Monday, April 18, 2022

किताबों की दुनिया - 255

देख लेंगे दुश्मनों की दोस्ती 
दोस्तों की दुश्मनी तो आम है 

जिस ने राहत की तमन्ना छोड़ दी 
बस उसे आराम ही आराम है 
राहत: सुख
*
इस  क़दर दिलकश कहां होती है फ़रज़ाने की बात 
बात में करती है पैदा बात दीवाने की बात 
फ़रज़ाने :बुद्धिमान

बात जब तय हो चुकी तो बात का मतलब ही क्या
बात में फिर बात करना है मुकर जाने की बात  

बात पहले ही न बन पाये तो वो बात और है 
सख़्त हसरत नाक है बन कर बिगड़ जाने की बात
*
मैंने जिस वक्त किनारों की तमन्ना छोड़ी 
खुद ब खुद लेने चले आए किनारे मुझको 

सोचता हूं तो सहारों का सहारा मैं हूं 
फिर कहांँ देंगे सहारा ये सहारे मुझको
*
इश्क में जब हमको जीना आ गया 
मौत को दांतों पसीना आ गया 

लब पे नाले है  आंसू आंख में 
मुझको जीने का क़रीना आ गया
*
तेग़े-अबरू, तेग़े-चीं, तेग़े-नज़र, तेग़े अदा 
कितनी तलवारों का पहरा रख लिया मेरे लिए 
तेग़े-अबरू: भौं रुपी तलवार, तेग़े-चीं: माथे की शिकन रूपी तलवार

हमारे आज के शायर के बारे में हिंदी के मूर्धन्य कवि स्वर्गीय श्री रमानाथ अवस्थी साहब के गीत का ये मुखड़ा मुझे सबसे सटीक लगता है :-
भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे
क़स्बा श्री हरगोविन्दपुर,तहसील बटाला,जिला गुरदासपुर,पंजाब का एक गाँव जिसके बाहर सुनसान इलाक़े में एक शिव मंदिर बना हुआ है। चारों और पेड़ और हरियाली से घिरे इस मंदिर में कभी कबार ही कोई भक्त आता है वर्ना ये वीरान ही रहता है। वीरानी का ये आलम था कि सुबह होने से पहले ही जंगली मोर इस मंदिर की मुंडेरों पर बैठ कर शोर मचाते हैं और इसके के प्रांगण में पंख फैला कर दिन भर नाचते हैं। गिलहरियां हर वक़्त पेड़ो से जमीन और फिर मंदिर की छत, दीवारों पर उधम मचाती दौड़ती फिरती हैं। मंदिर से थोड़ी ही दूर व्यास नदी कलकल बहती है। रात के सन्नाटे में उसकी लहरों से उठने वाला संगीत सुनाई देता है। इस मंदिर में रहने वाला जो एकमात्र इंसान है कायदे से उसे कोई महात्मा या साधू या जोगी या पुजारी होना चाहिए लेकिन वो एक शायर है।

अभी सुबह के 4:00 भी नहीं बजे हैं। एक इकहरे बदन का बुज़ुर्ग, मंदिर से पगडण्डी पर चलते हुए चारों और फैली बेलों और झाड़ियों से बचता हुआ, व्यास नदी के ठंडे पानी में गोते लगाता है। बाहर आ कर हल्के बादामी रंग का कुर्ता और सफेद धोती पहनता है, सर पर सफेद रंग की पगड़ी पहनता है, आँख पर मोटे फ्रेम का चश्मा लगाता है, कन्धों पर सफेद गमछा डालता है और गले में रुद्राक्ष की माला पहनता है | मंदिर आ कर शिव लिंग के समक्ष हाथ जोड़ कर बैठता है ,आँखें बंद करता है और ध्यान मग्न हो जाता है।ये उसका रोज का काम है।

तअज्जुब है तसव्वुर तो तेरा करता हूं ऐ हमदम 
मगर फिरती है मेरी अपनी ही तस्वीर आंखों मे
*
का'बे में भटकता है कोई दैर में कोई 
धोखे में हैं दोनों ही, ख़ुदा और ही कुछ है
*
हस्ती-ओ-मर्ग में कुछ फ़र्क न देखा हम ने 
अपने ही घर से चला अपने ही घर तक पहुंचा 
हस्ती-ओ-मर्ग: जीवन और मृत्यु

कितना दुश्वार है मंजिल पे पहुंचना या रब 
मिटने वाला ही मुसाफ़िर तेरे दर तक पहुंचा
*
ये खु़द अंधेरे में जा रहे हैं चिराग़े-ईमां जलाने वाले 
जनाबे-वाइज़ के दिल को देखो तो हर तरफ़ तीरगी मिलेगी
*
जब तुझ को मेरे सामने आने से आर है 
किस हौसले पे तुझको ख़ुदा मानता रहूं 
आर: लाज 

इक तू कि मेरे दिल ही में छुपकर पड़ा रहे 
इक मैं कि हर चहार तरफ ढूंढता रहूं
*
ये भी क्या उल्फ़त भी हो नफ़रत भी हो 
क्या हमारे दिल में है दिल एक और 

इश्क में मरने में क्या दिलचस्प है 
ज़िंदगी होती है हासिल एक और
*
नाकामियां तो शौक़े शहादत की देखना 
ख़ंजर ब-कफ़ वो सामने आकर चले गए 
ख़ंजर ब-कफ़ :हाथ में खंजर लिए हुए

