Monday, September 13, 2021

किताबों की दुनिया - 240

पहाड़ - हम जैसे मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए पहाड़ तफ़रीह के लिए हैं। शहर की घुटन से निज़ात पाने को खुली शुद्ध हवा में साँस लेने के लिए, झुलसाती गर्मी से परेशान हो कर ठण्डी हवाओं की तलाश के लिए या सर्दियों में रुई के फाहों सी गिरती बर्फ़बारी का आंनद लेने के लिए हम पहाड़ का रुख़ करते हैं। हम पहाड़ों पर जाते हैं मौज मस्ती करते हैं और लौट आते हैं। अपने आनंद के लिए हम पहाड़ों का लगातार दोहन करते हैं। हमें पहाड़ों की तकलीफ़ों की तरफ़ देखने की न जरुरत महसूस होती है न उसके लिए हमारे पास फुर्सत है। पहाड़ों के दुःख को वो ही समझ सकता है जो पहाड़ों में रहता है।पहाड़ जिसकी ज़िन्दगी का जरूरी हिस्सा हैं। हमारे आज के शायर का ताल्लुक पहाड़ से है इसीलिए वो पहाड़ पर ऐसे सच्चे शेर कह पाए हैं जिनमें पहाड़ की असलियत झलकती है  :   

ख़ुद तो जी अज़ल ही से तिश्नगी पहाड़ों ने 
सागरों को दी लेकिन हर नदी पहाड़ो ने

आदमी को बख़्शी है ज़िंदगी पहाड़ों ने 
आदमी से पाई है बेबसी पहाड़ों ने 

बादलों के आवारा कारवाँ  के गर्जन को 
बारिशों की बख़्शी है नग़मगी की पहाड़ों ने
*
जिस तरह चढ़ रहे हैं वो ज़ीना पहाड़ का 
लगता है बैठ जाएगा सीना पहाड़ का

ये ग़ार-ग़ार सीना ये रिसता हुआ वजूद 
दामन किया है किसने ये झीना पहाड़ का
ग़ार-ग़ार: जख़्म-जख़्म
*
न जाने कितनी सुरंगें निकल गईं उससे 
खड़ा पहाड़ भी तो आंँख का ही धोखा था
*
बस आसमान सुने तो सुने इन्हें यारों 
पहाड़ की भी पहाड़ों-सी ही व्यथाएँ हैं

कहते हैं चन्दन का सिर्फ़ एक पेड़ पूरे जंगल को महकाने के लिए काफी होता है। हमारे आज के  शायर का बचपन ऐसे ही चन्दन के पेड़ की छाया में गुज़रा , मेरी मुराद हिमाचल प्रदेश के लाजवाब शायर स्वर्गीय जनाब मनोहर शर्मा 'साग़र' पालमपुरी से है जिनकी शादी के 14 साल बाद उनके घर कांगड़ा की नूरपुर तहसील के एक गाँव में 10 अक्टूबर 1962 को जिस बच्चे का जन्म हुआ उसका नाम रक्खा गया 'द्विजेन्द्र 'द्विज'। 'साग़र' साहब की शायरी की खुशबू चन्दन के पेड़ की तरह हिमाचल ही नहीं पूरे भारत में फैली हुई थी। चन्दन की वही खुशबू अब द्विजेन्द्र जी की शायरी में भी महसूस की जा सकती है।   

'साग़र' साहब पालमपुर के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के पी ऐ के पद पर कार्यरत थे और वो अधिकतर अपने काम में बहुत व्यस्त रहते। पालमपुर के पास मरिंडा में  उनका बड़ा सा पुश्तैनी घर था जिसमें 'साग़र' साहब की दादी , माता-पिता के अलावा बड़े भाई और उनका पूरा परिवार रहता था। ऐसे संयुक्त परिवार वाले घर में, जिसमें परिवार जन के अलावा ढेर सारे रिश्तेदार, पड़ौसी और दूसरे मिलने वालों के आने जाने से लगातार चहल-पहल बनी रहती,  द्विजेन्द्र जी का बचपन गुज़रा। घर के आँगन में जहाँ गायें बंधी थीं वहीँ अनेक फलों के पेड़ थे और ढेर सारी सब्ज़ियाँ भी उगी हुई थीं। 'द्विज' जी के दादाजी धार्मिक प्रवृति के थे गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के नियमित पाठक थे जिसमें छपी कहानियां वो घर के सब बच्चों को इकठ्ठा कर सुनाया करते। दादाजी सब बच्चों को एक अच्छा इंसान बनने पर जोर दिया करते, यहाँ तक कि विविध प्रकार के खिलौने भी वो बच्चों को बना कर देते थे। घर के बच्चे आपस में खूब शैतानियां करते और हुड़दंग मचाते।आज के दौर में ऐसे संयुक्त परिवार वाले घर की कल्पना भी  करना कठिन है।  

शैतानी में अव्वल रहने के कारण द्विजेन्द्र जी को साढ़े पाँच साल की उम्र में घर के पास के एक स्कूल में दाख़िल करवा दिया। ये 1968 की बात है जब बच्चों को आज की तरह ढाई साल की उम्र में नहीं छै साल की उम्र में स्कूल भेजा जाता था। आज तो छै साल का बच्चा इतना कुछ सीख जाता है जितना शायद पहले ज़माने में ग्यारह साल का बच्चा भी नहीं सीख पाता था। हमने अपने बच्चों को जल्दी स्कूल भेज कर उनसे उनका बचपन छीन लिया है - ख़ैर ! ये बहस का विषय है इसलिए इसे यहीं विश्राम देते हैं।  

 हजारों सदियों का सारांश कुछ कथाएंँ हैं 
और इन कथाओं का सारांश प्रार्थनाएंँ हैं

इसलिए यहांँ ऊबी सब आस्थाएँ हैं 
पलों की बातें हैं पहरों की भूमिकाएँ हैं 

यही है हाल तो किस काम की है आज़ादी 
दिलों में डर है, हवाओं में वर्जनाएँ हैं
*
बजा है आईनों में सूरतें सँवरती हैं 
मगर वो कौन है लाया जो आईनों पे निखार

चमक-दमक में न बीनाई बरक़रार रही 
कुछ एक लोग ख़िज़ां को भी कह रहे हैं बहार 
बिनाई: दृष्टि
*
तन-बदन बेशक सुखा डाला ग़मों की आग ने 
हांँ मगर आंँखों में पानी है अभी तक गांँव में

बेतहाशा भागने की ज़िद में जो तुझ को मिले 
ऐसे छालों की दवाई है अभी तक गांँव में
*
पता करो कि अभी वो बचा भी है कि नहीं 
बड़े दरख़्त के नीचे जो नन्हा पौधा था
*
फिर वही होगा हमेशा जो हुआ है 
फिर मुसीबत आएगी इक  बेजुबां पर
*
ज़लील होते हैं कितने उन्हें हिसाब नहीं 
अभी तो गिन रहे हैं वो दिहाड़ियाँ अपनी

