Monday, July 8, 2024

किताब मिली - शुक्रिया - 8


अपने दुश्मन तो हम खुद हैं 
हमसे हमको कौन बचाए
*
बेवजह जो दाद देते हैं
कैक्टस को खाद देते हैं
*
इस नदी का जल कहीं भी अब लगा है फैलने
बांध कोई इस नदी पर अब बनाना चाहिए
*
लोग कुर्सी पर जो बैठे हैं ग़लत हैं माना
प्रश्न ये है जो सही हैं वो कहां बैठे हैं
*
ज़माने से तुमको शिक़ायत बहुत
क्या तुमसे किसी को शिकायत नहीं

आपको याद होगा कि देश में 1975 में इमरजेंसी घोषित हुई थी, यानी अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी।1977 में जैसे ही इमरजेंसी हटी, जनता का गुस्सा फूट कर सामने आया और सत्ता के विरोध में कहानियों, उपन्यासों कविताओं और ग़ज़लों की बाढ़ सी आ गई जैसे कोई बांध टूट गया हो। 

सत्ता के विरोध में और आम इंसान के दुख- तकलीफों पर लिखने वाले सफल रचनाकारों में से एक थे 'दुष्यंत कुमार' जिनकी ग़ज़लों ने जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला। बहुत से नए ग़ज़ल कारों ने उन्हें अपना आदर्श माना। आम बोलचाल की भाषा में हुस्न और इश्क़ के रुमानी संसार से निकल कर हक़ीक़त की खुरदरी ज़मीन पर ग़ज़ल कहने का दौर आया। 

हमारे आज के ग़ज़लकार श्री सुरेश पबरा 'आकाश' ने भी दुष्यंत जी को आदर्श मानते हुए ग़ज़लें कहना शुरू किया। उन्होंने अपनी ग़ज़लों की किताब 'वो अकेला' जो अभी हमारे सामने है में लिखा है कि 'ग़ज़ल अब केवल मनोरंजन ही नहीं कर रही बल्कि समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रही है। कभी-कभी किसी ग़ज़ल का एक शेर भी आदमी की जीने की दिशा बदल देता है। मेरी ग़ज़लें आम आदमी की भाषा में कही गई आम आदमी की ग़ज़लें हैं। ये ग़ज़लें ईमानदार आदमी पर हुए अत्याचार की, उसके साथ हुई पक्षपात की ग़ज़लें हैं। आम ईमानदार आदमी इन ग़ज़लों में अपनी पीड़ा महसूस करेगा और बेईमान आदमी इनको पढ़कर तिलमिलाएगा और ये तिलमिलाहट ही इन ग़ज़लों की सफलता होगी।'

बहुत मिले रावण से भी बढ़कर रावण
पर इस युग में नकली सारे राम मिले
*
अपनी तो ये इच्छा है सब दुष्टों को
जल्द सुदर्शन चक्र लिए घनश्याम मिले
*
शराफ़त से सहना ग़लत बात को
मियां बुजदिली है शराफ़त नहीं
*
साफ कहने का मुझे अंजाम भी मालूम है
जानता हूं मैं कहां हूं और कहां हो जाऊंगा
*
ये सही है मैं बहुत तन्हा रहा हूं उम्र भर
एक दिन तुम देखना मैं कारवां हो जाऊंगा

स्व.श्रीमति विद्यावती एवं स्व.श्री कर्म चंद पबरा के यहां चार जून 1954 को सुरेश जी का जन्म हुआ। अपने बारे में सुरेश जी बताते हैं कि "मैंने 1973 से व्यंग्य कवितायें लिखना प्रारम्भ किया मैंने दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें पत्रिकाओं में पढ़ी उनसे प्रभावित हुआ। मैं मंचों पर भी जाया करता था एक कवि सम्मेलन में 'माणिक वर्मा' जी ने व्यंग के साथ कुछ ग़ज़लें भी सुनायीं बाद में उनमें से एक ग़ज़ल सारिका में भी छपी थी जिसका मिसरा था 'आज अपनी सरहदों में खो गया है आदमी' मैंने इसी  बहर पर एक ग़ज़ल लिखी 'जुल्म हँस हँस के सभी सहने लगा है आदमी' और सारिका को भेजी । ये ग़ज़ल 1977 में लिखी थी जो 1979 में सारिका में प्रकाशित हुई। उसके बाद मैंने ग़ज़लें कहना शुरू किया और आज तक कह   रहा हूँ ।

मेरी ग़ज़लें कादम्बिनी एवं नवनीत आदि बहुत सी पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। मेरा कोई उस्ताद नहीं रहा। 'डा आज़म' की आसान उरूज़' एवं 'वीनस केसरी' की किताब 'ग़ज़ल के बहाने' से बहर सीखी। अधिकांश ग़ज़लें स्वतः ही बहर में आयीं। शंका समाधान मैंने कइयों से किया।

मैंने 2003 में भेल (BHEL)शिक्षा मण्डल, भोपाल से व्याख्याता के रूप में VRS लिया उसके बाद पन्द्रह वर्षों तक विभिन्न विद्यालयों में प्राचार्य रहा सन् 2020 में, मैं प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुआ फिर उसके बाद वकालत करने लगा जो अभी तक कर रहा हूँ ।"
'वो अकेला' सुरेश जी का पहला ग़ज़ल संग्रह है जो 'पहले पहल प्रकाशन' भोपाल से सन 2018 में प्रकाशित हुआ था। उनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह ' सितारों को जगाना है' सन 2022 में प्रकाशित हुआ है।

सुरेश जी की ग़ज़लें पढ़ कर आप उन्हें उनके मोबाइल +91 98932 90590 पर बात कर बधाई दे सकते हैं।

जाग कर इक रात काटी यार तेरी याद में
याद महकी रात भर और रात रानी हो गई
*
पल भर जिधर ठहरना हमको लगता है दूभर
मजबूरी में उधर उम्र भर रहना पड़ता है
*
भाईचारे की बात होती है
भाईचारा जहां नहीं होता
*
उम्र भर तन्हा रहा है जो
भीड़ में वो खो नहीं सकता
*
मखमल के गद्दों पर बैठे गीत गरीबी पर लिखते
बातें करते इंकलाब की दारू पीकर जाड़े में







Monday, July 1, 2024

किताब मिली - शुक्रिया - 7

तो क्यों रहबर के पीछे चल रहे हो 
अगर रहबर ने भटकाया बहुत है 
मैं छोड़ कर चला आया हूं शहर में जिसको 
मुझे वो गांव का कच्चा मकान खींचता है 
ज़ालिम को ज़ुल्म ढाने से मतलब है ढायेगा 
तुम चीखते रहो की गुनहगार हम नहीं 
तलाशे ज़र में भटकता फिरा ज़माने में 
जो मेरे पास था मैं वो ख़ज़ाना भूल गया 
मंजिल मिली न हमको मगर ये भी कम नहीं 
हमसे किसी के पांव का कांटा निकल गया 

