Monday, February 15, 2021

किताबों की दुनिया - 225

ये कोई सन 1960 के आसपास की बात होगी बीकानेर के राजकीय पाबू पाठशाला, जो आठवीं याने मिडल क्लास तक ही थी, में रोज की तरह असेम्बली की घंटी बज चुकी थी। एक मेज पर हारमोनियम और दूसरी पर तबला रखा था। स्कूल स्टाफ के सभी लोग, अध्यापक गण मेज के दोनों ओर कतार में खड़े थे। बच्चे भाग भाग कर अपनी अपनी क्लास की लाइन में खड़े हो रहे थे। रोज की ही तरह असेम्बली से पहले होनी वाली गहमगहमी मची हुई थी। तभी हैड मास्साब अपने कमरे से बाहर निकले और हारमोनियम वाली टेबल के पास खड़े हो कर एक नज़र सबको देखा। उनके देखने के अंदाज़ से सारी हलचल शांत हो गयी। आपस में चुहुल करते बच्चे,  खुसपुस करते स्टाफ मेंबर और अध्यापक चुपचाप सीधे खड़े हो गए। अभी सात बजने में तीन मिनट बाकी थे, रोज ठीक सात बजे प्रार्थना शुरू होती थी। हैड मास्साब ने तबले की टेबल के पास खड़े बच्चे से पूछा 'राम जी तूने तबला ठीक से मिला लिया न ?' जी साब, मैंने बजा कर देख लिया है ,बिलकुल सही कसा हुआ है 'रामजी ने फुर्ती से जवाब दिया। 'हूँ' हैड मास्साब बोले फिर हारमोनियम की और देखते हुए बोले आज ये कहाँ गया ?' किसी के पास जवाब नहीं था इसलिए कोई नहीं बोला। सात बजने से ठीक एक मिनट पहले एक दुबला पतला लड़का दौड़ता हुआ आया और सीधा हारमोनियम वाली टेबल के पास जा कर खड़ा हो गया। हैड मास्साब ने देखा कि वो पसीने से तर-बतर है और हाँफ रहा है।' अरे क्या हुआ बेटा ? तुम ऐसे पसीने में भीगे दौड़ते क्यों आ रहे हो ?' हैड मास्साब ने पूछा। 'साब मैं अब्बा के साथ आ रहा था लेकिन रास्ते में उनकी साईकिल पंचर हो गयी, मुझे देरी न हो जाय इसलिए भागता आ रहा हूँ' लड़के ने सर झुका के जवाब दिया। हैड मास्साब ने प्यार से लड़के के सर पर हाथ फेरते हुए कहा 'कोई बात नहीं बेटा थोड़ी साँस ले लो फिर शुरू करना। 'नहीं साब प्रार्थना में देरी नहीं होनी चाहिए' कह कर लड़के ने हारमोनियम पर उँगलियाँ फेरनी शुरू करदी। हारमोनियम पर थिरकती उँगलियों से सुरों की बारिश होने लगी जिसे सुन सभी की आँखें अपने आप बंद हो गयीं हाथ जुड़ गए और स्वर उस लड़के के स्वर से जुड़ गए ' हे शारदे माँ, हे शारदे माँ, अज्ञानता से हमें तार दे माँ'' प्रार्थना के बाद हैड मास्साब ने लड़के को गले लगाते हुए कहा 'जियो हनीफ़ बेटा ज़िन्दगी में हमेशा यूँ ही सुरीले बने रहना और वक़्त का ध्यान रखना -जुग जुग जियो'  
सब ये माने बैठे थे कि एक दिन 'हनीफ़' हारमोनियम का उस्ताद बनेगा और बीकानेर का नाम देश विदेश में ऊँचा करेगा लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। 'हनीफ़' ने बीकानेर का नाम जरूर रौशन किया लेकिन हारमोनियम उस्ताद बन कर नहीं बल्कि ग़ज़लों का उस्ताद बन कर एक ऐसा उस्ताद जिसने ग़ज़ल को अपने मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में कुछ यूँ परिभाषित किया :
 