क्लास में सबसे छोटी उम्र का प्यारा लेकिन बातूनी बच्चा 'द्विज' स्कूल की एक बुजुर्ग अध्यापिका जिसे सब बच्चे 'बूढी बहनजी' कहते थे, का दुलारा बन गया। वो हमेशा क्लास में उसे अपनी कुर्सी के सामने रखी मेज पर बिठा लेतीं और कवितायेँ सुनातीं जिन्हें याद कर ये बच्चा स्कूल में होने वाले बाल सभा के कार्यक्रमों में सुनाता और वाहवाही लूटता। कविताओं के प्रति प्रेम इन्ही बूढ़ी मास्टरनी की वजह से द्विज जी के दिल में पनपा।

साहित्य के प्रति अनुराग आठवीं कक्षा में आने के बाद और बढ़ा। घर पर पिता बच्चों को सुबह रेडिओ पर ऑल इण्डिया रेडिओ की उर्दू सर्विस सुनवाते जिसमें अक्सर उमा गर्ग जी की आवाज़ में गायी उनकी लिखी ग़ज़ल 'वस्ल की सेज पे उभरी हुई सलवट की तरह, उनकी याद आयी है सन्नाटे में आहट की तरह' अक्सर ब्रॉडकास्ट हुआ करती थी। उस उम्र में इस ग़ज़ल का 'द्विज' जी को मतलब तो कुछ समझ नहीं आता था लेकिन धुन और शब्द सम्मोहित करते थे। इसके अलावा 'द्विज' जब अपने पिताजी को रेडिओ पर सलामत अली खान ,मेहदीहसन, ग़ुलाम अली की ग़ज़लों को सुनते हुए झूमते देखते तो उन्हें बहुत अच्छा लगता। पिताजी के शायर मित्रों का जमावड़ा भी अक़्सर ही घर पर लगा रहता था जिनकी आपस की गुफ़तगू द्विज जी को बहुत दिलकश लगती। पिता पहले बच्चों के लिए नन्दन, चंदामामा, पराग, चम्पक जैसी बाल पत्रिकाएँ लाया करते थे जिनकी जगह बाद में धर्मयुग, सारिका, दिनमान और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं ने लेली। कहने का मतलब ये कि द्विज को बचपन से ही घर में शायराना माहौल मिला।

कोई ख़ुद्दार बचा ले तो बचा ले वरना 
पेट काँधो पे कोई सर नहीं रहने देता
*
आदमी व्यवहार में आदिम ही दिखता है अभी 
यूंँ तो है दुनिया सभी आदिम-प्रथाओं के ख़िलाफ़

तजरिबे कर की ही होती है बुरा मत मानिए 
हर नई पीढ़ी पुरानी धारणाओं के ख़िलाफ़
*
ख़ुद को इस हाल में रखना भी कोई खेल नहीं
मेरे कांँधों से जो ऊंँचा मेरा सर लगता है
*
हमारे हक़ में बयान आपका ख़ुदा रक्खे 
हुजूर ! दाल में कुछ तो जरूर काला है

कोई बचा ही नहीं उसकी भूख से अब तक 
वजूद सबका किसी वक़्त का निवाला है
*
अभी हर बात में उनकी तू हांँ में हांँ मिलाता है 
परख के देख तू अपने किसी इनकार का जादू
*
मुश्किल में जान आ गई जब आईना हुए
पहले ये पत्थरों का नगर पुरख़तर न था
*
कुछ तो बाकी था मेरी मिट्टी से रिश्ता मेरा 
मेरी मिट्टी को तरसती रही मिट्टी मेरी
*
रब्त और आहंग हैं गुम ज़िंदगी के शे'र से 
मिसरा ए ऊला अलग मिसरा ए सानी और है 
रब्त: संबंध आहंग: गान धुन

आठवीं तक के स्कूल से सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी का ईनाम लेकर आगे की पढाई के लिए 'द्विज' सेंट पॉल हाई स्कूल पालमपुर पहुंचे जो 1924 में अंग्रेज़ों द्वारा बनाया गया था। स्कूल के बच्चे और अध्यापक इस कॉन्वेंट स्कूल में सिर्फ़ अंग्रेजी ही बोला करते थे लिहाज़ा इस माहौल में ढलने में द्विज जी को थोड़ा वक़्त लगा। दसवीं की परीक्षा के बाद जब ग्यारवीं में वो विज्ञान विषय लेने के लिए स्कूल के प्रिंसिपल श्री एस.के.भारद्वाज जी से मिले तो दसवीं के विषयों में आये अंक देख कर उन्होंने विज्ञान की जगह उन्हें अंग्रेजी विषय लेने की सलाह देदी। देश विदेश में ख्याति प्राप्त श्री एस.के.भारद्वाज नेशनल अवार्ड प्राप्त अध्यापक थे और अंग्रेजी तथा फ्रेंच में पोस्ट ग्रेजुएट थे जिनकी बात को नकारा नहीं जा सकता था। फाइनल परीक्षा के दिन भारद्वाज साहब परीक्षा सेंटर पर अपने विद्यार्थियों को शुभकामनायें देने आये और जाते जाते द्विज जी से बोले 'बेटा मैं तुम्हारा नाम स्कूल के आनर्स बोर्ड पर देखना चाहता हूँ''। ये सुनकर सारे बच्चे ठहाके लगा कर हँसने लगे। परीक्षा के समस्त दिनों में द्विज जी ने न दिन देखा न रात डटकर मेहनत की और नतीज़तन अपना नाम ऑनर्स बोर्ड में सबसे ऊपर पाया।

ग्रेजुएशन की पढाई के लिए 'द्विज' जी जाना तो डी ऐ वी कॉलेज कांगड़ा चाहते थे लेकिन पारिवारिक मजबूरियों के चलते उन्हें एस.डी कॉलेज बैजनाथ में जाना पड़ा। बैजनाथ में उन्हें हिंदी की श्रेष्ठ कवयित्री सुश्री सरोज परमार, जो हिंदी पढ़ाती थीं, का सानिध्य मिला। हालाँकि द्विज जी हिंदी के विद्यार्थी नहीं थे लेकिन उनका रुझान हिंदी की और था परमार जी के निर्देशन में वो इंटर कॉलेज भाषण, वादविवाद और कविता प्रतियोगिताओं भाग लिया करते। उनके भाषा ज्ञान को परिष्कृत करने में सरोज जी का बहुत बड़ा हाथ रहा है।