आप सोचते होंगे की आसान है, जी नहीं आप ग़लत सोचते हैं, चूड़ी बनाना और वो भी कांच की, बेहद मुश्किल काम है. कांच को न जाने कितनी बार आग में तपना, गलना और फिर पिटना पड़ता है तब कहीं जाकर वो तार बनता है जिसे एक गोल घूमते हुए पाइप पर लपेटकर चूड़ी बनाई जाती है.चूड़ी बनाने से कम मुश्किल नहीं है शेर कहना...अच्छा शेर कहना समझिए सबसे मुश्किल कामों में से एक है. 
इंसान की फितरत है कि उसे मुश्किल काम करने में मजा आता है, जितना ज्यादा मुश्किल काम उतना ही ज्यादा मजा. तभी एक अच्छा शेर शायर को तो दिली सुकून देता ही है पढ़ने सुनने वाले के दिलों दिमाग पर भी छा जाता है.आप सोच रहे होंगे कि मैं चूड़ी और शेर इन दोनों की बात एक साथ क्यों कर रहा हूं। सही सोच रहे हैं, मैं बताता हूं। 
 हमारे आज के शाइर जनाब अनवर कमाल 'अनवर' जिनकी किताब "जहां लफ़्ज़ों का" हमारी सामने है, फिरोजाबाद की कांच की चूड़ी के व्यवसाय से जुड़े है इसीलिए तो उनके शेर चूड़ियों की तरह ही नाज़ुक दिलकश और खनखनाते हुए हैं। उस्ताद शायर जनाब 'हसीन फिरोजाबादी' साहब के शागिर्द 'अनवर कमाल' साहब फिरोजाबाद ही नहीं इसके बाहर भी पूरी दुनिया में अपनी बेहतरीन शायरी का डंका बजवा चुके हैं। बड़ा फनकार वो है जो अपने लहज़े में अपनी बात कहने का हुनर जानता हो और ये हुनर 'अनवर कमाल' साहब को खूब आता है। 

 नहीं था कोई खरीददार खुशबुओं का 'कमाल' 
 मगर चमन में वो पैदा गुलाब करता रहा 
बेकार जिसको जान के हमने गंवा दिया 
वो वक्त क़ीमती था बहुत अब पता चला 
यूं तो मुझे तलाश उजाले की है मगर 
जो भीख में मिले महे कामिल नहीं पसंद 
महे कामिल: चौदहवीं का चांद 
हज़ार कांटों ने एहसास को किया जख़्मी 
मुझे पसंद थी ख़ुशबू गुलाब उगाता रहा 
चांद से प्यार करके ये हासिल हुआ 
नींद आंखों की अक्सर गंवानी पड़ी

 'अनवर'साहब की शायरी के बाबत डॉक्टर 'अपूर्व चतुर्वेदी ' साहब लिखते हैं की 'इजाफ़त से परहेज और बातचीत की भाषा में शाइरी 'अनवर' साहब की ख़ासियत रही है। वो शेर, बल्कि चुभते हुए शेर इतनी सफाई से कहते हैं कि मुंह से वाह वाह निकल जाए। शाइरी में बोलचाल की भाषा के जनाब अनवर कमाल 'अनवर' भी कायल हैं।
 'अनवर' साहब के बहुत से कामयाब शागिर्द भी हैं जिनमें से एक हैं जनाब 'हरीश चतुर्वेदी' जी जिन्होंने 'अनवर' साहब की शाइरी को हिंदी में 'जहां लफ़्ज़ों का' के नाम से प्रकाशित करवा कर उसे उन लोगों तक पहुंचाने में मदद की है जो उर्दू लिख पढ़ नहीं सकते। हिंदी में प्रकाशित इस किताब से पहले 'अनवर' साहब के दो दीवान 'धूप का सफर' और 'बूंद बूंद समंदर' उर्दू में छप कर पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके हैं। उनकी ग़ज़लों की हिंदी में दूसरी किताब 'इब्तिदा है ये तो इश्क़ की' सन 2021 में निखिल पब्लिशर आगरा से प्रकाशित होकर धूम मचा चुकी है। 

अनवर साहब को शाइरी विरासत में नहीं मिली, उनके वालिद मोहतरम जनाब बसीरउद्दीन का फिरोजाबाद में चूड़ियों का बहुत बड़ा व्यवसाय है जिसे अब 'अनवर' साहब और उनके बेटे संभालते हैं।भले ही उन्हें शाइरी विरासत में नहीं मिली लेकिन उर्दू शाइरी से मुहब्बत तो उन्हें बचपन से ही हो गई थी जिसे बाद में उसे उनके उस्ताद ए मोहतरम ने तराशा और उसमें पुख्तगी पैदा की। 

 'अनवर' साहब की किताब 'जहां लफ़्ज़ों का' को आप उनके शागिर्द जनाब 'हरीश चतुर्वेदी' जी को 9760014590 पर फोन कर मंगवा सकते हैं। वैसे इस किताब को 'रेख़्ता' की साइट पर ऑनलाइन भी पढ़ा जा सकता है। आप पढ़िए और 'अनवर' साहब को 9837775811 पर फोन कर दाद देना मत भूलियेगा। 

बताओ ऐसी सूरत में बुझाये प्यास किसकी कौन 
समंदर भी यह कहता है कि पानी ढूंढ कर लाओ
 * 
ऐसी सूरत में बताओ क़ाफ़िला कैसे बने 
साथ कोई भी किसी के दो क़दम चलता नहीं
 * 
ख़ाक वो दिन में मिलायेंगे नजर सूरज से 
रात में जिन से सितारे नहीं देखे जाते 
मसअला तो यही है लोगों को 
मसअले करने हल नहीं आते 
मेरा दामन मिल गया जब से तुम्हें 
आंसुओं क़ीमत तुम्हारी बढ़ गई 
*



Monday, June 24, 2024

किताब मिली - शुक्रिया - 6


सभी का हक़ है जंगल पे कहा खरगोश ने जब से 
तभी से शेर, चीते, लोमड़ी, बैठे मचनों पर
*
जिस घड़ी बाजू मेरे चप्पू नज़र आने लगे
झील, सागर, ताल सब चुल्लू नज़र आने लगे 

हर पुलिस वाला अहिंसक हो गया अब देश में
पांच सौ के नोट पे बापू नज़र आने लगे
*
तन में मन में पड़ी दरारें, टपक रहा आंखों से पानी 
जब से तू निकली दिल से हम सरकारी आवास हो गये

ऐसे डूबे आभासी दुनिया में हम सब कुछ मत पूछो 
नाते, रिश्ते और दोस्ती सबके सब आभास हो गये,

बात सन 2006 की है, जब इंटरनेट पर ब्लॉग जगत का प्रवेश हुआ ही था बहुत से नए पुराने लिखने वाले इससे जुड़े, उन्होंने अपने ब्लॉग खोले उसमें लिखा, जिसे बड़ी आत्मीयता से पढ़ने वाले पढ़ते थे। ब्लॉग की पोस्टस को अख़बार वालों ने भी स्थान देना शुरू कर दिया था। 

उन्हीं दिनों देश के ख़्यातिनाम साहित्यकार 'पंकज सुबीर' ने अपने ब्लॉग 'सुबीर संवाद सेवा' पर ग़ज़ल के व्याकरण की पाठशाला चलाई थी जिससे बहुत से नए ग़ज़ल सीखने वाले जुड़े। उसी कक्षा से निकलने वाले बहुत से छात्र आज स्थापित ग़ज़लकार हो गए हैं और अपनी क़लम का लोहा मनवा रहे हैं।उन्हीं छात्रों में मेरे सहपाठी रहे हमारे आज के ग़ज़ल कार हैं 'सज्जन' धर्मेंद्र।

निरीक्षकता अगर इस देश की काफूर हो जाए 
मज़ारों पर चढ़े भगवा हरा सिंदूर हो जाए
*
पसीना छूटने लगता है सर्दी का यही सुनकर 
अभी तक गांव में हर साल मां स्वेटर बनाती है
*
एक तिनका याद का आकर गिरा है 
मयकदे में आंख धोने जा रहा हूं
*
सभी नदियों को पीने का यही अंजाम होता है
समंदर तृप्ति देने में सदा नाकाम होता है

