Monday, May 17, 2010

किताबों की दुनिया - 29

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए

इस बार किताबों की दुनिया में किताब का जिक्र करने इसे पहले एक गीत सुनते हैं:--





मुझे उम्मीद है आपको ये गीत बहुत पसंद आया होगा क्यूँ की इस गीत में संगीत के साथ साथ लाजवाब शायरी भी है, ऐसे ही एक नहीं कई मधुर यादगार गीतों के रचयिता हैं जनाब जांनिसार अख्तर साहब. आज हम उन्ही की नायाब रचनाओं को जिसे निदा फ़ाज़ली साहब ने अपनी किताब ' जाँनिसार अख्तर एक जवान मौत" 'में सम्पादित किया है का जिक्र करेंगे. आज के नौजवानों को सूचित कर दूं की आज के मशहूर शायर जावेद अख्तर साहब जनाब जां निसार अख्तर साहब के बेटे हैं.



मैं सो भी जाऊं तो क्या, मेरी बंद आँखों में
तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे


मैं जब भी उसके ख्यालों में खो सा जाता हूँ
वो खुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे


दबा के आई है सीने में कौन सी आहें
कुछ आज रंग तेरा सांवला लगे है मुझे


जांनिसार साहब ने अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी के साथ उसकी दोस्ती में गर्क कर दिए. वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे वो ही साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए उनमें और उनकी शायरी में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ. उसके बाद उन्होंने जो लिखा उस से उर्दू शायरी के हुस्न में कई गुणा ईजाफा हुआ.

जब शाख कोई हाथ लगाते ही चमन में
शर्माए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बलखाये तो लगता है कि तुम हो


इस किताब की भूमिका में निदा फ़ाज़ली साहब ने जां निसार अख्तर के कई अनछुए पहलू पाठकों के सामने बड़े दिलचस्प अंदाज़ में रखें हैं. हमें अख्तर साहब की शायरी और उनकी शख्सियत के अलग अलग रंग देखने को मिलते हैं. निदा फ़ाज़ली लिखते हैं: "जाँ निसार ने अपने ख़त में लिखा है 'आदमी जिस्म से नहीं दिलो दिमाग से बूढा होता है ' वे वास्तव में आखरी दिन तक जवान रहे. वो नौजवानों की तरह रात में देर तक चलने वाली महफ़िलों और बाहर के मुशायरों में अपने आपको खर्च करते रहे."

और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह


और तो मुझको मिला क्या मेरी महनत का सिला
चन्द सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों की तरह




अख्तर साहब ने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से सन 1935-36 में उर्दू में गोल्ड मेडल ले कर एम ऐ किया था. 1947 के देश विभाजन के पहले तक ग्वालिअर के विक्टोरिया कालेज में उर्दू के प्रोफ़ेसर रहे और फिर सन 1950 तक भोपाल के हमीदिया कालेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे. 'साफिया' जो जावेद अख्तर साहब की अम्मी हैं,से उनका निकाह सन 1943 में हुआ. 'साफिया' उस दौर के सबसे रोमांटिक शायर 'मजाज़' लखनवी की बहन थीं. दोनों हमीदिया कालेज में पढ़ाने लगे और प्रोग्रेसिव राइटर मूवमेंट से जुड़ गए. अख्तर साहब को उस मूवमेंट का प्रेसिडेंट बनाया गया जो उस वक्त की सरकार को गवारा नहीं हुआ. इसके चलते उन्हें भोपाल में ही अपना घर बार छोड़ मुंबई की शरण लेनी पड़ी, जहाँ वो साहिर के साथ जुड़ गए. साफिया दो बच्चों जावेद और सलमान के साथ भोपाल में ही रहीं. उस दौरान में साफिया के अख्तर साहब को लिखे पत्रों पर एक किताब 'तुम्हारे नाम'हिंदी में, अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है, जो साहित्य का अनमोल हीरा है. एक पत्नी द्वारा अपने पति को लिखे निजी पत्र भी किस कदर ऊंचे दर्जे के साहित्यिक हो सकते हैं ये इस किताब को पढ़ कर ही जाना जा सकता है. मात्र 150/- रु.की ये किताब राजकमल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुई है.

