Monday, February 23, 2009

किताबों की दुनिया - 6

कुछ एक दिन में ग़ज़ल से लड़ा ही ली आँखें
तमाम उम्र तेरा इन्तज़ार क्या करते

मुझे युवा रचनाकारों की रचनाएँ पढने में विशेष आनंद आता है. युवा लेखक ज़िन्दगी की हमारी परंपरागत सोच को नए आयाम देते हैं. येही कारण था जिसने मुझे जयपुर के पुस्तक मेले में प्रदर्शित "तुफैल चतुर्वेदी" जी की पुस्तक "सारे वरक तुम्हारे" को खरीदने के लिए प्रेरित किया.



'तुफैल चतुर्वेदी' मेरे पसंदीदा शायर जनाब "कृष्ण बिहारी नूर" साहेब के चहेते शागिर्द रहे हैं. 'नूर' साहेब उनके बारे में फरमाते हैं की " शायरी की डगर पर जिस कदर तेज रफ्तारी से 'तुफैल' चलें हैं दूसरा चलता तो या तो लड़खड़ा कर गिर जाता या संभालना मुहाल होता. 'तुफैल' को मैंने अपने तमाम शागिर्दों से जियादा वक्त दिया, सबसे जियादा कलाम दुरुस्त किया और सबसे जियादा चाहा भी"

नूर साहेब की इस बात से आप भी 'तुफैल' साहेब का कलाम पढ़ कर सहमत हो जायेंगे. अब आप ही बताईये की किसी का कोई चहेता अगर इस तरह के लाजवाब शेर कहे तो क्या उसका सर फक्र से ऊंचा नहीं हो जाएगा ?

आईने में अपनी सूरत भी न पहचानी गयी
आंसुओं ने आँख का हर अक्स धुंधला कर दिया

उसके वादे के इवज़* दे डाली अपनी ज़िन्दगी
एक सस्ती शय का ऊंचे भाव सौदा कर दिया
इवज़* = बदले में

था तो नामुमकिन तेरे बिन मेरी साँसों का सफर
फ़िर भी जिंदा हूँ मैंने तेरा कहना कर दिया

विनय कृष्ण चतुर्वेदी उर्फ़ 'तुफैल चतुर्वेदी' अपने बारे में कहते हैं की उनका वतन पहले काशीपुर था अब सारी दुनिया है और निवास किला-काशीपुर जिला नैनी ताल में है. आप सिर्फ़ और सिर्फ़ शायरी करते हैं. नैनीताल की हवा सी ताजगी आप उनकी हर ग़ज़ल में महसूस कर सकते हैं, जैसे मिसाल के तौर पर उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर देखें:

कोई वादा न देंगे दान में क्या
झूठ तक अब नहीं ज़बान में क्या

क्यों झिझकता है बात कहने में
झूठ है कुछ तेरे बयान में क्या

रात दिन सुनता हूँ तेरी आहट
नक्स* पैदा हुआ है कान में क्या 
नक्स*= दोष

शायर की खूबी ये होती है की वो रोजमर्रा के हालात को अपनी नज़र से आंक कर उसे अपने शेरों में ढालता है.अब बरसों से हम सब की ज़िन्दगी में, दुनिया में, वोही सब कुछ होता आया है जो अब हो रहा है, लेकिन उसी होने को एक नए अंदाज़ से पेश करने का ढंग ही हर शायर को दूसरे से अलग करता है. मैं अपनी बात की सच्चाई 'तुफैल' साहेब की ग़ज़ल के इन शेरों से सिद्ध करना चाहूँगा:

इसी लिए तो कुचलती है रात दिन दुनिया
हम अपना हक भी बड़ी आजिजी* से मांगते हैं
आजिजी*= विनम्र भाव

बहुत संभल के फकीरों से तव्सरा* करना
ये लोग पानी भी सूखी नदी से मांगते हैं
तव्सरा*= चर्चा

कभी ज़माना था उसकी तलब में रहते थे
और अब ये हाल है ख़ुद को उसी से मांगते हैं 

युवाओं वाले तेवर आपको उनकी इस किताब में एक जगह नहीं हर पन्ने पर बिखरे नजर आ जायेंगे. मुझे लगता है जब वो मुशायरों में अपने ये शेर सुनाते होंगे तो सुनने वाले ख़ुद बा ख़ुद ताली बजाने को मजबूर हो जाते होंगे:

बाज़ारे-फ़न में फ़न की न थी कद्र कुछ मगर 
लफ्जों की धूप छाँव का धंधा नहीं किया

शोहरत के बावजूद रहे हम ज़मीन पर
हम हैं, हमें उजालों ने अँधा नहीं किया

अब भी उसी की याद थपकती है मेरे ख्वाब
उसने बिछुड़ के भी मुझे तन्हा नहीं किया 

यूँ तो इस किताब में प्रकाशित सब ग़ज़लें एक से बढ़ कर एक हैं लेकिन मुझे एक ग़ज़ल के ये दो शेर बहुत पसंद आए, सोचता हूँ आपको भी सुनाता चलूँ:

हम बुजुर्गों की रिवायत से जुड़े हैं भाई
नेकियाँ करके कभी फल नहीं माँगा करते

आज के दौर से उम्मीदे-वफ़ा, होश में हो
यार अंधों से तो काजल नहीं माँगा करते

'तुफैल' साहेब ने इस किताब को 'उन आसुओं के नाम जो इस किताब में आने से रह गए' किया है, आप इस किताब को ' नेशनल पब्लिशिंग हाउस, २३ दरियागंज, नई दिल्ली -११०००२ से ' प्राप्त कर सकते हैं. किताब का मूल्य है पचास रुपए मात्र. इस से पहले की आप से अगली पुस्तक की जानकारी देने तक नमस्कार किया जाए, छोटी बहर की एक ग़ज़ल के ये बेहतरीन शेर पढिये और तुफैल साहेब को दिल ही दिल में दाद दीजिये....

फकीरी में भी खुद्दारी बचा ली
हमारा नाम सुल्तानों में रखना

मिरे जख्मों की आराइश* से सीखो
सजा कर फूल गुलदानों में रखना
आराइश*= सज्जा, सजाना

सहेली पढ़ ही लेगी नाम मेरा
तुम अपने हाथ दस्तानों में रखना

अगली पोस्ट में एक धमाके दार खुशखबरी की सूचना आप सब को मिलने वाली है.....थोड़ा सा इंतज़ार करें....बस.

28 comments:

"अर्श" said...

tufail sahab ke baare me jaankari dene ke liye bahot bahot shukriya aapko sahab ... daryaganj... ke book publishers ka no. dedete to ehsaan hota aapka .... main ye kitab zarur leke aaunga ...
dhero aabhar aapka sahab...


arsh

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बहुत शुक्रिया इतनी बढ़िया किताब के बारे में जानकारी देने के लिए नीरज जी

अब भी उसी की याद थपकती है मेरे ख्वाब
उसने बिछुड़ के भी मुझे तन्हा नहीं किया

बहुत खूब कहा है तुफैल' साहेब ने

विनय said...

तुफ़ैल साहब की किताब के तो हम दीवाने हैं उनकी मैग्ज़ीन 'लफ़्ज़' तो हर तीसरे माह पढ़ते हैं, बड़ी नायाब मैग़ज़ीन है!

दिगम्बर नासवा said...

एक और खूबसूरत खजाना ले कर आए हैं नीरज जी आप. आज तुफैल जी की साथ इतनी खूबसूरत ग़ज़ल और बेहतरीन शेर आपने संजोय है, की बार बार पढने को मन करता है. आपकी व्याख्या आधा परिचय तो करा ही देती है, वाकई आप भी उतने ही बेहतरीन फनकार है जितने तुफैल जी. आपके पसंदीदा शेरों से दुबारा चुनु ऐसे जुर्रत रखनी ठीक नही पर क्या करू मजबूर हूँ अपनी पसंद तो देनी ही है. बस २ शेर इस लिए कहीं आपकी मेल पूरी की पूरी न उतार दूँ

उसके वादे के इवज़* दे डाली अपनी ज़िन्दगी
एक सस्ती शय का ऊंचे भाव सौदा कर दिया

बहुत संभल के फकीरों से तव्सरा* करना
ये लोग पानी भी सूखी नदी से मांगते हैं

आप क्या खुशखबरी देने वाले हैं जल्दी बता देन, इंतज़ार हमारे बस की नही,

सुशील कुमार छौक्कर said...