'द्विज' जी ग्रेजुएशन के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहते थे लेकिन पिता की मर्ज़ी थी कि वो कोई नौकरी करें क्यूंकि आगे की पढाई के लिए उन्हें हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी शिमला जाना पड़ता और वहां के खर्चे उठाना शायद परिवार के लिए संभव नहीं था। मन मार कर वो पालमपुर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में नौकरी करने लगे।

नमी संँभाल के रक्खी है दिल की परतों में 
इसी से आंँखों में रहते हैं क़हक़हे रौशन
*
फ़ाइलों से निकल न पाये हम 
ख़ुद को दफ़्तर में छोड़ आये हम 

फ़स्ल बनकर तो लहलहाये हम 
आ के मंडी में छटपटाये हम 

खून सबका है एक, भूल गए 
और फिर ख़ून में नहाये हम
*
'धृतराष्ट्र' को पसंद के 'संजय' भी मिल गए 
आंँखों से देख कर भी जो मुकरे ज़ुबान से
*
आप अंगारों की फ़ितरत को बदल सकते नहीं 
सिर्फ़ इतना सोचिए क्यों फूल अंगारे हुए
*
खामोशी की बर्फ़ में अहसास को जमने न दे 
गुफ़्तगू की धूप में आकर पिघल कर बात कर
*
ये माना आईने से सामना अच्छा नहीं लगता 
किसे खिड़की से बाहर देखना अच्छा नहीं लगता 

इन्हीं हाथों से तुम दिन में अंँधेरे घेर लाते हो 
इन्हीं हाथों से मनके फेरना अच्छा नहीं लगता
*
बुलंदी दर हक़ीक़त वक़्त की मोहताज होती है 
बहुत ऊंँचा हमेशा तो बहुत ऊंँचा नहीं रहता

हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता शाहरुख़ खान की फिल्म 'ओम शांति ओम' का एक प्रसिद्ध संवाद है 'कहते हैं अगर दिल से किसी चीज को चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है' ये संवाद 'द्विज' जी पर पूरी तरह से सही उतरा। अंग्रेज़ी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने की जो जबरदस्त चाह, जब शिमला दूर होने की वजह से पूरी नहीं हो पायी, वो अचानक उसी साल से धर्मशाला में भी उसकी कक्षाएँ शुरू होने से पूरी हो गयी। शिमला तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर था लेकिन घर से मात्र 35 किलोमीटर दूर धर्मशाला जा कर अंग्रेजी की कक्षाएँ अटेंड करना तो संभव था। हालाँकि पिता एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में लगी नौकरी छोड़ कर रोज धर्मशाला जा कर द्विज जी के अंग्रेजी पढ़ने के पक्ष में नहीं थे लेकिन जब द्विज जी के दादा ने उनका साथ दिया तो पिता के पास सिवा हाँ करने के और कोई विकल्प बचा ही नहीं। पहाड़ों पर ये 35 की.मी की यात्रा लोकल बस लगभग दो ढाई घंटों में पूरी करती। इसके चलते द्विज जी रोज क्लास में आधा घंटा देरी से पहुँचते। एक दिन कॉलेज के प्राचार्य डा आत्माराम जी ने द्विज जी को बुला कर पूछा कि लगता है तुम्हारा कक्षाएँ अटेंड करने में रूचि नहीं है तभी तुम रोज देरी से आते हो। द्विज जी उन्हें अपनी समस्या बताई तो उन्होंने पूछा कि 'तुम किसके बेटे हो और पिताजी क्या करते हैं ?  द्विज जी ने जब पिताजी का नाम बताया तो वो खुश हो कर बोले अरे तुम तो हिमाचल प्रदेश की शान 'सागर' साहब के बेटे हो मैं तुम्हारे लिए स्कॉलरशिप और किताबों का इंतज़ाम कर देता हूँ। उनके इस सहयोग से 'द्विज' जी को पोस्ट ग्रेजुएशन करने में आसानी हुई। 

कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर एक दिन द्विज जी ने निकट भविष्य में होने वाली अंतरमहाविद्यालय भाषण प्रतियोगिता (डेक्लेमेशन ) का नोटिस लगा देखा जिसका विषय था 'मत कहो आकाश में कोहरा घना है ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है'। तब तक द्विज जी इस शेर के शायर दुष्यंत कुमार जी के नाम से परिचित नहीं थे इसलिए जब पता किया तो मालूम हुआ कि वो हिंदी के बहुत बड़े शायर हैं और उनकी ग़ज़लों की किताब 'साये में धूप' बहुत चर्चित हो चुकी है। द्विज जी ने दिल्ली से ये किताब तुरंत मंगवाई उसे पूरा पढ़ा और भाषण तैयार किया। उस भाषण प्रतियोगिता में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के 65 कॉलेजों से आये प्रतियोगिओं को हरा कर द्विज जी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। दूसरे दिन अंतर विश्वविधयालय की कविता प्रतियोगिता में भी प्रथम पुरूस्कार प्राप्त किया ।ट्राफियाँ जीतने के सिलसिले की ये शुरुआत थी। उसके बाद उन्होंने कॉलेज में दो साल पढ़ने के दौरान इतनी ट्रोफियाँ जीतीं कि प्रिंसिपल आत्माराम जी को उन्हें बुला कर कहना पड़ा कि बस करो बेटा अब तो कॉलेज में ट्रोफियाँ रखने की जगह ही नहीं बची। इस बात को उन्होंने द्विज जी को कॉलेज की पढाई पूरी करने के बाद दिए गए सर्टिफिकेट में भी लिखा।          

बात कहता तो है अपनी लेकिन 
उसमें सुनने का जज़्बा नहीं है 

शेर कहता हूंँ वरना समंदर 
कूज़े में यूँ सिमटता नहीं है
*
उनको भर भर थाली धूप 
हमको प्याली प्याली धूप 

अपना हर पत्ता सीला 
उनको डाली डाली धूप
*
ले उड़ेगा हवा का इक झोंका 
इन घटाओं की आनबान में क्या 

उसको कह तो दिया ख़ुदा हाफ़िज़ 
जान अब भी है तेरी जान में क्या
*
शामिल ही नहीं इसमें हुनरमंद लोग अब 
इतने कड़े नियम हैं ज़माने में होड़ के
*
लब पे आज़ादियों के क़िस्से हैं 
सोच लेकिन है सांँकलों वाली
*
परिंदे आने दो थोड़ा सा चहचहाने दो 
ये शाख़ देखना हो जाएगी हरी फिर से
*
मैं इसे घुटनों पर रहकर कब तलक बैठा रहूं 
क्या करूं इसका बता तू ही कि सर मेरा भी है

