Monday, September 28, 2020

किताबों की दुनिया -215

इस इंतज़ार में हूँ शाख़ से उतारे कोई 
तुम्हारे क़दमों में ले जा के डाल दे मुझको 
*
तूने मुझे छुआ था क्या जाने वो मोजिज़ा था क्या 
हिज़्र की साअतों में भी मुझको विसाल-सा रहा 
मोजिज़ा :चमत्कार , हिज़्र: जुदाई ,साअतों :घड़ियों ,विसाल : मिलन 
*
दुनिया के भेद क्या हैं क़ुरआन-वेद क्या हैं 
आगाही-ए-अदम में इन्सान मर गया है 
आगाही ए अदम :परलोक ज्ञान 
*
उस फूल को निहारूँ और देर तक निहारूँ 
शायद इसी बहाने मैं ताज़गी को पहुँचूँ 
*
पहले भी तन्हा थे लेकिन हम को इल्म न था 
तुझसे मिल कर हमने तन्हाई को पहचाना 
*
पहले मुझको भी दुनिया से नफ़रत रहती थी 
फिर मेरे जीवन तेरे इश्क़ का फूल खिला 
*
तेरा दुःख है जो मुझे भरता है 
अपने हर सुख में अधूरा हूँ मैं 
*
हमारे वास्ते होने की सूरत
वही है जो नहीं अब तक हुआ है 
*
बाहर रह रह कर ये जाना 
अपने अंदर जन्नत है 
*  
 हज़ारों मंज़िलें सर कर चुका हूँ मैं लेकिन 
ये ख़ुद से ख़ुद का सफ़र तो बहुत अजब सा है   

'जहांगीर गँज' मुझे उम्मीद है कि शायद आपने इस गाँव का नाम नहीं सुना है। इसमें आश्चर्य की कोई बात भी तो नहीं है, भारत जैसे विशाल देश में एक राज्य के लोग दूसरे राज्य के अधिकांश शहरों के नाम तक नहीं जानते, गाँव के नाम तो दूर की बात है।ये संभव भी नहीं है। चलिए हम बता देते हैं ये गाँव भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के 'अम्बेडकर नगर' डिस्ट्रिक्ट जो 1995 में फैज़ाबाद से विभक्त हो कर अस्तित्व में आया, के अंतर्गत आता है। अब अगर हम 'जहांगीर गँज' को केंद्र में रख कर 50 की.मी रेडियस का एक गोल घेरा खींचे तो आप पाएंगे कि उस परिधि में आयी भूमी पर विलक्षण प्रतिभा के लोग पैदा हुए हैं। उन सब के नाम तो यहाँ बताने संभव नहीं हैं  लेकिन उन में से कुछ के नाम उदाहरण के तौर पर लिये जा सकते हैं जैसे प्रगतिशील लेखक संग के आधार स्तम्भ, शायर, लेख़क पद्म श्री से सम्मानित ज़नाब 'कैफ़ी आज़मी' साहब,  सोशलिस्ट पार्टी के जनक श्री  'राम मनोहर लोहिया' जी ,संस्कृत भाषा से उर्दू में भगवत गीता का अनुवाद करने वाले अनूठे शायर 'अनवर जलालपुरी' साहब , मष्तिष्क चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में क्रन्तिकारी खोज के लिए पद्म श्री से सम्मानित डॉक्टर 'मेहदी हसन' साहब और असामाजिक तत्वों द्वारा चलती रेल से दिए गये धक्के के कारण पैर गंवाने के बावजूद अपने बुलंद हौसलों से एवरेस्ट विजय करनी वाली, पद्म श्री से सम्मानित ,दुनिया की पहली महिला, 'अरुणिमा सिन्हा' । आप सोच रहे तो जरूर होंगे कि मैं आपको जहांगीर गँज के बारे में क्यों बता रहा हूँ तो इसका जवाब ये है कि हमारे आज के युवा प्रतिभाशाली शायर 'महेंद्र कुमार सानी' यहीं जहांगीर गँज में 5 जून 1984 को पैदा हुए थे और इनका नाम भी कल को इन लोगों की फेहरिश्त में शामिल हो जाय तो हैरत नहीं होनी चाहिए । उनकी ग़ज़लों की पहली किताब 'मौज़ूद की निस्बत से' हमारे सामने है।   