हम जिस बुजुर्ग की बात कर रहे हैं उनका जन्म पंजाब के गुरदासपुर जिले की बटाला तहसील के छोटे से गाँव पंडोरी में 7 जुलाई 1907 को एक ग़रीब ब्राह्मण पंडित मथुरादास भारद्वाज खट शास्त्री के यहाँ हुआ। फ़रवरी 1922 में उन्होंने फ़ारसी मिडल अप्रेल 1925 में नार्मल की परीक्षा पास की। मात्र 18 वर्ष की उम्र में वो बोलेवाल गाँव के एक प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक की हैसियत से बच्चों को पढ़ाने लगे। गाँव में कोई लाइब्रेरी नहीं थी सबसे नज़दीक की लाइब्रेरी पचास मील दूर थी और वहाँ पहुँचने के बहुत से साधन भी नहीं थे। अपनी इल्म-ओ-फ़न की प्यास बुझाने वो पैदल सफ़र करते हुए लाइब्रेरी जाते अपनी पसंद की किताब लाते गाँव आ कर उसकी नक़ल एक रजिस्टर में उतारते और उसे वापस लौटा कर दूसरी क़िताब लाते। ऐसा जनून अब बहुत कम देखने को मिलता है। मोबाइल पर गूगल ने अब सब कुछ सहजता से घर बैठे ऊँगली की एक क्लिक पर उपलब्ब्ध करवा दिया है। जब कोई चीज़ सहजता से उपलब्ध हो तो उसे पाने की प्यास भी कम हो जाती है।    
      
किताबों की तलाश के शौक़ ने उन्हें लाहौर के ओरियंटल कॉलेज के प्रोफ़ेसर 'शादाँ बिलगीरामि' तक पहुँचाया वो प्रोफ़ेसर बीरभान कालिया संपर्क में भी आये। इन दो रहनुमाओं की ने मेहरबानी की वजह से ये 'मुंशी फ़ाज़िल' और सं 1936 में 'अदीब फ़ाज़िल' की परीक्षाएं भी पास कर लीं और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड हाई स्कूल श्री हरगोविन्दपुर तहसील बटाला में फ़ारसी पढ़ाने लगे। ज़िन्दगी एक पटरी पर चलने लगी। इसी स्कूल से पचपन वर्ष की उम्र में आप रिटायर हुए।

दम भर में बुलबुले का घरौंदा बिगड़ गया 
कहता था किस हवा में कि फ़ानी नहीं हूं मैं

मंजिल पे जा के ग़ौर से देखा तो ये खुला 
पहले था जिस मक़ाम पर अब तक वहीं हूं मैं
*
अगर ये जानते हम भी उन्हीं की सूरत हैं 
कमाल शौक़ से अपनी ही जुस्तजू करते
*
अपने ही घर में मिला ढूंढ रहे थे जिस को 
उस को पाने के लिए खुद ही को पाये कोई 

ज़िंदगी क्या है फक़त मौत का जामे- रंगीं
हस्त होना है तो हस्ती को मिटाये कोई
*
भूल जाओ खुद को उनकी याद में 
उनसे मिलने की यही तदबीर है

सर को सज्दों से भला फुर्सत कहां 
 ज़र्रा ज़र्रा हुस्न की तस्वीर है
*
रौंद जाता है हर कोई मुझ को 
नक्शे-पा है कि मेरी हस्ती है

ख़ाकसारी की शान क्या कहिए 
किस क़दर औज पर ये बस्ती है 
औज: ऊंचाई
*
इंसां बना के अशरफ-ए-आलम बना दिया 
इस पर भी ये हरीस बशर मुतमइन नहीं 
अशरफ-ए-आलम: सब जीवों से उत्तम, हरीस: लालची

आप सोच रहे होंगे कि जिसका ज़िक्र हो रहा है आखिर वो शख़्स है कौन ? तो साहब जिनका ज़िक्र हो रहा है उनका नाम था जनाब 'रतन पंडोरवी' जिनका शुमार उर्दू के बड़े उस्तादों में होता है। 'रतन' साहब को फ़ारसी पढ़ते पढ़ते शायरी से इश्क़ हो गया और वो महज़ चौदह पंद्रह की उम्र से शेर कहने लगे। उन दिनों शिक्षा के पाठ्यक्रम की किताबों में जनाब उफुक़ लखनवी का क़लाम शामिल हुआ करता था। फ़ारसी पढ़ते हुए रतन साहब को उफ़ुक़ साहब का कलाम रट सा गया , वो सुबह शाम उसे ही गुनगुनाते और उनकी तरह ही शेर कहने की कोशिश करते। उनका पहला शेर कुछ यूँ हुआ :
ऐ बशर किस हस्ती-ए-बातिल पे तुझको नाज़ है
है अदम अंजाम इसका और फ़ना आग़ाज़ है
बातिल: व्यर्थ ,मिथ्या , अदम: परलोक , फ़ना: मिटना
स्कूल की नौकरी के दौरान उर्दू शायर जनाब 'जोश मल्सियानी' मशवरे पर 'रतन पंडोरवी' जी ने जनाब 'दिल शाहजहांपुरी' की शागिर्दगी इख़्तियार कर ली।रतन साहब की शायरी में सूफ़ी रंग है वो जनाब 'दिल शाहजहांपुरी' की देन है। दिल साहब जब बीमारी की वज़ह से रतन साहब के साथ ज्यादा नहीं रह पाए तो उनके जाने के बाद वो 'जोश मल्सियानी' साहब के शागिर्द हो गए बरसों इस्लाह लेते रहे।

