Monday, June 21, 2021

किताबों की दुनिया - 234

वो रात बहुत ही छोटी थी 
जिस रात तू मेरे साथ रहा 
*
रावण मेरे अंदर बैठा रहता है 
दुनिया यूँ ही पुतला फूंका करती है 
*
या रब धागा ढीला रखना 
कठपुतली सा नाच रहे हैं 
*
मैं तो.. खुद से.. मैं खो बैठी 
जब से मैं ने तुमको जाना 
*
नींद की गोली देकर तेरी याद को चाहा सो जाए 
याद नशे में ऐसा नाची घुंघरू घुंघरू टूटी मैं
*
 ढाई आखर शब्द है ये ज़िंदगी 
पढ़ते-पढ़ते थक गई आंखें मेरी 
*
झुकते झुकते झुकते झुकते 
आखिर डाली टूट गई है 
*
चाबी अक्सर खो जाती है 
ताले लटके रह जाते हैं 
*
चांद बुला कर ले आई हूँ
आओ पकड़म पकड़ी खेलें 
*
खामोशी है तो ज़लज़ला आने को है कोई 
तुमने कभी ठहरा हुआ दरिया नहीं देखा 

ये तो हम जानते ही हैं कि दुनिया में मुख्य रूप से दो तरह के लोग होते हैं एक-'अंतर्मुखी' जिसे अंग्रेजी में इंट्रोवर्ट कहते हैं और दूसरे 'बहिर्मुखी' याने एक्सट्रोवर्ट ।हम ये भी जानते हैं कि यह एक व्यक्तिगत लक्षण है जो जन्मजात होता है । एक तो जीवन जीना वैसे ही आसान नहीं होता ऊपर से अगर आप अंतर्मुखी हैं तो अपेक्षाकृत ज्यादा मुश्किल हो जाता है। जब आप बोलते नहीं तो ग़लत या मूर्ख समझ लिए जाते हैं जबकि अधिकतर अंतर्मुखी लोग बहुत संवेदनशील,सोच समझ कर बोलने वाले, गहरे, समझदार और कुशल प्रशासक होते हैं। कुछ लोग जो अपनी भावनाएं अभिव्यक्त नहीं कर पाते वो घुटन के शिकार हो जाते हैं और अंदर ही अंदर छटपटाते हैं । इस छटपटाहट से निज़ात पाने के लोग तरीक़े ढूंढते हैं।  

हमारे आज किताबों की दुनिया की शायरा रश्मि शर्मा 'रश्मी' इंट्रोवर्ट याने अंतर्मुखी प्रकृति की हैं, लिहाजा कम बोलती हैं, बहुत संवेदनशील हैं और अपनी ही नहीं दूसरों की पीड़ा से भी परेशान हो जाती हैं । जिंदगी में जो देखती और महसूस करती हैं उसे बोलकर नहीं बल्कि लिखकर अभिव्यक्त करती हैं ।अपनी इसी अभिव्यक्ति को उन्होंने अपनी पहली किताब 'काग़ज पर..!' में दर्ज किया है जो हमारे सामने हैं।

इस किताब को मॉयबुक्स पब्लिकेशन, दिल्ली ने हिंदी और उर्दू दोनों लिपियों में प्रकाशित किया है जिसे 9910491424 या 011-49094589 पर फोन कर मँगवाया जा सकता है।ये किताब अमेजन पर भी उपलब्ध है।

चंडीगढ़ साहित्य अकेडमी ने मार्च 2020 में इस किताब के लिए रश्मि जी को पुरुस्कृत भी किया है।


कितना भी पत्थर हो जाओ 
कुछ मिट्टी तो बाक़ी होगी 
*
कितनी बेकल है ये सड़कें देखो ना 
तुमसे मिलने कैसे दौड़ी आती हैं 

कूज़ागर जब पटके थपके आंच दिखाये 
सारे ऐब निकल जाते हैं मिट्टी के भी
*
उदासी एक घना जंगल है प्यारे 
बहुत अंदर गए तो शेर होंगे 
*
आ चांद कटोरे में भर लें 
आधा तेरा आधा मेरा
*
घर में रहकर हूँ बैरागी 
क्यों जाना फिर जंगल वन में 
*
बात कल तक थी यही सब कुछ करूं हासिल 
आज की ताजा खबर है... थक गई हूं मैं 

कौन समझाए कहानी जिंदगी की अब 
उलझा उलझा हर बशर है... थक गई हूं मैं 
*
चांद तारों से भरा है आसमां 
रात की हम तीरगी क्यों सह रहे
*
बीवी करे शिकवा.. करें मां भी.. करूं मैं क्या 
किसको कहूँ किस की सुनूं बांटा हुआ सा मैं

रश्मि जी के पिता डॉक्टर थे जो राजस्थान के गंगानगर जिले के एक गाँव में रहते थे जहाँ एक बड़े से घर के आगे के हिस्से में उनका क्लिनिक था और पीछे रियाइश। रश्मि जी की माताजी रश्मि जी के जन्म के समय अपने पीहर पटियाला आ गयीं। अभी रश्मि जी कुछ दिनों की ही थीं कि उनके दादा जो पंजाब के रामामंडी में डॉक्टर थे अचानक गंभीर रूप से बीमार हो कर बिस्तर पर आ लगे। रश्मि जी की दादी ही अकेले उनकी देखभाल को थीं। ऐसे में रश्मि जी की माताजी ने उनके पिता को अपना सब कुछ बेच-बाच कर फ़ौरन पटियाला आकर रामामंडी में उनके पिता की देखभाल के लिए जाने को लिखा। रश्मि जी के पिता ने अपना बड़ा सा मकान, क्लिनिक आदि तुरंत मात्र 800 रु में बेच, पटियाला की बस पकड़ी। उनके पास इतना समय नहीं था कि वो अधिक पैसों के लिए इंतज़ार करते और वैसे भी लोग ऐसे नाज़ुक मौकों पर मजबूर इंसान की मज़बूरी का फ़ायदा उठाने में परहेज़ नहीं करते। कहने का मतलब ये कि रश्मि जी के पैदा होते ही पूरे परिवार में जलजला आ गया। 

पुरानी हिंदी फ़िल्म की अगर ये कहानी होती तो परिवार वालों ने ऐसी बेटी को मनहूस कहना था लेकिन रश्मि जी के माता-पिता बहुत आधुनिक और प्रगतिशील विचारों के थे, उन्होंने रश्मि जी का लालन-पालन बहुत प्यार से किया बल्कि उनका, उनके दो भाइयों के बनिस्पत, अधिक ख़्याल रखा। पिता ने रामामंडी पारिवारिक कारणों से छोड़ अपनी प्रेक्टिस सर्दुलगढ़ में, जो मानसा जिले में है, शुरू कर दी जो धीरे धीरे चल पड़ी। उसी जिले में उनकी माताजी भी सरकारी हॉस्पिटल सर्दूलगढ़ में महिला सेहत कर्मचारी के पद पर काम करने लगीं।। सब कुछ ठीक चल रहा था ज़िन्दगी पटरी पर बिना झटका खाये ,दौड़ रही थी। घर के साहित्यिक और खुशनुमा माहौल में बच्चे बड़े हो रहे थे। दसवीं की परीक्षा के बाद उन्होंने हायरसेकेंडरी अपनी मौसी के घर रह कर की। उसके बाद जब वो मानसा के एस.डी. कॉलेज से दी गयी फर्स्ट ईयर की परीक्षा के रिजल्ट का इंतज़ार कर रहीं थी तभी उनके पड़ौस में एक छोटे बच्चों का स्कूल खुला जिसमें माँ-पिता को मना कर रश्मिजी पढ़ाने लगीं। उनका इरादा था कि दो तीन महीनों बाद रिजल्ट आने पर वो ये नौकरी छोड़ कर आगे पढ़ने कॉलेज चली जाएँगी। इंसान सोचता कुछ है लेकिन होता कुछ है। तो हुआ ये कि रश्मि जी की माताजी गंभीर रोग की चपेट में आ गयीं जिसका इलाज़ सर्दूलगढ़ जैसी जगह में संभव नहीं था लिहाज़ा उनके पिता उन्हें पटियाला जहाँ उनका मायका था के एक बड़े हस्पताल में इलाज के लिए ले आये। माँ की गैर मौजूदगी में रश्मि जी के नाज़ुक कन्धों पर दो भाइयों के साथ साथ घर की सारी ज़िम्मेदारी भी आ गयी। कॉलेज जाने का सपना, सपना ही रह गया।             

बिन मौसम बरसा करता है 
रोको इसको.. मोया बादल 
मोया: मरा हुआ...पंजाबी में प्यार से दी गाली

जाने किस बैरी धोबी ने 
रगड़ रगड़ कर धोया बादल 
*
बंद लिफाफा चूम लिया है 
क्या जाने किसकी पाती है
*
 बारहा आंख दीद को तरसे 
इश्क़ में है अभी कमी जानो
*
सच की हर दवा की एक्सपायरी गई 
रोज़ गोली झूठ की निगल रही हूं मैं
*
पानी में बनती परछाई 
पानी ही से कट जाती है 

आंसू आंखों में चलते हैं 
सांस गले में अट जाती है
*
हर गली लुट रही है कोई सीता 
रस्मी रावण जलाया जा रहा है
*
अकेला छोड़ दो मुझको यही बेहतर है तूफ़ाँ में
 मुसाफिर जो ज़ियादा हों सफ़ीना डूबता भी है
*
जिसने जी चाहा सुनाया है मुझे अक्सर यहां
तू मगर जब चुप रहा तो मैं पशेमाँ सी हुई

दिन-रात पढ़ने, खेलने और अपने में मस्त रहने वाली रश्मि जी के लिए जीवन में अचनाक आई इस तब्दीली ने गहरा असर डाला और वो उदास रहने लगीं। अपनी उदासी को उन्होंने एक कॉपी के पन्नों पर चुपचाप कविता लिख कर अभिव्यक्त करना शुरू किया। ये उनके लेखन की शुरुआत थी हालाँकि रश्मिजी ने इस बात की जानकारी किसी को नहीं दी। स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ घर का काम निपटाते हुए रश्मि जी ने आगे की पढ़ाई प्राइवेटली जारी रखी। सेकण्ड ईयर पास करने के बाद उन्होंने सरकार द्वारा चाइल्ड डवलेपमेंट प्रोजेक्ट के तहत आंगनबाड़ी योजना के लिए नौकरी के लिए आवेदन दिया और सलेक्ट होने पर राजपुरा ट्रेनिंग सेंटर में चार महीने की ट्रेनिंग में गयीं। इस गर्ल्स हॉस्टल में हुए उनके अच्छे और बुरे अनुभवों पर अलग से एक किताब लिखी जा सकती है। आंगनबाड़ी की नौकरी के दौरान ही उनकी शादी हो गयी। ससुराल पटियाला में था और आंगनबाड़ी केंद्र दूर पीहर के गाँव में, कुछ दिन तो किसी तरह नौकरी चली लेकिन दो नावों में सवार होना मुमकिन नहीं था इसलिए आख़िर उन्होंने वो नौकरी छोड़ दी। 

