदा के लिए
*
शेख़ हम होंगे जुदा वादा बिरहमन यार का
जब मुझे भगवान या तुझको ख़ुदा मिल जाएगा
*
देर से जाऊंँगा दफ़्तर तो कटेगा वेतन
वो इसी डर से मुझे जल्दी जगा देते हैं

क्यों न बीमार के हक़ में हों दुआएं भी 'रक़ीब'
कुछ तबीब ऐसे हैं जो सिर्फ़ दवा देते हैं
तबीब: चिकित्सक
*
अल्लाह इस अज़ाब से हम को बचाए रख
बनती बिगाड़ सकता है एहसासे कमतरी

चुंबकीय व्यक्तित्व के स्वामी सतीश शुक्ला जी से मेरी पहचान मुंबई की नशिस्त की दौरान सन् 2009 में हुई थी। मुझे वो पुराने क्रिकेट खिलाड़ी सलीम दुर्रानी जैसे लगे जो दर्शकों की फ़रमाइश पर छक्का जड़ दिया करते थे। पहली नज़र में ही मैं उनकी सादा और शालीन शख़्सियत का क़ायल हो गया। मुंबई जैसे महानगर में इस क़दर दूसरों के लिए प्यार और आदर से भरा इंसान मिलना मुश्किल है।

चार अप्रेल 1961 को लख़नऊ में सतीश जी का जन्म हुआ। पिता सिविल इंजिनियर होने के साथ साथ अच्छे तैराक और कवि भी थे। उर्दू लिपि (नस्तलीक़ ) से भी वाक़िफ़ थे उर्दू शायरी की किताबें बड़े चाव से पढ़ते थे। जिस मोहल्ले में घर था वो मोहल्ला मुस्लिम बहुल था सिर्फ़ 5-7 हिन्दू परिवार रहते थे। मोहल्ले में उनके घर के पास ही मस्जिद थी और मस्जिद से पांच मकान आगे शिव मंदिर। पाँच वक़्त की अज़ान और सुबह-शाम आरती की घंटियों की आवाज़ का असर सतीश जी के दिल-ओ-दिमाग़ में कुछ इस तरह घर कर गया कि उन्हें पूजा, अर्चना और नमाज़ में कोई फ़र्क़ ही महसूस नहीं होता। लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब उनमें रच बस गयी, यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें उर्दू प्रेमियों को भी अच्छी लगती हैं और हिंदी के आशिक़ों को भी। सन् 1980-81 में अलीगढ़ के संक्षिप्त प्रवास के दौरान ही उर्दू शायरी उनकी ज़िन्दगी अहम हिस्सा बन गयी जो मुंबई आ कर परवान चढ़ी।
मुझे लगता है कि सतीश जी की कुंडली में कुछ चक्कर है तभी वो एम.ए., बी.एड. और कम्यूटर में डी.सी.पी.एस. की डिग्रियाँ हासिल करने के बावज़ूद कहीं टिक कर नौकरी कर नहीं पाए। फ़तेहगढ़, उत्तर प्रदेश के एस.जी.एन.डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता की नौकरी छोड़ छाड़ के ये मुंबई चले आये और यहीं के हो कर रह गए। मुंबई में भले ही उन्होंने रोज़गार के लिए ख़ूब पापड़ बेले लेकिन हार नहीं मानी। ज़िन्दगी की जद्दोजहद को वो अपनी शायरी में ढालते रहे। शायरी की बदौलत ही मुंबई में उनके चाहने वालों की तादाद में ख़ूब इज़ाफ़ा हुआ।

होठों पे कभी जिनके दुआ तक नहीं आती
जीने की उन्हें कोई अदा तक नहीं आती

मुश्किल से महीने में बचाता है वो जितना
उतने में तो खांँसी की दवा तक नहीं आती

पछतायेगा मज़लूम पर ज़ालिम न जफ़ा कर
क़ुदरत की तो लाठी की सदा तक नहीं आती
*
है ज़रूरी बहुत समझ लेना
बंदगी क्या है और ख़ुदा क्या है

