Monday, July 6, 2009

किताबों की दुनिया - 13

(आज गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व के पूर्व दिवस पर मैं अपनी पोस्ट समर्पित करता हूँ अपने परम आदरणीय गुरुजनों श्री प्राण शर्माजी, श्री पंकज सुबीर जी और श्री देवेन्द्र द्विज जी को ,जिनसे मुझे अभी तक रूबरू मिलने का सौभाग्य नहीं मिला लेकिन जिनकी अमृत वाणी और शब्दों का संबल हमेशा मिला है. आज मैं जो कुछ भी कहने का साहस कर पाता हूँ ये सब उन्हीं की बदौलत है.इश्वर से प्रार्थना करता हूँ की उनका आशीर्वाद सदा मुझ पर यूँ ही बना रहे.)

*****

मुसलसल* हादसे, टूटन, घुटन, खामोश पछतावे
मैं अपनी पुरखुलुसी** की बड़ी कीमत चुकाता हूँ
मुसलसल*=लगातार
पुरखुलुसी**=सच्चाई से भरा व्यवहार

निहायत सादगी, बेहद शराफत, गहरी हमदर्दी
ये डसते हैं मुझे अक्सर, मैं अक्सर तिलमिलाता हूँ

मैं बहुत उलझन में था, इस किताब को ना जाने कितनी बार हाथ में लिया पढ़ा और रख दिया. समझ ही नहीं आ रहा था की क्या करूँ. आप ही बताईये जिस किताब की हर ग़ज़ल बेहतरीन हो उसमें से कौनसी छोडूँ कौनसी रक्खूं ये तय करना कितना मुश्किल काम है. एक ग़ज़ल चुनता तो दूसरी कहती "हम से का भूल हुई जो ये सजा हम का मिली....". आखिर ये तय किया की आँख बंद कर के इस किताब के सफ़हे पलटूंगा और जो सफहा खुलेगा उस पर छपी ग़ज़ल में से ही एक आध शेर चुन लूँगा. नतीजा आपके सामने है.

मैं जिस किताब का जिक्र कर रहा हूँ उसका नाम है "नका़ब का मौसम" और शायर हैं जनाब "योगेन्द्र दत्त शर्मा" जी



योगेन्द्र जी की शायरी खूबसूरत लफ्जों में हम सब की दास्तान ही कहती है, कभी प्यार से दुलार से तो कभी फटकार से. अपने शेरों से वो हमें चौंकाते भी हैं और हर्षित भी कर जाते हैं, शब्द प्रयोग की एक बानगी देखिये...

हम जुड़े,पर अवान्छितों की तरह
पाए वरदान शापितों की तरह

हम उपेक्षित हैं गो की सम्मानित
फ्रेम में हैं सुभाषितों की तरह

दिग्विजय की महानता ढोते
जी रहे हैं पराजितों की तरह

डस गए सांप की तरह सहसा
जो थे कल तक समर्पितों की तरह

कवि कथाकार के रूप में चर्चित और बहुत से सम्मानों से सम्मानित,श्री योगेन्द्र जी पिछले पैंतीस सालों से साहित्य साधना कर रहे हैं. आपके चार कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह और एक ग़ज़ल संग्रह छप कर प्रशंशा प्राप्त कर चुका है, उसी ग़ज़ल संग्रह की बात हम कर रहे हैं.

ग़ज़ल में हिंदी शब्दों का प्रयोग अब कोई नयी बात नहीं रह गयी है योगेन्द्र जी ने ग़ज़ल में शब्द यूँ पिरोये हैं की वे भरती के नहीं लगते बल्कि ये एहसास करवाते हैं की जो बात उस शेर में कही जा रही है उसे कहने के लिए वो ही शब्द बिलकुल सही है.