छत्तीसगढ़' के 'रायगढ़' टाउन से लगभग 55 किलोमीटर दूर 'तलाईपल्ली' गांव में 'एनटीपीसी' द्वारा संचालित ओपन कोल माइन है, जहां 22 सितंबर 1979 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्मे 'सज्जन' धर्मेंद्र उप महाप्रबंधक (सिविल) के पद पर कार्यरत हैं। इस भारी जिम्मेदाराना पोस्ट पर काम करते हुए भी, 'सज्जन' धर्मेंद्र अपनी साहित्यिक अभिरुचियों को पूरा करने के लिए समय निकाल लेते हैं। 

'धर्मेंद्र कुमार सिंह', इनका पूरा नाम है, ने प्रारंभिक शिक्षा 'राजकीय इंटर कॉलेजेज प्रतापगढ़' से प्राप्त करने में बाद 'काशी हिंदू विश्वविद्यालय' से बी.टेक और 'भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की' से 'एम.टेक' की उपाधि प्राप्त की । इसी के चलते इन्हें 'ग़ज़लों का इंजीनियर' भी कहा जाता है।

जाने किस भाषा में चौका बेलन चूल्हा सब
उनको छूते ही उनसे बतियाने लगते हैं
*
खूं के दरिया में जब रंगों का गोता लगता है 
रंग हरा हो चाहे भगवा तब काला लगता है  
*
मत भूलिए इन्हें भले आदत को लिफ़्ट की 
लगने पे आग जान बचाती है सीढ़ियां
*
रात ने दर्द ए दिल को छुपाया मगर 
दूब की शाख़ पर कुछ नमी रह गई
*
दे दी अपनी जान किसी ने धान उगाने में 
मजा न आया साहब को बिरयानी खाने में

आप जो अशआर यहां पर पढ़ रहे हैं ये सभी उनकी ग़ज़लों की पहली किताब 'ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर' से लिए गए हैं जिसे 'अंजुमन प्रकाशन' ने सन 2014 में छापा था। इसे आप 'कविता कोष' की साइट पर ऑनलाइन भी पढ़ सकते हैं। इसके बाद उनका एक और ग़ज़ल संग्रह 'पूंजी और सत्ता के ख़िलाफ़' सन 2017 में प्रकाशित हो कर धूम मचा चुका है। 'सज्जन' जी की ग़ज़लों में आप भले ही 'दुष्यंत कुमार' और 'अदम गोंडवी' की शैलियों की झलक देखें लेकिन उनकी अधिकांश ग़ज़लों में ज़िंदगी और उससे जुड़ी समस्याओं पर अनूठे और असरदार ढंग से शेर कहे गए हैं। 

'धर्मेंद्र' जी ने अपना लेखन ग़ज़लों तक ही सीमित नहीं रखा, उन्होंने 'नवगीत' भी लिखे जो उनकी 2018 में प्रकाशित किताब 'नीम तले' में संकलित हैं । सन 2018 में उनकी कहानियों की किताब 'द हिप्नोटिस्ट' पाठकों द्वारा बहुत पसंद की गई। सन 2022 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'लिखे हैं ख़त तुम्हें' अपनी अनूठी शैली के कारण बहुत चर्चित रहा है। उनकी सभी किताबें आप अमेजॉन से ऑनलाइन मंगवा सकते हैं। आप सज्जन धर्मेंद्र जी को उनके 9981994272 पर बधाई संदेश भेज सकते हैं।

संगमरमर के चरण छू लौट जाती 
टीन के पीछे पड़ी है धूप 'सज्जन'

खोल कर सब खिड़कियां आने इसे दो 
शहर में बस दो घड़ी है धूप 'सज्जन'
*
कितना चलेगा धर्म का मुद्दा चुनाव में 
पानी हो इसकी थाह तो दंगा कराइए

चलते हैं सर झुका के जो उनकी जरा भी गर 
उठने लगे निगाह तो दंगा कराइए






Monday, June 17, 2024

किताब मिली - शुक्रिया -5


मुतमइन था दिन के बिखराव से मैं लेकिन ये रात 
दाना दाना फिर अ'जब ढंग से पिरोती है मुझे
*
इश्क़ में मैं भी बहुत मुहतात था सब झूठ है 
और ये साबित कर गया कल रात का रोना मेरा 
मोहतात:सावधान
*
समझ में कुछ नहीं आता मगर दिलचस्पी क़ायम है 
यही तो कारनामा है इस अलबेले मदारी का
*
कई दिनों से मैं एक बात कहना चाहता हूं 
तू लब हिला तो सही हां कोई सवाल तो कर

मैं चाह कर भी तेरे साथ रह नहीं पाऊं 
तू मेरे ग़म मेरी मजबूरी पर मलाल तो कर
*
हमारे ज़ेहन में ये बात भी नहीं आई 
कि तेरी याद हमें रात भी नहीं आई 

बिछड़ते वक़्त जो गरजे तो कैसे बादले थे 
ये कैसा हिज़्र कि बरसात भी नहीं आई
*
सुकून चाहता हूं मैं सुकून चाहता हूं 
खुली फिज़ा में नहीं तो क़फ़स में दे दे तू
*
उस पे तक़्सीम तो कीजे खुद को
क्या ज़रूरी है कि हासिल आए
*
मैं बांध ही रहा था ग़ज़ल में उसे अभी 
वो ज़ीना ए ख़्याल से नीचे उतर गया
*

आपको याद ही होगा की सन 2019 में एक भयंकर बीमारी ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। उस बीमारी ने न गरीब देखा न अमीर, न गोरे देखे न काले, न देश देखे न मज़हब, उसने सबको, बिना भेदभाव के, अपनी चपेट में ले लिया था। 

उस बीमारी का इलाज तो खैर इंसान ने बहुत हद तक ढूंढ लिया है लेकिन एक और इससे भी बड़ी बीमारी का इलाज कोई इंसान अब तक नहीं ढूंढ पाया है। ढूंढ लिया होता तो आप, जो मैं लिख रहा हूं, यकीनन न पढ़ रहे होते। जी आप सही समझे, मैं 'सोशल मीडिया' की बात कर रहा हूं।जहां हर कोई 'मुझे देखो, मुझे पढ़ो, मुझे सुनो' की गुहार लगाता नज़र आता है।इसकी पकड़ में भी बहुत कम लोग ही आने से बच पाए हैं। जो लोग 'फेसबुक' 'यूट्यूब' 'ट्विटर' 'इंस्टाग्राम' आदि से बच गए वो 'व्हाट्सएप' की भेंट चढ़ गए। सोशल मीडिया में कोई बुराई नहीं है, बुराई सिर्फ इसकी अति में है। 

वैसे साहब ये पोस्ट 'सोशल मीडिया' के बारे में ज्ञान बांटने के लिए नहीं है क्योंकि पसंद अपनी अपनी ख़्याल अपना अपना। दरअसल ये पोस्ट उस शाइर के बारे में है जो 'सोशल मीडिया' में होकर भी वहां नहीं है। 

जनाब "शहराम सरमदी" साहब जिनकी किताब "किताब गुमराह कर रही है" पर लिखने का मन तो दो सालों से था लेकिन उनके बारे में कहीं से कोई सुराग नहीं मिल रहा था। 'फेसबुक' पर भी वो हैं 'इंस्टा' पर भी और 'यू ट्यूब' पर भी लेकिन बस हैं। वहां से आप उनके बारे में कुछ पता नहीं लगा सकते। यूं समझें हो कर भी नहीं हैं ।इंटरनेट पर कहीं उनका कोई इंटरव्यू या उन पर आर्टिकल भी देखने सुनने को नहीं मिलता, मुशाइरों के वीडियोज की बात तो भूल ही जाइए। 