है अमानत ये ज़िंदगी उसकी
ये बतायें कि आपका क्या है

दिल किसी का कभी नहीं रखता
इक मुसीबत है, आईना क्या है
*
बता सको तो बताओ ये क़ाफ़िले वालों
कि तुमसे पहले यहांँ पर क़याम किसका था
*
बस ख़ुदा का शुक्र कह कर टाल देता है हमें
हाल जब भी पूछते हैं इस दिले-बिस्मिल से हम

कुछ तो है, जो कुछ नहीं तो, फिर ये उठता है सवाल
पास रहकर दूर क्यों हैं दोस्तो मंज़िल से हम
*
रिश्ता गुलों से है न गुलिस्तांँ से रब्त है
गुलशन में जी रहे हैं मगर ख़ार की तरह


अपनी शायरी के हवाले से सतीश जी ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि 'माया नगरी मुंबई में मेहनत मज़दूरी करके जीवन यापन करने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए किसी उस्ताद का गंडाबंद शागिर्द बन कर रह पाना तो मुमकिन नहीं हुआ सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्ग मित्रों की रहनुमाई हासिल हुई जिनमें सर्वप्रथम श्री गणेश बिहारी 'तर्ज़' साहिब , कृष्ण बिहारी 'नूर' साहिब क़मर जलालाबादी साहिब, नक़्श लायलपुरी साहिब, इब्राहिम 'अश्क' साहिब, आरिफ़ अहमद साहिब ओबैद आज़म आज़मी साहिब और सादिक़ रिज़वी साहिब वो नाम हैं जिन्होंने न सिर्फ़ ख़्याल और अरूज़ के ऐतबार से मेरी काविशों पर नज़र रखी बल्कि बेशुमार लोगों से बड़ी आत्मीयता से परिचय भी कराया। सतीश जी 'तर्ज़' साहब को अपना उस्ताद मानते थे और उनका ज़िक्र अक्सर मुझसे किया करते थे। 'तर्ज़' साहब की 'किताब से मेरा परिचय भी उन्होंने ही करवाया जिस पर मैंने अपने ब्लॉग पर लिखा भी था। 'तर्ज़' साहब की याद में इस्कॉन मंदिर मुंबई, जहाँ सतीश जी सहायक प्रबंधक पर कार्यरत हैं, के हॉल में सतीश जी द्वारा कराये गए मुशायरे का मैं चश्मदीद गवाह हूँ जिसमें मुंबई के नामी शायरों ने शिरक़त की थी।

सतीश जी को मुंबई और मुंबई के बाहर बहुत से पुरुस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है और ये सिलसिला मुसलसल जारी है। उनकी रचनाएँ शाइर, द उर्दू टाइम्स, बे-बाक (उर्दू ), जहाँनुमा (उर्दू), नया दौर (उर्दू), अदबी देहलीज़ ,ग़ज़ल के बहाने, अरबाबे क़लम छंद प्रभा, गीत गागर जैसी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में छप चुकी हैं और छप रही हैं। आकाशवाणी-प्रसार भारती मुंबई के संवादिता चैनल से काव्यपाठ का प्रसारण भी हो चुका है। जल्द ही उनका दूसरा काव्य संग्रह 'अभी सीख रहा हूँ' मंज़र-ऐ-आम पर आने वाला है उसके लिए मैं उन्हें अग्रिम बधाई देता हूँ। आप भी सतीश जी को उनके वर्तमान और आने वाले ग़ज़ल संग्रह के लिए उन्हें 9892165892 पर फ़ोन कर के बधाई दे सकते हैं।

सतीश जी के जीवन का सम्बल उनकी विदुषी पत्नी अनुराधा और मेधावी बेटी सागरिका हैं जो हर परिस्थिति में उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी नज़र आती हैं।

अंत में प्रस्तुत हैं उनकी किताब से लिए कुछ और चुनिंदा अश'आर-

फ़ज़ाओं में जो तल्ख़ी है जलाकर ख़ाक कर डालो
बुझाओ फिर उसे ऐसे न हो कोई शरर पैदा

सिवाए ख़ार के हासिल न होगा कुछ बबूलों से
शजर ऐसे लगाओ जिनपे हों मीठे समर पैदा
*
कम पड़े जब हाथ मेरे मांँ का आंँचल मिल गया
है सितमगर भी पशेमाँ ज़ुल्म अब ढाए कहांँ
*
दूरियांँ कम कीजिए करते नहीं क्यों
जाने कब से कह रहा है शामियाना