मुश्किलों ने रश्मि जी का पीछा नहीं छोड़ा। माताजी की तबियत फिर से ख़राब हो गयी ऐसे में रश्मि जी के पापा अपने घर की ज़िम्मेदारी बेटे-बहू को सौंप कर उन्हें फिर सर्दूलगढ़ से पटियाला ले आये जहाँ के एक हॉस्पिटल में उन्हें भर्ती करा दिया। पिता अकेले उन्हें नहीं संभाल सकते थे लिहाज़ा माताजी की सेवा की जिम्मेदारी रश्मि जी ने उठा ली।  वो रोज सारे घर वालों का खाना बना कर अपनी छोटी सी बेटी को गोद में उठाये सारा दिन अपनी माँ जी के पास हॉस्पिटल रहतीं और शाम को वहां से लौट कर फिर से घर के कामों में जुट जातीं। इसी बीच उनके ससुर जी को हार्ट अटैक आ गया और ससुर भी हॉस्पिटल में भर्ती हो गए। पूरा घर अस्त-व्यस्त हो गया। 

ये विपदा किसी तरह टली तो उसके कुछ ही वक्त के बाद पटियाला में तूफानी बारिश के चलते बाढ़ आ गयी।  घग्गर नदी के अत्यधिक घुमावदार होने से अक्सर उसके किनारे पड़ने वाले गाँव-शहरों में बाढ़ आना सामान्य बात है लेकिन 1988 में आई बाढ़ बहुत खतरनाक थी। रश्मि जी के ससुराल वालों की कोठी शहर के अपेक्षाकृत नीचे वाले इलाके में थी लिहाज़ा सारा घर 10 फिट गहरे पानी से घिर गया। पूरे परिवार ने, जिसमें रश्मि जी की 6 माह की बेटी भी थी, पूरी रात छत पर बने एक छोटे से कमरे में गुज़ारी। दो दिन बाद सरकारी नाव की सहायता से उन्हें बचाया गया। किसी फ़िल्म या टीवी पर समाचार देख कर इस तरह की बाढ़ में फंसे परिवार की समस्याओं का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। वो रात रश्मिजी कभी नहीं भूल पातीं। चार-पाँच दिन बाद पानी उतरने पर जब परिवार वाले अपने घर वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि पूरा घर साँप के छोटे छोटे बच्चों से भरा पड़ा था और दीवारों पर कनख़जूरे रेंग रहे थे। 

ऐसा ही मंज़र 1993 में आई बाढ़ में भी नज़र आया ब्लकि सन 1988 में आई बाढ़ से भी अधिक ख़तरनाक।

कितनी तन्हा तन्हा हूँ मैं 
कितने खाली खाली हो तुम 

कांटों से भी याराना है 
ऐसे कैसे माली हो तुम
*
मुख़ालिफ़ को देना मुहब्बत 
बहुत ख़ूबसूरत सज़ा है
*
सबको तुझसे ही मिलना है 
तुझसे फिर मिलवाये कौन 

होश में आना पागलपन है 
पगले को समझाएं कौन
*
पैर की पाज़ेब कितनी क़ैद है 
दूर जब ढोलक बजे तो सोचना 

मौत दस्तक दे के आती है कहाँ 
जिंदगी आवाज़ दे तो सोचना
*
जाने कैसा अजब ख़ज़ाना है यह मेरा ख़ालीपन 
जितना जितना बाँटा मैं ने उतना लौटा खालीपन
*
बिन मोहब्बत तू किस काम की ज़िंदगी  
मैंने तुझको बहुत जी लिया...तख़लिया  

वास्ता दोस्ती का न देना कभी 
हंस के कह दूंगी मैं शुक्रिया तख़लिया

देवानंद साहब की मशहूर फ़िल्म 'हमदोनो' में साहिर साहब के लिखे एक कालजयी गीत की ये पंक्ति शायद आपको याद हो कि ' जहाँ में ऐसा कौन है कि जिसको ग़म मिला नहीं ' रश्मि जी इसकी अपवाद नहीं। ग़म, तकलीफ़ और मुश्किलें जीवन का अहम हिस्सा हैं, ये अलग बात है कि किसी किसी को ऊपरवाला ये सब बहुतायत में देता है। कुछ लोग इनसे बिना लड़े ही हार मान लेते हैं और कुछ, रश्मि जी की तरह कमर कस कर इनका डट कर मुकाबला करते हैं। हारना जीतना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना लड़ना। लड़ना तो हर हाल में आपको ही होता है लेकिन ये लड़ाई थोड़ी आसान तब हो जाती है जब विपरीत परिस्थितियों में आपके परिवार वाले और मित्र आपके पीछे खड़े होते हैं। रश्मिजी इस मामले में ख़ुशक़िस्मत रहीं कि मुश्किल की घड़ियों में उन्हें अपने माता-पिता, पति और समस्त ससुराल वालों का भरपूर साथ मिला। 

रश्मिजी को जीवन में निष्क्रिय हो कर घर बैठना बिल्कुल पसंद नहीं था इसलिए वो हमेशा नौकरी करने की उधेड़बुन में रहतीं। पति के पंजाब युनिवेर्सिटी चंडीगढ़ में ट्रांसफर होने पर वो पटियाला छोड़ चंडीगढ़ में बस गयीं और नौकरी की तलाश करने लगीं। घर के पास ही एक छोटे बच्चों का स्कूल था जिसमें वो बहुत कम तनख़्वाह पर काम करने लगीं। धीरे धीरे अपनी मेहनत और लगन से वो न सिर्फ़ स्कूल के कर्ताधर्ताओं में बल्कि बच्चों में भी बहुत लोकप्रिय हो गयीं। अब वो उसी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल के पद पर काम कर रही हैं। वो इस स्कूल को और स्कूल वाले उन्हें अपना समझते हैं। उनके द्वारा पढ़ाये हुए बच्चों ने पढाई के अलावा अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में भी अपना और स्कूल का नाम रौशन किया। 

स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ रश्मि जी ने अपना एक कोचिंग सेंटर भी खोला इसके अलावा टपरवेयर और एवोन के उत्पाद की मार्केटिंग भी की, आई सी आई सी आई प्रू लाइफ़ इंशोरेंस इंसोरेंस तथा बिरला सन लाइफ़ के प्रतिनिधि के रूप में भी काम किया और तो और जब मौका और जरूरत पड़ी तो चंडीगढ़ में अपने नए घर को बनाने के दौरान पति के साथ मिल कर ईंटों से भरे ट्रक की सारी ईंटों को एक एक कर पहली मंज़िल तक पहुंचाने की मेहनत भी की। इससे उनकी कभी हार न मानने वाली जुझारू प्रवृति का अंदाजा भी लगता है ।

इस सब के दौरान उनका लेखन भी साथ साथ चलता रहा। उनकी रचनाएँ चंडीगढ़ से प्रकाशित ' चंडीगढ़ डाइजेस्ट' में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं यहाँ तक कि उन्हें डाइजेस्ट वालों ने अपने सम्पादकीय मंडल में शामिल होने की पेशकश भी की जिसे उन्होंने अपने संकोची स्वभाव के कारण ठुकरा दिया।   
    .
वस्ल की बारिश पल भर हो तो सदियों तक भी 
हिज्र की मिट्टी को महकाया जा सकता है 

एक उदासी थोड़े आंसू कुछ तन्हाई
इन से कब तक काम चलाया जा सकता है
*
जाने कितने चेहरे औढ़ लिए हैं मैंने 
थक जाता है अक्स उठाता घर का शीशा 

मेरे अंदर से मैं कब की निकल चुकी हूँ 
झूठा है.. मुझ को बहलाता.. घर का शीशा
*
उतना बोझिल होगा रस्ता 
जितनी भारी होगी गठरी 

खट्टा मीठा सब रख बैठी 
यादों की अलमारी गठरी 
*
मां होती तो कह देती मैं 
फिर से गूंधो मेरी मिट्टी

मुझ में कुछ महका महका है 
मुझ में है कुछ तेरी मिट्टी 

कूज़ागर का दोष नहीं कुछ 
थी मेरी रेतीली मिट्टी
*
छत पर मैं और चांद सितारे 
थी वो रात बहुत पहले की 

क्या कहते हो .. हंसती हूँ मैं 
हाँ ये बात बहुत पहले की 

आख़िर उनकी ज़िंदगी में भागदौड़, परेशानियां और मुश्किलें धीरे धीरे कम होने लगीं। बच्चे बड़े हो गये।उनका कॉलेज न जा पाने का मलाल बच्चों ने दूर कर दिया। बिटिया ने देवीलाल यूनिवर्सिटी सिरसा से एम.एस.सी की और फिर पी.एच.डी की डिग्री हासिल की ,बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए न्यूजीलैंड चला गया । जहाँ अब उसकी खुद की कम्पनी है ।  उनकी बेटी जो आज असिस्टेंट प्रोफ़ेसर है और लिखती भी हैं ,ने, उन्हें बताया कि वो इंटरनेट पर शायरी.कॉम साईट पर अपनी रचनाएं पोस्ट किया करें। इस तरह रश्मि जी का इंटरनेट से परिचय हुआ जिसके माध्यम से बाद में उन्हें बहुत से अच्छे रचनाकार मिले। इन में प्रमुख थे जनाब विकास राणा साहब। शायरी.कॉम साइट किसी कारण से विकास राणा सहित बहुत से सदस्यों ने छोड़ दी उनमें रश्मि जी भी थीं।

इसके बाद विकास जी ने रश्मि जी के अलावा विपुल कुमार , वीनीत आशना, तरकश प्रदीप,कुणाल सिफर, अमित बजाज , निर्मल आर्य और विजय शंकर मिश्रा जैसे बहुत से प्रतिभाशाली युवा व अनुभवी रचनाकारों के साथ मिल कर 'हिंदवी' नाम से साइट बनाई जो इंटरनेट पर बहुत लोकप्रिय है और जिसके हज़ारों फॉलोअर हैं ।' हिंदवी' ने अपने बैनर तले अलग अलग स्थानों पर कामयाब साहित्यिक आयोजन किये हैं जिसमें देश के प्रसिद्ध रचनाकारों ने हिस्सा लिया है। 'हिंदवी' से जुड़ने के बाद रश्मि जी के लेखन के स्तर में अप्रत्याशित सुधार आया।पंकज सिजवाली  'उफ़क़' साहब और विपुल जी ने उन्हें ग़ज़ल लेखन के लिए जरूरी बातों की विस्तार से जानकारी दी। 'कुणाल सिफर' जो अब उनके दामाद भी हैं ने हर क़दम पर उन्हें सहारा दिया। आज वो जिस मुकाम पर हैं वो अपनी अथक मेहनत और हिंदवी के सदस्यों के सहयोग से हैं।

'रश्मि' जी की लोकप्रियता का आलम ये है कि कुछ समय पूर्व अपनी न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान जब उन्होंने वहां की प्रसिद्ध कवयित्री 'प्रीता व्यास' जी से संपर्क साधा तो 'प्रीता' जी ने उन्हें न्यूजीलैंड में होने वाले एक कवि-सम्मेलन में बतौर चीफ गेस्ट आमंत्रित किया जहाँ उनकी रचनाओं ने न्यूजीलैंड निवासियों को मंत्र मुग्ध कर दिया। 'प्रीता व्यास' जी ने अपनी मधुर आवाज़ में हाल ही में रश्मिजी की एक लाजवाब ग़ज़ल को यू ट्यूब पर डाला है जो सुनने लायक है।      

रश्मि जी इन दिनों अपनी पंजाबी ग़ज़लों की किताब को अंतिम रुप देने में व्यस्त हैं। हम दुआ करते हैं कि उनकी 'काग़ज पर...' किताब के लोकार्पण का सपना जो कोरोना के चलते संभव नहीं हो पाया उनकी पंजाबी ग़ज़लों की किताब आने पर जरूर पूरा हो ।

कहते हैं कि ग़ज़ल कहना आसान नहीं होता और सरल सीधी ज़बान में कहना तो बहुत ही कठिन होता है लेकिन रश्मि जी ने इस कठिन काम को अपने हुनर से साधा है। उनकी ग़ज़ल़ें उन्हीं की तरह सीधी, सरल और इमानदार हैं जो पढ़ते/सुनते वक्त सीधे दिल में उतर जाती हैं। आप रश्मि जी को उनकी इन बेहद खूबसूरत ग़ज़लों के लिए 9815605163 पर फोन कर बधाई देना न भूलें।

आखिर में उनकी किताब से लिए चंद और शेर आपकी नज़र हैं..