एक मौजूद की निस्बत से है ये सारा वजूद 
किसी अव्वल का नहीं कोई निशाँ सानी में 
*  
तन्हाई है फुर्सत है 
जीने में क्या लज़्ज़त है 
*
शेर कह कर दिल-ऐ-मुज़्तर को करार आया तो 
मसअला फिर वही दरपेश है हैरानी का 
दिल-ऐ-मुज़्तर:बेकरार दिल , दरपेश :सम्मुख 
*
मैं जागृति की अजब अजब मंज़िलों से गुज़रा 
कि रात जब तेरा ध्यान कर के मैं सो रहा था 
*
यूँ तो आवारगी मुझमें है बला की लेकिन 
इश्क़ तेरा मुझे बादल नहीं होने देता 
देखिये तो सब दुनिया मस्त-अलस्त लगती है 
जानिये तो हर इन्सां मुब्तिला है दहशत में 
मुब्तिला :खोया हुआ 
*
बिखर गया है मेरी रूह में वो ख़ार की मानिंद 
वो गुल बदन मुझे शायद गुलाब कर के रहेगा 
*
दूर करते हैं तुझे हम पहले 
फिर जो  हैरत से तुझे देखते हैं 
ये दुनिया है इसे पाना नहीं है  
इसे बस देखना है देखना है   
 *
है सारा खेल इन आँखों के घर में 
हक़ीक़त में जो बाहर दिख रहा है 

जहाँगीर गँज में अधिकतर उर्दू और हिंदी ही बोली जाती है और वहां की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत अधिक है। बचपन के आठ साल यहाँ बिताने के बाद याने 1992 में 'महेंद्र कुमार सानी' जी का परिवार 'पंचकुला' स्थानांतरित हो गया। पंचकुला हरियाणा का चंडीगढ़ के साथ बसा हुआ एक प्लांड शहर है। आपकी जानकारी के लिए बताता चलूँ की राष्ट्रिय पुरूस्कार से सम्मानित अभिनेता 'आयुष्मान खुराणा' यहीं के हैं. बात 1999 की है, महेंद्र तब 15 वर्ष के रहे होंगे, दसवीं कक्षा के विद्यार्थी थे, स्कूल के बाद घर लौट रहे थे कि रास्ते में पान की दुकान पर रखे टेपरिकार्डर में बज रही जगजीत सिंह की ग़ज़ल " शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आप की कमी सी है " सुन कर उनके पाँव ठिठक गए।  ग़ज़ल जैसे ही ख़तम हुई उन्होंने पान वाले से उसे फिर से चलाने की गुज़ारिश की जब वो सीधे कहने से नहीं माना तो फिर हाथ पाँव जोड़ कर उसे मनाया और इस ग़ज़ल को चार पांच बार सुना। रास्ते भर उसे गुनगुनाते महेंद्र घर पहुंचे। जगजीत सिंह जादू उनके सर चढ़ कर बोलने लगा। घर लौटते वक्त पान की दुकान पर खड़े हो कर ग़ज़ल सुनना महेंद्र की दिनचर्या का हिस्सा बन गया। पान वाले को भी अब ये ग़ज़ल प्रेमी बच्चा पसंद आने लगा और वो महेंद्र के आते ही जगजीत की कोई न कोई कैसेट लगा देता। 