धूप, बारिश और हवा के ज़ुल्म सारे
मुस्कुरा कर सह रहा है शामियाना
*
दिल ही मेरा तोड़ा है सोचता हूंँ यारों ने
शुक्र है ख़ुदा मेरे सर मेरा सलामत है
*
पूछूँगा मैं लुक़मान से ये रोज़े-क़यामत
कैसा है मरज़ इश्क़, दवा क्यों नहीं आती
*
मैं तुझे डूबने नहीं दूंगा
सिर्फ़ कहने को एक तिनका हूंँ
*
दूरी भी रही और नहीं दूर रहे हम
ये साथ गुज़ारे हुए लम्हों का असर था
*
दौलत का चंद रोज़ में यूं जादू चल गया
कल तक जो आदमी था वो पत्थर में ढल गया।





Monday, January 10, 2022

किताबों की दुनिया - 248

मेरा क़द 
मेरे बाप से ऊंचा निकला 
और मेरी मांँ 
जीत गई
*
ऐ जीवन के प्यारे दुख 
मेरे अंदर दिया जलाना 
बुझ मत जाना
*
मेरे बच्चे 
तेरी आंँखें, तेरे लब देखकर 
मैं सोचती हूंँ 
ये दुनिया इस बला की ख़ूबसूरत है 
तो फिर क्यों जंग होती है ?
*
एक तरफ बेटी है मेरी 
एक तरफ मेरी मांँ 
दोनों मुझको अक़्ल बताती रहती है 
बारी-बारी सबक पढ़ाती रहती हैं 
दो नस्लों के बीच खड़ी 
मैं खुद पर हंसती रहती हूंँ 
अपनी गिरहें आप ही कसती रहती हूंँ 
मेरे दोनों हाथ बंँधे
मेरा दर्द न जाने कोई
*
खेलने कूदने की उम्रों में 
इक ना इक भाई साथ रहता है 
नौजवानी में खुलकर हंँसने पर 
ख़ौफ़-ए-रुसवाई साथ रहता है 
और अब उम्र ढल गई है तो 
रंज-ए-तन्हाई साथ रहता है 
वो अकेली कभी नहीं होती
*
औरतें ब-ज़ाहिर जो 
खेतियाँ तुम्हारी हैं 
यूं भी तो हुआ अक्सर 
उनके चश्म-ओ-अबरू के  
सिर्फ़ इक इशारे पर 
खेत हो गए लश्कर 
ब-ज़ाहिर: बाहर से ,चश्म-ए-अबरु:आंँख और भँवें

अब जरूरी तो नहीं कि किसी नयी किताब पर लिखने का सिलसिला हमेशा उस क़िताब में छपी ग़ज़लों के शेरों से ही किया जाये, यदि उस किताब में बेहतरीन नज़्में भी हैं तो उनमें से ही चुनिंदा आपके सामने रख कर भी तो आगे बढ़ा जा सकता है।

छठे दशक की बात है। कराची के एक उपनगर 'मलीर' के घर के अंदरूनी कमरे में जो दस बारह साल की बच्ची सो रही है वो सुबह मुँह अँधरे गली में चीमटा बजा कर गाते हुए फ़कीर की सुरीली आवाज़ से आँखें खोल देती है। अभी बिस्तर में कसमसा ही रही है कि बकरियों का रेवड़ हाँकते हुए बाहर जो गली से गुज़र रहा है वो भी गाता जा रहा है, परिंदो की कलरव हर लम्हा तेज होती जाती है, वो बिस्तर से नीचे उतरे उससे पहले ही रेड़ी पर सब्जी बेचने वाले की सुरीली टेर उसे मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। ये सब आवाजें रोज उसके सुबह उठने के अलार्म हैं। बच्ची तैयार हो कर जिस किसी भी बस से स्कूल जाती है उसी बस में लतामंगेशकर के गाने बजते सुनाई देते हैं।शाम कहीं दूर मस्जिद में कव्वालियों के सुर तो किसी शादी वाले घर से मुहम्मद रफ़ी के गाने फ़जा में तैरते सुनाई देते हैं। अभी बच्ची के घर रेडियो नहीं आया है। लाउडस्पीकर भी बहुत कम बजते हैं लेकिन संगीत का दरिया हर ओर बहता सुनाई देता है। बच्ची इस संगीत को सुन मुस्कुराती है, खिलखिलाती है। जी हाँ ठीक पढ़ा ये पाकिस्तान के कराची की ही बात कर रहा हूँ, संगीत कब सरहदों में बंध सका है ?