हमने भी थक हार कर सोचा कि अगर 'शहराम सरमदी' साहब, एकांत में रहना चाहते हैं तो क्यों बेवजह उनकी प्राइवेसी में दखल दिया जाए।

आप 'रेख़्ता' से या 'अमेजन' से "किताब गुमराह कर रही है" को मंगवाइए और इत्मीनान से पढ़िए। याने आम खाइए, पेड़ मत गिनिए।
और हां,जब तक वो किताब आपके हाथ आए तब तक यहां 'सरमदी' साहब के ये चंद अशआर पढ़िए और पढ़िए फिर वो जहां, जैसे भी हैं, उन्हें दुआ दीजिए:

तो ज़मीं को आसमां करने की कोशिश ठीक है
सुनते हैं हर चीज हो जाती है मुमकिन वक्त पर
*
याद की बस्ती का यूं तो हर मकां खाली हुआ 
बस गया था जो खला सा वो कहां खाली हुआ

रफ़्ता रफ़्ता भर गया हर सूद से अपना भी जी 
रफ़्ता रफ़्ता दिल से एहसास ए जियां खाली हुआ 
सूद: फायदा, एहसास ए जियां: नुकसान
*
मैं अपनी फ़त्ह पर नाजां नहीं हूं 
प सुनता हूं कि थी दुनिया मुक़ाबिल
*
आज भी रोशन है वो इक नाम ताक़ ए याद में 
आज भी देती है जो इक लौ दिखाई उससे है
*
पहलू में कोई बैठ गया है कुछ इस तरह 
गोया किसी का साथ नहीं चाहिए हमें
*
हमेशा मुझसे ख़फा ही रही है तन्हाई 
सबब ये है कि तेरी याद जो बचा ली है
*
बस सलीक़े से जरा बर्बाद होना है तुम्हें 
इस ख़राबे में अगर आबाद होना है तुम्हें 
*
कई दिनों से बहुत काम था सो दफ़्तर में 
तेरे ख़्याल की लौ मैंने थोड़ी मद्धम की
*
उसने कहा था कि दिल का कहा मान इश्क़ है 
उस दिन खुला के वाकई आसान इश्क़ है 

हैरान मत हो देख के दीवानगी मेरी
तू महज़ तू नहीं है मेरी जान इश्क़ है

ऐसा नहीं है कि 'शहराम सरमदी' साहब के बारे में कुछ भी नहीं मालूम लेकिन जितना मालूम है वो मालूम होने की हद से बहुत दूर है। रेख़्ता की साइट पर जो जानकारी मौजूद है वो सिर्फ़ इतनी सी ही है
"शहराम सरमदी 1975 को अ’लीगढ़ में पैदा हुए। अ’लीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम. ए. किया। मुम्बई यूनिवर्सिटी से डाक्टरेट की डिग्री हासिल की और वहीं कई बर्सों तक तदरीसी फ़राएज़ भी अनजाम दिए। बा’द-अज़ाँ वज़ारत-ए-उमूर-ए-ख़ारजा, हुकूमत-ए-हिन्द से वाबस्ता हुए और इन दिनों हुकूमत-ए-हिन्द की जानिब से ताजिकिस्तान में मामूर हैं।"
हांलांकि मेरे पास उनका वाट्सएप नंबर है लेकिन मैं उसे आपसे शेयर करने से परहेज़ करूंगा। मैं नहीं चाहता कि मेरी वज़्ह से उनकी प्राइवेसी में खलल पड़े।
आखिर में आपको इस किताब से कुछ और अशआर पढ़वाता चलता हूं:

तेरे जुनून ने इक नाम दे दिया वरना 
मुझे तो यूं भी ये सहरा उबूर करना था 
उबूर: पार
*
कभी जो फुर्सत ए लम्हा भी मिले तो देख 
कि दश्त ए याद में बिखरा पड़ा है तू कैसा
*
क्या मजा देता है बा'ज औक़ात कोई झूठ भी 
जैसे ये अफ़वाह दिल से ग़म की सुल्तानी गई
*
वो देख रोशनियों से भरा है पस मंजर 
मलूल क्यों है अगर सामने उजाला नहीं
मलूल: उदास
*
लग गई क्या इसके भी बैसाखियां 
तेज़ी से वक्त ढलता क्यों नहीं









Monday, June 10, 2024

किताब मिली - शुक्रिया - 4

उम्र गुज़री रेत की तपते हुए सहराओं में 
क्या ख़बर थी रेत के नीचे छुपा दरिया भी है
*
बुराई सुनना और ख़ामोश रहना 
बुराई करने से ज़्यादा बुरा है
*
ऐसी ऐसी बातों पर हम प्यार की बाज़ी हारे हैं 
उनकी मस्जिद के मंदिर से ऊंचे क्यों मीनारे हैं
*
चुभने लगते हैं तो फिर और मज़ा देते हैं
तेरी यादों के भी हैं कितने निराले कांटे 

ये तुझे वक्त का एहसास न होने देंगे 
घर के गुलदान में थोड़े से सजा ले कांटे
*
आप में से बहुतों को याद होगा कि 1988 की हिंदी फिल्म 'क़यामत से क़यामत तक' का गाना 'पापा कहते हैं बड़ा काम करेगा, बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा' बहुत लोकप्रिय हुआ था। हमारे आज के शाइर जनाब 'मजीद खान' साहब, जो 12 अक्टूबर 1954 को आगरा की एक नर्सरी में पैदा हुए थे, पर ये गाना एकदम सटीक बैठता है क्योंकि 'मजीद खान' ने बड़ा काम भी किया और नाम भी। ये अलग बात है कि उन्होंने वो नहीं किया जो उनके पापा चाहते थे। 
'मजीद खान' साहब के अब्बा मरहूम 'अलीमुद्दीन' साहब, आगरा के 'तकिया' अखाड़े के मशहूर पहलवान थे और चाहते थे कि उनका बेटा भी पहलवानी के दांव पेंच सीखे और फिर अखाड़े में बड़े से बड़े पहलवानों को धूल चटाकर नाम कमाए। ऐसा नहीं है की 'मजीद खान' साहब ने कोशिश नहीं की लेकिन अखाड़े की मिट्टी से ज्यादा मोहब्बत उन्हें उस मिट्टी से थी जिसमें पेड़-पौधे, फूल-पत्ते उगते थे, उस मिट्टी से थी जो जमुना के किनारे पर थी जिस पर बैठकर वो चांद सितारे देखा करते और लहरें गिनते थे या फिर उस मिट्टी से थी जो जमुना नदी के पास बनी सूफी संत हज़रत 'अब्दुल्लाह शाह' की दरगाह के इर्द-गिर्द फैली हुई थी। वो घंटों दरगाह में बैठे रहते जहां दरगाह के गद्दीनशीन बाबा 'मुस्तफा' उनको अपने पास प्यार से बिठाकर सूफी मत के बारे में विस्तार से बताते।

धूप में चलने का लोगो सीख लो कुछ तो हुनर 
जा रहे हो दूर घर के सायबां को छोड़कर
*
वही लोग दुनिया में पिछड़े हुए हैं 
नहीं सुन सके जो किताबों की आहट
*
न दुनिया की समझ है और न दीं की 
वो करने को इबादत कर रहा है
*
जहां भी तीरगी बढ़ी नए चिराग़ जल उठे 
है शुक्र इस ज़मीन पर अभी ये सिलसिला तो है