'रतन पंडोरवी' साहब ने लगभग दो दर्ज़न किताबें लिखीं जिनमें 14 किताबें नस्र की और 9 किताबें शायरी की हैं जिनमें ग़ज़लें नज़्में रुबाइयाँ आदि शामिल हैं। हमारे सामने जो आज किताब है उसमें उनकी चुनिंदा ग़ज़लों को उनके अज़ीज़ और बेहद मशहूर शागिर्द शायर जनाब 'राजेंद्र नाथ 'रहबर' साहब ने 'हुस्ने-नज़र' नाम से संकलित किया है। ये किताब दर्पण पब्लिकेशन पठानकोट से सन 2009 में शाया हो कर बहुत मक़बूल हुई थी।   

ये पूरी किताब अब इंटरनेट पर 'कविताकोश' की साइट पर पढ़ी जा सकती है।   


किस-किस का दीन उसकी शरारत से लुट गया 
मुझसे न पूछ अपनी ही क़ाफ़िर नज़र से पूछ 

ढल जायेंगी ये हुस्न की उठती जवानियां 
ये राज़े-इंकलाब तू शम्स-ओ-क़मर से पूछ 
शम्स-ओ-क़मर :सूरज और चांद
*
तय हुआ यूं मोहब्बत का रस्ता 
कुछ इधर से हुआ कुछ उधर से 

ज़िंदगी क्या है चलना सफ़र में 
मौत क्या है पलटना सफ़र से
*
मेरा जीना भी कोई जीना है 
जिसने चाहा मिटा के देख लिया 

मुतमइन ऐ 'रतन' जबीं न हुई 
हर जगह सर झुका के देख लिया
*
बात चुप रह के भी नहीं बनती 
बात करते हुए भी डरता हूं 

मार डाला है मुझ को जीने ने 
ऐसे जीने पे फिर भी मरता हूं
*
ज़िंदगी मौत की आग़ोश में हंसती ही रही 
जीने वालों को ये नैरंग दिखाया हमने 
नैरंग :जादू 

बर्क़ का ख़ौफ़ न आंधी का रहा अब खटका 
अपने हाथों से नशेमन को जलाया हमने

स्कूल में नौकरी के दौरान अपने पहले उस्ताद जनाब 'दिल शाहजहांपुरी' और उनके बाद जनाब  'जोश मल्सियानी' साहब  की शागिर्दगी से 'रतन' साहब की शायरी में निरंतर सुधार आता गया और अदबी हलकों में उनके चर्चे होने लगे। वक़्त साथ उनकी शोहरत बटाला से निकल कर पूरे पंजाब में फैली और फिर पंजाब के बाहर देश के उन गली कूचों में भी फ़ैल गयी जहाँ उर्दू शायरी पढ़ी और पसंद की जाती है, यहाँ तक की पड़ौसी मुल्क़ में भी उनके चाहने वालों की तादात अच्छी खासी हो गयी। युवा शायर उनसे इस्लाह लिया करते ,होते होते उनके करीब तीन दर्ज़न शाग़िर्द ऐसे हुए जिन्होंने उनका नाम रौशन किया। उनमें से एक जनाब 'राजेंद्र नाथ 'रहबर' साहब हैं जिनकी एक नज़्म 'तेरे ख़ुश्बू से भरे ख़त मैं जलाता कैसे' जगजीत सिंह साहब ने गा कर पूरी दुनिया में मक़बूल कर दी। 

शायरी के अलावा 'रतन पंडोरवी' साहब को ज्योतिष में महारत हासिल थी। उनकी भविष्य वाणियाँ शत प्रतिशत सच साबित होतीं। देश के दूर-दराज़ हिस्सों से लोग उनके पास अपना भविष्य जानने आया करते थे। लोगों के पूछे प्रश्नों का वो एक दम सटीक उत्तर देते। रतन साहब की शायरी और ज्योतिष विद्या ने एक योगी की सिद्धि का दर्ज़ा इख़्तियार कर लिया था। वो तन्हा पसंद इंसान थे इसलिए उन्होंने स्कूल की नौकरी के बाद व्यास नदी के किनारे बने एक पुराने खंडहर से सुनसान वीरान मंदिर को अपने रहने और साधना का ठिकाना बनाया। मंदिर की साफ़ सफाई और उसके पास बनाये एक छोटे से बाग़ की देखभाल उनके नित्यकर्म का हिस्सा थी। उनके शागिर्द उसी मंदिर में उनके पास इस्लाह के लिए आते। उन्होंने किसी से कभी कुछ नहीं माँगा और फकीरों सी सादगी से ज़िन्दगी जी। हमेशा उन्होंने पूरे दिन में सिर्फ एक बार ही खाना खाया। उनके भतीजे श्री निशिकांत भारद्वाज ने उनसे ज्योतिष विद्या सीखी वो अब 'चामुंडा स्वामी' के नाम से मशहूर हैं।        

अज़ीज़ तर है हमें किस क़दर वतन की हवा 
क़फ़स में जिंदा रहे शाख़े-आशियां के लिए
*
रोते रोते सो गई हर शम्अ परवानों के साथ 
होते होते हो गई आखिर हर फुर्क़त की रात 
फुर्क़त की रात: विरह की रात

हर तरफ़ तारीकियां, खामोशियां, तन्हाइयां 
हू का आलम बन गया है घर का घर फुर्क़त की रात
*
दोनों ने थाम रक्खी है क़िस्मत की बागडोर 
कुछ आदमी के हाथ है कुछ है खुदा के हाथ 

तेरी निगाहों में है मेरे दिल की आरज़ू 
फिर तुझसे मांगता फिरुं मैं क्या उठा के हाथ
*
यह कौन सा मक़ाम है ऐ जोशे बे-खु़दी 
रस्ता बता रहा हूं हर इक रहनुमा को मैं