ठहरे हुए पानी में रवानी कोई शय तू 
मौजूद से आगे भी है यानी कोई शय तू 

जो एक है उस एक में हर हाल है तू ही 
अव्वल में अगर है कहीं सानी कोई शय तू 

जो रूप है वो रंग से खाली तो नहीं है 
इन ज़र्द से पत्तों में है धानी कोई शय तू 

सरसब्ज़ है ता-हद्दे-नज़र रेत की खेती 
मौजूद के सहराओं में पानी कोई शय तू 

दसवीं से बाहरवीं कक्षा तक याने दो साल तक ये सिलसिला चलता रहा. ग़ज़लें सुन सुन कर महेंद्र को उर्दू ज़बान से मोहब्बत हो गयी और उसे बहुत से उर्दू के लफ्ज़ भी याद हो गए। बाहरवीं के बाद छुट्टियों में महेंद्र अपने गाँव घूमने गए क्यूंकि अभी कॉलेज जाने में देरी थी। गाँव में महेंद्र के ग़ज़ल प्रेम को देख कर उनके बहुत से मुस्लिम दोस्त बन गए। महेंद्र की याददाश्त भी खूब थी वो बात बात पर बेहतरीन शेर सुना देते थे। उनके इस हुनर के चलते उस छोटे से जहाँगीर गँज में उनकी एक पहचान बन गयी। लोग उन्हें अपने घर बुलाते, बाजार के रास्तों ,चौराहों पर खुली चाय की दुकानों पर उसे चाय पिलाते और शायरी सुनते। ऐसी ही एक महफ़िल में महेंद्र की मुलाक़ात इलाहबाद यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ऐ. कर रहे आफ़ताब अहमद से हो गयी जो छुट्टियों में अपने घर आये हुए थे । उम्र में अच्छा ख़ासा फर्क होने के बावजूद दोनों की उर्दू ज़बान से मोहब्बत की वजह से दोस्ती हो गयी। दो तीन दिन में एक बार होने वाली ये मुलाक़ात अब दिन में दो तीन बार होने लगी। आफ़ताब से मिलने के बाद जैसे महेंद्र के ज़ेहन में रौशनी फ़ैल गयी। ग़ज़ल कहने के नए आयाम उनके सामने खुलने लगे। बात धीरे धीरे जगजीत सिंह की ग़ज़लें सुनने से आगे बढ़ कर अब खुद शेर कहने, रदीफ़, काफ़िये को निभाने तक जा पहुंची। .   

मिरे वजूद में तेरा वजूद ऐसे है 
दरख़्त-ए-ज़र्द में जैसे हरा चमकता है 
दरख्त-ऐ-ज़र्द :सूखा पेड़ 

ये रौशनी में कोई और रौशनी कैसी 
कि मुझ में कौन ये मेरे सिवा चमकता है 

मैं एक बार तो हैरान हो गया 'सानी'
ये मेरा अक्स है या आइना चमकता है

 आफ़ताब अहमद ने फ़िराक़ गोरखपुरी, कृष्ण बिहारी नूर, कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर', पंडित बृज नारायण चकबस्त आदि के साथ साथ ऐसे और कई मशहूर शायरों के नाम महेंद्र को बताये जो मुस्लिम नहीं लेकिन उर्दू के बेमिसाल शायर थे । उन्होंने महेंद्र को समझाया कि उर्दू ज़बान हमारी अपनी ज़बान है और इस पर जितना हक़ मेरा है उतना ही तुम्हारा भी है बशर्ते तुम इसे ढंग से सीखो। इस बात ने महेंद्र को रोमांचित कर दिया और उसने फैसला किया कि वो पंचकुला पहुँचते ही उर्दू लिखना पढ़ना सीखेगा। पंचकुला के जिस कॉलेज में महेंद्र ने दाखिला लिया उसके पास ही हरियाणा उर्दू अकेडमी थी वहां कम्यूटर के साथ उर्दू का कोर्स सीखना जरुरी था। महेंद्र ने कोर्स में दाखिला ले लिया और अगले दो तीन महीनों में ही अच्छे से उर्दू लिखना पढ़ना सीख गया। महेंद्र ने अकेडमी की लाइब्रेरी में रखी उर्दू शायरी की किताबें एक एक करके पढ़ने का सिलसिला शुरू कर दिया। इन किताबों को पढ़ने के साथ ही महेंद्र ने अपनी शायरी का आगाज़ कर तो दिया लेकिन उसे महसूस हुआ कि शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल कहना महज़ काफिया पैमाइ का नाम नहीं है। अब महेंद्र को तलाश थी एक ऐसे शख्स की जिसकी ऊँगली पकड़ कर वो ग़ज़ल की टेढ़ी मेड़ी पगडंडियों पर आसानी से चलना सीख सकें।    
एक जंगल सा उगा है मेरे तन के चारों ओर 
और अपने मन के अंदर ज़र्द-सा रहता हूँ मैं 