धर्मशाला के मॉल रोड की बात है एक शाम द्विज जी को चहलकदमी करते हुए उनके प्रोफ़ेसर मिल गए जिनके साथ एक बुजुर्ग सज्जन भी थे। द्विज जी ने प्रोफ़ेसर साहब के चरणस्पर्श किये और साथ में उन बुज़ुर्गवार के भी। प्रोफ़ेसर साहब ने कहा 'मिलो आप है श्री मुल्कराज आनंद', द्विज जी को यकीन ही नहीं हुआ कि ' टू लीव्स एन्ड अ बड' और 'कुली' जैसे कालजयी उपन्यासों के पद्म भूषण से सम्मानित लेखक से उनकी यूँ अचानक रूबरू मुलाक़ात हो जाएगी। जब प्रोफ़ेसर साहब ने मुल्कराज जी को बताया कि 'ये द्विज हैं हमारे कॉलेज के होनहार विद्यार्थी जो कवितायेँ और ग़ज़लें कहते हैं' तो मुल्कराज जी ने मुस्कुराते हुए पूछा 'कौनसी ज़बान में लिखते हो बरख़ुरदार, फिर बिना जवाब सुने आगे बोले कि 'किसी भी ज़बान में लिखो लेकिन अपनी ज़बान में भी जरूर लिखना'। मुल्कराज आनंद जी की ये बात द्विज जी ने गाँठ बाँध ली और प्रण किया कि अपनी मातृभाषा में भी ग़ज़लें कहूँगा। अपने इस प्रण को साकार करने की ओर उन्होंने अपना पहला क़दम 2004 में बढ़ाया। 2004 से 2021 तक हिमाचली ज़बान में लिखी उनकी ग़ज़लों का संग्रह 'ऐब पुराणा सीहस्से दा' हाल ही में मन्ज़रे आम पर आया है जो बहुत पसंद किया जा रहा है।

एम.ऐ. इंग्लिश करने के बाद 'द्विज' जी की नौकरी लेक्चरर के पद पर थुरल कॉलेज में लगी जहाँ के बच्चे इतने बदमाश थे कि किसी लेक्चरर को तीन दिन से ज्यादा कॉलेज में टिकने नहीं देते थे लेकिन द्विज साहब ने उन पर ऐसा जादू डाला कि बच्चे उनके मुरीद ही नहीं हुए बल्कि अपनी सारी शैतानियां छोड़ इंटर कॉलेज भाषण और कविता प्रतियोगिताएं में ट्रोफियाँ जीतने लगे। द्विज जी की लेक्चरर के रूप में ख़्याति इसकदर बढ़ी कि एस.डी. कॉलेज वाले, जहाँ से उन्होंने ग्रेजुएशन किया था, उन्हें अपने यहाँ ले गए। इसी बीच 1986 में उन्हें डिपार्टमेंट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन में अँग्रेज़ी के लेक्चरर के पद पर नियुक्ति मिल गयी। इसी संस्थान से 34 वर्ष बाद सन 2020 में वो विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर हुए। 

स्थाई नौकरी मिलने के बाद ज़िन्दगी पटरी पर आ गयी। शादी हो गयी और पत्नी के रूप में एक ऐसी जीवन संगनी मिली जो उनकी रचनाओं पर एक कुशल आलोचक की तरह सटीक टिप्पणी करतीं हैं। ग़ज़ल लेखन इस दौरान अबाध गति से चलता रहा। देश के अधिकतर पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ छपने लगीं। मुशायरों में पिता के साथ साथ हिमाचल प्रदेश के पावेंद्र पवन जी प्रेम भारद्वाज जी ,प्रफ़्फ़ुल परवेज़ साहब, शेष अवस्थी जी जैसे बड़े शायरों के साथ मंच साझा करने का अवसर मिलता रहा।  

यकीनन हो गया होता मैं पत्थर 
सफ़र में मुड़ के पीछे देखता तो 

तुझे कुछ डर नहीं दुनिया का लेकिन 
कभी जो सामना खुद से हुआ तो
*
यूंँ ही बना कर रक्खोगे कब तक मेरा भरम 
दीवार का सवाल है अब इश्तिहार से
*
हादसो! तुमको बयां करने की फ़ुर्सत है किसे 
रह गए हैं अब उलझ कर राहतों, भत्तों में लोग
*
जो शख़्स है लंबा उसे रस्ते से हटा दें 
इस तरह तो क़द आपका ऊंँचा नहीं होता
*
छोड़ दे चिंगारियों से खेलने का अब जुनूं 
सिर्फ़ तेरा ही नहीं बस्ती में घर मेरा भी है
*
फूल ही फूल हों कदमों में चलो यूंँ कर लें 
प्यार के पेड़ की एक शाख़ हिला दी जाये
*
जहांपनाह! सज़ाओं से हम नहीं डरते 
मगर सज़ाओं से पहले ख़ता की बात करें 

ज़ुबानें, गर्दनें, सर, हाथ-पाँव, बाजू सब 
कहां बचेंगे जो अपनी रज़ा की बात करें
*
अजब तक़रीर की है रहनुमा ने अम्न पर देखो
निकल आए हैं चाकू, तीर और तलवार चुटकी में

नौकरी, गृहस्ती और शायरी सुचारु रूप से चल रही थी कि 1996 में लम्बी बीमारी के बाद द्विज जी के पिताजी का देहावसान हो गया। परिवार के लिए ये बहुत बड़ा झटका था उनके बिना घर की कल्पना ही किसी ने नहीं की थी। इस हादसे से उबरने में द्विज जी को पाँच साल लगे। ये पाँच साल का समय कैसे बीता ये द्विज जी को याद नहीं। ख़ैर !! जीवन कभी रुकता नहीं इसलिए धीरे धीरे ही सही वापस पटरी पर आ गया। लेखन में भी गति आयी। जब काफ़ी ग़ज़लें इकठ्ठा हो गयीं तो उन्हें एक किताब की शक्ल में प्रकाशित करने का फैसला लिया। द्विज जी के एक मित्र ने उन्हें कहा कि आप ग़ज़लों की किताब छपवा तो रहे हो लेकिन क्या आपने उनकी बहर, वज़्न आदि किसी उस्ताद को दिखाई हैं ? द्विज जी का तो कोई नियमित उस्ताद कभी था नहीं जो सीखा दूसरों को पढ़ के सीखा बाकी ये फ़न तो उन्हें तो उन्हें पिता से विरसे में मिला था। मित्र के बताये अनुसार उन्होंने ग़ज़ल के उरूज़ पर छपी बेहतरीन किताब 'फन्ने शायरी' जिसे अल्लामा अख़लाक़ हसन देहलवी साहब ने लिखा था दिल्ली में काफी खोजबीन के बाद हासिल की और उसे पढ़ा । सातवीं-आठवीं और उसके बाद वही नवीं-दसवीं में भी पढ़ी उर्दू, उस किताब को पढ़ने में काम आयी। किताब पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी सभी ग़ज़लों को दुबारा से देखा और आखिर गुलमोहर पब्लिकेशन की और से जन-गण-मन किताब मंज़र -ऐ आम पर आयी जिसे आम पाठकों के अलावा उस्ताद शायरों ने भी बहुत पसंद किया और उस पर अपनी समीक्षाऐं भी लिखी जिनमें श्री ज़हीर क़ुरैशी, कमलेश भट्ट 'कमल' और ज्ञान प्रकाश विवेक जी की टिप्पणियॉं विशेष उल्लेखनीय हैं । 'द्विज' जी मानते हैं कि वो बहुत ख़ुशकिस्मत हैं क्यूंकि उन्हें शायरी में ही नहीं बल्कि ज़िन्दगी के हर मोड़ पर भरपूर मदद करने को लक्ष्मण सा भाई 'नवनीत' मिला है जो स्वयं भी लाजवाब शायर और कवि है साथ ही द्विज जी ग़ज़लों का पहला और सच्चा आलोचक भी।