क्यों उसकी जुस्तजू का हो सौदा मुझे 'रतन' 
मुझ से अगर जुदा हो तो ढूंढू खुदा को मैं 
सौदा: पागलपन
*
उलझते हैं भला शैख़-ओ-बरहमन किसलिए 
हरम हो दैर हो दोनों में है तस्वीर पत्थर की
*
रंज, ग़म, हसरत, तमन्ना, दर्द, गिर्या फ़र्तै यास
 मेरे दिल ने परवरिश की है बराबर सात की 

देखिए मैदान किसके हाथ रहता है 'रतन' 
चश्मे-गिरिया के मुकाबिल है घटा बरसात की
 चश्मे गिरिया: रोती हुई आंख
*

जोगी शायर के नाम से मशहूर रतन साहब बेहद विनम्र स्वभाव के इंसान थे। एक बार जो उनसे मिलता बस उन्हीं का हो कर रह जाता। वो बड़े धार्मिक विचारों के थे। नियम से योग और शिव की आराधना करते। रहबर साहब लिखते हैं कि 'रतन साहब ने अपने इष्टदेव को सामने रख कर राज़ो-नियाज़ की बातें कीं और मज़ाज से हक़ीक़त को नुमायां करने की कोशिश की।'

उनकी किताबों पर बिहार उर्दू अकादमी, बंगाल उर्दू अकादमी और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने एवार्ड दिए। भाषा विभाग पंजाब की तरफ़ से उन्हें 'शिरोमणि साहित्यकार' का ख़िताब, नक़दी, शॉल और प्रमाणपत्र भेंट किये गए। चंडीगढ़ की 'कला दर्पण' संस्था द्व्रारा 18 मई 1980 को टैगोर थियेटर में 'जश्न-ऐ-रतन पंडोरवी' मनाया गया। 19 मई 1981 को शाहजहांपुर में एक बहुत बड़ा जलसा हुआ जिसमें 'दिल शाहजहांपुरी' के बेटे शब्बीर हसन ने उन्हें दिल शाहजहांपुरी का जा-नशीन (उत्तराधिकारी) मुकर्रर किया।

रतन साहब 16 दिसंबर 1989 को पंडोरी को हमेशा हमेशा के लिए ख़ैरबाद कह कर पठानकोट जा कर बस गए और 4 नवम्बर 1990 को इस दुनिया-ऐ-फ़ानी को अलविदा कह गए। अफ़सोस ,गायत्री मंत्र और भगवत गीता का उर्दू नज़्म में अनुवाद करने वाले इस अपनी तरह के अकेले शायर को याद करने वाले अब बहुत कम लोग बचे हैं। इस किताब को मंज़र-ऐ-आम पर लाने के लिए आप रहबर साहब को 9417067191 पर फोन कर मुबारकबाद दे सकते हैं।
जब अपनी ज़िंदगी तुम हो फिर उसक मुद्दआ तुम हो
तो इसमें हर्ज ही क्या है अगर कह दे खुदा तुम हो

न होता आशियां तो बिजलियां पैदा ही क्यों होतीं
सुनो ऐ चार तिनको अस्ल में बर्के-बला तुम हो
*
इतनी कहां मजाल कि बेपर्दा देखते 
तेरे निशान हम को मिले हैं कहीं-कहीं

ऐ शैख़ मयकदे की मज़म्मत फुज़ूल है 
मिलती है क्या बहिश्त में ऐसी जमीं कहीं
*
इस तरफ आग कि सीने में भड़क उठ्ठी है 
उस तरफ हुक्म कि हरगिज़ न मिलेगा पानी


Monday, April 4, 2022

किताबों की दुनिया - 254

शबे ग़म की सहर नहीं होती 
हो भी तो मेरे घर नहीं होती 

हल्क़ से घूंट भर जहां उतरी 
तौबा फिर उम्र भर नहीं होती 

वस्ल में ये बला भी होती है 
रात पिछले पहर नहीं होती
*
न सजदागह न कोई जलवागह बची हमसे 
वो दिल में थे उन्हें हमने कहाँ कहांँ देखा
*
खाते थे अपनी भूख तो सोते थे अपनी नींद 
माना क़फ़स में थे हमें खटका तो कुछ न था
*
है अभी मेरे बुढ़ापे में जवानी कैसी
है अभी उनकी जवानी में लड़कपन कैसा
*
सितम भी लुत्फ़ हो जाता है भोलेपन की बातों से 
तुझे ऐ जान अंदाज़े-खफ़ा अब तक नहीं आया 

जिसे तुम कोसते हो उम्र उसकी और बढ़ती है 
तुम्हें सब कुछ तो आया कोसना अब तक नहीं आया
*
किसी से कहने ये आए हैं वो सहर होते 
तमाम रात कटी मेरे इंतज़ार में क्या 