सच नीरज जी आपकी किताबों की दुनिया बहुत सुन्दर है। हर शेर शानदार है तुफ़ैल जी का। पर

इसी लिए तो कुचलती है रात दिन दुनिया
हम अपना हक भी बड़ी आजिजी* से मांगते हैं

दिल के करीब ज्यादा लगा।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत धन्यवाद जी आपको इस जानकारी के लिये.

रामराम.

Vijay Kumar Sappatti said...

neeraj ji ,

aapka ye kitaabo ka shauk jo hai , ek din mujhe aapke ghar par daaka maarne par mazboor kar denga ..\

itni acchi kitaabe aap dhoondh kahan se lete hai ..


इसी लिए तो कुचलती है रात दिन दुनिया
हम अपना हक भी बड़ी आजिजी* से मांगते हैं

This is ultimate.

Bahut sadhoowad..

hem pandey said...

तुफैल साहेब के उम्दा शेरों से रूबरू कराने के लिए धन्यवाद.

Udan Tashtari said...

आभार इस बेहतरीन समीक्षा के लिए. लगता है यह पुस्तक ढ़ूंढ़ना पड़ेगी अब.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

फकीरी में भी खुद्दारी बचा ली
हमारा नाम सुल्तानों में रखना
बहुत खूब .

गौतम राजरिशी said...

नीरज जी को प्रणाम....आप कितना बड़ा उपकार कर रहे हैं हम याचकों पर खुद आपको भी नहीं मालूम होगा...
तुफ़ैल जी के हम भी बड़े पुराने फ़ैन हैं। उनसे बात भी होते रहती हैं। उनकी पत्रिका ’लफ़्ज़’ अपने आप में व्यंग्य और गज़ल की दुनिया में मिसाल कायम कर रही है।
आपका शुक्रिया फिर से....

राज भाटिय़ा said...

सहेली पढ़ ही लेगी नाम मेरा

तुम अपने हाथ दस्तानों में रखना
वाह क्या बात है, ओर धन्यवाद इस सुंदर जानकारी के लिये.

गर्दूं-गाफिल said...

बहुत संभल के फकीरों से तव्सरा* करना

ये लोग पानी भी सूखी नदी से मांगते हैं

khngalne wale ko khjane ki khbar hoti hai.
ghre whi utrta hai jiski moti pe nzr hoti hai.taire hwa me bahut din fir jamin pr utr aaye.
duniya e kitab se duniya me nye sukhn ki kdr hoti hai.

गर्दूं-गाफिल said...

bahut khoob hai kitabo ki duniya.ia sone me suhaga aapka andaze bayan

mehek said...

आईने में अपनी सूरत भी न पहचानी गयी

आंसुओं ने आँख का हर अक्स धुंधला कर दिया

waah bahut badhiya,ek aur gazalkaar se rubaru karwane ka shukran,sach ek hi sher copy kiya,kahi puri post copy karke tariff na kar de,behad lajawaab hai saare ke saare.

गर्दूं-गाफिल said...

khangalne wale ko khzane ki khbr hoti hai.

अल्पना वर्मा said...

khazane se moti nikal rahey hain ..

मिरे जख्मों की आराइश से सीखो

सजा कर फूल गुलदानों में रखना

bahut hi umda!
shukriya in se parichay ke liye


महाशिवरात्रि की शुभकामनायें.

seema gupta said...

तुफैल चतुर्वेदी" जी की पुस्तक "सारे वरक तुम्हारे"
रात दिन सुनता हूँ तेरी आहट
नक्स* पैदा हुआ है कान में क्या
नक्स*= दोष
का ये शेर न जाने कितनी आहटे मन में पैदा कर गया..... सच ही तो बयाँ किया है.......अक्सर होता है ऐसा......तब समझ नही आता क्यूँ हुआ......आप के द्वारा इतनी बहतरीन पुस्तको और लेखको की जानकारी मिल रही है की दिल करता हर किताब को पढा जाए.....आभार आपका..

Regards

swati said...

bahut hi gyanvardhak aur achhhi sameeksha neeraj bhaiya.....khushkhabri ki bhi prateeksha men.....swati

Hari Joshi said...