चांदनी, जंगल, मरुस्थल, भीड़, चौराहे, नदी
हर कहीं हिरनी बनी भटकी हुई है जिंदगी

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी

चुप्पियों के इस शहर में ऊंघती निस्तब्धता
छटपटाहट एक आहट की, हुई है जिंदगी

आप उनकी शायरी में जिंदगी जीने के हुनर ढूंढ सकते हैं. वो आपको सलाह भी देते हैं और आज के हालत पर सोचने को मजबूर भी करते हैं...बिना भारी बोझिल शब्दों का सहारा लिए उनके बात कहने का अंदाज़ मोह लेता है:

आ, कि अब मृतप्राय-से-इतिहास को जिन्दा करें
आदमियत के दबे एहसास को जिन्दा करें

सांस है तो आस है - कहते चले आए बुजुर्ग
चल, कि जीने, के लिए अब आस को जिन्दा करें

रेत में प्यासे हिरन को जिंदा रखता है सराब
वास्तविक चाहे न हो, आभास को जिन्दा करें

ऐसे मौसम में, जहाँ सच बोलना दुश्वार हो
मौन रहने के कठिन अभ्यास को जिन्दा करें

सब से खास बात इस किताब की ये है की इसमें कोई भूमिका नहीं है, किसी गणमान्य शायर या साहित्यकार की टिपण्णी नहीं है न ही किसी की शुभकामनाएं हैं. सीधी सादी इस किताब में आज का धड़कता वजूद है और वो भी अपने पूरे रंग में. आप ही बताईये जिस किताब की ग़ज़ल में ऐसे शेर हों उसे किसी सहारे या फिर आर्शीवाद की जरूरत पड़ेगी? धारदार सवाल हैं जो हमें, आप और हर संवेदन शील इंसान को व्यथित कर देते हैं :

हर तरफ अंधी सियासत है, बताओ क्या करें ?
रेहन में पूरी रियासत है , बताओ क्या करें?

झुंड पागल हाथियों का, रौंदता है शहर को
और अंकुश में महावत है, बताओ क्या करें?

जुल्म की दिलकश अदाएं, रेशमी रंगीनियाँ
गिड़गिड़ाती-सी बगावत है, बताओ क्या करें?

आँख में अंगार, मन में क्षोभ, साँसों में घुटन
ये बुजुर्गों की विरासत है, बताओ क्या करें?

बात कहने की उनकी इसी अनूठी विधा को अब जरा छोटी बहर में भी निहारें...और देखें की कम लफ्जों में कैसे असर पैदा किया जा सकता है:

सोच कर बोलता हूँ मैं सबसे
बात करने का अब मज़ा न रहा

हाय वो जुस्तजू , वो बेचैनी
बीच का अब वो फासला न रहा

अब चला है वो तोड़ने चुप्पी
जब कोई उसपे मुद्दआ न रहा

किताब घर प्रकाशन वालों ने मात्र पचास रुपये में, जिसे आप डिसकाउंट मांग कर पैंतालीस भी कर सकते हैं, शायरी की इस किताब को छाप कर हम पाठकों पर बहुत बड़ा उपकार किया है. "आर्य स्मृति साहित्य सम्मान" से सम्मानित इस ग़ज़ल संग्रह को प्रत्येक ग़ज़ल प्रेमी को पढना चाहिए. किताब के कवर पर छपी इस बात को नकारना इसे पढने के बाद असंभव है की: "इस संग्रह की ग़ज़लों में एक पूरम पूर जीवन की दमक और दिव्यता का काव्यांकन है तथा साथ ही गहन नियति के परिणाम स्वरुप धुंधलाते-बुझते असंख्य दीपो का खामोश क्रंदन भी, जो की जीवन की निजी और सार्वजनिक बोली है."