अफ़सोस !! संगीत अब हमारी ज़िंदगी से ग़ायब हो गया है उसकी जगह शोर ने ले ली है। संगीत ने ही तो हमें  जानवरों से अलग किया हुआ है। संगीत जिस दिन हमारे बीच से ग़ायब हो गया उस दिन ये जो थोड़ा बहुत जानवरों और हममें फ़र्क बचा है वो मिट जाएगा। आप देखें धीरे धीरे मिट ही रहा है। हम अंदर से बेचैन हैं ,घुट रहे हैं ,दुखी हैं, अकेले हैं ,जल्दी ही अपना आपा खो देते हैं क्यूंकि हम मुस्कुराना भूल गए हैं, गुनगुनाना भूल गए हैं।    

फूलों की जबाँ की शाइ'र थी 
कांँटो से गुलाब लिख रही थी 

आंँखों से सवाल पढ़ रही थी 
पलकों से जवाब लिख रही थी 

फूलों में ढली हुई ये लड़की 
पत्थर पे किताब लिख रही थी
*
लड़कियांँ माओं जैसा मुकद्दर क्यों रखती हैं 
तन सहरा और आंँख समंदर क्यों रखती हैं 

औरतें अपने दुख की विरासत किसको देंगी 
संदूक़ों में बंद ये ज़ेवर क्यों रखती हैं 

वो जो रही है खाली पेट और नंगे पांँवों 
बचा बचा कर सर की चादर क्यों रखती हैं 

सुब्ह-ए-विसाल की किरनें हमसे पूछ रही हैं 
रातें अपने हाथ में ख़ंजर क्यों रखती हैं
*
यादों के बिस्तर पर तेरी ख़ुश्बू काढ़ूँ
इसके सिवा तो और मैं कोइ हुनर नहीं रखती

मैं जंगल हूंँ और अपनी तन्हाई पर ख़ुश 
मेरी जड़ें जमीन में है कोई डर नहीं रखती
*
सूना आंँगन तन्हा औरत लंबी उम्र 
खाली आंँखें भीगा आंँचल गीले होंठ

ये बच्ची कराची के उपनगर मलीर में रहती जरूर है लेकिन इसके घर में अवधी बोली जाती है। इस बच्ची के पिता वकील हैं जो मुल्क़ तक़सीम होने के कुछ अरसे बाद, बलरामपुर उत्तर प्रदेश से कराची जहाँ ये 25 दिसंबर 1956 को पैदा हुई, आ कर बस गए। माँ 1965 तक इसे गोद में लिए न कितनी बार सरहद पार अपने वतन बलरामपुर ले जाया करती। इस बच्ची को अपने बचपन में सुने अनीस के ढेरों मर्सिये याद हैं। इन्हें सुन सुन कर ये खुद भी नोहे और नात लिखने लगी। तब ये कोई छठी या सातवीं जमात में पढ़ती होगी। साथ पढ़ने वाले और मोहल्ले के बच्चे इसकी लिखी नात मजलिसों में सुनाते और ईनाम पाते। इसी उम्र में ये रेडिओ पाकिस्तान कराची से जुड़ गयी और बरसों जुड़ी रही। एक बार का वाकया है रेडिओ पर प्रोग्राम डायरेक्टर ने चूड़ी पर तुरंत एक छोटी सी नज़्म लिखने को कहा इन्होने लिख दी 
'तेरी भेजी हुई 
ये हरे काँच की चूड़ियाँ 
नर्म पोरों से 
उजली कलाई के नाज़ुक़ सफर तक 
लहू हो गईं '