मन से उठ आंखों तक आया 
बूंद बना फिर ढलका कोहरा 

मैंने आंचल में भर रक्खा 
इसका उसका सब का कोहरा 

किस कोहरे की बात करें हम 
मौसम का या मन का कोहरा 
*
मैं बहुत सोचने लगी हूं ना 
ये भी तो सोच ही रही हूं ना

छू के देखो मुझे बताओ फिर 
मैं यहाँ से चली गई हूँ ना
*
एक उदासी लिपटी छत के पंखे से 
और कमरे में घूम रहा है सन्नाटा 

पहले शोर मचा फिर हाहाकार हुई 
लेकिन आखिर जीत गया है सन्नाटा
*
मैंने जब इक आंख बनाई काग़ज़ पर 
उसने आंख में नहर बहाई काग़ज़ पर 

दिल का हाल लिखा चिट्ठी में पढ़ लेना 
दिल पर एक लकीर लगाई काग़ज़ पर 

पहलू में आ बैठ करूंँ तस्वीर तमाम 
देख जरा अपनी तन्हाई काग़ज़ पर

***

Monday, June 7, 2021

किताबों की दुनिया - 233


भारतीय रेलवे को अपने उस मुलाज़िम पर गर्व होना चाहिए जो ऐसा शायर है जिसने उर्दू अदब को अपनी ग़ज़लों से मालामाल किया है और जिसकी ग़ज़लें दुनिया भर के ग़ज़ल गायक आज भी गाते हैं। भारतीय रेलवे का तो पता नहीं लेकिन हर वो शख़्स जो इनके संपर्क में आया इसे आज भी अपने जीवन की बड़ी उप्लब्धी मानता है और इस बात पर गर्व करता है । शायर तो बहुत हुए हैं लेकिन ऐसा शायर जो सबको अपना सा लगता हो और जिसकी बातें याद करते ही लोगों का दिल भर आए, बहुत कम हुए हैं।

मैं शायर तो नहीं हूँ अलबत्ता कभी तुकबंदी किया करता था ,अब वो भी छोड़ दी है, खैर! तो कभी एक शेर हुआ था कि:
समझना तब हक़ीक़त में ये दुनिया जीत ली तूने
कि तेरे बाद जब घर में तुझे बच्चे तलाशेंगे

लोगों के पास आपकी मौजूदगी में आपको तलाशने और आपसे मुहब्बत करने के सैंकड़ों कारण हो सकते हैं लेकिन आपके दुनिया से जाने के बाद अगर लोगों को आपकी कमी महसूस हो तो समझिए कि जिंदगी का मक़सद पूरा हुआ। हमारे आज के शायर को इस दुनिया ए फ़ानी से जाने के बाद उनके बच्चे ही नहीं सभी अहबाब आज भी उतनी ही शिद्दत से अपनी यादों के गलियारों में तलाशते हैं जितनी शिद्दत से उनका साथ पाने को उन्हें यहाँ वहां उनकी मौजूदगी में तलाशा करते थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि 'अच्छे लोगों को ढूँढना मुश्किल होता है, छोड़ना और भी मुश्किल और भूल जाना नामुमकिन।'

ये बुअद भी निगाहे-मोहब्बत पर बार है 
इतने करीब आओ कि तुम भी नज़र न आओ
बुअद: दूरी, बार : बोझ
*
तुम्हारी याद कितनी दिलनशीं है 
मैं अपने आपको भूला हुआ हूं 

मुझे अपने सिवा सब की ख़बर है 
मैं खुद को छोड़ कर सब से मिला हूं 

जिसे आना हो मेरे साथ आए 
मैं अपनी रोशनी में चल पड़ा हूं
*
ऐ जुर्मे आगही कोई ज़िन्दाँ तलाश कर 
खाते रहेंगे राह में पत्थर कहाँ तलक
जुर्मे-आगही: ज्ञान का जुर्म, जिन्दाँ: क़ैदखाना
*
अब जिंदगी न जाने करे हमसे क्या सुलूक 
जब तक तुम्हारा साथ रहा जी में जी रहा
*
दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है 
हम भी पागल हो जाएंगे ऐसा लगता है 

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारों सोचो तो 
शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है 

दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं 
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है

आंखों को भी ले डूबा ये दिल का पागलपन 
आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है

हमारे आज के शायर की जिस किताब को आपके लिए लाया हूँ उसमें मुझे दो बहुत बड़ी खराबियां नज़र आईं । वैसे खराबियां नहीं कहना चाहिए लेकिन जब तक मुझे कोई दूसरा लफ़्ज नहीं मिलता इसी से काम चलाना पड़ेगा। पहली खराबी तो ये कि लगभग 230 पेज की इस एक किताब को पढ़ने में मुझे इतना वक्त लगा जितना दूसरी 230 किताबें पढ़ने में नहीं लगा होगा। कारण -इस किताब का हर शेर मुझे ठिठकने को और फिर फिर पढ़ने को मजबूर करता, आगे बढ़ने ही नहीं देता किसी तरह आगे बढ़ भी जाता तो पिछले शेर की कशिश मुझे वापस खींच लेती। ये किताब ऐसी बुरी आदत की तरह मुझे लगी जो छूटे नहीं छूटती। इस किताब का अपना नशा है और नशा तो बुरा माना गया है लेकिन जिन्हें इस नशे की लत शराब की लत की तरह लगती है वही कहते हैं ' लुत्फ़े मय तुमसे क्या कहूँ जाहिद, हाय कमबख्त़ तूने पी ही नहीं'। 
इस किताब को जितनी बार पढ़ने को हाथ में लिया हमेशा लगा कि पहली बार पढ़ रहा हूँ।। ये पहली नज़र के प्यार जैसी नहीं है जो दूसरी नज़र में बासी हो जाता है। हर चीज दूसरी नज़र में बासी हो जाती है और जो नहीं होती उसी के लिए शायर 'विज्ञान व्रत' साहब का शेर है कि ' तुमसे जितनी बार मिला हूँ, पहली पहली बार मिला हूँ' । 

दूसरी खराबी इस किताब की ये है कि ये किताब अब बाज़ार में उपलब्ध नहीं है। क्यों नहीं है ये मुझे नहीं पता, बस इतना पता है कि उपलब्ध नहीं है। इसे मैं सबसे बड़ी खराबी मानता हूँ। हिंदी में इतने शायरों की किताबें आसानी से उपलब्ध हैं लेकिन अभी भी बहुत से ऐसे शायर हैं जिनकी किताबें उपलब्ध होनी चाहिएं लेकिन नहीं हैं। इसे मैं उन बेहतरीन शायरों की बदकिस्मती कहूँ जिन्हें हिंदी पाठकों का विशाल संसार नहीं मिला या हिंदी पाठकों की जिन्हें उन बेहतरीन शायरों का क़लाम पढ़ने को नहीं मिल रहा ।

खैर! जो किताब मेरे सामने है उसका नाम है 'पत्थर हवा में फेंके' और शायर हैं मरहूम जनाब 'क़ैसर-उल-जाफ़री' साहब। इस क़िताब में क़ैसर साहब की पिछली चार किताबों (रंग-ए-हिना -1964 , संग-आशना -1977, दश्ते- बेतमन्ना-1988 और हर्फ़े-तसलीम-1955 ) का निचोड़ है। इस किताब को हिंदी बुक सेन्टर, नई दिल्ली ने 1995 में प्रकाशित किया था। इस किताब का इज़रा मुंबई के 'नेहरू सेंटर' वर्ली में हुआ था।उस मौके पर प्रकाशित एक पैमफ्लेट में जनाब शाहिद लतीफ़ साहब का ये कोट जाफ़री साहब की शायरी को मुकम्मल तौर पर बयाँ कर देता है। उन्होंने जाफ़री साहब के लिए लिखा कि 'He loves beauty and he beautifies love '


बादल हवा के दोश पे उड़ते फिरें मगर 
प्यासी ज़मीं कहे तो ठहर जाना चाहिए 
दोश: कंधे

दिन ढल गया तो मौत है इक जश्ने बेबसी 
सूरज चमक रहा हो तो मर जाना चाहिए
*
सामने हो मगर हाथ आते नहीं 
तुम हमारे लिए आसमां हो गए
*
जी लिए, जितने दिनों उनकी निगाहों में रहे 
अब ये जीना तो बुजुर्गों की दुआ लगता है
*
अब दिन के उजाले में हमें कौन पुकारे 
चमके थे कभी रात में जुगनू की तरह हम
*
बुझे भी तो धुआं गूंजेगा बरसों 
हवा के सामने जल कर तो देखो
*
संगबारी के तमाशे में सभी थे शामिल 
मैंने पत्थर न उठाया तो गुनहगार लगा
*
जी चाहता है फिर कोई कमसिन करे सलाम 
बरसो गुज़र गए हैं किसी को दुआ दिए
*
ख्वाबों के हार गूंथने बैठी थी जिंदगी 
कम पड़ गए जो फूल तो कांटे पिरो लिए
*
मेरी आंखों का हासिल थे वो लम्हे 
मैं जितनी देर तुम को देख पाया

उत्तरप्रदेश के इलाहबाद की चाइल तहसील में दो गाँव ऐसे हैं जिन्हें एक पतली सी पगडण्डी अलग करती है। एक गाँव का नाम है 'नज़रगंज' और दूसरे का 'बड़ा गाँव'। इसी नज़रगंज में सैय्यदों के खानदान में क़ाज़ी सैय्यद सग़ीर अहमद और इशरत बेग़म के यहाँ 14 सितम्बर 1928 को जिस बच्चे का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया 'क़ाज़ी सैय्यद ज़ुबैर अहमद'। सैय्यदों के खानदान के लोग दोनों गाँवों में बसे हुए हैं। इन्हें पढ़े लिखे लोगों का ख़ानदान माना जाता है। ज़नाब जुबेर अहमद अभी छोटे ही थे कि उनके सर से माँ का साया उठ गया। उनके चाचा मौलाना अख़्तर साहब जो बड़े गाँव में रहते थे को ज़ुबैर अहमद साहब से बहुत लगाव था। उनकी अपनी कोई औलाद नहीं थी लिहाज़ा ज़ुबैर साहब उन्हें अपना ही बेटा लगते। वो उसे अरबी फ़ारसी और उर्दू की तालीम देने लगे। 