एक नुक़्ते से उभरती है ये सारी क़ायनात  
एक नुक़्ते पर सिमटता फैलता रहता हूँ मैं 

रौशनी के लफ्ज़ में तहलील हो जाने से क़ब्ल 
इक ख़ला पड़ता है जिस में घूमता रहता हूँ मैं 
तहलील : घुल जाना

उस्ताद की तलाश महेंद्र को पंचकुला के नामवर अदीब जनाब 'टी एन राज' साहब के दर पर ले आयी।  राज साहब उर्दू के आला तन्ज़ो मिज़ाह के शायर हैं और उनका शेरी मजमुआ  'ग़ालिब और दुर्गत' उर्दू मज़ाहिया शायरी में मक़बूल हुआ। राज साहब के यहाँ उर्दू का हर बेहतरीन रिसाला आता था और हर विषय पर छपी उर्दू की श्रेष्ठ किताबें आती थीं। हरियाणा उर्दू अकेडमी की लाइब्रेरी ने जहाँ महेंद्र को रिवायती शायरी की ढेरों किताबें पढ़ने का मौका दिया वहीँ राज साहब के यहाँ उनका परिचय उर्दू की आज की शायरी से हुआ। राज साहब ने महेंद्र के अध्ययन विस्तार दिया लेकिन उनकी शायरी को सही पटरी पर डाला जनाब 'एस एल धवन' साहब ने। उसके बाद महेंद्र की लगन और लगातार पढ़ते  रहने की आदत ने उन्हें शायरी के एक ख़ास मुक़ाम पर पहुंचा दिया। 

 मैं सोचता हूँ मग़र क्या मुझे नहीं मालूम 
मैं देखता हूँ मग़र ध्यान किसके ध्यान में है 

जहाँ मैं हूँ वहीँ उसको भी होना चाहिए ,फिर 
मुझे वो क्यों नहीं मिलता ,वो किस जहान में है 

उसी का तर्जुमा भर मेरी शायरी 'सानी'
वो एक लफ्ज़ जो मुब्हम-सा मेरे कान में है 
मुब्हम: अस्पष्ट 

इस किताब की भूमिका में जयपुर के मशहूर शायर जनाब 'आदिल रज़ा मंसूरी' साहब, जो महेंद्र की शायरी के इस सफर में शरीक रहे हैं, लिखते हैं कि " मौजूद के मानी जहाँ 'हाज़िर' के हैं वहीँ एक मानी 'ज़िंदा' या 'जीवित' के भी हैं। 'ज़िंदा मतलब 'ज़िन्दगी' यानी ये शाइरी ज़िन्दगी से इंसान की निस्बत की शाइरी है. जिसके सामने रोज़े-ए-अज़ल से कुछ सवाल हैं। 'वो कौन है ?क्यों है ?किसलिए है ? ख़ुदा क्या है ? है भी या नहीं ?ये दुनिया क्या है ? रूह क्या है ? सानी का ज़हन भी ऐसे सवालों के घेरे में है मग़र उनके यहाँ सिर्फ सवाल नहीं हैं उनके पास जवाब भी है जो उनके अपने हासिल-कर्दा हैं और उनकी शायरी इन जवाबों के इज़हार की शाइरी है।  उनकी शाइरी में ज़ाहिर में भी एक फ़िक्री पर्दा है जहाँ उनके हमअस्र सब कुछ कह देना चाहते हैं वहीँ 'सानी' कहे में कुछ अनकहा छोड़ देते हैं बल्कि ये काम वो कारी याने पाठक के सुपुर्द कर देते हैं " 
महेंद्र सानी अपनी बात कहते हुए लिखते हैं कि 'शाइरी क्या है ? इसी उधेड़बुन में एक अरसा सर्फ़ हो चुका है और ऐसा लगता है मेरी बाक़ी उम्र भी ऐसे ही गुज़रने वाली है "      