ये मोहम्मद जिया-उल हक़ के कार्यकाल की बात है ,प्रोग्राम डाइरेक्टर ने उसे पढ़ कर कहा 'बीबी इसमें से लहू लफ्ज़ की जगह कोई और लफ्ज़ बरतो क्यूंकि लहू लफ्ज़ कविता कहानियां ग़ज़ल, नज़्म आदी में इस्तेमाल करने की सरकार की तरफ़ से पाबन्दी है। बच्ची ने साफ़ मना कर दिया और घर चली आयी। आप ज़रा लफ्ज़ की ताकत का अंदाज़ा लगाएं कि उसके इस्तेमाल भर से एक तानाशाह किस तरह ख़ौफ़ज़दा था। उस दिन इस बच्ची को भी लफ्ज़ की ताक़त का पता चला और उसने तय किया कि वो लफ्ज़ का दामन कभी नहीं छोड़ेगी।            

अपनी आग को जिंदा रखना कितना मुश्किल है
पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है 

कितना आसाँ है तस्वीर बनाना औरों की 
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना मुश्किल है

दोपहरों के ज़र्द किवाड़ों की ज़ंजीर से पूछ 
यादों को आवारा रखना कितना मुश्किल है
*
तेरे ध्यान का जिद्दी बालक मुझको सोता देख 
घुंँघरू जैसी आवाज़ों में रोने लगता है
*
लाख पत्थर हूं मगर लड़की हूंँ
फूल ही फूल हैं अंदर मेरे
*
ख्वाहिशें दिल में मचल कर यूं ही सो जाती हैं
जैसे अंगनाई में रोता हुआ बच्चा कोई
*
दिल कोई फूल नहीं है कि अगर तोड़ दिया 
शाख़ पर इससे भी खिल जाएगा अच्छा कोई 

रात तन्हाई के मेले में मेरे साथ था वो 
वरना यूंँ घर से निकलता है अकेला कोई
*
सुब्ह वो क्यारी फूलों से भर जाती थी 
तुम जिसकी बेलों में छुप कर आते थे 

उससे मेरी रूह में उतरा ही न गया 
रस्ते में दो गहरे सागर आते थे

ये बच्ची बहुत शर्मीली है। घर से स्कूल और स्कूल से घर बस यही इसकी दुनिया है। वालिद हर छुट्टी के दिन इसे कराची से थोड़ा आगे खरीदे अपने खेतों पर पूरे परिवार के साथ ले जाते जहाँ कपास चुनती, खेतों में काम करती लड़कियों से ये बतियाती और उनके दुःख सुख सुनती। वालिद साहब का इंतेक़ाल जल्द ही हो गया तब इसकी माँ की उम्र ये कोई तीस बत्तीस की रही होगी।तब अपनी माँ के साथ ये अपनी नानी जो मात्र 24 साल की उम्र में ही बेवा हो गयीं थीं के पास रहने लगीं। नानी एक तरह से घर मुखिया हो गयीं। नानी जमींदार परिवार से थीं लिहाज़ा उनमें जमीन्दाराना ठसका भी था। घर में काम वालियों के साथ नानी का व्यवहार वही जमीन्दाराना था जबकि माँ की उन सबसे खूब दोस्ती थी। काम वालियाँ बच्ची की माँ से घंटो बातें करतीं और अपने दुखड़े सुनातीं। उनके दुखड़े सुन सुन कर बच्ची सोचती कभी मैं इनके बारे लिखूंगी। एक रजिस्टर में अपने ख़्याल जो कभी नज़्म होते कभी कहानी की शक्ल में वो दर्ज़ करती रहती। मात्र चौदह साल की उम्र से उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो कर चर्चित होने लगी थीं.

स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से यूनिवर्सिटी का सफ़र भी कट गया। कराची यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम् ऐ करने के बाद भी उनका लिखना जारी रहा और इसे सँवारा मलीर की 'बज़्में इल्मो दानिश' नाम से होने वाली नशिस्तों ने। युवा और अनुभवी रचनाकार इन नशिस्तों में अपना क़लाम सुनाते जिन पर खुली बहस होती और युवाओं को इस सब से बहुत कुछ सीखने को मिलता। रेडिओ पाकिस्तान कराची पर भी उस वक़्त पाकिस्तान की बेहतरीन प्रतिभाएं काम करती थीं लिहाज़ा वहां से भी बच्ची ने बहुत कुछ सीखा। लगातार सीखने की ललक और अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण ये बच्ची, जिसे दुनिया 'इ'शरत आफ़रीन के नाम से जानती है, सबकी नज़रों में आ गयी आज उन पर पूरे उर्दू लिटरेचर को नाज़ है।