आये क्या क्या याद नज़र जब पड़ती उन दालानों पर
उसका काग़ज़ चिपका देना, घर के रौशनदानों पर

सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया
जाने किस का नाम खुदा था, पीतल के गुलदानों पर

आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मेरे रख देती हो
चलते चलते रुक जाता हूँ, साड़ी की दूकानों पर


इस किताब में अख्तर साहब की सिर्फ इकतीस ग़ज़लें ही हैं लेकिन इसके अलावा नज्में ,रुबाइयाँ, और फ़िल्मी गीत भी संकलित किये हुए हैं. साफिया की असमय केंसर से हुई मृत्यु पर उनकी कालजयी नज़्म 'खाके दिल' भी आप इसमें पढ़ सकते हैं और बिलकुल अलग लहजे में लिखी कमाल की रुबाइयाँ {'घर आँगन' के शीर्षक से} भी. ये रुबाइयाँ पति पत्नी के प्रेम और उनके बीच की छोटी छोटी बातों को लाजवाब ढंग से प्रस्तुत करती हैं. बानगी के तौर पर कुछ रुबाइयाँ पढवाता हूँ:--

आहट मेरे क़दमों की सुन पाई है
इक बिजली सी तनबन में लहराई है
दौड़ी है हरेक बात की सुध बिसरा के
रोटी जलती तवे पर छोड़ आई है

***

डाली की तरह चाल लचक उठती है
खुशबू हर इक सांस छलक उठती है
जूड़े में जो वो फूल लगा देते हैं
अन्दर से मेरी रूह महक उठती है

***

हर एक घडी शाक (कठिन) गुज़रती होगी
सौ तरह के वहम करके मरती होगी
घर जाने की जल्दी तो नहीं मुझको मगर
वो चाय पर इंतज़ार करती होगी

***

रहता है अज़ब हाल मेरा उनके साथ
लड़ते हुए अपने से गुज़र जाती है रात
कहती हूँ इतना न सताओ मुझको
डरती हूँ कहीं मान न जायें मेरी बात

***

इक रूप नया आप में पाती हूँ सखी
अपने को बदलती नज़र आती हूँ सखी
खुद मुझको मेरे हाथ हंसी लगते हैं
बच्चे का जो पालना हिलाती हूँ सखी

***

शुक्रिया अदा कीजिये 'वाणी प्रकाशन' दिल्ली वालों का जिन्होंने इस पुस्तक को प्रकाशित कर हम पाठकों के सामने अख्तर साहब का रूमानी संसार खोल दिया. अब ये आप पर है की आप उस संसार से रूबरू होते हैं या नहीं.

सन 1976 में साहित्य अकादमी पुरूस्कार से नवाज़े गए अख्तर साहब के लिखे फिल्म अनारकली, नूरी ,प्रेम पर्वत, शंकर हुसैन, रज़िया सुलतान, बहु बेगम, बाप रे बाप, छूमंतर, सुशीला, सी.आई.डी. आदि फिल्म के गीतों ने धूम मचा दी थी. उनके गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में घर किये हुए हैं जैसे ..." लेके पहला पहला प्यार....", आजा रे...नूरी...नूरी ", ये दिल और उनकी निगाहों के साए..."पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे..." गरीब जान के..."आ जाने वफ़ा आ..." बेमुरव्वत बेवफा बेगाना ऐ दिल आप हैं...."आदि.

चलते चलते सुनते हैं उनका लिखा ये गीत जो यकीनन आपका मन मोह लेगा....



हमने तो आपको गीत संगीत सुनवा दिए, अब इस किताब को खरीदने का आपका क्या इरादा है, ये आप जानें, खरीद लेंगे तो आनंद में डूबेंगे नहीं तो आप की मर्ज़ी हम तो अब अपना सबसे पसंद दीदा काम करने निकलते हैं याने ढूँढ़ते हैं आपके लिए एक और किताब... फिर मिलेंगे.

30 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जाँनिसार अख्तर से मिल कर अच्छा लगा!

नीरज जाट जी said...

पोस्ट भी बढिया, जां निसार साहब भी ठीक हैं,
लेकिन किताब को खरीदने का इरादा नहीं है।
आप तो जी जानते ही हो क्यों।

संजय भास्कर said...

........ प्रशंसनीय रचना - बधाई

संजय भास्कर said...

जाँनिसार अख्तर से मिल कर अच्छा लगा!

सतपाल ख़याल said...

और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह

bahut shukria Neeraj Bhai yih mehfileN aisee hi sajtee raheN. Sahir saab ke yahan Nida saab bhi rahe the aur Nida saab ko aage laane me saahir saab ka yogdaan hai lekin kahte hain ki ek din Nida saab ne unke saamne Firaq saab ke she'r ki taariif kar dii to Saahir ne usii vaqt unheN ghar se nikal dia tha, so kya kahen!!

khair sahir, nida aur jaanisar saab shayiree ki piller haiN.