ज़ुबैर अहमद साहब को उर्दू ज़बान से मुहब्बत सी हो गयी। नज़रगंज में एक तालाब था जिसके किनारे वो अपने दोस्त आलम इलाहबादी के साथ अक्सर जा कर घंटो बैठे रहते। ऐसे ही किसी चाँदनी रात में दोनों दोस्त बैठे बतिया रहे थे कि ज़ुबैर साहब ने अचानक एक मिसरा कहा तभी एक मिसरा आलम ने कह दिया। दोनों दोस्त अपने इस पहले शेर कहने की क़ामयाबी पर देर तक खुश होते रहे। आलम एक हादसे में उसी तालाब में डूब गया जिसका अफ़सोस ज़ुबैर साहब को ताउम्र रहा। इसी बीच ज़ुबैर साहब के अब्बा नज़रगंज़ हमेशा के लिए छोड़ कर इलाहबाद आ कर बस गए। इलाहबाद में वालिद की सरपरस्ती में ज़ुबैर साहब का तालीमी दौर शुरू हुआ। बिलकुल तनहा और उदास। सबसे पहले उन्होंने फ़ानी बदायूनी की शायरी पढ़ी। पहली मुकम्मल ग़ज़ल एक दिन गर्मियों की सूनी दोपहरी में सहन में फैले पीपल के पेड़ तले अचानक हुई और कुछ ही देर में जेहन से उतर भी गयी। उसके बाद ज़ुबैर साहब पर एक कैफ़ियत सी तारी हो गयी और वो कभी हल्के या गहरे शेर कहने लगे। उन्हें ज़िन्दगी में कभी किसी उस्ताद से इस्लाह लेने की जरुरत ही महसूस नहीं हुई। ग़ज़ल का उरूज़ जाने बगैर उन्होंने कभी एक मिसरा भी बेबहर नहीं कहा। अगर आप शायरी के तालिबे इल्म हैं और ग़ज़ल कहना सीख रहे हैं तो उरूज़ की बाक़ायदा तालीम लें क्यूंकि ऊपर वाला हर किसी पर मेहरबान नहीं होता। इन्हीं ज़ुबैर अहमद साहब  को बाद में दुनिया ने 'क़ैसर उल जाफ़री' के नाम से जाना। 

कितने भी घनेरे हों तेरी जुल्फ़ के साये 
एक रात में सदियों की थकन कम नहीं होती
*
या रब ! ख़ता मुआफ़ कि इस बेबसी के साथ 
जीना, तेरा मज़ाक़ उड़ाना लगा मुझे
*
लोग क़िस्तों में मुझे क़त्ल करेंगे शायद 
सबसे पहले मेरी आवाज पे तलवार गिरी
*
हम अपनी ज़िंदगी को कहां तक संभालते 
इस क़ीमती किताब का क़ाग़ज़ ख़राब था
*
दुआ करो, मेरी ख़ुशबू पे तबसिरा न करो 
कि एक रात में खिलना भी था, बिखरना भी 

तुम इतनी देर लगाया करो न आने में 
कि भूल जाए कोई इंतज़ार करना भी 

मेरे ग़ुरुर ने चारागरी क़ुबूल न की 
तेरी निगाह को आता था ज़ख़्म भरना भी
*
घर लौट के रोएंगे मां-बाप अकेले में 
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
*
चीख़ता फिरता हूं ख़ुद अपने बदन के अंदर 
मुझ से बढ़कर कोई सहारा हो तो घर से निकलूं
*
बादे सबा हूं, छू के गुजर जाऊंगा तुझे
मैं चांदनी नहीं कि तेरी छत पर सो सकूं

ज़नाब क़ाज़ी सैय्यद ज़ुबैर अहमद जाफ़री के क़ैसर उल जाफ़री बनने तक का सफर बहुत लम्बा और मुश्किल भरा रहा। इस्लामिया मजीदिया कालेज इलाहबाद में पढाई के दौरान शायरी का नशा परवान चढ़ा। साहिर, हफ़ीज़ जालंधरी और जोश मलीहाबादी के अलावा नून मीम राशिद और मीराजी पर भी दिल आगया। अपने शायर दोस्त इब्ने सफ़ी के साथ मिल कर उन्होंने कॉलेज के मुशायरों में धूम मचा दी। सब कुछ ठीक चल रहा था कि मुल्क़ को तक़्सीम का ज़हर पीना पड़ा। इसी बीच पिता बीमार हो गए और क़ैसर साहब जो मेट्रिक और इंटरमीडिएट में फर्स्ट डिवीजन से पास हुए थे को अपनी पढाई बीच ही में छोड़ देनी पड़ी।एक होनहार बच्चे के आगे पढ़ने और कुछ बड़ा बनने के ख़्वाब, ख़्वाब ही रह गए। घर खर्च चलाने के लिए इलाहबाद से निकलने वाले 'नया अखबार' के दफ़्तर में मन मार कर छै महीने नौकरी की । इसी बीच उनकी शादी मुंबई के एक लेदर मर्चेंट की एकलौती बेटी से हो गयी । इलाहबाद में जब उनका मन नहीं लगा तो वो 1948 में मुंबई क़िस्मत आज़माने आ गए।

मुंबई के शुरू के दो चार साल उन्होंने फुटकर प्राइवेट नौकरियाँ कीं फिर वेस्टर्न रेलवे के कमर्शियल विभाग में नौकरी करने लगे और 1986 याने रिटायर होने तक करते रहे। मुंबई आ कर उनकी मुलाक़ात तरक़्क़ी पसंद शायरों से हुई और उनकी सोहबत से ही उनकी शायरी को परवाज़ मिली। क़ैसर साहब किसी बने बनाये ढर्रे पर नहीं चले उन्होंने अपने मिज़ाज़ से शायरी की जो बहुत पसंद  की गयी। वो मुशायरों और ग़ज़ल गायकों के चहेते शायर बन गए। उन्होंने कुछ फ़िल्मी गीत भी लिखे लेकिन फ़िल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आयी। मुंबई के लोकप्रिय शायर देवमणी पांडे जी ने अपनी एक ब्लॉग पोस्ट में लिखा है कि 'क़ैसर उल जाफ़री मुहब्बतों के शायर हैं। उन्होंने अपनी शायरी में कभी मीनाकारी से काम नहीं लिया। अपनी शख्सियत के अनुरूप उन्होंने सीधे-सादे अल्फ़ाज़ में मुहब्बत के मंज़र पेश किये इसलिए उनकी शायरी बड़ी जल्दी पढ़ने सुनने वालों के साथ अपना जज़्बाती रिश्ता कायम कर लेती है। 

इसी पोस्ट में देवमणी जी क़ैसर साहब का एक दिलचस्प किस्सा भी बयाँ करते हैं जिससे उनकी सादगी और मिज़ाज़ का पता चलता है। वो बतातें कि कैसे एक दिन क़ैसर साहब अपने भतीजे रूमी जाफ़री को जो बाद में हिट फ़िल्मों के मशहूर लेखक हुए को किसी निर्माता से मिलवाने ये कह कर ले गए कि बरखुरदार उनका घर बस दस मिनट के फासले पे ही है और क़रीब एक घंटे से ज़्यादा देर तक बस दस मिनट, बस दस मिनट कहते हुए उन्हें पैदल ही रस्ते में गाजर खिलाते हुए ले गए। आख़िर मंज़िल पर पहुँच कर थके हारे रूमी जी से मुस्कुराते हुए बोले देखा बरखुरदार गाजर से शरीर को एनर्जी मिली और दस मिनट पैदल चलने से सेहत भी बन गयी। "इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा ---

आंखों में अब चुभन ना रही इंतज़ार की 
रातों को जागने का सबब ख़त्म हो गया
*
कभी-कभी तेरी पलकों पर झिलमिलाऊं मैं 
तू इंतिज़ार करे और भूल जाऊं मैं 

समुंदरों में पहुंचकर फ़रेब मत देना 
अगर कहो तो किनारे पे डूब जाऊं मैं 

तू मुझसे बात ना कर इतने रख रखाव के साथ 
तेरे क़रीब पहुंच कर न लौट आऊं मैं
*
मुट्ठी बंद किए बैठा हूं कोई देख न ले 
चांद पकड़ने घर से निकला जुगनू हाथ लगे
*
लम्हा लम्हा घर उजड़ा है मुश्किल से एहसास हुआ 
पत्थर आए बरसों पहले शीशे टूटे बरसों बाद
*
घर में तू भी तो नहीं जो कोई बर्तन टूटे 
ये जो कमरे में अभी शोर हुआ था, क्या था

तुम तो कहते थे ख़ुदा तुमसे ख़फा है क़ैसर
डूबते वक़्त जो एक हाथ बढ़ा था, क्या था
*
ज़रा सी देर चमकने को रात काफ़ी है 
ये दिन फ़ुज़ूल बने जुगनूओं की राय में
*
दिल ने बहुत कहा कि अकेले सफ़र करो !
मैं कारवां के साथ चला और भटक गया

क़ैसर साहब की शख़्सियत और उनकी शायरी पर जो उनके दोस्त और बेपनाह चाहने वाले उदयपुर निवासी देश के मशहूर शायर और गायक जनाब प्रेम भंडारी साहब ने कहा है उसे पढ़ने के बाद क़ैसर साहब पर और कुछ कहने की गुंजाइश कम ही रहती है। प्रेम जी और क़ैसर साहब का लगभग 25 बरस का साथ रहा इन 25 बरसों में वो एक दूसरे से कई बार मिले। प्रेम जी लिखते हैं कि ' क़ैसर साहब का क़लाम उतनी ही सादगी लिए होता था जितनी सादा उनकी शख़्सियत थी। उनकी सादगी के किस्से बयां करने बैठें तो शायद एक किताब भी कम पड़े। बेफ़िकराना मिज़ाज ,खुलूस ,सादगी और बेलौस मोहब्बत उनके क़िरदार की खूबियां थीं।  इतने सालों में उनको सादा एक सफ़ेद कुर्ते और पाजामे में ही देखा कुर्ते पर अक्सर वो एक जैकेट पहना करते थे। मैंने उनके शेरों को मैंने सिर्फ़ याद करके गाया ही नहीं बल्कि अपनी ज़िन्दगी में उतारने और अमल करने की भी पूरी पूरी कोशिश की है। मैं अपनी ज़िन्दगी में कई शायर और अदीबों से बहुत नज़दीकी तौर पर मिला हूँ इसलिए मैं खुल के कह सकता हूँ कि उनके जैसा सादा दिल, ज़मीन से जुड़े रहने वाला, सबको बेलौस मुहब्बत लुटाने वाला रहम दिल इंसान मैंने नहीं देखा। 

मेरा एक प्रोग्राम मुंबई में था जिसमें क़ैसर साहब भी मौजूद थे। श्रोताओं ने मुझसे पंकज उधास  जी द्वारा गायी क़ैसर साहब की मशहूर ग़ज़ल 'दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है --'गाने की फ़रमाईश की मैंने श्रोताओं से कुछ वक़्त माँगा। इंटरवल में मैंने क़ैसर साहब से कहा कि अगर उस ग़ज़ल में कुछ शेर ऐसे हों जिसे पंकज उधास जी ने न  गाया हो तो बताएं मैं वो गाऊँगा। क़ैसर साहब मुस्कुराये पास पड़ा एक कागज़ का टुकड़ा उठाया उस पर कुछ लिखा और बोले लीजिये ये पढ़ कर सुना दीजिये , आप उनकी हाज़िर जवाबी देखिये कि एक मिनट से भी कम समय में मुझे जो शेर लिख के दिए वो क्या कमाल थे :