साथियों इस से पहले की मैं शायरी की अगली किताब खोजने चलूँ आपको योगेन्द्र जी की एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वाता हूँ इस उम्मीद से की इन्हें पढ़ कर शायद आप इस किताब को खरीदने से अपने आप को ना रोक पायें:

हर कदम पर एक कौमी गीत गाते जाइये
मुफलिसों की खाल का जूता बनाते जाइये

ज़िन्दगी की तल्ख़ कीमत हम चुकायेंगे मगर
आप इस तकलीफ का ज़ज्बा भुनाते जाइये

पीजिये रंगीन मौसम की महक वाला अरक
वक्त का कड़वा ज़हर हमको पिलाते जाइये

कामयाबी का है ये नुस्खा इसे मत भूलिए
आप जिस सीढ़ी चढ़े, उसको गिराते जाइये

जैसा मैंने शुरू में ही कहा था की इस किताब में से आपके लिए शेर छांटना मेरे लिए बहुत मुश्किल काम था फिर भी मैंने किया और ये मैं ही जानता हूँ की इस ईमानदार कोशिश के बावजूद, मैं आपको कितने ही और दूसरे खूबसूरत शेर नहीं पढ़वा पाया हूँ, उम्मीद है आप मेरी मजबूरी समझते हुए मुझे माफ़ करेंगे और योगेन्द्र जी के इन शेरों को हमेशा अपने साथ रख कर मेरा मन ही मन शुक्रिया भी अदा करेंगे.

जिन्हें सुने तो कोई बेनकाब हो जाये
किसी से भूलकर ऐसे सवाल मत करना

उसूल*, दोस्ती, ईमान, प्यार, सच्चाई
तुम अपनी ज़िन्दगी इनसे मुहाल** मत करना

उसूल* = सिद्धांत, मुहाल = कठिन

56 comments:

विवेक सिंह said...

वाह !

एक से बढ़कर एक !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

शुक्रिया एक और अच्छी किताब से वाकिफ करवाने का ...

sada said...

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी

आपने बिल्‍कुल सही कहा है हर शेर एक से बढ़कर एक है इतनी बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आपका आभार्

Murari Pareek said...

बिलकुल ही सही कहा ऐसे सुन्दर शब्दों मैं कोनसा छोडे कोनसा रखें तय करना एक बहुत ही मुश्किल काम है, मेरे एक मित्र हैं जो गजलों पर आधारित कार्य कर्म करते हैं | "शाम - ऐ - ग़ज़ल" वो शेर के साथ ही अपना इंट्रो शुरू करते हैं !! मैं तो ये अनमोल संग्रह लूंगा ही, और मित्र को भी भी बताउँगा, उसके प्रोग्राम मैं चांदों की भरमार हो जायेगी गजब समां बंधेगी!!

पंकज सुबीर said...

मिष्‍टी और इक्षु का साथ का फोटो देखकर सुखद लगा कैप्‍शन वाक्‍य कुछ और ठीक हो सकता था मसलन 'हम शायर तो नहीं, मगर उसकी धड़कनें हैं, या उसकी जिंदगी हैं, मिष्‍टी और इक्षु दोनों पर से राई नोन उतरवा दीजियेगा । आपने प्राण जी, मुझे और द्विज जी को जो स्‍नेह दिया है वो अभिभूत करने वाला है । ऐसे ही स्‍नेह जीवन में आगे बढ़ने का हौसला देता है । खपोली आने का प्रोग्राम बना रहा हूं । दरअसल में एक उपन्‍यास पूरा करना है औश्र उसके लिये पांच छ: दिनों के लिये कहीं छुट्टी पर जाना चाहता हूं यहां कि मसरूफियत में वो नहीं हो पा रहा है । तो उसके लिये अगस्‍त में खपौली ही बेहतर रहेगा । नकाब का मौसम के शेर विस्‍मय में डालने वाले हैं और मेरे जैसे हिंदी ग़ज़लों के दीवानों के लिये तो हम उपेक्षित हैं गो की सम्मानित
फ्रेम में हैं सुभाषितों की तरह

जैसे शेर आनंद देने वाले हैं । मिष्‍
टी और इक्षु को बहुत बहुत स्‍नेह ।

ताऊ रामपुरिया said...