PRAN said...

NEERAJ JEE,
HANS KEE TARAH MOTI CHUN-
CHUN KAR AAP JO SHAAYRON AUR KAVIYON KEE RACHNAAON KO PAATHKON
KE SAAMNE RAKH RAHE HAIN,BAHUT HEE
SRAHNIY HAI.AAPKAA YAH NAYAA ROOP
KHOOB HAI! JAN NISAR AKHTAR EK BADE
SHAAYAR THE .GHARELOO JEEWAN PAR
UNKAA LIKHA MUKTAK SANGARAH " GHAR
AANGAN " EK AMOOLYA KRITI HAI.
ACHCHHE LEKH KE LIYE AAPKO
BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.

singhsdm said...

अख्तर का साहब जैसे शायर को याद करने का शुक्रिया......तफसील से उनके बारे में बताने का दिली शुक्रिया......कई किस्से उनके पढ़ते रहे हैं उनके बारे में उनकी हस्ती के बारे में जो भी कहा जाए कम......

R.Venukumar said...

नीरज भाई !
जां निसार अख्तर साहब पर हम भी जां निसार करते हैं गो कि अख्तर नहीं हैं।
आप एक बहुत ही बढिया श्रृंखला निकाल रहे हैं । आपका धन्यवाद। जां निसार साहब पर इस आलेख को पढ़कर बहुत सुकून मिला। हां साहिर साहब के बारे बहुत कुछ ऐसा पढ़ा हे। जो खराब लगता है पर क्या करें । साहित्य में रचनाधर्मिता भी कोई चीज है।
एक साथ बहुत से लोग याद आए। अध्यक्षता कर रहे कैफी आजमी साहब.. शबाना जी शौकत आजमी जी, जावेद अख्तर साहब..कला की एक अनूठी प्रतिबद्ध पीढियां और परिवार कुल.....

Udan Tashtari said...

बेहतरीन किताब से परिचय कराया. इसे मंगवाता हूँ. एक से एक गीत और नज़्में हैं जाँ निसार साहेब की.

आपका आभार!!

और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह

रंजन said...

बहुत आभार.. एक पूरी लिस्ट तैयार कर रहा हूं.. सब खरीद लूंगा...

seema gupta said...

जाँ निसार साहेब जी की इस अनुपम पुस्तक से परिचय करने का आभार.....
आहट मेरे क़दमों की सुन पाई है
इक बिजली सी तनबन में लहराई है
दौड़ी है हरेक बात की सुध बिसरा के
रोटी जलती तवे पर छोड़ आई है

regards

तिलक राज कपूर said...

जॉंनिसार अख्‍़तर साहब, उस पीढ़ी में भी उन कुछ चुनिंदा शाइरों में से रहे हैं जो बोलें तो नज्‍़म बन जाये फिर जब वो शेर कहें तो क्‍या आलम रहता होगा उसकी गवाह है ये पुस्‍तक। अच्‍छा शाइर बनने के लिये अच्‍छे शाइर को पढ़ना कितना जरूरी है यह आपकी प्रस्‍तुति को पढ़कर समझ आता है। शेर कह देने में और शेर कहने में कितना अंतर होता है।
खुदा गवाह है ऑंसू निकल पड़े ये पढ़ते पढ़ते कि:
आये क्या क्या याद, नज़र जब पड़ती उन दालानों पर
उसका काग़ज़ चिपका देना, घर के रौशनदानों पर

सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया
जाने किस का नाम खुदा था, पीतल के गुलदानों पर

आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मेरे रख देती हो
चलते चलते रुक जाता हूँ, साड़ी की दूकानों पर

बेचैन आत्मा said...

किताब तो खरीद लेंगे देखें पढ़ कब पाते हैं..
...उम्दा पोस्ट.

Manish Kumar said...

shukriya Janisaar sahab ki zindagi aur shayri se jude in pahluon ko sajha karne ke liye.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

सुन्दर लगा , अख्तर साहब के बारे में जान कर ..
पोस्ट पढ़ते हुए ' ऐ दिले-नादाँ आरजू क्या है , जुस्तजू क्या है '' की
बहुत याद आई !
आपके द्वारा किताबों और शायरों का परिचय दिया जाना काबिले-तारीफ़ है ! आभार !

योगेन्द्र मौदगिल said...

Bhai ji, behtreen prastuti,,,, har baar ki tarah... 'Jannisar saheb' ko padna sobhagya ki baat hai..

राज भाटिय़ा said...