तन्हाई में बैठ के रोना अच्छा लगता है 
कोई आँसू पोंछ रहा है ऐसा लगता है    

आईने से आँख मिलाते डर सा लगता है 
सारा चेहरा टूट गया हो ऐसा लगता है 

हम भी पागल हो कर 'क़ैसर' देखेंगे इक दिन 
दीवारों से मिल कर रोना कैसा लगता है 

आप देखें कि कैसे उन्होंने अपनी ग़ज़ल के मतले को मक़्ता बना कर पेश किया। मैंने जब ये शेर गा कर सुनाये तो पूरे हॉल में श्रोताओं ने खड़े हो कर तालियाँ बजायीं।  ये तालियां मेरी गायकी के लिए नहीं क़ैसर साहब की दिलकश शायरी के लिए थीं।' 

मिट्टी की देख-रेख से चूल्हे की आग तक 
सूखे हुए शजर की कहानी तवील है 

पल भर में ज़ख़्म, कोशिशे-दरमां तमाम उम्र 
क़ातिल से, चारागर की कहानी तवील है
*
पागल हो कर देख लिया है 
पागलपन है पागल होना !!
*
हमको क्या रोकोगे लोगो ! हम ऐसे दीवाने हैं 
पैरों में ज़ंजीर पड़े तो, रक़्स करें झनकारों पर
*
वो रोज़ रोज़ जो बिछड़े तो कौन याद करे 
वो एक रोज़ न आए तो याद आए बहुत
*
ख़्वाब पलकों में पिरोते रहिए 
रात होती नहीं सोने के लिए
*
देखने जाओ तो ज़ख़्मों से बदन छलनी है 
ढूंढने जाओ तो खंजर न दिखाई देगा
*
हाथ बौनों के तो पहुंचेंगे न शाख़ों के क़रीब 
चंद फूलों के लिए, पेड़ों को काटा जाएगा
*
कोई सबब, न बहाना, कभी-कभी यूं ही 
किसी को मुझसे शिकायत रही, किसी से मुझे
*
तुमको एहसान जताना है तो हम जाते हैं 
हमसे दो बूंद को दरिया न कहा जाएगा

मेरे जयपुर के एक अज़ीज़ मित्र हैं जो गायक हैं रंगकर्मी हैं और शायरी के प्रेमी हैं नाम है 'गुरमिंदर सिंह 'रोमी' । यारों के यार हैं हमेशा मुस्कुराते हुए मदद को तैयार। करोड़ों में एक।  उन्होंने एक बार मुझे क़ैसर साहब का शेर और उनसे अपनी मुलाक़ात का किस्सा सुनाया तो मैंने कहा दुःख की बात है रोमी भाई कि क़ैसर साहब की कोई किताब हिंदी में नहीं है तो वो तपाक से बोले कैसे नहीं है ? मैंने देखी है और तुरंत उदयपुर में अपने मित्र प्रेम भंडारी जी को फोन मिला कर कहा कि प्रेम जी आपके पास जो क़ैसर साहब की किताब है वो जयपुर नीरज जी को भेज दें और देखिये साहब कि प्रेम जी ने तीसरे ही दिन वो किताब जिसे क़ैसर साहब ने अपने हाथ से लिख कर प्रेम जी को भेंट दी थी तुरंत मुझे भेज दी। आज की पोस्ट रोमी जी और प्रेम जी के सहयोग के बिना संभव नहीं थी। प्रेम जी ने ही मुझे क़ैसर साहब के होनहार बड़े साहबज़ादे जनाब इरफ़ान जाफ़री जिन्होंने अपने अब्बू की विरासत को सँभाला हुआ है और बेहतरीन शायरी करते हैं का मोबाईल नंबर भी दिया। 

रोमी जी क़ैसर साहब के बहुत बड़े फैन हैं और उन्हें उनके कई शेर जबानी याद हैं जिसे वो गाहे- बगाहे अपनी गुफ़्तगू की माला में मोतियों सा पिरोते हैं। रोमी जी क़ैसर साहब से दो बार मिले हैं एक बार मुंबई में और दूसरी बार उदयपुर में और इन दोनों मुलाक़ात के ख़ुशग़वार लम्हे उनकी यादों में हमेशा जगमगाते रहते हैं।मुंबई में क़ैसर साहब का प्रेम भंडारी जी से मिलने आना और लगभग पाँच सात घंटों तक अपनी शायरी से नवाज़ना उन्हें खूब याद है। रोमी जी कहते हैं कि इस पूरी मुलाक़ात के दौरान उन्होंने ये एहसास कभी नहीं होने दिया कि वो इस देश के इतने नामी गरामी शायर हैं। रोमी जी की तुकबंदियों को भी उन्होंने दिल से दाद दी और उनकी ग़ज़ल की कमियों की और इस तरह समझाया जैसे कोई बाप अपने बेटे को समझाता है। वो एक ऑटो रिक्शा में मिलने आये थे।ऑटो रिक्शा का ड्राइवर उनके परिवार के सदस्य जैसा ही था जो उन्हें हमेशा वहां ले जाता जहाँ उन्होंने जाना होता था और जब तक वो किसी नशिस्त या मुशायरे से फ्री नहीं होते वहीँ उनके लिए खड़ा रहता। क़ैसर साहब भी उसका पूरा ध्यान रखते और जो खुद खाते वही उसको भी खिलाते। ये छोटी छोटी बातें बतलाती हैं कि वो कितने सरल इंसान थे। 

यूं उम्र हमने काटी दीवाना जैसे कोई 
पत्थर हवा में फेंके पानी पे नाम लिक्खे

ऐ कातिबे मुकद्दर सदके तेरे क़लम के 
दो दिन की ज़िंदगी में सदियों के काम लिक्खे
*
तेरे क़रीब से गुज़रूं तुझे न पहचानूं 
मेरी नज़र भी कभी इंतिक़ाम ले ले तो
*
मेरे पुरखों ने दी थी मुझको एक उजड़ी हुई दुनिया 
मेरे बच्चों ने मुझ पर भी यही इल्ज़ाम रक्खा है
*
रेशम के लिबास आए, पहना गए उरियानी 
इंसान फरिश्ता था, इंजीर के पत्तों तक
उरियानी: नग्नता
*
अगर अंदर की थोड़ी रोशनी बाहर न आ जाती
 मैं अपने आप से टकरा गया होता अंधेरे में
*
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे 
मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा न लगे

जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो 
कि आसपास की लहरों को भी पता न लगे
*
रस्ते भर रो रो के पूछा हमसे पांव के छालों ने 
बस्ती कितनी दूर बसा ली, दिल में बसने वालों ने

बर्बादी का मेला देखो क़ैसर अपनी आंखों से 
मेरे घर को छोड़ दिया है, बस्ती फूंकने वालों ने

इरफ़ान जाफ़री साहब बताते हैं कि हम सभी भाई बहनों ने कभी अब्बूजी को उदास या दुखी नहीं देखा। कभी उनकी आँख में आंसू नहीं देखे, कभी किसी चीज का मलाल करते नहीं देखा कभी किसी की शिकायत या किसी से गिला करते नहीं देखा। जो है, जैसा है, जितना है उसी में उन्हें खुश देखा वो बहुत Pure Soul थे। बड़े खूबसूरत इंसान थे। एक आदर्श पति और जिम्मेदार पिता। उनका एक शेर :
जहन के सारे दरीचों पे जमीं है पतझड़ 
इक तेरा नाम महकता है गुलाबों की तरह 
सुनाते हुए इरफ़ान साहब भरे गले से बताते हैं कि अब्बू जी की यादें अब हमारे दरमियाँ गुलाबों की तरह महकती हैं। 

सन 2005 की बात है , इरफ़ान साहब चाहते थे कि इस साल अब्बू जी की 77 वीं सालगिरह का जश्न बहुत धूमधाम से मनाया जाय। क़ैसर साहब से मशवरा किया तो वो बहुत खुश हुए। सभी रिश्तेदारों और दोस्तों से एक साथ मिलने का मौका जो मिलने वाला था। दो महीने पहले से तैयारियां शुरू हो गयीं तभी अचानक रायपुर से उर्दू अकेडमी की सेकेट्री 'उस्मा अख्तर' साहिबा  का फ़ोन इरफ़ान साहब के पास आया उन्होंने बताया कि सालाना होने वाले प्रतिष्ठित 'चक्रधर समारोह' के मुशायरे में हम क़ैसर साहब को बुलाना चाहते हैं। मुशायरा शायद 14 या 15 सितम्बर को था। इरफ़ान साहब ने बताया कि हम लोग अब्बूजी के योमे पैदाइशी का जश्न मनाने जा रहे हैं इसलिए इस बार आप उन्हें रहने दें। 'अख्तर साहिबा तुरंत बोलीं 'क़ैसर साहब क्या सिर्फ़ आपके ही अब्बू हैं ?आप फ़िक्र न करें हम यहाँ रायपुर में उनका जश्न धूम धाम से मनाएंगे और इस मौके पर उनका सम्मान भी करेंगे। अख़्तर साहिबा की ये बात सुन कर इरफ़ान साहब मना नहीं कर पाए और क़ैसर साहब को रायपुर भेज दिया।  

इरफ़ान साहब ने ,जो क़ैसर साहब से कुछ मिनट के फासले पर ही रहते थे, एक नियम बना रखा था। नियम के अनुसार जब भी क़ैसर साहब मुंबई के बाहर किसी मुशायरे से वापस घर आते तो इरफ़ान साहब उनके पास उस रात गपशप करने और चाय पीने जरूर जाते।16 सितम्बर को क़ैसर साहब जब रायपुर से वापस आए तो क़ायदे से इरफ़ान साहब को मिलने आना था लेकिन उस दिन अजीब सी थकान होने से उन्होंने सोचा कि आज नहीं कल मिलने जाऊंगा और बिस्तर पर लेट गए लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उन्हें लगा कि नहीं जो नियम इतने बरसों से नहीं टूटा उसे आज भी नहीं टूटना चाहिए। ये सोच कर वो उठे और अब्बूजी से मिलने चले गए। हमेशा की तरह क़ैसर साहब ने चाय बनाई मुशायरे और वहां हुए उनके सम्मान के बारे में ढेरों बातें की। बातों बातों में क़ैसर साहब ने ये भी बताया कि कल सुबह वो अपने प्रकाशक के पास अपनी आगामी किताब 'अगर दरिया मिला होता' का मसौदा लेकर जाएंगे और शाम को चित्रकार स्नेह तुली की पहली ग़ज़लों की किताब का इज़रा जो अँधेरी के कामत क्लब में है वहाँ वो मुख्य अतिथि की हैसियत से जाएंगे। रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे इरफ़ान भाई वापस अपने घर लौट आये।     

शिकवा गिला नहीं है वो हमसे करें न बात 
लेकिन सवाल ये है, कोई बात भी तो हो
*
हवा में मेरी अना भीगती रही वरना 
मैं आशियाने में बरसात काट सकता था
*
दरो दीवार हैं मैं हूं मेरी तन्हाई है 
चांदनी रात से पूछो मेरा घर कैसा लगा
*
मिलेगी राख न तुमको हमारे चेहरे पर 
बदन में रह के सुलगना बड़ा हुनर है मियां
*
सांस लेता हूं तो ज़ंजीर ख़नक उठती है 
उम्र जैसे किसी बेनाम सज़ा में गुज़री