बताऊं दोस्तों मैं आपको कि क्या है ग़ज़ल 
कमाले-फ़न को परखने का आइना है ग़ज़ल 

ये एक फ़न है इशारों में बात करने का 
इसीलिए तो हर-इक सिन्फ़ से सिवा है ग़ज़ल 
सिन्फ़ : विधा , सिवा : बढ़कर 

गुलाब, चम्पा, चमेली कि रात की रानी 
जो इन को छू के गुज़रती है वो हवा है ग़ज़ल   
*
दिलों के शहरों को फ़त्ह करने का जिस में फ़न है वही ग़ज़ल है 
जो नोके-ख़ामा पे झिलमिलाती हुई किरन है वही ग़ज़ल है 
नोके-ख़ामा : क़लम की नोक 

कहीं है जंगल की शाहज़ादी कहीं है शहरों की ज़ेबो-ज़ीनत 
कहीं पे झरनों की रागनी में जो नग़मा-ज़न है वही ग़ज़ल है 
ज़ेबो-ज़ीनत : ख़ूबसूरती, नग़मा-ज़न : गाती हुई  

वो ठंडी-ठंडी सी रौशनी से धुला-धुला सा चमन का मन्ज़र 
गुलाब चेहरे पे दहकी-दहकी सी जो अगन है वही ग़ज़ल है   

ग़ज़ल की तारीफ़ पूछते हैं 'शमीम' क्या मेरे दोस्त मुझसे 
मेरे सवालों से उसके माथे पे पे जो शिकन है वही ग़ज़ल है  

 'मोहम्मद हनीफ़' जिनका ज़िक्र ऊपर किया है 27 नवम्बर 1949 को राजस्थान के नागौर में जनाब 'अल्लाह बक़्श' साहब के यहाँ पैदा हुए। जनाब 'अल्लाह बक़्श' हालाँकि पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन दुनियादारी की समझ उन्हें खूब थी। ज़िन्दगी जो हमें सिखाती है उसे कोई स्कूल कॉलेज हमें नहीं सिखा पाता लिहाज़ा ज़िन्दगी की पाठशाला में 'अल्लाह बक़्श' साहब ने खूब सीखा और इसी के चलते वो बड़े बड़े आलिमों से बहस कर लिया करते थे। मुलाज़मत के सिलसिले में वो नागौर से बीकानेर आकर बस गये। बचपन से ही मोहम्मद हनीफ़ अपने बड़े भाई 'मुज़फ़्फ़र हुसैन सिद्दीक़ी' को हमेशा किताबें पढ़ते हुए देखते।यूँ तो मुज़फ़्फ़र हुसैन साहब की दीनयात अदबियात, समाजियात और सियासियत पर अच्छी पकड़ थी लेकिन उनका रुझान शायरी की तरफ़ ज्यादा था। ग़ालिब, मीर, मोमिन, दाग़, जोश, फ़ैज़ और इक़बाल के सैंकड़ों शेर उन्हें जबानी याद थे। उन्हीं को देख सुन कर मोहम्मद हनीफ़ भी शायरी के दीवाने हो गए और बड़े भाई की तरह जब वक़्त मिलता शायरी की किताबें पढ़ने लगे। छुप छुप कर शेर कहने की कोशिश भी करने लगे। छुप छुप कर इसलिए क्यूंकि उन्हें अपनी शायरी के मयार पर पूरा भरोसा नहीं था। एक दिन अचानक बड़े भाई साहब की नज़र उस कॉपी पर पड़ी जिसमें हनीफ़ साहब ने शेर लिख रखे थे। शेर पढ़ कर बड़े भाई साहब पता नहीं क्या सोच कर मन ही मन मुस्कुरा दिये लेकिन किसी से कुछ बोले नहीं।  
 .     
उनकी मुस्कराहट का राज़ कुछ दिनों बाद मोहल्ला भिश्तियान मदीना मस्जिद के ज़ेरे साया होने वाले जश्ने-ईदे-मौलादुन्नबी के तरही मुशायरे में खुला जिसमें उन्होंने हनीफ़ साहब को अचानक मंच से तरही मिसरे 'मोहम्मद दस्तगीरे दो जहाँ हैं' पर ग़ज़ल पढ़ने का न्योता दिया। 21 साल के  'हनीफ़' इस तरह अचानक बुलाये जाने पर घबरा गये क्यूंकि इस से पहले उन्होंने कभी किसी के सामने अपना कलाम नहीं सुनाया था। हनीफ़ साहब की घबराहट देख कर भाई साहब बोले 'हनीफ़ मियां घबराओ नहीं हम तुम्हारी कॉपी पढ़ के जान चुके हैं कि तुम शेर कहते हो और खूब कहते हो ,आओ तुम्हें आज सबको अपना क़लाम सुनाने का मौका देते हैं'. भाई साहब की हौसला अफ़ज़ाही से हनीफ़ साहब ने शेर सुनाये और दाद भी हासिल की। 