मिष्‍टी और इक्षु साथ साथ आज बहुत प्यारे लग रहे हैं, आज नजर जरुर उतरवाना दोनों की. शायरी तो बस खुदा की नेमत है और आप इसे उसके प्रतिनिधि के बतौर बांट रहे हैं..बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको.

रामराम.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

उसूल*, दोस्ती, ईमान, प्यार, सच्चाई
तुम अपनी ज़िन्दगी इनसे मुहाल** मत करना

सच है इनकी कद्र ही कहाँ
यह शब्द तो सिर्फ किताबी हो गए

दिगम्बर नासवा said...

मिष्‍टी और इक्षु बहुत ही प्यारे लग रहे हैं, गुरु देव ने सच कहा है नज़र उतार देवें, नकाब का मौसम योगेन्द्र जी के खूबसोरत गज़लों और शेरों से भरा लाजवाब गुलदस्ता नज़र आ रहा है .............. और आपने छांट छांट कर जो मोती चुने हैं वो मजबूर करते हैं की किताब को अब अभी ही खरीद लिया जाए..........आपके अंदाज़ बहुत ही लाजवाब है नीरज जी, जितने लाजवाब शेर, उतनी ही आपकी व्याख्या ..........

ओम आर्य said...

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी

इन पंक्तियो मे जान भी चटक गई कई हिस्सो मे सोच

सोच कर बोलता हूँ मैं सबसे
बात करने का अब मज़ा न रहा ......


जिन्दगी से जला इंसान की ऐसी ही हालत होती है .......हर कदम

ओम आर्य said...

बहुत बहुत शुक्रिया जो आप इतने अच्छे शायर को लेकर आते है और हमे पढवाते .............मै इसके लिये तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ......

सतपाल said...

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी
Neeraj ji aise kitabeN sab ko kaise uplabhad hoN, iske baare me kuch socheN aur kareN.

‘नज़र’ said...

नायाब रच्नाएँ

---
चर्चा । Discuss INDIA

कंचन सिंह चौहान said...

आप जिन भी किताबों का जिक्र करते हैं, वे वाकई बहुत अच्छी होती है...! इस पुस्तक से भी उद्धृत हर शेर बहुत अच्छा है और पढ़ने की चाह बढ़ाता है।

Science Bloggers Association said...

किताबघर द्वारा पुरस्कृत यह पुस्तक एक लाजवाब गजल संग्रह है। इसकी समीक्षा पढकर अच्छा लगा।
एक सुझाव, यदि समीक्षा का शीर्षक पुस्तक के नाम से दें, तो शायद पाठक बढ जाएं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

डॉ .अनुराग said...

किताब पर टिपण्णी तो बाद में करूँगा नीरज जी.....पहले इन दोनों को एक काला टीका लगा दे.....

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगी आप की यह समीक्षा इस किताब पर ओर उस से सुंदर लगे यह दोनो मिष्‍टी और इक्षु जो दोनो कोने से झांक रहे है.
धन्यवाद

Prem Farrukhabadi said...

Neeraj bhai,
aapki sameeksha achchhi lagi.bhasha aur shaili badi pyari evam rochak lagi. badhai!

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी

M.A.Sharma "सेहर" said...

Neeraj ji is pustak se vagat karane ka bhai shukriya !!!



जिन्हें सुने तो कोई बेनकाब हो जाये
किसी से भूलकर ऐसे सवाल मत करना

lajavaab umda sher
dhanyavaad !!

Nirmla Kapila said...

बहुत बडिया जानकारी है एक से एक गज़ल बढ कर है बहुत बहुत बधाई और शुक्रिया
टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी
लाजवाब्

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इतने अच्छे शायर से मिलवाने के लिए,
धन्यवाद।

रश्मि प्रभा... said...

jawaab nahi.....ek se badhkar ek

सुशील कुमार छौक्कर said...

लगता है आपके पास किताबों का खजाना है।
सोच कर बोलता हूँ मैं सबसे
बात करने का अब मज़ा न रहा

सच्ची बात।

"अर्श" said...