शराब से भी सिवा ख़ुशगवार है हमको 
बताएंँ क्या कि मज़ा पड़ गया उधार में क्या

कौन है यह नौजवान जो दिल्ली की सड़कों के किनारे लगे बाज़ार में किताबों के ढेर के पास बैठा कुछ ढूंढ रहा है ? मजे की बात है कि ये जिस ढेर के पास बैठा किताबों में ग़ुम है वो ढेर अंग्रेजी किताबों का नहीं है | अंग्रेजी किताबों का ढेर तो कुछ आगे लगा है, जिस पर अंग्रेजी बोलते युवा लड़के लड़कियां भीड़ लगाए खड़े हैं | जिस ढेर के पास ये नौजवान है वो तो हिंदी और उर्दू किताबों का है | दो ऐसी भाषाएं जो मौसेरी बहने हैं और जिन्हें बोलने वाले भले कम न हो पढ़ने वाले निश्चित रूप से बहुत कम हैं | उर्दू का हाल तो बहुत ही ख़स्ता है | कभी हिंदुस्तान का शान रही ये भाषा अब एक धर्म विशेष की भाषा करार दी गई है | अब कौन किसे ये बात समझाए कि भाषा का कोई धर्म नहीं होता | अगर थोड़ा गौर से देखें तो आप पाएंगे कि इस नौजवान ने जिन किताबों को छाँटा है उन पर धूल जमी हुई है और कागज़ वक्त की मार से पीले पड़ चुके हैं | 

पूछने पर यह नौजवान अपना नाम 'अजय नेगी' बताता है जो पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला है और फिलहाल फरीदाबाद रहते हुए मनोविज्ञान में बीए ऑनर्स के फाइनल वर्ष की तैयारी कर रहा है | फिल्मी गानों का शौकीन 'अजय' किसी दिन फिल्मों में गाने लिखने का ख़्वाब देखता है |

उर्दू जबान से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले इस नौजवान ने इस ज़बान को सीखने के लिए बहुत पापड़ बेले | जब कोई ढंग का उस्ताद नहीं मिला तो अजय ने किताबों की मदद से इस ज़बान को सीखा | अजय ने ये सिद्ध किया कि यदि आपमें जुनून है तो फिर दुनिया का कोई काम मुश्किल नहीं होता | ऐसे ही एक दिन ढूंढते ढूंढते उसे वो किताब हाथ लगी जो फटेहाल लेकिन नायाब थी | उर्दू शायरी की इस किताब को पढ़ते हुए अजय को ख़्याल आया कि इसे हिंदी में भी लाना चाहिए और वो इस काम में जुट गया | हिम्मत ए मर्दां मदद ए खुदा, 'अजय' के इस सपने को साकार किया एनी बुक के 'पराग अग्रवाल' ने, जिन्होंने 'अजय' को हिम्मत और हौंसला दिया और उसकी मेहनत को किताब की शक्ल में मंज़रे आम पर लाने की जिम्मेदारी उठाई|
 
आज ज़नाब रियाज़ ख़ैराबादी साहब की ग़ज़लों की वही किताब  'शब-ए-ग़म की सहर नहीं होती' जिसका अजय नेगी साहब ने लिप्यंतरण और सम्पादन किया है हमारे सामने खुली हुई है :


कमबख़्त जब क़ुबूल न हो कोई क्या करे 
मुद्दत हुई कि हाथ दुआ से उठा लिया 

दिल लाख पाक साफ़ है दामन का क्या करूंँ
जा जा के मयकदे में ये धब्बा लगा लिया 

खाने में क़ैदे वक्त न अच्छे बुरे से काम 
जब मिल गया तो शुक्र किया और खा लिया
*
वो पूछते हैं शौक़ तुझे है विसाल का 
मुंँह चूम लूँ जवाब ये है इस सवाल का 

रूठे हुए भी छोड़ के सुनते हैं मेरे शेर 
मेरे कलाम में है मज़ा बोलचाल का
*
घर मेरा कहते हैं जिसको कोई जिंदाँ होगा 
दरो दीवार न होते जो मेरा घर होता 
जिंदाँ: कैदखाना
*
 मेरे सिवा नज़र आए न कोई दोज़ख मे 
किसी का जुर्म हो मालिक मुझे सज़ा देना
*
कमबख़्त वही दिल है कि था हार गले का 
अब हार के फूलों में भी शामिल नहीं होता
*
अब ये जाना कि इसे कहते हैं आना दिल का 
हम हसीं खेल समझते थे लगाना दिल का 

दर्दे दिल आज सुनाया जो उन्हें रो-रो कर 
हंँस के बोले कि ये किस्सा है पुराना दिल का

ख़ैराबाद उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले का एक नगर है। इसी ख़ैराबाद में लगभग एक ही कालखंड में दो ऐसे बेमिसाल शायर हुए जिन्होंने अपनी शायरी से पूरे देश में अपने नाम का डंका बजा दिया। पहले थे सं 1853 में पैदा हुए जनाब 'रियाज़ ख़ैराबादी' और दूसरे उसके 12 साल बाद याने 1865 में पैदा हुए जनाब 'मुज़्तर खैराबादी'। हालाँकि रियाज़ साहब 84 वर्ष तक जिए जबकि मुज़्तर साहब महज़ 62 साल बाद ही इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत हो गए लेकिन उनका नाम फिर भी देश में ज्यादा लोग जानते हैं। दरअसल मुज़्तर साहब का नाम उनके बाद उनके बेटे मशहूर शायर जनाब 'जां निसार अख़्तर' और फिर उनके पोते शायर 'जावेद अख़्तर' साहब ने ज़िंदा रखा जबकि रियाज़ साहब के बाद की पीढ़ी में ऐसी कोई मशहूर हस्ती नहीं हुई। पुरखों की विरासत को सँभालने की ज़िम्मेदारी अगली पीढ़ी की होती है जो रियाज़ साहब को नसीब नहीं हुई। ये तो भला हो 'अजय नेगी' जैसे जुनूनी नौजवान का जिसने रियाज़ साहब की शायरी से हमें रूबरू होने का मौका दिया। 