फिर 2006 में इंटरनेट पर आया ब्लॉग का दौर। 'द्विज' जी 'पंकज सुबीर' जी के ब्लॉग 'सुबीर सुबीर संवाद सेवा' से जुड़े जहाँ हम जैसे बहुत से लोग ग़ज़ल का ककहरा सीख रहे थे। ब्लॉग पर हम एक दूसरे की ग़ज़लें पढ़ते और मदद भी करते। द्विज जी से मैंने बहुत कुछ सीखा है। पंकज जी के अलावा मेरे गुरुओं में 'द्विज' जी भी शामिल हैं। इंटरनेट के आने से द्विज जी ग़ज़लें बहुत बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचने लगीं। काव्य की बहुत मशहूर साइट 'कविता कोष' से भी द्विज जी जुड़े और उसे विस्तार दिया। आप उन्हें उर्दू साहित्य की सबसे बड़ी साइट 'रेख़्ता' पर भी पढ़ सकते हैं।

बेहद विनीत स्वाभाव के मृदुभाषी 'द्विज' जी अनूठे व्यक्तित्व के स्वामी हैं। 'नवल प्रयास शिमला द्वारा उन्हें धर्मप्रकाश साहित्य सम्मान दिल्ली में 2019 प्रदान किया गया इससे पूर्व वो काँगड़ा लोक साहित्य परिषद् राजमंदिर नेरटी द्वारा वर्ष 2017 का परम्परा उत्सव सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं। सबसे बड़ा सम्मान वो प्यार है जो उनके लाखों पाठकों ने उन्हें दिया है।

अब आखिर में आपको बता दें कि आज जिस किताब को हम सामने खोले बैठे हैं वो 'द्विजेन्द्र द्विज' का ताज़ा ग़ज़ल संग्रह 'सदियों का सारांश' है। इसे हार्ड कवर में भारतीय ज्ञान पीठ ने प्रकाशित किया है। सरल भाषा में बेमिसाल ग़ज़लें पढ़ने वालों के लिए ये किताब किसी वरदान से कम नहीं। इस किताब में 'द्विज' जी की श्रेष्ठ 115 ग़ज़लें संगृहीत हैं जिनका केनवास बहुत विस्तृत है। इस किताब के प्रकाशन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है विलक्षण प्रतिभा के शायर जनाब 'विजय कुमार स्वर्णकार' जी ने, उन्होंने किताब के फ्लैप पर इस ग़ज़ल संग्रह और द्विज जी के बारे बेहतरीन आलेख भी लिखा है।

आप इस किताब को भारतीय ज्ञानपीठ से 9350536020 पर फोन करके मंगवा सकते हैं। ये किताब फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध है और तेज़ी से बिक रही है। इस खूबसूरत किताब के प्रकाशन के लिए द्विज जी को 9418465008 पर बधाई देना न भूलें।


हमें चेहरों से कोई बैर कब था 
हमारी जंग थी बेचहरगी से 

ख़ुदा महफ़ूज़ है वो है जहांँ भी 
बचा लो आदमी को आदमी से 

तो क्या मैं भी सियासी हो रहा हूंँ 
मेरी बनने लगी है हर किसी से
*
रंग ने, रंग में, रंग से बात की 
रंग और आ गए रंग के रंग में

Monday, August 30, 2021

किताबों की दुनिया - 239

बड़े वसूक़ से दुनिया फ़रेब देती रही 
बड़े ख़ुलूस से हम ऐ'तबार करते रहे 
*
रविश रविश पे चमन के बुझे बुझे मंजर 
ये कह रहे हैं यहाँ से बहार गुज़री है
*
मज़हब का सिर्फ़ नाम है वरना समाज पर 
अब तक है मुहर सब्द वही जात पात की
सब्त: लिखना/खुदी हुई
*
ये वो ही परिंदा है कि साधे हुए चुप था
इस तरह जो अब हो के रिहा बोल रहा है
*
साए के वास्ते ता'मीर करेंगे फिर लोग 
धूप के वास्ते दीवार गिराने वाले
*
दुश्मन है आदमी का अज़ल से खुद आदमी 
यानी मुक़ाबला ये बला का बला से है
*
बढ़ूँ अगर तो किसी तक मिरी रसाई न हो 
रुकूँ तो यूंँ लगे वो मेरी दस्तरस में है
*
हैरत है कि हासिल जिसे आराम बहुत है 
इतना ही ज़ियादा वो परेशाँ नज़र आए
*
जिस कदर बढ़ती गई है उम्र, कम होती गई 
जिस कदर घटती गई है, और नादानी बढ़ी
*
'शौकत' हमारे साथ बड़ा हादसा हुआ 
हम रह गए हमारा ज़माना चला गया

ये शेर जो अभी आपने ऊपर पढ़ें हैं, उस शायर के नहीं हैं जिनकी किताब की बात हम किताबों की दुनिया की इस कड़ी में करेंगे। ऐसा पहली बार हुआ है, इससे पहले इस श्रृंखला में हमने जिस किसी शायर की किताब की बात की है तो उसके साथ किसी दूसरे शायर के शेर कभी नहीं पोस्ट किये । तो फिर ये अपवाद अबकी बार क्यों ? वो इसलिए कि ये हमें जरूरी लगा। यूँ समझिये ये ऐसा ही है जैसे कोई गंगा की बात करने से पहले हिमालय की बात करे। गंगा का उद्गम हिमालय ही है न। ये शेर जनाब शौक़त वास्ती साहब मरहूम के हैं । शौकत साहब के वालिद सय्यद नेमत अली शाह यूँ तो अम्बाला के पास के एक गाँव के निवासी थे लेकिन वो अपनी सरकारी नौकरी के चलते पेशावर आ गये और वहीँ बस गए। उनका इरादा था कि रिटायरमेंट के बाद वो वापस अपने गाँव चले जायेंगे और अपने बड़े-छोटे भाइयों और बाकि परिवार जन के साथ पुश्तैनी घर में इकठ्ठा रहेंगे