फ़ितरत हमारी शीशओ-सीमाब की सी है 
जब भी गिरे हैं टूट गये और बिखर गये   
शीशओ-सीमाब : शीशा और पारा 

बे-दाग़ अपने आप को कहते थे वो, मगर 
जब आइना दिखाया तो चेहरे उतर गये 

सुर्ख़ी शफ़क़ की, आतिशे-गुल और जिगर का खूं 
सब मिलके तेरी मांग में सिन्दूर भर गये 
सुर्ख़ी शफ़क़ : सुबह शाम की लालिमा , आतिशे-गुल : फूलों की लालिमा 

जिनके ज़मीर ज़िंदा हैं ज़िंदा हैं वो 'शमीम'
जिनके ज़मीर मर गये वो लोग मर गये 
*
दिखाई दे कि न दे एहतियात है लाज़िम 
कब आस्तीन में खन्ज़र दिखाई देता है 
*
उस दिन तू ख़ामोश रहा तब देखेंगे 
जिस दिन पानी तेरे सर से गुज़रेगा 

पीली चादर ओढ़ के बैठेगा मौसम 
क़ाफ़िला जब पत्तों का शजर से गुज़रेगा 
*
तुम्हारे दर्द को दिल में बसा लिया क्यूँकर 
मैं चाहता तो तुम्हें भूल भी तो सकता था 
*
अपने बच्चों को जो देखा तो समझ में आया 
घर पहुँचता है सरे-शाम परिंदा कैसे 