दूसरे दिन रोज़ाना की तरह इरफ़ान साहब तैयार हुए और अपने आफिस के लिए निकल गए जो मुम्ब्रा, जहाँ वो रहते थे, से डेढ़-दो घंटे की दूरी पर था। सुबह के लगभग सवा दस बजे इरफ़ान साहब के पास उनके छोटे भाई का फोन आया कि अब्बूजी का एक्सीडेंट हो गया है। फ़ौरन उन्हें  ठाणे डॉ. जोशी के हस्पताल में ले जाया गया। इरफ़ान साहब जब हॉस्पिटल पहुंचे तो उन्होंने देखा कि क़ैसर साहब के बदन पर गहरी चोट का कोई निशान नहीं था अलबत्ता वो बेहोशी की हालत में थे। लोगों ने बताया की अपने घर की गली से जब क़ैसर साहब मुख्य सड़क पर आये तो एक तेज गति से आती जीप ने उन्हें टक्कर मार कर गिरा दिया। शाम सीटी स्केन की रिपोर्ट से पता चला की उनके ब्रेन में क्लॉट है। 17 सितम्बर की उस मनहूस सुबह से 5 अक्टूबर की शाम तक ज़िन्दगी और मौत की जंग में मौत की फ़तह हुई। पहले रमज़ान के चाँद के नजर आने के दस मिनट बाद क़ैसर साहब इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़सत हुए। 
इरफ़ान साहब ने घर जा कर सब भाई बहनों को इकठ्ठा किया और कहा कि हम सब बच्चों ने अपने माँ-बाप के साथ और हमारे माँ-बाप ने हम सब के साथ चालीस पैंतालीस साल का वक्त बहुत हँसी-ख़ुशी से बिताया है और ये बात अब हमें ता-उम्र याद रखनी है। 

ठाणे में उन्हें बेपनाह चाहने वाले हज़ारों लोग हैं। वो गली जिसमें वो रहते थे, ख़तम हो कर मेन सड़क से मिलती है उसके सामने कब्रिस्तान है जहाँ क़ैसर साहब को सुपुर्दे-ख़ाक किया गया। बाद में ठाणे म्यूनिसपल्टी ने उस गली का नाम 'क़ैसर उल जाफ़री मार्ग' रखा है। अपने देश में गलियों, सरकारी दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों, स्टेडियमों, लाइब्रेरियों, भवनों के नाम साहित्यकारों पर कम ही रखे जाते हैं क्यूंकि इनपर ज्यादातर नेताओं का कब्ज़ा रहता है ऐसे में क़ैसर साहब के नाम पर गली का नाम रखा जाना अच्छा संकेत है। 


आखिर में क़ैसर साहब के प्रेमियों को ये बता देता हूँ कि 'पत्थर हवा में फेंके' भले ही बाज़ार में नहीं मिलेगी लेकिन उनकी शायरी का कलेक्शन देवनागरी में 'डाइनामिक बुक्स मेरठ' ने 9 किताबों के सेट में निकाला है। आप 121-2644766 /4026111 पर संपर्क करके मंगवा सकते हैं। क़ैसर साहब के बारे में अधिक जानकारी  इरफ़ान साहब से उनके मोबाईल न. 9987792355 पर संपर्क कर ले सकते हैं।  .       

सिला मेरे जुनूं का, और दुनिया 
बहुत सोचा तो एक पत्थर उठाया
*
किस तरह समो लूं मैं तुम्हें अपनी ग़ज़ल में 
जब शेर पढ़े कोई तो काग़ज़ से छनो लो तुम
*
किसने कहा था राह से हटकर सफ़र करो 
हमने ख़ुद अपने पांव में कांटे चुभो लिए
*
कैसे बाक़ी रात कटेगी 
सुब्ह समझ कर शमा बुझा दी
*
ज़िंदगी है तुम्हारी गली तो नहीं 
छोड़ देंगे अगर छोड़ देना पड़ा



Monday, May 24, 2021

किताबों की दुनिया - 232

पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र
किस से कहें कि पाँव के कांटे निकाल दे

चलिए शायरी के दीवानों से एक पहेली पूछी जाय इस पहेली को मेरे जैसे पुरानी हिंदी फिल्मों के प्रेमी शायद सुलझा पाएं लेकिन नई नस्ल के पाठकों से इस पहेली का जवाब मिलना अगर असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। जरा इन पुराने फ़िल्मी गानों को याद करें 1. यूँ तो हमने लाख हसीं देखे हैं तुमसा नहीं देखा --- 2. माँग के साथ तुम्हारा मैंने माँग लिया संसार ---3. जरा हौले हौले चलो मेरे साजना ,हम भी पीछे हैं तुम्हारे---4. मैं रंगीला प्यार का राही, दूर मेरी मंज़िल ---5 पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे ---6. ये क्या कर डाला तूने दिल तेरा हो गया ---7. एल्लो जी सनम हम आ गए आज फिर दिल लेके --- ठीक? कर लिया याद ? एक बार फिर कर लें ! क्या कहा जरुरत नहीं, याद हैं ? अच्छा तो बतायें कि इन गानों में क्या एक चीज कॉमन है ? संगीतकार कॉमन है ? गीतकार कॉमन है ? कलाकार कॉमन है ? या *कुछ और* कॉमन है ?   

अब आप ऐसा करें कि आगे पढ़ने से पहले यहाँ रुक जाएँ और इस पहेली जवाब कहीं लिख लें ,यदि नहीं आता तो फिर आगे बढ़ जाएँ।  

जवाब है कि इनमें *कुछ और* कॉमन है और वो कॉमन है 'ताँगा' ! ये सभी गीत ताँगे पर फिल्माए गए हैं। सवाल ये उठता है कि किताबों की दुनिया में ताँगे का ज़िक्र क्यों ? वो यूँ कि हमारे आज के शायर भोपाल के हैं और भोपाल में बड़ा तालाब और ताज-उल-मस्ज़िद के अलावा कभी जो एक और चीज मशहूर हुआ करती थी वो थी 'ताँगा'। भोपाल के ताँगे पूरे भारत में मशहूर थे। दिलीप कुमार की फिल्म नया दौर में दिलीप साहब ने भोपाल का ताँगा चलाया था। तो ताँगे का जिक्र इसलिए क्यूंकि हमारे आज के शायर ने भी अपने लड़कपन में ताँगा चलाया। चलाया क्या यूँ कहें उनसे चलवाया गया। ताँगा चलाना निहायत गैर रूमानी काम है ,ये जो फिल्मों में हीरो के ताँगा चलाने और हीरोइन के साथ बैठ कर उसके सुर में सुर मिलाने को आप देख कर खुश होते हैं वो हक़ीक़त से कोसों दूर है।ताँगा चलाते हुए मटक कर गाना गा कर देखिये या तो आप खुद सड़क पर चित गिरे होंगे या ताँगे को किसी नाली में गिरा पाएंगे। 

बाप सैय्यद रमज़ान अली ने जब देखा कि उनके बरख़ुरदार पढ़ने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते बस सारा दिन आवारागर्दी करते हैं और रात में दोस्तों के साथ शायरी करते हैं या मुशायरों में बैठे शायरों को सुनते रहते हैं तो उन्हें घबराहट हुई कि ये बड़ा हो कर ये करेगा क्या ? लिहाज़ा उन्होंने अपने एक दोस्त का ताँगा इन्हें चलाने को दे दिया और कहा कि ले बेटा 'मोहम्मद अली' सँभाल इसे और घर में चार पैसे कमा कर ला। बेटा यूँ इतना फ़रमाबदार तो नहीं था कि बाप के कहने पर ताँगा हाँकने लगता लेकिन घर के हालात ऐसे थे कि वो मना नहीं कर पाया। भोपाल की ऊंची-नीची,खुली-तंग सड़कों पर ताँगा चलाना बहुत हुनर का काम होता था और जो दिल से शायराना तबियत का हो वो ताँगा चलाने का ये हुनर कहाँ से लाएगा ? ताँगा चलाते चलाते कोई मिसरा दिमाग में आ जाता तो उसे सँवारने में मोहम्मद अली इतना खो जाता कि ताँगा बाएँ की जगह दाएँ घुमा लेता इसपे सवारी झिकझिक करती। इन सब बातों से तंग आकर वही हुआ साहब जो होना चाहिए था, याने एक दिन मोहम्मद अली साहब ने अचानक सोचा कि क्या मैं भोपाल की सड़कों पर ताँगा हाँकने के लिए पैदा हुआ हूँ? दिल ने जवाब दिया 'हरगिज़ नहीं' बस तुरंत ताँगा वापस अपने बाप के दोस्त को देते हुए कहा 'ये काम हमसे न हो सकेगा 'और मुस्कुराते हुए मोहम्मद अली ने बेरोज़गारी का दामन थाम लिया।   

जब घर ये ख़बर पहुँची तो बाप रमज़ान अली को चिंता हुई कि अब इसका क्या होगा ? बाप तब भी बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे आज भी रहते हैं ,बेटे तब भी बे-फ़िक्र हुआ करते थे आज भी बे-फ़िक्र हैं लेकिन तब बेटे बाप की सुन लेते थे और मान भी लेते थे अब नहीं सुनते मानना तो दूर की बात है।  
ये बात बहुत पुरानी है जब भोपाल में ताँगे चला करते थे और बेटे बाप की बात मान लिया करते थे।  

ज़मीं पर पांँव, आंँखें आसमा पर 
रहोगे उम्र भर मग्मूम लोगो 
मग्मूम: दुखी

अगर तेशा नहीं पत्थर उठा लो 
रहोगे कब तलक मज़्लूम लोगो 
तेशा: कुदाली

अभी तक शहर का जिंदाँ है खाली 
दरो दीवार से महरूम लोगो
जिंदाँ: क़ैदखाना
*
शम्आ देहलीज़ पे रोशन रक्खो
क्या अजब है कि वो आ ही जाए
*
दर्द से चेहरे की ताबानी बढ़ी 
घर जला तो आस्माँ रोशन हुआ 
ताबानी: चमक
*
जाँ हथेली पे लिए फिरते हैं 
इक यही शर्ते-वफा है जैसे
*
बढ़े चलो के वो मंजिल अभी नहीं आई 
ये वो मुक़ाम है जिसका शुमार राह में है 

न पाँव थमते हैं अपने न हौसले दिल के 
सुना है जब से कोई ख़ारज़ार राह में है 
ख़ारज़ार: कांटो की झाड़ियां
*
मौत से यूँ मिले जैसे महबूब हो 
मौत हमसे मिली जिंदगी की तरह
*
जिसने सहरा में तुझको भेज दिया 
उसका सब कुछ बिगाड़ सड़कों पर