इस क़दर ख़ामुशी है कमरे में 
एक आवाज़-सी है कमरे में 

कोई गोशा नहीं मिरी खातिर 
क्या मिरी ज़िन्दगी है कमरे में 

कोई रस्ता नहीं रिहाई का 
वो अजब गुमरही है कमरे में 

एक बाहर की ज़िन्दगी है मिरी 
और इक ज़िन्दगी है कमरे में 

महेंद्र जी, जो आजकल एक स्टार्टअप 'योर कोट' में मैनेजर के ओहदे पर कार्यरत हैं, का मानना है कि शाइरी के लिए कही गई ये बात ग़लत है कि इसे हर कोई नहीं कर सकता। वो बाकायदा शाइरी सिखाते भी हैं ग़ज़ल पर वर्क शाप भी करते हैं । वो ख़ुद एक ऐसे परिवार से हैं जिसका शाइरी से कभी कोई नाता नहीं रहा। उनका मानना है कि हर वो इंसान जिसका ज़हन सवाल करता है शाइरी कर सकता है आप महेंद्र जी से 8699434749 / 7009383017 पर  सम्पर्क करें उन्हें इस किताब के लिए मुबारक़ बाद दें और इस किताब को अमेज़न या रेख़्ता बुक्स से ऑर्डर करें। इस किताब पर बहुत से विद्वान शायरों और आलोचकों ने अपने विचार रखें हैं जिन्हें आप महेंद्र कुमार सानी जी के फेसबुक अकाउंट पर पढ़ सकते हैं। मैंने आपको महेंद्र जी के बारे में जितना मुझे पता था बताया, उनकी शाइरी के बारे में. आप उन्हें पढ़ कर, अपनी राय स्वयं बनायें , चलते चलते आईये  आपको उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर भी पढ़वा देता हूँ :  

जिस्म इक सहरा है सहरा के दरून 
एक दरिया चस्म-ऐ-तर दरवेश है 
दरून : अंदर , चश्म-ऐ-तर : भीगी आँख 

ख़ल्क़ ख़ाली सीपियाँ हैं दहर में 
दहर में कोई गुहर दरवेश है 
ख़ल्क़ :प्रजा ,दहर:संसार , गुहर : मोती 

जाने किस फ़ुर्सत में फिरता है वो शख़्स 
इस तरह तो दर-ब-दर दरवेश है   

10 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सुन्दर समीक्षा।

तिलक राज कपूर said...

इस उम्र में
एक जंगल सा उगा है मेरे तन के चारों ओर
और अपने मन के अंदर ज़र्द-सा रहता हूँ मैं

एक नुक़्ते से उभरती है ये सारी क़ायनात
एक नुक़्ते पर सिमटता फैलता रहता हूँ मैं

रौशनी के लफ्ज़ में तहलील हो जाने से क़ब्ल
इक ख़ला पड़ता है जिस में घूमता रहता हूँ मैं

जैसे शेर पर्याप्त हैं यह बताने को कि महेंद्र ने कहाँ तक आगे जाना है।

Onkar said...

बहुत सुंदर

Ramesh Kanwal said...

सुंदर समीक्षा

के. पी. अनमोल said...

आला मेयार की शायरी है। महेंद्र जी की अच्छी परिचयात्मक जानकारी मिली।

mgtapish said...

ख़ूबसूरत अल्फाज़ से सजा बेहतरीन लेख वाह वाह क्या कहना
मोनी गोपाल 'तपिश'

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

क्या बात है

Sarwat Jamal said...

"रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद"
महेन्द्र की मेहनत रंग ले ही आई

Sarwat Jamal said...

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panditramdial said...

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