रियाज़ साहब के वालिद जनाब सैयद तुफ़ैल अहमद अपने वक़्त के बड़े आलिम थे। अरबी और फ़ारसी के विद्वान् तुफ़ैल साहब गोरखपुर में अंग्रेजी हुकूमत के पुलिस विभाग में बड़े ओहदे पर थे। रियाज़ साहब ने अरबी और फ़ारसी की शुरुआती तालीम अपने वालिद से ली और आगे की पढाई खैराबाद के मदरसा अरबिया से की। रियाज़ साहब लड़कपन से ही शेर कहने लगे और अपनी शायरी का आगाज़ 'असीर' साहब की शागिर्दी में किया। अपना तख़ल्लुस पहले 'आशुफ़्ता' रखा फिर उस्ताद के कहने पर 'रियाज़' के नाम से शायरी करने लगे। ग़ालिब को पढ़ा तो उनके क़ायल हो गए और लगे उन जैसी मुश्किल ज़बान में शेर कहने। उस्ताद ने समझाया कि मियाँ तुम कितनी भी कोशिश कर लो ग़ालिब तो बनने से रहे इसलिए मुश्किल ज़बान छोडो और आम बोलचाल की भाषा में शेर कह कर अपनी अलग पहचान बनाओ। रियाज़ साहब को उस्ताद की बात अच्छे से समझ में आ गयी और  वो आम ज़बान में शेरगोई करने लगे।                        
घर में दस हों तो ये रौनक़ नहीं होती घर में 
एक दीवाने से आबाद है सहरा कैसा

अब ये आलम है कि पलकें भी नहीं तर होतीं 
इन्हीं आंँखों से बहा देते थे दरिया कैसा
*
कमजोर हुए अश्कों से घर के दरो-दीवार 
रोने के लिए लेंगे किराए का मकाँ अब 

धोके से पिला दी थी उसे भी कोई दो घूंँट 
पहले से बहुत नर्म है वाइज की  जुबाँ अब
*
मयख़ाना हमारा कोई मस्जिद तो नहीं है 
तस्बीह लिए कौन बुजुर्ग आए इधर आज
*
हो भी कुछ तो है बहुत बेजा घमंड 
चार दिन की जिंदगी पर क्या घमंड 

ख़ाक़ में छुपना है तो कैसा गुरुर 
ख़ाक में मिलना है तो कैसा घमंड

इज्ज़ से बढ़कर नहीं है कोई चीज
कैसी नख़वत किब्र कैसा क्या घमंड 
इज्ज़: नम्रता, नख़वत: बहादुरी, किब्र: बड़ी उम्र
*
मुश्किल हमारी नज़्अ में आसान हो गई 
वो कह गए हम आएंँगे तेरे मज़ार पर 
नज्अ: मौत के समय

बेकस सी रात दिन मेरे घर में पड़ी रही 
आया ना तुमको रहम शबे-इंतज़ार पर 
बेकस: बेबस

वालिद साहब ने जब देखा कि उनके बरखुरदार दीन -दुनिया से बेखबर शायरी के गहरे समंदर में गोते लगा कर सीपियाँ ढूंढने में लगे हुए हैं तो उन्हें चिंता हुई। ये चिंता हर बाप को अपनी उस औलाद के कारण होती है जो उनकी नहीं सुनता और अपनी खुद की राह बनाना चाहता है। इसलिए उन्होंने रियाज़ को, राह पर लाने के लिए अपने रसूख़ और ताल्लुक़ात का इस्तेमाल करते हुए, गोरखपुर के पुलिस विभाग में सब इस्पेक्टर के पद पर लगा दिया। कोई और शख़्स होता तो सब-इन्स्पेक्टर बन कर इतराता फिरता लेकिन रियाज़ साहब को ये मुलाज़मत पाँव की ज़ंज़ीर लगी। चौबीसों घंटे शायरी में मुब्तिला रहने वाला उनका दिमाग पुलिस की गैर शायराना ड्यूटी से मुक्ति पाने को छटपटाने लगा।आख़िर एक दिन उन्होंने अपना इस्तिफा दे कर चैन की सांस ली।

नौकरी से फ़ारिग हो कर रियाज़ साहब ने अपना पूरा ध्यान शायरी पर लगा दिया। इसी बीच उनके एक दोस्त ने उनकी मुलाक़ात उस्ताद शायर 'अमीर मीनाई' से करवाई। रियाज़ साहब को लगा कि 'अमीर मीनाई' ही वो उस्ताद हैं जिनकी उन्हें बरसों से तलाश थी। 'अमीर' साहब की शागिर्दी में रियाज़ साहब की शायरी में ग़ज़ब का निखार आया यूँ समझें कि लोहे का एक मामूली सा टुकड़ा पारस के छूने से सोना हो गया। बेहद दिलकश और खूबसूरत शख़्सियत के मालिक रियाज़ साहब अपनी शायरी की बदौलत हर दिल अजीज़ होते चले गए। रियाज़ खैराबादी ने शराब पर कहे अपने शेरों में शायद ही ऐसा कोई पहलू छोड़ा हो जिस पर तबअ-आज़माई न की हो। रियाज़ खैराबादी ने कभी शराब को मुँह नहीं लगाया और न ही अपने मज़हब से ग़ाफ़िल हुए।

जो अदा पर मर रहे हैं शौक़ से मरते रहें 
जाए बन-बन कर क़ज़ा उनकी अदा को क्या ग़रज़

दुख़्तरे-रज़ शब को आ जाती है छुपकर मेरे घर 
मयकदे में जाऊँ मुझसे पारसा को क्या ग़रज़
दुख़्तरे-रज़: शराब
*
शगुफ़्ता फूल हसीनों के हार के का़बिल
जो ख़ुश्क हों तो हमारे मज़ार के क़ाबिल 