मैंने इक हर्फ़ से आगे कभी सोचा ही न था 
और वो हर्फ़ लुग़त में तेरी लिक्खा ही न था 
लुग़त: शब्दकोश 

मैंने कहना भी जो चाहा तो बयांँ कर न सकी
मुझमे लफ्जों को बरतने का सलीक़ा ही न था 

उसने मिलने की रह-ओ-रस्म न की तर्क मगर 
मैं ही चुप रह गई अब के वो अकेला ही न था
*
ये और बात की कम हौसला तो मैं भी थी 
मगर ये सच है उसे पहले मैंने चाहा था
*
यह नहीं ग़म कि मैं पाबंद-ए-ग़म-ए-दौराँ थी 
रंज ये है कि मेरी ज़ात मेरा ज़िन्दाँ थी 
पाबंद-ए-ग़म-ए-दौराँ: समय के दुखों को बाध्य ,ज़िन्दाँ: क़ैदखाना

सूखती जाती है अब ढलती हुई उम्र के साथ
बाढ़ मेहंदी की जो दरवाजे पे अपने हाँ थी 

पढ़ रहा था वो किसी और के आंँचल पे नमाज़ 
मैं बस आईना-ओ-क़ुर्आन लिए हैराँ थी
*
अ'दावतें नसीब हो के रह गईं 
मोहब्बतें रक़ीब हो के रह गईं 

परिंद हैं न आँगनों में पेड़ है 
ये बस्तियांँ अजीब हो के रह गईं

रिवायतों की क़त्ल-ग़ाह-ए-इश्क में 
ये लड़कियां सलीब हो के रह गईं

इ'शरत आफ़रीन के लिए अपने लिए नयी राह बनाना आसान नहीं था। उनसे पहले की कद्दावर शायरायें अदा जाफ़री, किश्वर नाहीद, फहमीदा रिआज़ और ज़ेहरा निग़ाह ने अपने लिए जो अलग राह बनाई उसके अलावा किसी और के लिए कोई नयी राह बनाना बेहद मुश्किल काम था लेकिन इशरत ने वो काम किया और अपनी अलग पहचान बनाई। इ'शरत ने जो देखा, सुना, भुगता वो लिखा और पूरी ईमानदारी से लिखा। मज़े की बात ये है कि ग़ज़ल कहना उन्होंने कहीं से सीखा नहीं हालाँकि उनके अब्बा अच्छे शायर थे और उनके यहाँ नशिस्तें हुआ करती थीं लेकिन इ'शरत ने उनमें कभी शिरकत नहीं की। इशरत के चाचा बेहतरीन शायर थे जब उन्हें कहीं से पता चला कि इशरत बीबी शेर कहती है तो उन्होंने एक तरही मिसरा इशरत को ग़ज़ल कहने के लिए दिया। जब इ'शरत साहिबा ने तुरंत ही उस पर ग़ज़ल कह कर चाचा के पास भिजवाई तो वो पढ़कर हैरान रह गए और अपने भाई याने इ'शरत के अब्बू से बोले कि भाई जान इ'शरत बीबी को आप कभी शेर कहने से रोकना मत. ऊपर वाले ने ख़ास हुनर इसे अता फ़रमाया है। आप देखना एक दिन ये अपना और आपका नाम पूरी दुनिया में रौशन करेगी।अपने लेखन की शुरूआत को इ'शरत साहिबा एक शेर में यूँ बयाँ करती हैं :

मैंने जिस दिन लिखना सीखा पहला शेर लिखा 
लिख लिख कर इक हर्फ़ मिटाया फिर ता'देर लिखा   

आज इ'शरत आफ़रीन साहिबा की रेख़्ता बुक्स द्वारा देवनागरी में प्रकाशित किताब 'एक दिया और एक फूल' हमारे सामने है जिसमें इ'शरत साहिबा की चुनिंदा 61 ग़ज़लें और 48 बेहतरीन नज़्में संकलित हैं। ये किताब आप रेख़्ता बुक्स नोएडा से या फिर अमेजन से ऑन लाइन मँगवा सकते हैं।