तूफैल साहब की शायरी से परिचय कराने के लिए आपका आभार।

प्रीति टेलर said...

ab to apki har agali postka intzaar rahta hai...
bahut khub sahitya ka parichay karate hai aap

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

अच्छा जखीरा है आपके पास अच्छी पुस्तकों का नीरज जी। पढ़ कर अच्छा लगा।

राजीव करूणानिधि said...

आपकी हर आलेख पहले से ज्यादा खूबसूरत और मजेदार होता है. मै आपका कायल हूँ. खूबसूरत शायरी शेयर करने के लिए आपको तहेदिल आभार.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बेहतरीन.....बस
और क्या कहें ?
===============
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

डॉ .अनुराग said...

धमाकेदार खुसखबरी ?किताबो की दुनिया से आकर हम इस जगह अटक गए है ..हमारी मिष्टी को स्नेह देना ....

poemsnpuja said...

एक से एक शेर पढ़वाए हैं आपने, बहुत ही अच्छे लगे. बहुत बहुत शुक्रिया. किताब तो कभी दिल्ली गयी तो पक्का ढूंढ के खरीदूंगी.

Kamlesh Pandey said...

एक अजीम इंसान,हरदिल-अजीज़ मेरे बड़े भाई तुफैल साहब के बारे में आपका आलेख और उसमें उनकी चुनिन्दा गज़लें पढ़कर पिछले दस सालों के उनके सानिंध्य का दौर आँखों के आगे तैर गया. अपनी ग़ज़लों और 'लफ्ज़' के माध्यम से उनका जो शानदार व्यक्तित्व दुनिया से रु-बी-रु होता है, वे निकट से भी वैसे ही हैं. आपने उन्हें सही ही युवा शायर कहा है, पर "हम बुजुर्गों की रिवायत से जुड़े हैं भाई
नेकियाँ करके कभी फल नहीं माँगा करते" वाला मिजाज़ भी अपने दोस्तों और अनुजों के लिए भरपूर प्यार के साथ रखते आये हैं. नीरज भाई मेरी ओर से एक बड़ा सा शुक्रिया कुबूल करें.

vedandquraan said...

नीरज जी, सादर प्रणाम, आदाब
सबसे पहले मैं आपका आभारी हूँ की मेरे एक निवेदन पर आपने इतनी बेहतरीन किताबें मुझे इनायत की जिनकी तारीफ़ करना सूरज को दिया दिखाने के बिलमुक़ाबिल है वो भी इतनी तीव्र गति से की मुझे यकीन नहीं हुआ. मैं उर्दू हिन्दी और अंग्रेजी अदब का छात्र हूँ पेशे से उर्दू वरिष्ठ अध्यापक हूँ. खाकसार की उर्दू में ६ किताबें पब्लिश हो चुकी हैं सभी बेस्ट सेलर रहीं अल्हम्दुलिल्लाह. एक किताब हिन्दी में चल रही है " प्रभावी अध्ययन की तकनीकें". मुझे कभी कोई एक विषय बाँध नहीं पाया मेरी इच्छा होती है हर विधा को सीखूं,सब में हाथ आजमाऊँ. शायरी का शौक भी महज एक हफ्ते पुराना है. १५-२० गजलें कहीं हैं. वालिदे मुह्तरम शायर हैं और कभी कभी डरते डरते उनसे इस्लाह लेता हूँ. वैसे इंटरनेट गुरु जिंदाबाद !
मेरे भी ब्लॉग हैं एक ब्लॉग akmal-articles.blogspot.com है जिस पर आर्टिकल्स और कलाम (अगर हुनर मंद हजरात उसे इस काबिल समझें तो) पब्लिश करता हूँ.
बात सीधी सीधी करने की आदत है सो कह देता हूँ बकौल आपके
नीरज सुलझाना सीखो
मुद्दों को उलझाना क्या
आज का एक शेर पेश करके इजाजत लेता हूँ
ग़म-ए-फ़िराक से उबरने की न थी उम्मीद मुझे
गुज़रते वक्त ने मरहम सा मगर काम किया
अकमल नईम अकमल
एक बार पुन: धन्यवाद की आपने मुझे अपनी अनमोल किताबों के काबिल समझा .