रमज़ान अली साहब ने सोचा कि बेटे को सिवा उर्दू, फ़ारसी और थोड़ी बहुत गणित के अलावा कुछ आता जाता है नहीं इसलिए इसे कोई ढंग की नौकरी तो मिलेगी नहीं, तो फिर क्या किया जाय ?अचानक उनको अपने एक परिचित 'समद दादा' याद आये जिन्होंने उन्हें कभी एक ऐसे मुलाज़िम की तलाश करने को कहा था जो उनके गली इब्राहिमपुरा वाले 'अहद होटल' को संभाल सके। रमज़ान साहब अपने बेटे मोहम्मद को साथ लिए एक दिन सवेरे सवेरे 'अहद होटल' जा पहुँचे जहाँ 'समद दादा' किसी खानसामे पर इसलिए बरस रहे थे कि उसने चाय का एक कप तोड़ दिया था। काउंटर पर भाजी वाला, जो आलू प्याज़ की बोरी लाया था उसके, पैसे माँग रहा था, बावर्चीखाने से तेल ख़तम हो गया है की गुहार लग रही थी और रेस्टॉरेंट में बैठे ग्राहक गर्म समोसे नहीं आने पर शोर मचा रहे थे। इस शोरो-गुल और अफ़रा तफ़री के माहौल में 'समद दादा' अपने बाल नौंच रहे थे तभी 'रमज़ान अली' ने उनसे जा कर कहा कि 'समद दादा आपके इस होटल को सँभालने के लिए मैं अपने बेटे 'मोहम्मद अली' को आपकी  मुलाज़मत के लिए लाया हूँ, ये इतना पढ़ा लिखा तो है कि काउंटर संभाल ले फिर भी आप एक बार देख-भाल कर तसल्ली कर लें।'समद दादा' को ऐसे लगा जैसे उखड़ती सांसों के मरीज़ को ऑक्सीजन सिलेंडर मिल गया हो। 'समद दादा' बिना 'मोहम्मद अली' की और देखे फ़ौरन अपनी कुर्सी से उठ कर बोले 'बरखुरदार मोहम्मद अली तुम बैठो, काम समझो, ये काउंटर संभालो, अब ये होटल तुम्हें चलाना है '। 'समद दादा' ये कह कर 'रमज़ान अली' के कंधे पर हाथ रख कर होटल से बाहर आते हुए बोले 'अली ये तुम्हारा बेटा है तो अब मुझे क्या देखना है ये संभाल लेगा ,तुमने मेरा बोझ हल्का कर दिया जो अपना बेटा मुझे सुपुर्द कर दिया-शुक्रिया।' 

अगर उस वक़्त समद दादा मोहम्मद अली के उस हुलिए को ,जिसका बयान निदा साहब ने अपनी किताब 'चेहरे' में यूँ किया है कि 'मोहम्मद अली चाल-ढाल और चेहरे से एक साथ कई इलाकों के बाशिंदे लगते थे। पान में छालियों की भरमार, चुटकीदार चूने के ऐतबार से भोपाली, चेहरे की  रंगत याने सियाही के लिहाज़ से बंगाली, मँझले कद की वजह से गढ़वाली और अंदर उतरी हुई छोटी आँखों और चपटी नाक से उन पर नेपाली होने का गुमान होता था, देख लेते तो  शायद उसे काउंटर पर नहीं बिठाते लेकिन उस वक्त 'समद दादा', के पास और कोई दूसरा चारा भी नहीं था।  

भोपाल की लम्बी सी गली इब्राहीम के 'अहद होटल' के काउंटर पर उस दिन बैठा तो 'मोहम्मद अली' लेकिन जब वो वहाँ से उठा तो 'ताज भोपाली' के नाम से पूरे देश में मशहूर हो चुका था। 'ताज भोपाली' साहब जिनका जन्म भोपाल में 1926 में हुआ था की ग़ज़लों का संकलन और संपादन भोपाल के प्रतिष्ठित शायर जनाब 'अनवारे इस्लाम' साहब ने 'किस से कहें' किताब में किया है, जिसे 'पहले पहल प्रकाशन' भोपाल ने प्रकाशित किया है। आप अनवारे इस्लाम साहब से 7000568495 पर संपर्क कर इस किताब को मँगवा सकते हैं। ये किताब अमेज़न से ऑन लाइन मँगवाई जा सकती है।  
  

बर्फ सी जम रही है होठों पर 
किसके रुख़्सारे-आतिशीं से कहें

हर जगह है तू इस फ़साने में 
तू जहांँ से कहे वहीं से कहें 

आंँसुओं की कहानियांँ ऐ 'ताज'
कब तक अपनी ही आस्तीं से कहें
*
तुम के हर मंजिलें-दुश्वार से हट जाते हो 
हम, के हर मंज़िले-आसाँ पे हंँसी आती है 

हमको इक खेल है यह तौको-सलासिल सैयाद
हमको ज़िन्दाँ में भी ज़िन्दाँ पे हँसी आती है
तौको-सलासिल: फंदा और बेड़ियाँ, ज़िन्दाँ:क़ैदखाना
*
चांँद इस तरह से मद्धम है सरे-शाख़े-गुलाब
सूरते-जख़्म पे जैसे के मसीहा चुप है
मसीहा: चिकित्सक
*
सोचेंगे सुब्ह, दिन ये गुज़ारेंगे किस तरह 
फ़िलहाल फ़िक्र है कि कहांँ रात कीजिए
*
हमारे रंजो-ग़म की इंतहा है 
मसीहा दाम पहले मांँगता है 

फ़राहम कर नहीं सकता है ख़ुद को 
कभी इंसान ऐसा टूटता है
फ़राहम: हासिल
*
तुम भी, ये दिल भी, दोस्त भी, मंज़िल की आग भी 
एक-एक करके छूट गए हमसफ़र तमाम

नहीं नहीं ऐसा नहीं है कि ताज साहब को पहले दिन से ही ये नौकरी रास आ गयी थी। थोड़ा सा वक़्त तो लगना ही था वो लगा लेकिन उसके बाद तो उन्हें ये काउंटर इतना रास आया कि उनकी दुनिया हो गया। इस काउंटर पर बैठ कर उन्होंने होटल चलाने के सभी आदाब अच्छे से सीख लिए मसलन ग्राहकों का पुर ख़ुलूस इस्तक़बाल, बाबर्चीखाने और वेटरों पर नज़र और उनसे मोहब्बत भरा सुलूक़, नतीज़ा ? थोड़े ही वक़्त में 'अहद होटल' की लोकप्रियता में चार चाँद लगने लगे। टेबलें भरी रहने लगीं यहाँ तक कि होटल के दोनों और रखे तख्तों पर बैठने के लिए भी ग्राहकों को इंतज़ार करना पड़ता। 'समद दादा' अब अपने दूसरे बड़े होटल 'सलामिया' में ही बैठते उन्होंने 'अहद होटल' एक तरह से मोहम्मद अली 'ताज' के हवाले कर दिया जो उन्हें खूब कमा कर दे रहे थे। 

'अहद होटल' ताज साहब की वजह से शायरों का अड्डा बन गया। ये देश की आज़ादी के कुछ सालों बाद की बात है जब ताज साहब की जवानी शबाब पर थी और अहद होटल के नाम का डंका पूरे भोपाल में बज रहा था। अनवारे इस्लाम साहब इस किताब की भूमिका में अहद होटल  के बारे में कुछ यूँ बयान करते हैं 'अहद होटल' होटल क्या अच्छी ख़ासी नशिस्तगाह हुआ करती थी। नज़र घुमाते जाइये, एक टेबल पर शेरी भोपाली, सलाम सागरी और कैफ़ भोपाली गुफ़्तगू कर रहे हैं तो दूसरी पर मेहमान शायर ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ, गोपाल कृष्ण शौक़ और सहबा कुरैशी किसी मुद्दे पर बहस में उलझे हैं, ताज साहब हैं कि होटल की तमाम कारोबारी एक्टिविटीज को अपनी नज़रों की गिरफ़्त में लिए हुए उन बहसों किस्सों में अपनी बात भी रख रहे हैं और दूसरों सुन भी रहे हैं। 

मुशायरों और दीगर साहित्यिक आयोजनों में भागीदारी कारण  दूसरे शहरों के शायर और कलमकार भी यहाँ आना अपना फ़र्ज़ समझते।' बाहर से आने वालों में सबसे ऊपर जां निसार अख़्तर साहब का नाम आता है जिनको ताज साहब और उनकी शायरी से बेहद लगाव हो गया था। जां निसार अख़्तर साहब ने एक जगह लिखा भी कि 'ताज जो अपने शहर बल्कि अपने प्रदेश का सबसे लोकप्रिय और हरदिल अज़ीज़ शायर है, कल पूरे हिन्दुस्तान की भी शोहरत का मालिक बनेगा। ये मेरी सोची समझी हुई राय है। इसी होटल अहद में उनकी दोस्ती 'सरदार जाफरी' 'साहिर लुधियानवी', 'निदा फ़ाज़ली' 'मज़रूह सुल्तानपुरी' जैसे मशहूर शायरों से भी हुई। 

इस चमन मैं गुलों की हंँसी जुर्म है 
ये भी क्या जिंदगी, जिंदगी जुर्म है 

तश्नगी लाख हो इतनी क़ातिल नहीं
ऐ मेरे दोस्तो, बेहिसी जुर्म है
बेहिसी: सम्वेदनहीनता
*
आंखों की क़ैद, जुल्फ़ की ज़ंजीर की क़सम 
जब से जवाँ हुए हैं सराफा सज़ा है हम
*
ये कौन सी बरखा है बरसना है न खुलना 
ऐ अब्र सभी सर्वो-समन चीख़ रहे हैं
अब्र: बादल, सर्वो-समन: पेड़ पौधे
*
मैं जिस जगह हूँ साथ मेरे कायनात है 
तेरे सिवा कोई भी नहीं तू जहाँ है आज
*
मुझे इंसान के मरने का इतना ग़म नहीं होता 
क़लक़ होता है जब इंसान में इंसान मर जाए
क़लक़: दुख, अफसोस
*
जिन अँखड़ियों ने सिखाई है मयकशी हमको
ग़ज़ब है अब सबक़े-पारसाई देती हैं
सबक़े-पारसाई: संयम की शिक्षा

शायरों और अदीबों की आमद से 'अहद होटल' गुलज़ार तो रहने लगा था लेकिन वहाँ जो भी आता वो पूरी फुरसत में आता, ऊपर से ताज साहब की मेज़बानी उन्हें बांधे रखती। ताज साहब भी बजाय होटल का फ़ायदा देखने के मेज़बानी में इतने खो जाते कि कहाँ क्या हो रहा है उसकी उन्हें ख़बर ही न रहती। अगर वो शायरों से किसी बहस में उलझे होते या किसी की शायरी को सुन रहे होते या किसी को सुना रहे होते तो उन्हें काउंटर पर जाने का होश ही न रहता। उनकी पसंद का, या शहर से बाहर का, कोई मशहूर शायर अगर आ जाता तो उसे और उसके साथ आये सभी दोस्तों को अपनी तरफ़ से चाय पिलाते गरमागरम समोसे खिलाते। चाय तो वो सभी अदीबों को अपनी तरफ़ से मुफ़्त पिलाते। आख़िर ऐसा घर फूँक तमाशा कब तक चलता ? जब तक 'समद दादा' इस होटल की बिगड़ी किस्मत को सँवारने के लिए कोई क़दम उठाते तब तक नुक्सान इस क़दर बढ़ गया था कि सिवा इसे बंद करने के और कोई चारा ही नहीं बचा था। 