कपास चुनते हुए हाथ कितने प्यारे लगे 
मुझे ज़मीं से मोहब्बत के इस्तिआरे लगे 
इस्तिआरे: रूपक

मुझे तो बाग भी महका हुआ अलाव लगा 
मुझे तो फूल भी ठहरे हुए शरारे लगे
*
यूंँ ही ज़ख़्मी नहीं है हाथ मेरे 
तराशी मैंने इक पत्थर की लड़की 

अना खोई  तो कुढ़ कर मर गई वो 
बड़ी हस्सास थी अंदर की लड़की
हस्सास: संवेदनशील
*
वहशत सी वहशत होती है 
ज़िंदा हूंँ हैरत होती है 
वहशत :उलझन, डर 

सारे क़र्ज़ चुका देने की
कभी कभी उज्लत होती है
उज्लत: जल्दी

अपने आप से मिलने में भी 
अब कितनी दिक्क़त होती है

शाम को तेरा हंँस कर मिलना 
दिन भर की उज् रत होती है
उज् रत: मजदूरी, मेहनताना
*
यूंँही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दोपहरें
नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दोपहरें 

सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छाँवों का 
लिपे-पुते कच्चे आंँगन में लोट लगाती दोपहरें

खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं 
मंढे हुए पीले काग़ज से छन कर आती दोपहरें

सन 1985 में उनका विवाह भारत के सय्यद परवेज़ जाफ़री से हो गया जो उस वक़्त वक़ालत के साथ-साथ अच्छी ख़ासी शायरी भी करते थे। सय्यद परवेज़ मशहूर शायर जनाब अली सरदार जाफ़री साहब के भतीजे हैं। शादी के बाद अली सरदार जाफ़री साहब ने अपने यहाँ दोनों को दावत पर बुलाया और हँसते हुए कहा कि देखो जिस तरह एक जंगल में दो शेर साथ नहीं रहते इसी तरह एक घर में दो शायरों का रहना भी मुमकिन नहीं है लिहाज़ा तुम दोनों आपस में तय करलो कि कौन शायरी छोड़ेगा। तय करने की नौबत ही नहीं आयी क्यूंकि चचा जान का जुमला पूरा करने से पहले ही परवेज़ साहब ने मुस्कुराते हुए कहा कि शायरी तो इ'शरत ही करती है और वो ही करती रहेगी। मैं भला और मेरी वकालत भली। इशरत साहिबा पांच बरस भारत में रहीं। इस दौरान उनके चाहने वालों की तादात में भरी इज़ाफ़ा हुआ। इस्मत चुगताई को उनकी नज़्में बहुत अच्छी लगती थीं उन्होंने इशरत से कहा भी कि 'तुम्हारी नज़्मों में वही कहानियां हैं जिन्हें देख या सुन कर मैंने खून थूका था'। तुम्हारी नज़्मों में कहानियां हैं ये बात पाकिस्तान के बड़े कहानीकार इंतज़ार हुसैन साहब ने भी उन्हें कहा था। 

उनकी नज़्म 'ये बस्ती मेरी बस्ती है' को उर्दू की बेहतरीन नज़्मों में से एक माना गया है। ये नज़्म उन्होंने कराची की एक मस्जिद में हुए बम्ब धमाके के बाद कही थी। ये मस्जिद उनके मोहल्ले में थी। जब अमेरिका से इस धमाके के बारे में इशरत ने अपनी अम्मी से फोन पर पूछा तो उनकी अम्मी ने कहा कि 'बेटा सब ठीक हैं, अपना कोई घायल नहीं हुआ हाँ कुछ बंजारने और उनके बच्चे अलबत्ता इस धमाके से अपनी जान गवाँ बैठे हैं।' अम्मी की ये बात इ'शरत के दिल पर छुरी की तरह लगी कि अपना कोई घायल नहीं हुआ तब उनके दिल से आवाज़ आयी तो फिर जो घायल हुए वो किनके हैं। मेरी गुज़ारिश है कि रेख़्ता की साइट पर इस नज़्म को पढ़ें या इशरत आफ़रीन को इसे पढ़ते हुए यू ट्यूब पर देखें और जाने कि लफ्ज़ किस तरह आपके दिल पर असर करते हैं। इसी तरह की एक और अलग विषय पर उनकी नज़्म 'गुलाब और कपास' बार बार पढ़ने लायक है।    