आदरणीय नीरज जी ,
आपसे शिकायत है मुझे पिछली दो एक प्रकाशकों का न. आप उपलब्ध नहीं करा रहे है ... मगर कोई बात नहीं ये बात सिर्फ्फ़ आपको इत्तला के लिए कही है के अगर आगे से पता हो तो करदें मैं किताब घर वालों का पता धुंध रहा हूँ... अगर हो सके तो आप मेल करदें मगर.. इस नकाब का मौसम से जिस तरहसे आपने हमारा परिचय कराया है वो अद्भूत है साहिब... क्या कमाल की पारखी नज़र रखते है आप...वाकई शर्मा जीने जिस तरह से हिंदी शब्दों का प्रयोग अपने ग़ज़लों में किया है वो सच में भरती के नहीं लगते वल्कि ऐसा प्रतीत होता है के अगर ये शब्द ना होते तो ग़ज़ल कहना मुमकिन न था... आप इस तरह से कर्ज पे कर्ज चढा रहे है नीरज जी के क्या कहूँ मगर दिल मिष्टी और इक्षु को देख प्रसन्नचित हो गया ... बहोत बहोत बधाई शिब... मेरी शिकायत को अन्यथा ना लें बस मजाक कर रहा था ...


अर्श

Shiv Kumar Mishra said...

आपने इतने अच्छे रचनाकारों से मिलवाया, उसके लिए तो धन्यवाद है ही. इस कड़ी में योगेन्द्र दत्त जी की किताब के बारे में जानकर बहुत ख़ुशी हुई. अगर आप इस सीरीज को आगे न बढाते तो इतनी बढ़िया रचनाओं के बारे में पता ही नहीं चलता.

मिष्टी और इक्षु को एक साथ देखकर बहुत ख़ुशी हुई.

श्रद्धा जैन said...

Aap jab jab kitaabon ka ghar ki heading likhte hain man jhoom uthta hai ki phir ek nayi kitaab ka kazana khula hai
kaash ki ye sari kitaaben online hi mil jaati

aapse agli baar bharat aane par pakka milungi. aapse milne ki badi ichcha hai

रंजन said...

उसूल, दोस्ती, ईमान, प्यार, सच्चाई
तुम अपनी ज़िन्दगी इनसे मुहाल मत करना


बहुत सुन्दर. आभार इस पुस्तक के लिये...

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

धन्यवाद नीरज जी इस रिव्यू के लिये।

डॉ. मनोज मिश्र said...

vah-aaj fir ek behtreen post.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

श्र्द्धेय नीरज जी,
सादर प्रणाम,
सच कहूँ तो शब्द नहीं मिल रहे ऐसे रचनाकार की पुस्तक और उम्दा शेरों की तारीफ़ के लिये....जनाब "योगेन्द्र दत्त शर्मा" जी को मेरा प्रणाम कहियेगा..कुछ शेर मुझे बहुत बहुत बहुत पसन्द आये...जैसे-

"मुसलसल हादसे, टूटन, घुटन, खामोश पछतावे
मैं अपनी पुरखुलुसी की बड़ी कीमत चुकाता हूँ|

निहायत सादगी, बेहद शराफत, गहरी हमदर्दी,
ये डसते हैं मुझे अक्सर, मैं अक्सर तिलमिलाता हूँ

हम जुड़े,पर अवान्छितों की तरह|
पाए वरदान शापितों की तरह|

हम उपेक्षित हैं गो की सम्मानित,
फ्रेम में हैं सुभाषितों की तरह|

दिग्विजय की महानता ढोते,
जी रहे हैं पराजितों की तरह|

ऐसे मौसम में, जहाँ सच बोलना दुश्वार हो,
मौन रहने के कठिन अभ्यास को जिन्दा करें|

कामयाबी का है ये नुस्खा इसे मत भूलिए,
आप जिस सीढ़ी चढ़े, उसको गिराते जाइये|

जिन्हें सुने तो कोई बेनकाब हो जाये,
किसी से भूलकर ऐसे सवाल मत करना|

उसूल, दोस्ती, ईमान, प्यार, सच्चाई
तुम अपनी ज़िन्दगी इनसे मुहाल मत करना"