फ़लक की तारों भरी कहकशाँ बुरी क्या है 
ये चादर अच्छी है मेरी मज़ार के क़ाबिल
*
जो पूछा जान लोगे दिल्लगी में 
तो बोले हंँस के है क्या आदमी में 

रहा तक़दीर का रोना हमेशा 
हमारी उम्र तो गुज़री इसी में
*
अदू के काम आई तू शबे हिज्र 
तेरा काला हो मुँह दोनों जहांँ में 

जब उतरे हल्क़ से दो घूंट मय के 
फले फूले चमन देखे ख़िज़ाँ में
*
रात दिन दोनों है मेरे काम के 
चाँद हो इक चाँद सी तस्वीर हो 

ग़ैर के आगे अगर बैठे हो आप 
आपके आगे मेरी तस्वीर हो

रियाज़ साहब की लड़कपन से शायरी के साथ साथ नस्र में भी बहुत रूचि थी। वो पत्रकार बनना चाहते थे। गोरखपुर से पुलिस की वर्दी उतार कर और आमिर मीनाई से शायरी के सारे गुर सीख कर जब वो वापस ख़ैराबाद आये तो रोजगार के लिए उन्होंने पत्रकारिता को ही चुना। महज़ 19 की उम्र में उन्होंने 'रियाजुल-अख़बार' के नाम से साप्ताहिक अख़बार निकाला। ये अखबार बाद में गोरखपुर और लखनऊ स्थानांतरित हो गया। इस अखबार के अलावा उन्होंने 'तारे-बर्क़ी' और 'सुल्हे-कुल' नाम से अखबार शाया किये जो अधिक नहीं चले। उनका उर्दू तंजो-मिज़ाह पर टिका अखबार 'फ़ित्ना-इत्रे-फ़ित्ना' लगभग तीस साल तक चला।

रियाज़ साहब ग़ज़ब के अनुवादक भी थे उन्होंने ब्रिटिश नॉवलिस्ट रेनॉल्ड्स के दो उपन्यासों 'द लव्स आफ द हरम' और 'ऐलन पर्सी' का अनुवाद 'हम असरा' और 'नज़ारा' नाम से किया जो उर्दू अदब में बहुत पसंद किया गया। वो उनके तीसरे उपन्यास 'ब्रॉन्ज़ स्टेचू' पर काम कर रहे थे जो पूरा नहीं हो पाया।

लिखने लिखाने का ये सिलसिला अभी चल ही रहा था कि उनके वालिद साहब ने उनकी शादी सीतापुर जिले के बिस्वां क़स्बे में तय कर दी। रियाज़ इस शादी के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे लेकिन वो ज़माना और था वालिद का कहा पत्थर पर लकीर हुआ करता था, आजकल भी अधिकांश घरों में ऐसा ही होता है। इस शादी के बाद रियाज़ की ज़िन्दगी से ख़ुशी ने किनारा कर लिया। जैसे तैसे कुछ वक़्त बीता और उनकी बीवी का एक बीमारी के चलते इंतकाल हो गया। रियाज़ साहब जैसे आज़ाद हो गए।

फल मैं पा जाऊँ इबादत का बना दे यारब 
दाना अंँगूर का तस्बीह के हर दाने को
*
जो आज पी हो तो साक़ी हराम शै पी हो 
ये यह कल की पी हुई मय का ख़ुमार बाक़ी है 

कोई भी अश्क सा दुख-दर्द का शरीक नहीं 
यही तो अब मेरा बचपन का यार बाक़ी है
*
शबे-वस्ल उठाए ये बाहम मजे़
न वो होश में है न हम होश में

रियाज़ अब कहां वो जवानी के दिन
कहांँ अब हसीं कोई आगोश में
*
सता रहा है हमें तो ख़्याले-रोज़े-शुमार 
वो हमने पी भी तो क्या पी जो बे-हिसाब न पी
ख़्याले-रोज़े-शुमार: कयामत के दिन का ख्याल

गुनाह कोई न करते शराब ही पीते 
ये क्या किया कि गुनह तो किए शराब न पी
*
न पीने को खुम में न खाने को घर में 
कहीं ऐसे में शायरी सूझती है 

ये काफ़िर लिए साथ आती है बोतल 
घटा आते ही मयकशी सूझती है
*
चुभती हुई इक फाँस है हर साँस सुकूँ की 
दुनिया में किसी के लिए आराम नहीं है

रियाज़ की मोहब्बत की दास्ताँ हमेशा एक मोड़ पर आ कर दुखांतिका में बदलती रही। गोरखपुर के एक गैर मुस्लिम परिवार में उनका बहुत आना-जाना था। वो परिवार रियाज़ की शायरी का दीवाना था और उन्हें भी बहुत पसंद करता था। उस परिवार की एक खूबसूरत लड़की से उन्हें मोहब्बत हो गयी वो भी दिलो-जान से उन्हें चाहने लगी। वो दिन सोने के और रातें चाँदी की थी लेकिन ऐसा कब तक चलता ? एक न एक दिन मज़हब की दीवार तो उनके बीच खड़ी होनी ही थी, सो हुई। रियाज खैराबादी चाहते तो मज़हब का ख्याल एक तरफ रख कर उस लड़की से शादी कर सकते थे क्योंकि लड़की अपना मज़हब तब्दील करने के लिए राजी थी लेकिन रियाज़ खैराबादी उस खानदान की बदनामी नहीं चाहते थे इसलिए उस लड़की से शादी के लिए तैयार नहीं हुए। रियाज़ अपने गम की हरारत को कम करने के लिए बिना किसी को बताए एक लंबे सफर पर रवाना हो गए, जब वापस लौटे तब तक उनकी महबूबा तपेदिक की बीमारी से रात-दिन लड़ते हुए इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थी।