जनाब नेमत अली शाह साहब का अम्बाला के पास अपने गाँव शाहाबाद वापस लौटने का सपना उस वक़्त चूर चूर हो गया जब विभाजन के बाद बलवाइयों ने उनके घर को जला कर ख़ाक कर दिया और उनके सगे भाइयों का बेरहमी से क़त्ल कर दिया। हर इंसान में शैतान रहता है जिसे हम बड़ी मुश्किल से अपने अंदर दबाये रखते हैं ये शैतान मौका मिलते ही इंसान के बाहर निकल आता है। भीड़ में इस शैतान को बाहर निकलने में आसानी होती है। विभाजन के समय हुई मारकाट इसी शैतान के बाहर निकलने के कारण हुई। 

जनाब नेमत अली शाह साहब के यहाँ एक अक्टूबर 1922 को शौकत साहब का जन्म हुआ। शौकत साहब को पढ़ने का शौक बचपन से ही था। उन्होंने हिंदी, अंग्रज़ी ,उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी और अरबी भाषा में महारत हासिल की। शायरी का शौक़ भी छोटी उम्र में ही उन्हें लगा जो बाद में मशहूर उस्ताद शायर अब्दुल हमीद 'अदम' साहब की रहनुमाई में परवान चढ़ा। मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन में 30 साल मुलाज़मत करने के बाद शौक़त साहब ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्र लेखन करने लगे। शायरी के अलावा उन्होंने हॉमेर, मिल्टन और रबिन्द्र नाथ टैगोर के काम को उर्दू में अनुवादित भी किया। शौक़त साहब के घर देश विदेश के शायरों और विद्वानों का आना जाना लगा रहता था। शौकत साहब, जिनका पूरा नाम 'सलाहुद्दीन शौकत वास्ती' था, को आधुनिक उर्दू शायरी के महान शायरों में शुमार किया जाता है। आप 3 सितम्बर 2009 को इस दुनिया ऐ फ़ानी से रुख्सत हुए लेकिन अपने काम की वज़ह से वो हमेशा हमारे बीच मौजूद रहेंगे। जनाब शौक़त वास्ती के यहाँ उनके बेटे हमारे आज के शायर जनाब सबाहत आसिम वास्ती का 5 नवम्बर 1957 को जन्म हुआ। उनकी ग़ज़लों की देवनागरी में रेख़्ता बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब 'लफ़्ज़ महफूज़ कर लिए जाएँ ' हमारे सामने है जिसे उन्होंने अपने बहुत अज़ीज़ जनाब सय्यद सरोश आसिफ़ और संजीव सराफ़ की नज़र किया है। जनाब सय्यद सरोश साहब आसिम साहब के शागिर्द हैं और उनसे पिछले पाँच सालों से शायरी के गुर सीख रहे हैं। मेरी नज़र से अब तक जो पाँच छै सौ ग़ज़ल की किताबें गुज़री हैं उनमें से ये अकेली किताब है जिसे एक उस्ताद ने अपने अपने शागिर्द को नज़र किया है। ये बात पढ़ने में जितनी आसान लगती है उतनी है नहीं, इस छोटी सी लेकिन बेहद अहम बात से एक उस्ताद का अपने शागिर्द के लिए जो प्यार झलकता है वो बेमिसाल है। इससे ये भी पता लगता है कि उस्ताद जी शायर ही बेहतर नहीं हैं इंसान भी कमाल के हैं। ये किताब आप अमेज़न से ऑन लाइन या रेख़्ता दिल्ली से मँगवा सकते हैं।
'

वक्त इज़हार का नहीं है अभी
लफ्ज़ महफ़ूज़ कर लिए जाएं
*
टपकेगा लहू लफ़्ज़ कोई चीर के देखो
तुम लोग समझते हो कि बे-जान ग़ज़ल है
*
वो इत्तेफ़ाक़ से मिल जाए रास्ते में कहीं 
मुझे ये शौक़ मुसलसल सफ़र में रखता है
*
मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं 
मैं आदमी हूं मेरा ऐ'तबार मत करना
*
जो जख़्म दिए आपने महफ़ूज़ हैं अब तक 
आदत है अमानत में ख़यानत नहीं करते
*
उ'रूज पर है चमन में बहार का मौसम 
सफ़र शुरू ख़िज़ाँ का यहाँ से होता है
*
इस क़दर ताजगी रखी है नज़र में हमने 
कोई मंज़र हो पुराना तो नया देखते हैं
*
ख़ुश्क़ रूत में इस जगह हमने बनाया था मकान 
ये नहीं मालूम था ये रास्ता पानी का है
*
हर बाग में ऐसे भी तो होते हैं कई फूल 
कोई भी जिन्हें देखने वाला नहीं होता
*
मैं तेरे वास्ते बदला तो बहुत हूँ लेकिन 
कुछ कमी रह गई होगी तेरे क़ाबिल न हुआ

ये कहना कि जनाब आसिम वास्ती साहब को शायरी घुट्टी में मिली, ग़लत नहीं होगा। जिस बच्चे की शायरी की जड़ें अपने वालिद जनाब शौक़त वास्ती से होती हुई जनाब अब्दुल हमीद 'अदम' साहब और फिर 'अदम' साहब से होती हुई उस्तादों के उस्ताद जनाब 'दाग़' साहब तक पहुँचती हों उसमें पुख़्तगी होना लाज़मी है। सिर्फ़ ग्यारह साल की उम्र से आसिम साहब शायरी करने लगे थे। उनका घर पेशावर में था जहाँ उनके वालिद से मिलने को पाकिस्तान और दूसरे देशों के उस्ताद शायरों की आवाज़ाही रहती ही थी. लिहाज़ा उनकी आपस की गुफ़्तगू सुन सुन कर ही उन्होंने बहुत कुछ सीखा। जनाब अहमद फ़राज़ और मोहसिन एहसान साहब तो लगभग रोज़ यहाँ आते। इनके अलावा गुलाम मुहम्मद क़ासिर ,फ़ारिग बुख़ारी ,परवीन शाकिर साहिबा ,इफ़्तिख़ार आरिफ़ और इब्ने इंशा जैसे नामवर शायर भी इनके यहाँ आये। शौक़त वास्ती साहब के उस्ताद जनाब अब्दुल हमीद 'अदम' साहब ने तो पूरा एक महीना उनके यहाँ क़याम किया। इस पूरे महीने आसिम साहब ने ही उनकी सुबह की चाय से लेकर खाने तक पूरी खिदमत की। आसिम साहब को इन सब बड़े शायरों को क़रीब से देखने और जानने का मौका मिला। ऊपर वाले ने भी शौक़त साहब के बेटों में से सिर्फ़ आसिम साहब को ही शायरी का हुनर अता किया।