ये सिर्फ़ शेर नहीं हैं..जीवन की गहरी नदी में गोता लगाते किसी व्यक्ति द्वारा पाये गये अनमोल मोती हैं...इन्हें संभाल कर रखना होगा...क्योंकि अब इन मोतियों को योगेन्द्र दत्त शर्मा" जी ने हम सबको सौंप दिया है.....
नीरज जी,इस सूचना के लिये "आप बधाई के पात्र हैं", मैं ये नहीं कहूँगा क्योंकि ये आपका हमारे लिये फ़र्ज है....है न !..आखिर हम इतनी अच्छी जानकारी आप के बिना कहाँ से प्राप्त करेंगे......पुनः प्रणाम.....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पुस्तक की जानकारी के लिए धन्यवाद और गुरु पूर्णिमा और दलाई लामा के जन्म दिन की बधाई!

Suman said...

nice

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हिन्दी के शब्दों का प्रयोग कर इतनी उम्दा ग़ज़ल लिखी गयी है, यह जानकर मैं चमत्कृत हूँ। क्या कहूँ, अद्‌भुत है यह।

नीरज जी, आपको इस प्रस्तुति के लिए ढेरों बधाई और धन्यवाद।

Udan Tashtari said...

मुसलसल हादसे, टूटन, घुटन, खामोश पछतावे
मैं अपनी पुरखुलुसी की बड़ी कीमत चुकाता हूँ

निहायत सादगी, बेहद शराफत, गहरी हमदर्दी
ये डसते हैं मुझे अक्सर, मैं अक्सर तिलमिलाता हूँ


-ये तो हुई आपकी तस्वीर और इसी के साथ शर्मा जी की किताब की जिस अंदाज में समीक्षा की है कि अब जल्द ही पाना होगा उसे.

बहुत उम्दा!!

गौतम राजरिशी said...

नीरज जी किताब घर का पता चाहिये और अभी चाहिये....प्लीज! मेल करें...
प्लीज ! प्लीज !! प्लीज !!!

venus kesari said...

नीरज जी,
हर किताब को खरीद कर पढ़ पाना तो मुश्किल है मगर इसको जरूर खरीदूंगा
पुस्तक चर्चा के लिए धन्यवाद
वीनस केसरी

श्याम कोरी 'उदय' said...

... शुक्रिया !!!!!!!!!

Babli said...

वाह बहुत बढ़िया! आपकी ये पोस्ट प्रशंग्सनीय है! एक से बढकर एक! एक अच्छी किताब से वाकिफ कराने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

मुकेश कुमार तिवारी said...

नीरज जी,

आपकी खोजपरकता का कायल हुआ। एक से बढकर एक शेर हैं :-

दिग्विजय की महानता ढोते
जी रहे हैं पराजितों की तरह

ऐसे मौसम में, जहाँ सच बोलना दुश्वार हो
मौन रहने के कठिन अभ्यास को जिन्दा करें

झुंड पागल हाथियों का, रौंदता है शहर को
और अंकुश में महावत है, बताओ क्या करें?


सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

seema gupta said...

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी
बहुत सुन्दर, पुस्तक की जानकारी के लिए धन्यवाद
regards

Mrs. Asha Joglekar said...

हम उपेक्षित हैं गो की सम्मानित
फ्रेम में हैं सुभाषितों की तरह
उम्दा ।

सारे ही शेर एक से बढ कर एक है । पर एक तो चुनना ही था । आप हमेशा ही बेहतरीन शायर और कवियों से मिलवाते हैं, आभार ।

Vijay Kumar Sappatti said...

aadarniy neeraj ji

guru poornimake shub avsar par aapko pranaam... aapka aashirwad hamesha mile....

baccho ki photo bahut acchi hai ..

aap sabko shubkaamnaye..

kitaab ke baare me batakar naye sher padhwane ka bhi shukriya
dhanywad.