आगरा के जिस स्कूल में 'मजीद खान' पढ़ते थे वहां हर साल 'रसिया' प्रतियोगिता होती थी। 'रसिया' सुन-सुन कर 'मजीद खान' भी अच्छी खासी तुकबंदी करने लगे। ये तुकबंदी तब तक चलती रही जब तक वो ग्रेजुएशन करने के बाद 'यू.पी. स्टेट वेयरहाउसिंग में नौकरी के दौरान 1979 में सिकंदराबाद (बुलंदशहर )ट्रांसफर नहीं हो गये।

बुलंदशहर में उनकी मुलाकात उस्ताद शायर जनाब 'फ़ितरत अंसारी' साहब से हुई जिन्होंने उन्हें अपना शागिर्द तस्लीम कर लिया। अगले 4 साल यानी 1983 का वक्त माजिद खान की जिंदगी का अहम वक्त रहा। इन चार सालों में 'फ़ितरत अंसारी' साहब ने 'मजीद खान' साहब को एक मुकम्मल कामयाब शायर जनाब 'एन.मीम.कौसर' में तब्दील कर दिया। जिनका हिंदी में छपा पहला ग़ज़ल संग्रह "आईने ख्वाहिशों के" हमारे सामने है।

'मजीद खान' साहब की 'ऐन.मीम. कौसर' बनने की कहानी भी सुन लीजिए। हुआ यूं कि एक दिन 'फ़ितरत अंसारी' साहब ने फरमाया की देखो बरखुरदार 'मजीद' अल्लाह का नाम है इसलिए अगर कोई तुम्हें ए 'मजीद' कह कर पुकारे तो क्या तुम्हें अच्छा लगेगा? ऐसा करो कि तुम मजीद के आगे 'अब्दुल' लगा लो अब्दुल याने बंदा और अपना नाम 'अब्दुल मजीद' याने अल्लाह का बंदा रख लो। 'कौसर' तुम्हारा तख़्ल्लुस रहेगा। फिर कुछ सोच कर बोले कि ऐसा करो 'अब्दुल मजीद को छोटा करके 'अब्दुल' के 'अ' का ऐन, 'मजीद' के 'म' का मीम लेकर अपना नाम ऐन.मीम.कौसर रख लो। सारी दुनिया 'मजीद खान' को भूल उन्हें सिर्फ़ 'ऐन.मीम.कौसर' के नाम से ही जानती है जिनकी ग़ज़लों की हिंदी में छपी किताब ' आईने ख़्वाहिशों के' हमारे सामने है।

कश्ती के डूबने का मुझे कोई ग़म नहीं 
गम ये है मेरे साथ कोई नाख़ुदा न था
*
मेरी अना की धूप ने झुलसा दिया मुझे 
निकला हूं अपनी ज़ात के जब भी सफर को मैं
*
बदल डाले परिंदों ने बसेरे
शजर सूखा तो फिर तनहा हुआ है
*
बदन पर दिन के पंजों की ख़राशें 
हर इक शब मेरा बिस्तर देखता है

कौसर साहब पिछले 40 सालों से शायरी कर रहे हैं। उनके उर्दू में तीन और हिंदी में ये पहला ग़ज़ल संग्रह छपा है। इसके अलावा मुल्क़ के सभी बड़े रिसालों में वो लगातार छपते आ रहे हैं। अनेक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है। 
कौसर साहब का कहना है कि शाइरी आसान ज़बान में ही होनी चाहिए और शेर बोलचाल की भाषा में कहे जाने चाहिएं ताकि वो सीधे दिल में उतर सकें। उनकी नज़रों में कामयाब शेर वो है जो एक बार सुन लेने के बाद आपको हमेशा याद रहता है। 

रिटायरमेंट के बाद 'कौसर' साहब बुलंदशहर में ही बस गए हैं और अपना पूरा वक्त शायरी लिखने-पढ़ने में बिताते हैं। उनकी ये किताब आप समन्वय प्रकाशन गाजियाबाद से 991166 9722 पर संपर्क कर मंगवा सकते हैं। 'कौसर' साहब से आप उनके मोबाइल नंबर 941238 7790 पर संपर्क कर बात कर सकते हैं।

रोज़ होती है यहां जंग महाभारत की 
तू इसे गुज़रे हुए वक्त का किस्सा न समझ
*
तीरगी न मिट पाई आदमी के ज़हनों की 
की तो थी बहुत हमने रोशनी की तदबीरें
*
दूर तक पहाड़ों पर सिलसिले चिनारों के 
एक अज़ीम शाइर की शाइरी से लगते हैं
*
बाहर से दिख रहा है सलामत मगर जनाब 
अंदर से अपने आप में बिखरा है आदमी
*
खुशबू पिघल-पिघल कर फूलों से बह रही है 
कितनी तमाज़तें हैं तितली की इक छुअन में
तमाज़तें: गर्मी
*
फूल से लोग संग सी फ़ितरत 
आईने ख्वाहिशों के टूट गए












Monday, June 3, 2024

किताब मिली - शुक्रिया - 3

तू चाहता है जो मंजिल की दीद सांकल खोल 
सदाएं देने लगी है उमीद सांकल खोल 

 बड़े मज़े में उदासी है बंद कमरे में 
 मगर हंसी तो हुई है शहीद सांकल खोल 
बाद इसके चराग़ लौ देगा 
पहले इक लौ चराग़ तक पहुंचे 
यार उकता गया हूं मैं खुद से 
यूं करो अब तुम्हीं जियो मुझको 
पास दरिया है प्यास फिर भी है 
बेबसी देखिए किनारों की 
अब आप लोगों को हो तो हो लेकिन सच बात तो ये है कि मुझे नहीं मालूम था कि मध्य प्रदेश के 'शिवपुरी' जिले में कोई 'करेरा' नाम का नगर भी है जिसके पास 'समोहा गांव है जहां लगभग 1500 साल पुराना 'हिंगलाज माता' का प्रसिद्ध मंदिर है। चलिए मान लेता हूं कि आपको यहां तक तो मालूम होगा लेकिन यह बात तो तय है कि आपको ये नहीं मालूम होगा कि 'हिंगलाज माता' का प्रसिद्ध मूल मंदिर जो हजारों साल पुराना है और 51 शक्तिपीठ में से एक है, पाकिस्तान के शहर 'कराची' से लगभग 250 किलोमीटर दूर बलूचिस्तान के बीहड़ पहाड़ों में स्थित है। आपके लिए ये विश्वास करना भी कठिन होगा कि इस मंदिर में हिंदू और मुसलमान दोनों समान रूप से पूजा/ इबादत करने हजारों की संख्या में आते हैं। बीहड़ पहाड़ों की गुफाओं में बने इन मंदिरों में 'हिंगलाज माता' के अलावा 'हनुमान जी' 'राम सीता लक्ष्मण' और 'शिव जी' के मंदिर भी हैं जहां रोज नियम से पूजा प्रार्थना होती है। यकीन नहीं हुआ ना ?मुझे भी नहीं हुआ था, जब तक मैंने यूट्यूब पर इसके वीडियोज ढूंढ कर नहीं देखे। आप भी चाहें तो देख सकते हैं, ये रहा लिंक:- 
https://dainik-b.in/uhq0M4q5Mtb 

अब के तो अश्क भी नहीं आए 
अबके दिल बेहतरीन टूटा है 
कुछ खबर ही नहीं है सीने को 
जब कि सीने के दरमियां है दिल 
*
 जिस्म बिस्तर पर ही रहा शब भर 
दिल न जाने कहां-कहां भटका 
जब कहें वो कहिए कुछ तो चुप रहूं मैं 
जब कहें वो कुछ ना कहिए तब कहूं क्या 