बचपन में आसिम साहब अपनी तुकबंदियाँ अपने वालिद साहब को दिखाया करते और वो हमेशा उनकी हौसला अफजाही करते। जहाँ जरुरत होती उन्हें मशवरा देते। आसिम साहब की ज़बान को सुधारने में शौक़त साहब का बहुत बड़ा हाथ है। इसके अलावा अहमद फ़राज़ भी उन्हें ग़ज़ल की बारीकियाँ सिखाते थे। अहमद फ़राज़ साहब से उनका रिश्ता बड़ा दोस्ताना था। एक बार तो जब अहमद फ़राज़ साहब को आसिम साहब कार से उनके घर छोड़ने जा रहे थे तो रास्ते में एक तेज़ रफ़्तार से आ रहे ट्रक से टक्कर होते होते बची। सेकण्ड की देरी से दोनों ख़ुदा को प्यारे हो गए होते। आज भी उस वाक़ये को याद कर आसिम साहब को ठंडा पसीना आ जाता है। 

आसिम साहब ने अपने स्कूल के दिनों में बल्कि आठवीं जमात में ही मीर और ग़ालिब को पढ़  लिया था। उस वक़्त उन्हें वो शायरी तो पूरी तरह समझ नहीं आयी लेकिन शेर कहने का हुनर और ज़बान बरतने का सलीक़ा थोड़ा बहुत समझ आया। बड़े होने के बाद भी उनका इश्क़ ग़ालिब, इक़बाल और मीर की शायरी जरा भी कम नहीं हुआ है। बचपन में वो वालिद साहब के साथ मुशायरों, रेडिओ और टीवी के प्रोग्रामों में जाया करते। बाद में उन्होंने कई बार अपने वालिद साहब के साथ मुशायरे पढ़े भी हैं।  

बांँधा हर इक ख्याल बड़ी सादगी के साथ 
लेकिन कोई ख्याल भी सादा नहीं कहा
*
इक जंग सी होती है मुसलसल मेरे अंदर 
लेकिन कोई नेज़ा है न तलवार है मुझ में

क्या उसके लिए भी है कहीं कोई जहन्नम 
मुझसे भी बड़ा एक गुनाहगार है मुझ में
*
गैरों के मोहल्लों को बड़े रश्क से देखा 
ख़ुद हमने मगर फूल न लगवाए गली में
*
बर्फीले पहाड़ों के सफर पर तो चले हो 
क्या तुमने फिसलने का हुनर सीख लिया है
*
कोशिश में इक अ'जीब सी उज्लत का दख़्ल है 
मैं बीज बोल रहा कि ख़्वाहिश समर बनी 
उज्लत: जल्द बाजी, समर : फल

बैठे थे एक बेंच पे कुछ देर पार्क में 
इतना सा  वाक़िया था मगर क्या ख़बर बनी
*
तोड़ना हाथ बढ़ाकर ही नहीं है लाज़िम 
पक चुका हो तो हवा से भी समर टूटता है 
समर: फल
*
मैं इन्हिमाक में ये किस मक़ाम तक पहुंँचा 
तुझे ही भूल गया तुझको याद करते हुए
इन्हिमाक: तल्लीनता
*
दरख़्त काटने का फ़ैसला हुआ 'आसिम' 
समर को छू न सके लोग जब उछल कर भी

पढ़ाई में तेज़ होने की वज़ह से उन्होंने मेडिकल प्रोफेशन चुना और ख़ैबर मेडिकल कॉलेज पेशावर से डाक्टरी की पढाई पूरी की। मुशायरों में शिरक़त की वजह से अब लोग इन्हें शायर के रूप में पहचानने लगे थे।

इनकी शायरी में अक्सर कम्युनिज़्म के प्रति झुकाव नज़र आता था। एक बार ये पाकिस्तान के क्रन्तिकारी शायर जनाब 'हबीब जालिब' साहब की सदारत में मुशायरा पढ़ रहे थे। हबीब जालिब से जिया उल हक़ साहब की सरकार ख़ासी नाराज़ थी। जालिब' साहब से पाकिस्तान की सभी सरकारें नाराज़ रहीं उन्होंने जितना वक़्त जेल की दीवारों के पीछे गुज़ारा उतना शायद ही किसी और शायर ने कभी गुज़ारा हो। मुशायरे के बाद बुज़ुर्ग हबीब जालिब साहब ने उन्हें पाकिस्तान में कम्युनिज़्म की मशाल थामने का मशवरा दिया। हबीब साहब और उनके बहुत से चाहने वालों की तरफ़ से बार बार जोर दिए जाने पर आसिम साहब इन्क़लाबी शायरी करने लगे। शायर के साथ साथ बतौर डॉक्टर भी इनका नाम तेजी से पाकिस्तान में फैलने लगा था। जब हुक़ूमत को इनकी इंक़लाबी शायरी की भनक लगी तो इन्हें भी हबीब जालिब साहब की तरह घेरने की योजना बनाई जाने लगी। इससे पहले की जिया उल हक़ की सरकार इन्हें सीखचों के पीछे बंद करती ये मेडिकल की एडवांस पढाई करने यू.के.आ गए। यहाँ आ कर उन्होंने मेडिसिन की पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की और फिर यू. के. में वहीँ की नागरिकता लेकर बस गए। जिया उल हक़ और उन जैसे बहुत से दूसरे तानाशाहों के ज़ुल्मों से तंग आकर पाकिस्तान को अदब के बेहतरीन ख़िदमदगारों और दूसरे प्रोफेशन के कामयाब लोगों को जब अपना मुल्क़ छोड़ना पड़ा तो इससे मुल्क़ को कितना बड़ा नुक़सान हुआ इसका अंदाज़ा शायद ही कभी ये तानाशाह लगा पायें।

बाइस तो मिरे क़त्ल का हालात हैं मेरे 
क़ातिल मेरा दुश्मन है कि दुनिया है कि मैं हूंँ
*
दूर उफ़ुक़ पर सूरज उभरा है लेकिन 
कौन हटाएगा खिड़की से पर्दों को 

करते हैं जो लोग तिजारत शीशों की 
खुद ही नहीं पहचानते अपने चेहरों को
*
देने लगा हूं जन्नत-ओ-दोजख़ के हुक्म भी 
परवरदिगार रोक ख़ुदा हो रहा हूंँ मैं
*
न था मुम्किन वहाँ हालात को तब्दील करना 
जहांँ तारीख़ को यक्सर भुलाया जा चुका था
यक्सर: पूरी तरह
*
हमने तिनके से तो साहिल पे उतर जाना है 
इससे आगे नहीं मालूम किधर जाना है 