अल्पना वर्मा said...

गुरुओं को समर्पित इस पोस्ट में की गयी पुस्तक समीक्षा पसंद आई.

*****मिष्टी और इक्षु की एक साथ तस्वीर बहुत प्यारी है.

आकांक्षा~Akanksha said...

Kuchh bhi ho ap samiksha behad tajatarin rup men likhte hain..apka andaj pasand aya.


"शब्द-शिखर" पर आप भी बारिश के मौसम में भुट्टे का आनंद लें !!

सैयद | Syed said...

एक बेहतरीन किताब से रूबरू करने का शुक्रिया...

मिष्टी और इक्षु को प्यार..

Dev said...

Bahut sundar rachana..ek se badh kar ek..really its awesome...

Regards..
DevSangeet

जितेन्द़ भगत said...

उपयोगी जानकारी। आभार।

भूतनाथ said...

यह जो दीदार करा रहे हो आप....काबिले-दीद है जनाब......जैसे मिल गया हो हमें भात के साथ मुफ्त में कबाब.....हा....हा...हा...हा....हा....!!आप को तहे-दिल से सलाम....!!

Harkirat Haqeer said...

नीरज जी ,

सच कहूँ इतनी अच्छी- अच्छी ग़ज़लें पढने के बाद मेरा भी ग़ज़ल लिकने का मन हो गया है ......!!

नीरज गोस्वामी said...

Comment Received on e-mail from Om Sapra Ji:-

shri neeraj ji
namastey
it is a good presentaiton about yogender sharma ji, especially the foloiwing lines:


झुंड पागल हाथियों का, रौंदता है शहर को
और अंकुश में महावत है, बताओ क्या करें?
जुल्म की दिलकश अदाएं, रेशमी रंगीनियाँ
गिड़गिड़ाती-सी बगावत है, बताओ क्या करें?
आँख में अंगार, मन में क्षोभ, साँसों में घुटन
ये बुजुर्गों की विरासत है, बताओ क्या करें?

thanks for the same and also congrats.
-om sapra, delhi-9

SAHITYIKA said...

vakai..
kabile tarif hai..
har gazal ek se badh kar ek hai..

Pakhi said...

ap to ek hi sath dher sari bat likhte hain, jo samajh men ati hain acchi lagti hain.

Mishthi kaisi hai ??

Is bar blog par meri nai photo dekhen.

Harsh said...

bahut sundar ............

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

चांदनी, जंगल, मरुस्थल, भीड़, चौराहे, नदी
हर कहीं हिरनी बनी भटकी हुई है जिंदगी
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
this is poetry @ its best !!
Lyrical & sublime ...
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उम्दा गज़लकार
देर तक
असर छोडे जाते हैँ !
- दोनोँ नन्हे राजदुलारोँ को स्नेहाशिष :)
आपकी किताबोँ से परिचित करवाने की ये विधा
बेहद महत्त्वपूर्ण हो रही है नीरज भाई
स्नेह,
- लावण्या

hem pandey said...

'कामयाबी का है ये नुस्खा इसे मत भूलिए
आप जिस सीढ़ी चढ़े, उसको गिराते जाइये'

-आज के समय की सच्चाई को उम्दा तरीके से बयान किया है.

रविकांत पाण्डेय said...

आदरणीय नीरज जी,
जिस पुस्तक की आपने चर्चा की है वो तो लाजवाब लग ही रही है। जो शेर आपने पेश किये हैं उसे पढ़कर कौन अपने को रोक पायेगा इअसे खरीदने से? दूसरी बात, जिस रोचक शैली में आप प्रस्तुत करते हैं वो अद्भुत है अपने आप में। हमें बहुत कुछ सीखना है आपसे।

Rohit said...

टूटने का दर्द तुमको ही नहीं है आइनों
जिस्म के इस फ्रेम में चटकी हुई है जिंदगी


Speechless