लाके चेहरे पे तबस्सुम की लकीरें ऐ दोस्त 
छोड़ दूँ मैं दिल-नाकाम को रोता कैसे 

उस मुशायरे के बाद बड़े भाई साहब को लगा कि 'हनीफ़' साहब की शायरी में अभी कच्चापन है और इस्लाह के लिए अब इन्हें किसी उस्ताद की ज़रूरत है। उस वक्त बीकानेर में बहुत से उस्ताद शायर थे लेकिन भाई साहब ने हनीफ़ साहब को उस वक्त के मशहूर शायर उस्ताद 'मस्तान बीकानेरी' साहब जिनका ये शेर हर ख़ास-ओ-आम की जुबान पर था "हज़ारों दैरो-हरम ने लिबास बदले मगर, शराब-ख़ाना अभी तक शराब-ख़ाना है " के पास शागिर्दी के लिए भेजा । बीकानेर में सबको पता था कि 'मस्तान साहब' का ज्यादा वक्त अपने दोस्त 'महबूब खान' की टेलरिंग की दुकान पर ही बीतता है लिहाज़ा उन्हें ढूंढने में कोई मुश्किल पेश नहीं आयी। हनीफ़ साहब अपने बड़े भाई साहब के हवाले से मस्तान साहब से मिले और उनका शागिर्द बनने की इच्छा ज़ाहिर की। मस्तान साहब ने उनसे कहा कि 'देखो बरखुरदार दरअसल मेरे पहले से ही बहुत से शागिर्द हैं तुमको मैं अपनी शागिर्दगी में ले तो लूँगा, लेकिन उसके लिए मेरी एक शर्त है'।' मुझे आपकी हर शर्त मंज़ूर है आप हुक्म करें'  हनीफ़ साहब तपाक से बोले। मस्तान साहब ने मुस्कुराते हुए कहा कि 'तुम मुझे अपना कलाम सुनाओ, अगर मुझे पसंद आया तो ही मैं तुम्हें शागिर्दगी में लूँगा वरना नहीं'। ' 'जी मुझे मंज़ूर है' कह कर हनीफ़ साहब उन्हें अपना कलाम सुनाने लगे। एक दो कलाम के बाद ही मस्तान साहब ने उन्हें गले लगाते हुए कहा 'तुम जैसा शागिर्द पा के मैं ही क्या कोई भी उस्ताद फ़ख्र महसूस करेगा, आज से तुम मेरे शागिर्द हुए और आज से तुम अपने नाम मोहम्मद हनीफ़ को छोड़ कर मेरे दिए नए, 'शमीम बीकानेरी' के, नाम से शायरी करोगे।  
   
आज हमारे सामने 'शमीम बीकानेरी' साहब की ग़ज़लों की एकमात्र किताब 'गुलाब रेत पर' है, जो 'सर्जना' प्रकाशन बीकानेर से प्रकाशित हुई है।  आप इस किताब को  sarjanabooks@gmail.com पर मेल से या वाग्देवी प्रकाशन को 0151 2242023 पर फोन करके मंगवा सकते हैं। मात्र 88 पेज में सिमटी ये किताब रिवायती शायरी के दीवानों के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। नए शायर भी इस किताब से शायरी में लफ्ज़ बरतने और रवानी का हुनर सीख सकते हैं।  


बादे-सर-सर चली उड़े पत्ते 
देखता रह गया शजर तन्हा 

सारी रौनक उसी के दम से थी 
वर्ना, मैं और इस क़दर तन्हा 
*
फेंका ये किसने संगे-मलामत मिरी तरफ़ 
इस शहर में तो मेरा शनासा कोई न था 
संगे-मलामत : बुराइयों का पत्थर , शनासा : परिचित 

बस्ती में सांस लेने को लेते थे सब मगर 
जिस का ज़मीर ज़िंदा हो ऐसा कोई न था   
*
शहर में हर सू सन्नाटा है 
सारा जंगल बोल रहा है   
*
बोली लगाये जाते थे ख़ुशफ़हमियों में लोग 
मैं बिक रहा था और ख़रीदार मुझ में था 
*
क्या कहा तेरे दिल पे और दस्तक 
कोई रहता है इस मकान में क्या 

जान है तो जहान है वर्ना 
जान  है और जहान में क्या 

क्यों बलाएं मुझे डराती हैं 
मैं नहीं हूँ तेरी अमान में क्या 
*
मैं तजर्बे की बिना पर तड़पने लगता हूँ 
किसी पे जब भी कोई एतिबार करता है 