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं कहां की बात ले बैठा हूं और यहां क्यों कर रहा हूं ? ये बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि हमारी आज के शाइर जनाब "सुभाष पाठक" 'जिया' इसी गांव समोहा में 15 सितंबर 1990 को पैदा हुए थे। उन्होंने अपनी ग़ज़लों की जो किताब 'तुम्हीं से ज़िया है' मुझे भेजी थी । आज उसी किताब की बात करते हैं। इसे अभिधा प्रकाशन ने सन् 2022 में प्रकाशित किया था। इस किताब को आप अमेज़न से मंगवा सकते हैं। 

 समोहा' किसी भी आम भारतीय गांव की तरह ही एक गैर शायराना माहौल वाला गांव था। ऐसे ही गैर शायराना माहौल में 'सुभाष पाठक' जी के मन में शायरी के बीज पड़े। स्कूल के दिनों में जब आम बच्चे 'किशोर कुमार' के गानों पर ठुमके लगाते थे तब 'सुभाष' जी को 'उमराव जान' फिल्म के 'इन आंखों की मस्ती में', 'दिल चीज क्या है' और फिल्म 'गमन' के गाने 'सीने में जलन दिल में ये तूफान सा क्या है' सुनने में आनंद आता था। 'जगजीत चित्रा' और ग़ुलाम अली को लगातार सुनने के बावजूद भी उनका मन नहीं भरता था। याने उनमें कुछ तो ऐसा था जो उनके साथ वाले दूसरे बच्चों में नहीं था। क्या था ?ये बात उन्हें स्कूली शिक्षा के बाद जब वो 'शिवपुरी' ग्रेजुएशन करने गए, तब समझ में आई। वो था उनका ग़ज़ल के प्रति रुझान। 'शिवपुरी' के एक मुशायरे में 'निदा फ़ाज़ली' साहब को सुनने के बाद उनमें ग़ज़ल कहने की उनकी इच्छा बलवती हो गई। ग़ज़ल कहने की बात सोचने में और ग़ज़ल कहने में ज़मीन आसमान का फ़र्क है साहब। ग़ज़ल कहने के लिए तपस्या करनी पड़ती है जैसे गाना सीखने के लिए रियाज़। उसके लिए अच्छे उस्ताद का मिलना बहुत ज़रूरी होता है। कुछ होनहार ऐसे भी हैं जिन्होंने किताबों को उस्ताद बनाया और उन्हीं की मदद से कामयाब हुए। सुभाष साहब को ग़ज़ल की टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों पर हाथ पकड़ कर चलना सिखाने वाले दो उस्ताद मिले पहले जनाब महेंद्र अग्रवाल साहब जिन्होंने उनकी पहली ग़ज़ल अपने रिसाले में छापी और ग़ज़ल के व्याकरण पर लिखी किताबें भी पढ़ने को दीं और दूसरे ज़नाब इशरत ग्वालियरी साहब जिनसे वो हमेशा इस्लाह लिया करते हैं। 

यह ख़ुशी है छुईमुई जैसी 
मशवरा दो इसे छुऊं कि नहीं 
वो तितलियां बना रहा था इक वरक़ पे 
सो इक फूल इक वरक़ पे बनाना पड़ा मुझे 
तुम्हारी बज़्म में जाएंगे शादमा होकर 
ये राज़ घर में रहेगा कि खुश नहीं हैं हम 
रेशम विसाल का रखें दिल में संभाल कर 
यादों की धूप आए तो चादर बुना करे 

पेशे से अध्यापक 'सुभाष पाठक' जिनका तख़्ल्लुस 'ज़िया' उनके उस्ताद 'इशरत' साहब का दिया हुआ है, का शेरी सफ़र आसान नहीं रहा। लगातार मेहनत और कोशिश करते रहने का नतीजा तब सामने आया जब उन्हें दिल्ली के एक मुशायरे में पद्मभूषण स्व.श्री गोपाल दास 'नीरज' और पद्मश्री 'अशोक चक्रधर' के सामने पढ़ने का मौका मिला। 'नीरज' जी ने उनकी ग़ज़लों की तारीफ़ की, उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज सुभाष जी को पूरे भारतवर्ष से मुशायरों में पढ़ने के लिए बुलाया जाता है। दूरदर्शन और रेडियो से उनकी ग़ज़लों का प्रसारण होता रहता है। देश के प्रसिद्ध ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लों को गाया भी है‌ जिसमें 'सारेगामा' कार्यक्रम के विजेता देश के प्रसिद्ध गायक 'मुहम्मद वकील' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सुभाष जी ग़ज़ल के अलावा गीत भी सफलता पूर्वक लिखते हैं । उनका कोरोना पर लिखा गीत जिसे मुहम्मद वकील साहब ने स्वर दिया था ' कोरोना एंथम' के नाम से प्रसिद्ध हुआ जिसने लाखों लोगों के दिलों में आशा के दीप जलाए। 

इतनी कम उम्र में जिन बुलंदियों को सुभाष जी ने छुआ है वहां तक या उसके आसपास तक पहुंचना बहुतों के लिए मुमकिन नहीं होता। लगातार कुछ नया सीखने और करने को उत्सुक, अपनी ज़मीन से जुड़े, सुभाष जी कभी अपनी उपलब्धियों पर गर्व नहीं करते और यही उनकी निरंतर सफलता और लोकप्रियता का राज़ है। उन्हें और ज्यादा नज़दीक से जानने के लिए मैं आपसे सिर्फ़ इतना ही कहूंगा कि उनकी ये किताब आप सभी मंगवा कर इत्मीनान से पढ़ें। 


आओ कि साहिलों पे घरोंदे बनाएं हम 
तुम थपथपाओ रेत सनम पांंव हम रखें 
अगर तमाज़त को सह सको तुम 
 तो हसरते- आफ़ताब रखना 
तमाज़त: गर्मी 

जो बात कहनी हो ख़ार जैसी 
तो लहज़ा अपना गुलाब रखना 
मैं ऊबता हूं ना क़िस्से को और लम्बा खींच 
अगर है हाथ में डोरी तो फिर ये पर्दा खींच

Monday, May 27, 2024

किताब मिली - शुक्रिया- 2

(ये पोस्ट फेसबुक के मापदंडों के अनुसार लंबी की श्रेणी में आएगी। अत: मेरा अनुरोध है कि इसे सिर्फ़ वही लोग पढ़े जिनके पास समय है और जो शायरी से "बेपनाह" मोहब्बत करते हैं। "बेपनाह" शब्द पर गौर करें मीलार्ड 🙏)

उत्तर प्रदेश का शहर 'रामपुर' जिसके अदब नवाज़ नवाबों के यहां कभी 'मिर्ज़ा ग़ालिब', 'दाग़ देहलवी' और 'अमीर मिनाई' जैसे शायरों ने वज़ीफ़े पाए, जिसका हर दूसरा बाशिंदा या तो शेर कहता या सुनता हुआ मिल जाएगा, जिसकी 'रज़ा लाइब्रेरी' दुनिया भर में मशहूर है उसी शहर 'रामपुर' के एक ऐसे परिवार में जहां शेर ओ सुखन का माहौल था 11 जून 1980 को हमारे आज के शायर का जन्म हुआ।