'अहद होटल' बंद हुआऔर ताज साहब के लिए बेरोज़गारी के दरवाज़े खुल गए। इस समय तक मुशायरों में जाने  और अपने शेरों की लोकप्रियता के चलते ताज साहब भोपाल के सबसे चहेते शायर बन गए थे। भोपाल शहर के हर घर का दरवाज़ा उनके लिए हमेशा खुला रहता था। वो किसी भी वक़्त किसी भी घर पर दस्तक़ दे कर अंदर जा सकते थे और बिना तकल्लुफ़, बुजुर्ग हों या जवान उनके साथ वक्त बिता सकते थे। इसमें औरत मर्द की क़ैद नहीं थी। निदा फ़ाज़ली 'चेहरे' किताब में लिखते हैं कि ' शेरी भोपाली' और 'कैफ़ भोपाली' भोपाल से बाहर भले ही उनसे ज़्यादा मशहूर रहे हों लेकिन भोपाल में ताज की शोहरत की बराबरी भोपाल ताल के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता था। भोपाल में उनकी लोकप्रियता ताँगे वालों और भिखारियों से मंत्री मंडल के मंत्रियों तक फैली हुई थी'। 

हयात जहदो-अमल से है वरना मौत अच्छी 
हयात गिरयाओ-मातम से बन नहीं सकती
जहदो-अमल: संघर्ष, गिरयाओ-मातम: रोना-धोना
*
तुझ से वफ़ा की उम्मीदें  
देख मेरा दीवानापन

हम दुखियों से हँसकर मिल 
क्या जोबन क्या माया, धन
*
जख्म़े-दिलो-जिगर की नुमाइश फ़िजूल है 
हर एक से इलाज की ख़्वाहिश फ़िजूल है 
*
इससे ज़ंजीर ही ग़नीमत है 
ज़ुल्फ़ चूमी थी निकहतों के लिए 
निकहत: खुशबू
*
वो मंज़िल क्या जो आसानी से तय हो 
वो राही क्या जो थककर बैठ जाए 
*
फ़िक्रे-मआश, ऐशे-बुताँ, यादे-रफ्तगाँ  
मय इस हिसाब से तो बहुत कम है दोस्तो!
*
तुम्हारे कब्ज़ाए-क़ुदरत में मेहो-माह सही 
मगर ये क्या कि मेरे पास एक किरन न रहे
मेहो-माह : सूरज चाँद
*
कभी-कभी ये ख़्याल आ के क्यों सताता है 
हयात जैसे अदम के सिवा कुछ और नहीं
*
कातिल गुनाहगार नहीं हम हैं गुनहगार 
हमने फ़रेब खाए मसीहा के नाम पर

मुसलसल बेरोज़गारी का असर जब फ़ाक़ों में तब्दील होता दिखाई दिया तो दोस्तों ने समझाया कि मियाँ तुम्हारी मुंबई में साहिर, मजरूह, सरदार जाफ़री, निदा फ़ाज़ली जैसे कद्दावर शायरों से दोस्ती है, क्यों नहीं मुंबई जा कर तुम फिल्मों में लिखते ? तुम इन से ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं हो। जैसे भोपाल में तुम्हारी तूती बोलती है वैसे मुंबई में भी बोलेगी ,जाओ क़िस्मत आजमाओ। बात एक दम सच थी ,भोपाल में जब कभी ये लोग किसी सिलसिले में आते तो अहद होटल में शाम को ताज साहब के साथ हम प्याला हुए बिना वापस नहीं जाते। ऐसी कितनी ही महफिलें ताज साहब को याद आईं जिनमें इन शायरों ने ताज साहब से गलबईयाँ करते हुए उनकी दोस्ती के लिए जान निछावर करने के वादे न किये हों। ताज साहब दोस्तों के कहने में आ गये, सोचा और कोई नहीं तो जांनिसार अख़्तर तो मेरे रहनुमा हैं वो तो मुंबई में मेरी मदद करेंगे ही। 

यहाँ से ताज साहब की ज़िन्दगी का वो सफ़र शुरू हुआ जिसकी राह में बेशुमार काँटे होने के बावजूद चलना उनकी मज़बूरी थी। ताज साहब ने किसी तरह ट्रेन के टिकट की जुगाड़ की और जा पहुंचे सपनों की नगरी 'मुंबई' । मुंबई में ताज बहुत हुलस कर 'साहिर', 'मजरूह', 'निदा', 'सरदार जाफ़री' से मिले लेकिन उन्होंने महसूस किया कि ये 'साहिर' 'मजरूह' 'निदा' 'सरदार जाफ़री' देखने में तो बिलकुल वैसे ही थे जैसे भोपाल में दिखाई दिए थे लेकिन हक़ीक़त में ये वो थे नहीं, उनकी शक्लो-सूरत में कोई और ही थे जिनको ताज साहब नहीं जानते थे। ताज साहब जल्द ही समझ गए कि यहाँ ये सब अजनबी हैं। ताज साहब ने जब 'जांनिसार' साहब से मदद की गुहार की तो उन्होंने बताया कि वो तो खुद 'साहिर' की मदद के सहारे यहाँ पाँव जमाये  हुए हैं , जिसके अपने पाँव दूसरे के सहारे टिके हों वो किसी और को क्या सहारा देगा ?  भोपाल जैसी जगह से आये सहज सरल स्वाभाव के ताज साहब के लिए ये इंसानी फ़ितरत किसी अजूबे से कम नहीं थी । उन्हें समझ आ गया कि मुंबई में जंगल का कानून चलता है जहाँ अपनी हिफाज़त के साथ साथ खाने का इन्तेज़ाम भी खुद ही करना पड़ता है। फ़िल्मी दुनिया के इस जंगल में ताज साहब को छोटी और बी ग्रेड फिल्मों के प्रोड्यूसर एस.एम. सागर मिल गए जो अपनी फिल्म 'आँसू बन गए फूल' पर काम कर रहे थे।भोपाल में उनकी ताज साहब से 'अहद होटल' में  मुलाक़ात भी हुई थी उन्होंने ताज साहब से अपनी फिल्म के गाने लिखने को कहा। ताज साहब ने गाने लिखे जो बहुत मक़बूल नहीं हुए एक आध फिल्मों में और गाने लिखे लेकिन जब बात नहीं बनी तो मुंबई को अलविदा कह कर वापस अपने वतन भोपाल आ गए। 

रात भर गर्दने-मीना को झुकाए रक्खो
चाँदनी हाथ में तलवार लिए आई है 

अब्र है, चाँद है, तारे हैं, सबा है, गुल है 
कितनी बिखरी हुई उस शोख़ की यकताई है 
यकताई :अनोखा पन
*
घबरा के ग़मे-हिज्र से जब जाम उठाया 
मुझको तेरी तस्वीर में आंसू नजर आए
*
ये तो इंसानों के टूटे हुए दिल हैं साक़ी 
हमसे टूटे हुए साग़र नहीं देखे जाते
*
बला से जुगनुओं का नाम दे दो 
कम अज़ कम रोशनी तो कर रहे हैं 

हमें इंसान से कोई मिला दे 
फ़रिश्तों में तो हम अक्सर रहे हैं
*
जितना खुलता है रंग खिलते हैं 
वो सरापा गुलाब जैसा है 

उम्र भर पढ़िए उम्र भर लिखिए 
हर ज़माना किताब जैसा है
*
ज़माने भर का ग़म अपना लिया है 
क़यामत हो गया हस्सास होना
हस्सास: संवेदनशील
*
वीरानियों के और उठाऊं मैं नाज़ क्या 
अब आईना भी मेरे मुक़ाबिल नहीं रहा

भोपाल, बकौल 'निदा' 'जहाँ का हर रास्ता कई सलामों के साथ उनकी आमद  इंतज़ार करता था। जहाँ के दरख़्त, जानवर, तालाब सब उन्हें नाम से जानते थे। उनकी काव्य प्रतिष्ठा को पहचानते थे। ताज, भोपाल के लाड़ले शायर थे। भोपाल ने उनकी शाइरी के साथ उनकी आवारगी को भी अपना लिया था। उन्हें न उनकी शराब बुरी लगती थी न मैले-कुचैले कपड़े अखरते थे। 'ताज' और भोपाल के रिश्ते में खुद 'ताज' की नम्रता और प्यार का भी बड़ा दख़ल था। 

'ताज' को बड़े अदब से मुशायरों में बुलाया जाता और वो झूमते हुए तरन्नुम में पढ़ते। श्रोता देर रात तक सिर्फ उन्हें सुनने को बैठे रहते लेकिन वो थे बहुत मूडी, किसी ग़ज़ल के तीन चार शेर सुनाते और चुपचाप वहाँ से चल देते ,कभी कभी तो अपने लम्बे समय से इंतज़ार करते श्रोताओं को सिर्फ एक शेर सुनाते और माइक से हट जाते और एक बार माइक से हटने के बाद वो कभी पलट कर दुबारा सुनाने नहीं आते। वो शायद श्रोताओं के लिए शेर कहते ही नहीं थे। खुद के लिए ही लिखते और खुद को ही सुना कर खुश रहते। उनकी ग़ज़लों में चार या पाँच से अधिक शेर कभी नहीं रहे। मुशायरों में उन्हें तालियों और दाद की कभी जरुरत नहीं रही न कभी उसके लिए आज के शायरों की तरह श्रोताओं से गुहार की। तालियां और दाद उन्हें बिना मांगे मिलतीं और खूब मिलतीं  .  

निदा अपनी किताब 'चेहरे' में लिखते हैं कि 'ताज साहब के खूबसूरत शेर 'उठे और उनके ख़त ही देख डाले , जिन्हें देखा नहीं इक दो बरस से ' को जांनिसार अख़्तर ने  'सफ़िया अख़्तर' के ख़तों के संग्रह ;जेरे लब' के पहले पृष्ठ पर इस्तेमाल किया है लेकिन इसके नीचे 'ताज' का नाम नहीं है'।ताज ने खुद को खो कर अपनी शाइरी को पाया।  हिंदी कवि दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों को बनाने संवारने में इनकी बड़ी भूमिका रही है लेकिन अपने जीवन की भूमिका लिखते वक़्त वो शायद नशे में थे....' ज़माने भर की तकलीफ़ों को दर किनार करते हुए वो 12 अप्रेल 1978 याने महज़ 52 साल की उम्र में उस सफ़र रवाना हो गए जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता। 
पेश हैं आख़िर में उनके ये शेर :       

उनसे मैं क्या कहूँ ,मुझे ये तो बताए जा 
जिन दोस्तों से तेरे लिए दुश्मनी हुई 
*
इक तेरी याद से आराइशे-दिल बाक़ी है 
कोई तस्वीर हटा दे तो ये दीवार गिरे 
आराइशे-दिल: दिल की शोभा     
*
ये जो कुछ आज है, कल तो नहीं है 
ये शामे-ग़म मुसल्सल तो नहीं है 

यक़ीनन ग़म में कोई बात होगी 
ये दुनिया यूँ ही पागल तो नहीं है
*
निर्वाण घर में बैठकर होता नहीं कभी 
बुध की तरह कोई मुझे घर से निकाल दे 

मैं ताज हूं तो तू मुझे सर पर चढ़ा के देख 
या इस क़दर गिरा कि ज़माना मिसाल दे
*
किया है इश्क़, ग़ज़ल भी कही, शराब भी पी 
ग़रज़, गुज़ार ली हमने भी शायरों की तरह