दिन तो अपना इक खिलंदरा दोस्त है 
शब वो हमजोली जो सब बातें करे 

मुझ में एक मासूम सी बच्ची जो है 
मुझसे पहरों बे-सबब बातें करे
*
तमाम रात में अपनी ही रोशनी में जली 
तमाम रात किसी ने मुझे बुझाया नहीं
*
अब ये दिल भी कितना बोझ सहारेगा 
मान भी जाओ कश्ती बहुत पुरानी है

आग बचा कर रखना अपने हिस्से की 
आने वाली रात बड़ी बर्फानी है 

तेरी खातिर कितना खुद को बदल दिया 
अपने ऊपर मुझको भी हैरानी है 
*
क्या दिन थे जब कुन्जी ख़ुशी ख़ज़ाने की 
अपने धूल-भरे हाथों में होती थी 

कच्चे रंगों का आंँचल और भीगे ख़्वाब 
कितनी मुश्किल बरसातों में होती थी
*
कहांँ से लाएंगे बच्चों के वास्ते अपने 
गई सदी का खुला आसमाँ सुनहरी धूप 

कहानियों में सुनाया करेंगे आगे लोग 
सितारे फूल धनक तितलियांँ सुनहरी धूप
*
इ'शरत आफरीन नब्बे के दशक के शुरुआत में अपने परिवार सहित अमेरिका चली गयीं और अब वहीँ अपने तीन बच्चों के साथ ह्यूस्टन, टेक्सास में रहती हैं। उनकी उर्दू में तीन किताबें 'कुंज पीले फूलों का' 1985 में ,' धूप अपने हिस्से की' 2005 में और 'दिया जलाती शाम' सं 2017  मंज़र-ऐ आम पर आयीं और बहुत चर्चित हुईं। हाल ही में उनकी कुलियात ' ज़र्द पत्तों का बन' भी मंज़र-ऐ-आम पर आयी है। 'उनकी नयी किताब 'परिंदे चहचहाते हैं' जल्द ही मंज़र-ऐ-आम पर आने वाली है। 
 
पूरी दुनिया की उन यूनिवर्सिटीज में जहाँ जहाँ 'जेंडर स्टडीज़' पढाई जाती हैं वहाँ वहाँ इ'शरत साहिबा की नज़्में और ग़ज़लें उनके सिलेबस में शामिल हैं। इशरत साहिबा को दुनिया के कोने में होने वाले सेमिनार, फेस्टिवल्स और मुशायरों में अपना कलाम पढ़ने को बड़े आदर से बुलाया जाता है।       

इशरत साहिबा को मिले अवार्ड्स की लिस्ट भी ख़ासी लम्बी है. आखिर में पेश हैं उनकी ग़ज़लों के कुछ और चुनिंदा शेर।   .
    
वही बेचैन रखते हैं ज़ियादा 
अभी तक हर्फ़ जो लिक्खे नहीं हैं 

ये दरिया ख़ुश्क है ऐसा नहीं बस 
किसी के सामने रोते नहीं हैं 

समझ में आ गई जिस रोज दुनिया 
उसी दिन से तो दुनिया के नहीं हैं
*
पंख पखेरू डाली डाली चहक रहे हैं 
आदमी के हिस्से में ऐसा सन्नाटा 

अनजानी दीवार खड़ी है हर घर में 
अंदर बैठा है अनदेखा सन्नाटा
*
इसे कुरेद के देखो तो शहर निकलेगा 
तुम्हारे सामने ये रेत का जो टीला है
*
जिंदगी देर से हम पर तेरे असरार खुले 
इतनी सादा भी न थी जितना समझते रहे हम 
असरार: रहस्य, भेद
*
कुछ हमीं कार-ए-जहांँ में उन दिनों उलझे न थे 
हमसे मिलने में उसे भी काम याद आए बहुत
*
कैसा होगा आधी उम्र सफर में रहना 
आधी उम्र अकेले एक ही घर में रहना
*
खोखला पेड़ खड़ा है लेकिन 
उसका एहसास-ए-अना रक़्स में है
एहसास-ए-अना: स्वत्व का भाव