ढूंढने से ख़ुदा तो मिलता है
किसको मिलता है ये ख़ुदा जाने
*
दर्द घनेरा हिज़्र का सहरा घोर अंधेरा और यादें
राम निकाल ये सारे रावण मेरी राम कहानी से
*
उसके हाथ में ग़ुब्बारे थे फ़िर भी बच्चा गुमसुम था
वो ग़ुब्बारे बेच रहा हो ऐसा भी हो सकता है
*
परिंदों पर न तानो इसको लोगो
ये टहनी थी कमां होने से पहले
*
आगे बढ़ने से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं बात करीब 3 साल से ज्यादा पुरानी है, जब मैं अपने ब्लॉग 'नीरज' के लिए जनाब 'सबाहत आसिम वास्ती' साहब की किताब 'लफ्ज़ महफूज़ कर लिए जाएं' पर लिखने की सोच रहा था।मेरी लाख कोशिशें के बावजूद भी जब मुझे जो जानकारी 'वास्ती' साहब के बारे में चाहिए थी वो कहीं से नहीं मिली तो मैंने जनाब 'सालिम सलीम' साहब को अपनी परेशानी बताई, उन्होंने आनन फानन में जनाब  'सय्यद सरोश आसिफ' साहब का नंबर भेजा और कहा की आप इनसे बात कर लें क्योंकि 'वास्ती' साहब सरोश साहब के उस्ताद हैं।

मैं यह बात 'वास्ती' साहब की किताब पर लिखी अपनी पोस्ट पर भी कर चुका हूं और यहां फिर से दोहराना चाहता हूं की 'वास्ती' साहब मेरी नजरों से गुज़री करीब पांच सौ से ज्यादा ग़ज़लों की किताबों में से ऐसे अकेले शायर हैं जिन्होंने अपनी किताब अपने शागिर्द के नाम की है।

तो आइए बिना वक्त जाया किए अब हम 'सय्यद सरोश आसिफ़' की ग़ज़लों की किताब, 'ख़ामोशी का मौसम' जिसे 'रेख़्ता बुक्स' ने प्रकाशित किया है, के सफ़हे पलटें। 

ख़ुशी है ये कि मेरे घर से फोन आया है 
सितम है ये कि मुझे खै़रियत बताना है
*
हमें जला नहीं सकती है धूप हिजरत की
हमारे सर पे ज़रूरत का शामियाना है
*
सभी जन्नत में जाना चाहते हैं 
ये दोज़ख़ के लिए अच्छा नहीं है

'रामपुर' के पास 'शाहाबाद' में शुरुआती स्कूली पढ़ाई के बाद आसिफ़ साहब दिल्ली आ गए और वहां से एमबीए की पढ़ाई मुकम्मल की। कुछ साल दिल्ली में नौकरी करने के बाद सन 2004 में उन्हें दुबई के एक बैंक में नौकरी मिल गई और वो दुबई चले गए। इन दिनों आप अबू धाबी के एक बड़े बैंक में आला अफसर हैं और अबू धाबी में ही रहते हैं। शायरी में दिलचस्पी की वजह से उनकी मुलाकात अबू धाबी के मशहूर डॉक्टर 'सबाहत आसिम वास्ती' साहब से हुई, जिनकी रहनुमाई में उनकी शायरी परवान चढ़ी।

बकौल 'सय्यद सरोश आसिफ़' साहब "अबू धाबी का अदबी माहौल बहुत अच्छा था। यहां की अदबी फ़जा में लोग आपस में मिलकर निशस्तें करते, लिटरेचर पर, नई किताबों पर, किसी शायर की ग़ज़ल पर या अदब की दूसरी किसी सिन्फ़ पर खुलकर गुफ्तगू किया करते थे। अदब को लेकर अबू धाबी में सबकुछ था सिवाय अंतरराष्ट्रीय मुशायरों के। दुबई में जहां लगातार मुशायरे होते थे वहीं आबूधाबी में साल में सिर्फ एक ही बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुशायरा होता था और उसमें भी लोकल शायरों को शिरकत का मौका नहीं मिलता था।"

सन 2019 में 'डा. वास्ती' और 'सय्यद सरोश आसिफ़' साहब ने लोकल टैलेंट को बढ़ावा देने, वहां के युवाओं को अपने कल्चर की अलग अलग सिन्फ़ जैसे ड्रामे, अफ़साने, किस्सागोई, खाने, संगीत आदि से रुबरु करवाने की ग़रज़ से 'कल्चरल कारवां' नाम से एक ऑर्गेनाइजेशन का आगाज़ किया जिसमें उन्होंने बहुत बड़ी तादाद मे वहां के अदब नवाज़ लोगों को इसके साथ जोड़ा। इस आर्गेनाइजेशन के तहत आबूधाबी में सन 2022 में गल्फ का पहला 'उर्दू लिटरेचर फेस्टिवल' हुआ जो बेहद कामयाब रहा। ये फेस्टिवल उतनी ही धूमधाम से 2023 में भी हुआ और अब अक्टूबर 2024 में भी होने जा रहा है। इसी फेस्टिवल के तहत हुए मुशायरों में दुनियाभर से आए मशहूर शायरात के साथ आबूधाबी के लोकल शायरों ने भी शिरकत की और सामईन से भरपूर दाद हासिल की ।

वस्ल तो कम उम्री में जान गंवा बैठा
हिज़्र हमारा अमृत पी कर आया है
*
सांस मंजिल से क़ब्ल फूल गई 
तेज चलने का है ये कम ख़मयाज़ा
*
काश खो जाते किसी मेले में हम 
और फिर जी भर के मेला देखते
*
पेड़ पे तुमने इश्क़ लिखा था मेरी बाइक की चाबी से 
पेड़ तो कब का सूख गया वो इश्क़ हरा है जंगल में
*

यूएई में रहने वाले हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी लोग एक साथ मुशायरों में शिरकत करते हैं, मजेदार जुमले पर जोर से कहकहे लगाते हैं, अच्छे शेरों पर जमकर दाद देते हैं और कभी-कभी किसी बात पर ग़मजदा होकर साथ में आंसू भी बहाते हैं। ऊपर वाले का करम है कि उसने कहकहों और आंसू बहाने जैसे काम को सरहदों और मज़हबों में क़ैद नहीं किया बल्कि इनका ताल्लुक दिल से रखा और ये कमबख़्त दिल, किसी भी मुल्क़ या मज़हब के इंसान का हो, एक ही तरह से धड़कता है।

हमको एक और उम्र दे मौला 
लेकिन इस बार आगही के बगैर 
आगही: जागरूकता
*
बच्चे जब स्कूल से वापस आते हैं 
सड़कों का दिल भी बच्चा हो जाता है
*
जीतता हूं जिन्हें मोहब्बत से 
उनको गुस्से में हार जाता हूं
*
दिल की शैतानियों से आजिज़ हूं 
क्यों ये बच्चा बड़ा नहीं होता
*
आसिफ साहब की रहनुमा में में ही पहली बार अबू धाबी में सन 2022 में उर्दू लिटरेचर फेस्टिवल हुआ जिसमें शायरी के अलावा उर्दू ड्रामा अफसाना और किस्सा वीडियो को शामिल किया गया इस कार्यक्रम को बहुत मकबूलियत हासिल हुई ।

जूनियर स्टेट लेवल पर क्रिकेट खेलते रहे 'आसिफ़' साहब जानते हैं कि शेर कहना वैसी ही मेहनत मांगता है जैसी एक क्रिकेटर को परफेक्ट टाइम के साथ स्ट्रेट ड्राइव, कवर ड्राइव, स्क्वेअर ड्राइव या पुल शॉट लगाने के लिए करनी होती है। जरा सी कोताही या जल्दबाजी खिलाड़ी को पवेलियन का रास्ता दिखा देती है वैसे ही कमज़ोर मिसरे, भर्ती के लफ़्ज या सपाट कहन शायर को पहचान नहीं दिलवा सकती। जिस तरह किसी अच्छी शाॅट पर तालियां बजती हैं ठीक वैसे ही, अच्छा शेर भी तालियां बटोरता है।