टूटा दिल और आँखों में आंसू लिए यूँ समझें कि देवदास बने रियाज़ एक तवायफ़ के कोठे पर जाने लगे। किस्मत देखिये कि उस कोठे की एक बला की खूबसूरत लेकिन दूसरे मज़हब की तवायफ़ इनपर मर मिटी। चूँकि यहाँ किसी ख़ानदान के बदनाम होने की फ़िक्र नहीं थी इसलिए रियाज़ साहब ने उस तवायफ़ का धर्म परिवर्तन करवा कर उससे शादी कर ली। दुल्हन के हाथ की मेहँदी अभी उतरी भी न थी कि एक दिन पुलिस धड़धड़ाती हुई उनके घर घुसी और उस तवायफ़ को किसी के क़त्ल के इलज़ाम में गिरफ़्तार कर ले गयी। रियाज़ साहब को तो जैसे काटो तो खून नहीं। मुक़दमा चला और उस तवायफ़ को सजाये मौत सुनाई गयी। रियाज़ साहब ने बहुत कोशिश की कहाँ कहाँ नहीं भागे आखिर बहुत कोशिशों से मौत की सज़ा 18 साल की क़ैदे बामशक़्क़त में तब्दील हो गयी। रियाज़ इस हादसे से बिलकुल टूट गए।

वस्ल की रात के सिवा कोई शाम 
साथ लेकर सहर नहीं आती 

अरे वाइज़ डरा न तू इतना 
क्या उसे दर-गुज़र नहीं आती 
दर गुज़र: माफी 

शर्म आती है दिल में सौ सौ बार  
तौबा लब पर मगर नहीं आती
*
लगी आग मेरी जिगर में यूँ न लगे किसी के भी घर में यूंँ 
न तो लौ उठी कि न चमक हुई न शरर उठे न धुआंँ उठा
*
आप आए तो ख़्याले-दिले-नाशाद आया 
आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया

क्या कहा फिर तो कहो भूल गए हम किसको 
सदक़े उसके जो तुम्हें भूल के यूंँ याद आया
*
ये भी पीना है कोई चाल है ये भी कोई 
हर क़दम पर उन्हें सौ बार संँभलते देखा
*
ये मुझसे सख़्त-जाँ पर शौक़ ख़ंजर आज़माई का 
ख़ुदा हाफ़िज़ मेरे क़ातिल तेरी नाज़ुक कलाई का 

वो क्या सोएंगे ग़ाफ़िल हो के शब भर मेरे पहलू में 
उन्हें ये फ़िक्र है निकले कोई पहलू लड़ाई का
*
यूंँ भी हो शग़्ले-मय कि पिएँ हम पिलाओ तुम 
यूंँ भी हो शग़्ले-मय कि पियो तुम पिलाएँ हम

कहानी यहाँ ख़त्म नहीं हुई। रियाज़ दिन-ब-दिन कमज़ोर और बीमार रहने लगे। इस दौर की उनकी ग़ज़लें उनके टूटे दिल की कैफियत बयाँ करती हैं। 18 साल बाद जब वो ख़ातून जेल से रिहा हुई तो रियाज़ साहब ने उसे तलाक़ दे दिया। तलाक़ क्यों दिया इसका जवाब कहीं मिलता नहीं और कोई बताने वाला भी शायद नहीं है -कुछ तो मज़बूरियां रही होंगी --खैर साहब ढलती उम्र और बढ़ती बीमारियों ने रियाज़ को जर्जर कर दिया। रियाज़ की ये हालत देख उनके वालिद , जी हाँ वालिद ने उनके ग़म को कम करने के लिए उनकी फिर से शादी  करवा दी। ये नुस्ख़ा आज भी लोग आज़माते हैं। साठ साल की उम्र में रियाज़ फिर से दूल्हा बने। इस शादी ने जैसे चमत्कार कर दिया। सूखे पेड़ की टहनियां हरी हो गयीं उनमें फूल और फल लगने लगे। मुनीर फातिमा बेग़म से उन्हें छै बच्चे हुए। ज़िन्दगी गुलज़ार हो गयी। 

चौथी शादी के लगभग बीस साल बाद तक रियाज़ काम में जुटे रहे और फिर उम्र की मार से धीरे धीरे बीमार होते चले गए। ख़ैराबाद में ही 28 जुलाई 1934 को इस बेमिसाल शायर ने आख़री साँस ली। अफ़सोस की बात है कि वक़्त के साथ दुनिया इन्हें भूल गयी। मुझे यकीन है की जब तक अजय नेगी जैसे नौजवान हैं उर्दू का मुस्तक़बिल रौशन रहेगा और ऐसे बेमिसाल लेकिन अपेक्षाकृत गुमनाम शायर हमारे सामने आते रहेंगे।    

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शैख़ ये कहता गया पीता गया 
है बहुत ही बदमज़ा अच्छी नहीं 

बाद जिसके हिज़्र हो वो वस्ल क्या 
दर्दे-दिल अच्छा दवा अच्छी नहीं
*
इतनी पी है कि बादे-तौबा भी 
बे पिए बेखुदी सी रहती है 

तेरी तस्वीर हो कि तेग़ तेरी 
हमसे हरदम खिंची सी रहती है
*
आ गया पीरी में भी रंगे शबाब 
घूँट उतरे जब मये-गुलफ़ाम के 
पीरी: बुढ़ापा