आप की पोस्ट हमेशा की तरह बहुत खुबसुरत.
धन्यवाद

मो सम कौन ? said...

नीरज साहब,
मुझे तो अख्तर साहिब का नाम ही बड़ा जबरदस्त लगता रहा है शुरू से ही। ’जांनिसार अख्तर।’
पुस्तक परिचय करवाने के लिये आभार।

सुलभ § सतरंगी said...

एक ख़ूबसूरत शायर उनकी ख़ूबसूरत शायरी पर लिखी एक ख़ूबसूरत पोस्ट है आपकी.

सुलभ § सतरंगी said...

जॉंनिसार अख्‍़तर साहब की शायरी में कितने अतरंग शब्द होते हुए भी जमाने भर का अनुभव है.

आये क्या क्या याद नज़र जब पड़ती उन दालानों पर
उसका काग़ज़ चिपका देना, घर के रौशनदानों पर

एक शे'र अर्ज करता हूँ उनकी शान में,

अख्तर तेरे नज्म ने मुझको रुलाएं हैं
गहरे समंदर से मोती निकल आएं हैं

- सुलभ

Shiv said...

शानदार पोस्ट!

जां-निशार अख्तर साहब शायरी अद्भुत है. फिल्मों के लिए भी उन्होंने एक से बढ़कर एक गाने लिखे. यहाँ जो दो गाने हैं, मेरे बहुत फेवरिट हैं.

किताबों वाली श्रृंखला ब्लॉग-जगत की धरोहर हो गई है.

अंकित "सफ़र" said...

जाँनिसार अख्तर साहेब के शेर बोल रहे हैं और कुछ कहने कि ज़रुरत नहीं है.
किताबों कि दुनिया बिखरे हुए मोतियों को एक खूबसूरत हार में पिरो रही है
बधाई नीरज जी

डॉ टी एस दराल said...

जां निसार अख्तर साहब का परिचय पाकर आनंद आ गया . दोनों गीत तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई .

आपका प्रस्तुतीकरण भी बढ़िया रहा . आभार .

दिगम्बर नासवा said...

Vaah Neeraj ji ... Aaj to bas bahaar hi aa gayi hai ... Janisaar Akhtar ke kalaam/geet sunte huve hi bade huve hain ham aur aaj aapne fir se unki yaadon ko khoobsoorat daali mein saja kar taaza kar diya hai ... har sher chun chun kar uthaaya hai aapne ... hamesha ki tarah aapki kitaabon ki sameeksha ka diwaana hun main ..

दीपक 'मशाल' said...

आदरणीय नीरज सर, बहुत आभारी हूँ आपका जो आपने श्री जाँ निसार अख्तर साहब के बारे में इतनी जानकारी दी. मुझे थोड़ा तो पता था कि ये श्री जावेद साब के पिताजी हैं पर इतनी ज्यादा जानकारी नहीं थी.. राजकमल और वाणी प्रकाशन का भी आभार.. गीत बहुत ही कर्णप्रिय लगे.
aur haan aap wada bhool gaye.. :)

सर्वत एम० said...

आ तो गया, लिखूं क्या? मैं सिर्फ उस अज़ीम शख्सियत को सलाम करता हूँ जो अपने बारे में खामोश है, दूसरों के कसीदों के लिए ही उसकी जबान खुलती है. आप नेकियाँ कमा रहे हैं.
मरहूम जांनिसार अख्तर का एक शेर याद आ गया:
ये इल्म का सौदा, ये किताबें, ये रिसाले
इक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं.
आपके साथ ऐसा ही कुछ तो नहीं!!!

गौतम राजरिशी said...

आज सुबह से नीरजमय हो रखा हूँ। इस किताब पर अपनी भी मिल्कियत है। जानिसार साब की ग़ज़लें तो खैर बेमिसाल हैं, लेकिन उनकी रूबाइयां मुझे तनिक जंची नहीं....

माधव said...

प्रशंसनीय रचना - बधाई

MUFLIS said...

जाँ निसार अख्तर साहब के बारे में बड़ी उम्दा
और तफ़सील से जानकारी दी है आपने... शुक्रिया
और लता जी की आवाज़ में दो खूबसूरत गीत सुन कर
बहुत सुकून हासिल हुआ .

आनंद कुमार द्विवेदी said...

वाह सर वाह ! काश और लिखते ..पढ़ने से मन ही नहीं भर रहा था ! बहुत जिज्ञासा हो गयी है दोनों पुस्तक माँगा कर पढता हूँ वाणी वाली और राजकमल वाली दोनों !