राजकीय पाबू पाठशाला से आठवीं पास करने के बाद हनीफ़ साहब ने राजकीय सादुल उच्च माध्यमिक विद्यालय से दसवीं की परीक्षा पास की। तभी राजस्थान बिजली बोर्ड के दफ्तर में वैकेंसी निकली जिसमें उनका सलेक्शन हो गया। वो आगे पढ़ना चाहते थे लेकिन हाथ आयी सरकारी नौकरी को छोड़ना उन्हें ग़वारा नहीं हुआ, दूसरे, घर के हालात देखते हुए उन्हें नौकरी करना ज्यादा मुनासिब लगा। नौकरी से हर महीने मिलने वाली आय के चलते उनका जीवन  पटरी पर आ गया। 'मस्तान साहब' की रहनुमाई में उनकी शायरी को पंख लग गये। 'मस्तान' साहब शमीम साहब को दिलो जान से शायरी के पेचोख़म से रूबरू करवाने लगे। उस्ताद-शागिर्द की ये जोड़ी पूरे बीकानेर में मशहूर हो गयी। 'मस्तान' साहब का छोटा-बड़ा कोई काम शमीम साहब की शिरकत के बिना मुकम्मल नहीं होता।  वो अपने उस्ताद को साईकिल पर बिठाये कभी हस्पताल कभी बाजार, कभी किसी दफ़्तर कभी, किसी मुशायरे या नशिस्त में लाते ले जाते लोगों को नज़र आ जाया करते।  
बीकानेर में 13 दिसंबर 1980 को जश्ने-एज़ाज़े-मस्तान मनाया गया। इस मौके पर एक ऑल इण्डिया मुशायरा भी हुआ जिसमें मुल्क़ के नामवर शायर जैसे जनाब मख़्मूर सईदी, शीन काफ़ निज़ाम, खुदादाद खां मुनीस और हज़ारों सामईन की मौज़ूदगी में 'मस्तान, साहब ने शमीम साहब को शॉल ओढ़ा कर अपना जा-नशीन घोषित किया। शायद ये पहला मौका था जिसमें एक उस्ताद ने अपने शागिर्द को भरी महफ़िल में अपना जा-नशीन घोषित किया हो। 

आते-आते ही तो जीने का हुनर आएगा 
जाते-जाते ही तो मरने की झिझक जायेगी 
*
तब कहीं जा के मिला है उस के होने का पता  
ख़ुद को अपने आप से जब बे-ख़बर मैंने किया 

दोस्तों के दिल भी कब आलूदगी से पाक थे 
बस इसी बाइस दिल-दुश्मन को घर मैंने किया 
आलूदगी : प्रदूषण 

नींद उचटती देखी है जब से अमीरों की 'शमीम'  
ज़िन्दगी को बेनियाज़े-सीमो-ज़र मैंने किया   
बेनियाज़े-सीमो-ज़र : धन दौलत की परवाह न करने वाला 
*
हमारे हक़ में रही ज़िन्दगी से मौत अच्छी 
उमीद किस से थी और कौन क़द्रदां निकला 
*
शबनम का रक्स आरिज़े-गुल पर फबन के साथ 
देखा है आफ़ताब की पहली किरन के साथ 
आरिज़े-गुल : फूल का चेहरा (गाल)

रखते थे जो हवाओं से लड़ने का हौसला 
जलते रहे चराग़ वो ही बाँकपन के साथ 

मख़मल की सेज थी कि तरसती ही रह गयी 
हम सो गये ज़मीन पे अपनी थकन के साथ 
*
उदास पेड़ तुझे चहचहे भी होंगे नसीब 
वो शाम होते ही तुझ पर तयूर उतारेगा 
तयूर: परिंदे 

 शमीम साहब को मस्तान साहब की रहनुमाई में रहने का मौका सिर्फ़ 17 अक्टूबर 1983 तक ही मिला इसी दिन 'मस्तान' साहब इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह गए, लगभग 12 साल के इस वक़्फ़े में मस्तान साहब की इल्म की सुराई में जो कुछ था वो सब उन्होंने शमीम साहब के प्याले में उँडेल दिया। शमीम साहब ने न सिर्फ़ बीकानेर में बल्कि पूरे भारत में देश के नामी गरामी शायरों साथ मुशायरे पढ़े और वाह वाही हासिल की। 