हाथ ऊपर कर के जब घर को कहा था अलविदा 
तब हमें कब ये ख़बर थी हाथ से घर जाएगा
*
किसी का साथ अच्छा लग रहा है 
मुझे दुनिया बुरी लगने लगी है
*
आवाजों को सोच समझ कर ख़र्च करो
ख़ामोशी का मौसम आने वाला है
*
अब मुझे तैरना सिखाओगे 
अब तो सर से गुज़र गया पानी

'ख़ामोशी का मौसम' किताब आप अमेजॉन से या 'रेख़्ता बुक्स' से ऑनलाइन मंगवा सकते हैं। अशआर पसंद आने पर आप 'सय्यद सरोश आसिफ़' साहब को उनके व्हाट्सएप नंबर +971503053146पर दाद देना ना भूलें।



Friday, May 24, 2024

किताब मिली - शुक्रिया -1


हुआ यूं कि जैसे ही मैं कल अपनी अलमारी में रखी ग़ज़लों की किताबों पर लिखने की बाबत फेसबुक पर पोस्ट डाली वैसे ही आप सबको लगा कि मैं फिर से "किताबों की दुनिया" श्रृंखला शुरू कर रहा हूं, जबकि मेरा आशय ऐसा बिल्कुल नहीं था। मैं इस बार उन किताबों को बड़े सीधे सादे संक्षिप्त शब्दों में आपके सामने रखूंगा जो मुझे मेरे मित्रों ने बड़े चाव से मुझे भेजी और मैं उनका 

माना कि ग़म के बाद मसर्रत जरूर है
लेकिन जिएगा कौन तेरी बेरुख़ी के बाद
मसर्रत:खुशी
*
किसी का दिल जो मुनव्वर न हो सके उनसे
चमकते चांद सितारों को क्या करे कोई
*
सबने हालत मरीज़ की देखी 
कोई लेकर दवा नहीं आया
*
मयकदे में नमाज़ पढ़ लेंगे
काश साक़ी इमाम हो जाए
*

दरमियाना कद, सलेटी रंग की कमीज, सफेद पजामा, काली अचकन, पैरों में कपड़े के जूते, सर्दी हुई तो सर पर फर वाली टोपी, चेहरे पर उम्र से पड़ी हुई गहरी झुर्रियां, काली गहरी आंखें, बुलंद आवाज़ और होठों पर फीकी सी मुस्कुराहट। ये पहचान थी हमारे आज की शाइर जनाब "नैरंग सरहदी" साहब की जो 6 फरवरी 1912 को पाकिस्तान के जिला डेरा इस्माइल खां के एक कस्बे मंदहरा में जन्मे और 5 फरवरी 1973 को अपना 61 वां जन्मदिन मनाने के चंद घंटे पहले ही इस दुनिया- ए-फ़ानी से कूच कर गये।

उनके बेटे 'नरेश नारंग' साहब उन्हें याद करते हुए बताते हैं कि 'नैरंग साहब की  अचकन और टोपी यानी उनकी पोशाक कुछ ऐसी थी जिसे बहुत से लोग पसंद नहीं करते थे। लोगों का कहना था कि हिंदू होते हुए भी नैरंग साहब मुसलमानों जैसी पोशाक क्यों पहनते हैं और ऊपर से शायरी भी उर्दू में करते हैं। ऐसी बचकानी सोच वाले तब भी थे, अब भी हैं, खैर!! 'नैरंग सरहद' साहब ऐसी सोच वालों की परवाह नहीं करते थे उन्होंने अपने वसीयतनामा में लिखा था कि "शाइर किसी ख़ास मज़हब का क़ायल नहीं होता। अच्छा अख़लाक़ ही उसका मज़हब होता है। मेरे मरने के बाद मेरा बेटा सर न मुंडवाए और मेरे नाम से किसी मज़हबी आदमी को कुछ देना मेरे अक़ीदे के ख़िलाफ़ होगा।"

अदा हक़ कर दिया है दुश्मनी का
हमारे दोस्तों ने दोस्ती में

कहां है लायके- सोहबत किसी के 
न हो जब आदमीयत आदमी में
*
दिल में है मेरे हसरतो- अरमान ज़ियादा 
अफसोस की घर तंग है मेहमान ज़ियादा
*
जब तक कि एक दैरो-हरम का हो फ़ैसला
मेरी जबीं है और तेरा संगे-दर तो है
*
एक मंजिल के लिए सैकड़ो रस्ते हैं मगर
देखना ये है कि जाना है कहां से बाहर
*
मुल्क के बंटवारे के बाद 1947 में नैरंग साहब रेवाड़ी आ बसे। वहां के हिंदू हाई स्कूल में पहले उर्दू, फ़ारसी और बाद में पंजाबी पढ़ाते हुए, फरवरी 1972 में रिटायर हुए।

मशहूर शायर 'मुंशी तिलोक चंद 'महरूम' के शागिर्द रहे  नैरंग साहब ने शायरी बहुत कम उम्र में ही शुरू कर दी थी। उनकी हौसला अफ़ज़ाई 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़' जैसे उस्ताद शायरों ने की। 

नैरंग साहब ने रिवाड़ी के गैर शाइराना माहौल में 'बज़्मेअदब' संस्था की नींव रखी जिसमें शायरी में दिलचस्पी रखने वालों को ढूंढ ढूंढ कर जोड़ा गया। 

उनकी रहनुमाई में रेवाड़ी में कामयाब मुशायरे होने लगे जिसमें हिंदुस्तान के कई शहरों से बड़े-बड़े शायर शिरकत करने आने लगे। कुंवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' साहब की मौजूदगी में इन मुशायरों ने नई ऊंचाइयां हासिल की।

अफ़सोस, नैरंग साहब की शोहरत की खुशबू एक ख़ास इलाके में सिमट कर रह गई। तंगदस्ती की वजह से लाख चाहने के बावजूद वो अपना दीवान नहीं छपवा सके। उनके इंतकाल के 13 साल बाद 1986 में उनके बेटे 'नरेश' ने उनकी कुछ गजलों का मज्मूआ 'एक था शायर' नाम से छपवाया। मशहूर शायर जनाब 'विपिन सुनेजा 'शायक' उनके कामयाब शागिर्द हुए उन्हीं की बदौलत ये किताब " जिंदगी के बाद " मुझे दस्तयाब हुई ।

विपिन जी जो खुद एक बेहतरीन गायक हैं ने उनकी ग़ज़लों को आवाज़ दी है जिसे यूट्यूब पर सुना जा सकता है। 

नैरंग साहब के जीते जी तो सरकार ने उनकी सुध नहीं ली अलबत्ता उनकी मृत्यु के कई साल बाद, रिवाड़ी बस स्टैंड से उनके घर तक जाने वाले रास्ते का नाम 'नैरंग सरहदी मार्ग' रखकर उन्हें इज़्ज़त बख़्शी 

इस किताब को आप अमृत प्रकाशन शाहदरा से मंगवा सकते हैं या जनाब विपिन सुनेजा जी से 9991110222 पर संपर्क कर इस किताब के बारे में पता कर सकते हैं।

हर इक मक़ाम है तेरा हर इक तेरी मंज़िल 
कोई बता दे कि सजदा कहां-कहां करते
*
फ़क़त दीदे-बुतां से कुफ्र का इल्ज़ाम है मुझ पर 
जबीं पर मेरी ज़ाहिद देख सजदों का निशां भी है
*
मैं जितना यक़ीं करता गया अपने यक़ीं पर
उतना ही गुमां बढ़ता गया अपने गुमां में
*
आएगी मेरी याद मेरी ज़िंदगी के बाद 
होगी न रोशनी कभी इस रोशनी के बाद
*
पसे-हयात यही शे'र होंगे ऐ नैरंग 
अलावा इसके तेरी यादगार क्या होगी