मुशायरों और नशिस्तों के दौरान उन्होंने देखा कि ज्यादातर शायर अपना क़लाम पढ़ने तक मंच पर बैठे रहते हैं और पढ़ने के बाद धीरे से ख़िसक लेते हैं या जब कोई नया शायर अपना क़लाम पढ़ रहा होता है तो उसकी तरफ़ कोई तवज्जोह नहीं देते और आपसी बातचीत में उलझे रहते हैं। ये आदत बड़े नामचीन शायरों में ज्यादा पाई जाती है। शुरू में शमीम साहब को भी इस तरह का माहौल देखने को मिला और इस से वो दुखी भी हुए। बाद में जब जो उस्ताद शायर हो गए तब उन्होंने इस बात का ख़ास ध्यान रखा कि किसी नए शायर की हौसला अफ़ज़ाही से वो चूक न जाएँ। नए शायरों को ध्यान से सुनना अच्छे शेरों पर झूम कर दाद देना शमीम साहब की खासियत थी। वो मंच पर से कभी बीच में उठ कर नहीं गए। बाज दफ़ा उनकी तबियत खासी ख़राब होती तो भी लोगों के लाख कहने पर भी मंच नहीं छोड़ते थे। इस उसूल का उन्होंने हमेशा पालन किया। 

दोस्ती को मिरी ठोकर में उड़ाने वाला 
दुश्मनी को भी मिरी अब तो तरसता होगा 

किसी इंसान से मिलने को तरस जाओगे
वो ज़माना भी है नज़दीक जब ऐसा होगा 

रौशनी बढ़ती चली जाती है धीरे-धीरे 
कोई आँचल किसी चेहरे से सरकता होगा 
*
हर तरफ़ हैवानियत रक़्सां है अब तो शहर में 
क्या कहें, इंसान को देखे ज़माने हो गये 

तब मज़ा है जब कोई ताज़ा सितम ईजाद हो 
छोड़ इन हर्बों को ये हर्बे पुराने हो गये 
हर्बे : लड़ाई के हथियार 
*
ज़मीन तकती है हैरत से उनके चेहरों को 
जो आस्मां की तरफ़ सर उठा के देखते हैं 

कहा है 'मीर' ने ये इश्क़ भारी पत्थर है 
ये बात है तो ये पत्थर उठाके देखते हैं 

हमारे जुर्म पे जाती नहीं किसी की नज़र 
मज़े तो लोग हमारी सज़ा के देखते हैं 
*
किस मुंह से हम अपने घर की बात करें 
लोग नहीं महफूज़ इबादतगाहों में 
*
कैसी लज़्ज़त है तड़पने में उसे क्या मालूम   
दिल पे हावी जो कोई ग़म नहीं होने देता 

अपनी मोतियों जैसी सुन्दर लिखाई ,फिर वो चाहे हिंदी ,उर्दू या अंग्रेजी लिपि हो ,बेहद विनम्र आचरण और मेहनत के कारण शमीम साहब बिजली बोर्ड के दफ़्तर में अपने से सीनियर और जूनियर लोगों के चहेते थे। 30 सितम्बर 2009 को बिजली बोर्ड के दफ़्तर से रिटायर होने पर उन्हें सबने भावपूर्ण विदाई दी। रिटायरमेंट के बाद उनकी मुशायरों में शिरक़त बढ़ गयी। अपने बेमिसाल तरन्नुम से जब वो सामईन को अपनी ग़ज़लें सुनाते तो वातावरण तालियों से गूंजने लगता। 
शमीम साहब के बेहद अज़ीज़ और क़रीब रहे बीकानेर के शायर ज़नाब 'ज़ाक़िर अदीब' साहब जो उनसे मशवरा-ऐ-सुख़न भी लेते थे, उनको याद करते हुए कहते हैं कि 'जहाँ तक शमीम साहब के अदबी सफ़र की बात है वो बहुत ही लो प्रोफ़ाइल शायर थे, उन्होंने हमेशा मुशायरे इस अंदाज़ में पढ़े जिसके लिए ग़ालिब का वो मिसरा हम इस्तेमाल कर सकते हैं कि  "न  सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह" । कहने मतलब ये कि वो ख़ुद को प्रोमोट करने से बचते थे। मेरा और शमीम साहब का मेलजोल का सिलसिला 1982 से शुरू हुआ जो उनके इंतकाल तक ज़िंदा रहा ,हाँ बीच के तीन चार साल हम दोनों के बीच बोलचाल किसी ग़लतफहमी के चलते बंद रही लेकिन इस दौरान न तो मैंने उनके और न शमीम साहब ने मेरे बारे में किसी से कुछ ग़लत कहा। यूँ समझें कि हमने बशीर बद्र साहब के इस मशहूर शेर 'दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिंदा न हों को अपनाया। ग़लतफहमी दूर हुई और हम दोनों फिर से बिना शर्मिंदा हुए गले मिल गए।    
       
शमीम साहब को राजस्थान उर्दू अकादमी की ओर से सन 2011-12 के लिए बिस्मल सईदी अवार्ड और 2012-13 के लिए शेरी तख़लीक़, नवाये-जां पर 11000 रु का इनआम , अंजुमन तरक़्क़िये उर्दू फतेहपुर शेखावाटी की ओर से 'जिगर मुरादाबादी' अवार्ड, 2010 और 2012 में बीकानेर की संस्थाओं द्वारा बहुत से अभिनन्दन पत्र और अवार्ड दिए गए। राजस्थान पत्रिका की ओर से उन्हें 2017 में कर्णधार विशिष्ट सम्मान प्रदान किया गया। 
सन 2014 से उन्हें अस्थमा की शिकायत रहने लगी जो लगातार बढ़ती गयी आखिर 18 फरवरी 2019 को बीकानेर की सर ज़मीं के इस अलबेले शायर ने इस दुनिया-ऐ-फ़ानी को अलविदा कह दिया।   
 
दिल की दुनिया रोशन करने की ख़ातिर 
 इक कोने में याद के जुगनू रक्खेंगे 
*
कई रंजो-ग़म कई पेचो-ख़म, रहे इश्क़ में थे क़दम-क़दम 
जो गुज़र गये वो गुज़र गये, जो ठहर गये वो ठहर गये 
*
ये जंग मसाइल का कोई हल तो नहीं है 
इस जंग को तुम आग लगा क्यों नहीं देते 

गो, ज़ख्मे-जिगर अब भी तारो-ताज़ा हैं लेकिन 
क्या बात है, पहले सा मज़ा क्यों नहीं देते  
*
दिल भी तेरा है जान भी तेरी 
सोचता हूँ कि फिर मेरा क्या है 

डूबने वाले से कोई पूछे 
नाख़ुदा क्या है और ख़ुदा क्या है 
*
हम से दग़ा करे वो दगाबाज़ है मगर 
अब उसको क्या कहें जो ख़ुद से दग़ा करे 
*
ऐसा लगता है कि चढ़ती हुई नद्दी जैसे 
झील बन के तेरी आँखों में उतर आई है 
*
ग़म तो अपने साथ अदम से आये थे 
अपने ही हमज़ाद से हम डर जायें क्या  
हमज़ाद; साया , जो साथ में पैदा हुआ हो 
*
आग से, पानी से, मिटटी से बने हैं पैकर 
ज़िन्दगी का मगर अहसास दिलाती है हवा 

एक चिन्गारी भी शोलों में बदल सकती है 
आग का साथ कुछ इस तरह निभाती है हवा  
*
जीने न दे हयात की गर्दिश अगर तुझे 
ये किसने कह दिया है कि मर जाना चाहिये   
 

( शमीम साहब के बारे में जरूरी जानकारियाँ देने के लिए मैं शमीम साहब के बेटे जनाब सईद अहमद सिद्दीक़ी , जनाब ज़ाकिर अदीब साहब और जनाब सुनील गज्जाणी जी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। )