जो गया महफ़िल-ए-याराँ से गया ये कह कर 
दिल तो करता नहीं जाने को मगर जाना है   

ये कि लगता ही गया बज़्म की रानाई में 
और मैं दिल से यह कहता रहा घर जाना है
*
ये कह रही हैं वो आंँखें जो ख़ुद नहीं खुलतीं 
शदीद आँधियों में आज़माए जाएंँ चराग़ 
शदीद: तेज 

अगर नज़र को अंधेरे में तेज रखना है 
तो फिर यह अम्र है लाज़िम बुझाए जाएंँ चराग़
अम्र: काम
*
कैसे उस आंँगन को 'आसिम' कमरे में तब्दील करूं
जिसमें चिड़िया और तितली से मेरी बेटी खेली है

आसिम साहब का यू. के. आने और वहां की नागरिकता लेने का फ़ैसला उनकी ज़िन्दगी में बहुत अहम तब्दीली लाया। मेडिकल में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने के अलावा उन्हें रॉयल कॉलेज ऑफ आयरलैंड की मेम्बरशिप हासिल हुई , लीडस टीचिंग हॉस्पिटल में रिहेब्लिटेशन मेडिसिन की ट्रेनिंग लेने का मौक़ा मिला बाद में वो शेफील्ड टीचिंग हॉस्पिटल में रिहेब्लिटेशन मेडिसिन के कंसलटेंट नियुक्त हुए जहाँ वो लगभग नौ साल तक काम करते रहे। प्रोफेशनल ज़िन्दगी में तरक़्क़ी के साथ साथ उनकी ज़िन्दगी में रोज़ी साहिबा जो ब्रिटिश नागरिक हैं बतौर शरीके हयात शामिल हुईं। अब उनके परिवार में दो बेहद समझदार और कामयाब बेटियाँ भी हैं जिन पर फ़क्र किया जा सकता है। 

रोज़ी साहिबा के अलावा एक और शख़्स ने आसिम साहब की ज़िन्दगी को गुलज़ार किया और वो हैं मशहूर शायर नासिर काज़मी साहब के बेटे जनाब 'बासीर सुल्तान काज़मी' साहब। बासीर साहब ने मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से एम्ए एड और एम्ए फिल की डिग्रियाँ हासिल की हैं। उनकी शायरी यू.के. के मैकेंज़ी स्केवर की एक शिला पर उकेरी गयी है। 1953 में जन्में बासीर साहब जो 1990 में यू.के. आ कर बस गए, आसिम वास्ती साहब के गहरे दोस्त हैं। आसिम साहब के दोस्तों में शायर जनाब 'अब्बास ताबिश' साहब का नाम भी आता है जिनकी पहली किताब जनाब शौक़त वास्ती साहब की रहनुमाई में मंज़र-ए-आम पर आयी थी।

मेरा दिल है मेरी पनाह में तेरा दिल है तेरी पनाह में 
मगर इख़्तियार का मस्अला तिरा और है मिरा और है
*
ये बात सच है कि मस् रुफ़ हूँ बहुत फिर भी 
सताए जब तुझे तन्हाई तो बुला लिया कर 

समझना ठीक नहीं बेवफ़ाई गफ़्लत को 
जब आए दिल में कोई शक तो आज़मा लिया कर
*
पूछा था दरवेश से मैंने प्यार है क्या और उसने 
काग़ज़ पर इक फूल बनाया साथ बनाई तितली
*
अगर लहू नहीं करता मैं अपने पाँव यहाँ 
तिरी ज़मीं पे कहीं रास्ते नहीं होते

यह लोग इज्ज़ की तासीर से नहीं वाक़िफ़ 
इसीलिए तो यहां मोजज़े नहीं होते
इज्ज़: विनम्रता , मोजज़े: चमत्कार
*
रहते हैं जिस गली में बहुत मालदार लोग 
हैरत है उस गली में गदागर नहीं गया 
गदागर :भिखारी
*
शहर का हाल अब ऐसा है ज़रा देर अगर 
नींद आए भी तो ग़ाफ़िल नहीं हो सकता मैं
*
जो मिरा रिज्क़ है सारा है मेरी क़िस्मत का 
ये तो सोचा ही नहीं छीनने वाले तूने
रिज्क़: जीविका, रोज़ी
*
अभी ये लम्स मुकम्मल नहीं हुआ मेरी जान 
अभी ये ख़ून के दौरान तक नहीं पहुंचा
लम्स: स्पर्श

यू.के. में ज़िन्दगी ख़ुशगवार तरीके से बसर हो रही थी कि सन 2007 में डाक्टर आसिम को यू ऐ ई के विश्व प्रसिद्ध 'शेख़ ख़लीफ़ा मेडिकल सिटी' से फ़िजिकल मेडिसिन और रिहेब्लिटेशन के सीनियर कंसल्टेंट पद का ऑफर आया। पचास वर्ष की उम्र में जब इंसान किसी एक जगह ठिकाना बना कर रहने की सोचता है अचानक यू.के. से जमा जमाया सब कुछ छोड़कर किसी दूसरी जगह जा कर फिर से आशियाँ बनाने का निर्णय लेना बनाना आसान नहीं होता लेकिन डॉक्टर आसिम ने इस चेलेंज को स्वीकारा और अबुधाबी आ गए। अबुधाबी में आसिम साहब ने बहुत से प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के रिहेब्लिटेशन सेंटर्स के विकास में अभूतपूर्व काम किया। आजकल वो अबुधाबी के विश्वप्रसिद्ध क्लीवलैंड क्लिनिक में स्टॉफ फिजीशियन के पद पर काम कर रहे हैं। रिहेब्लिटेशन के क्षेत्र में डा.आसिम का नाम विश्व के सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर्स में शुमार होता है।

डॉक्टर साहब के पास यूँ तो सब कुछ है सिवा वक़्त के। मसरूफ़ियत के चलते वो सोशल मिडिया पर एक्टिव नहीं है इसलिए उनसे इन प्लेटफॉर्म्स के मार्फ़त राबता बनाये रखना बहुत मुश्किल है। इतनी मसरूफ़ियत के बावज़ूद वो अपने प्रोफेशन में से पैशन के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं। शायरी ही उनका पैशन है। वो तकरीबन रोज़ ही शेर कहते हैं उनके लिए शेर कहना शायद सांस लेने जैसा ही अहम् काम है। उन लोगों को जो वक्त की कमी का रोना रो कर अपने पैशन को पूरा नहीं कर पाते डॉक्टर साहब से सीखना चाहिए कि कैसे अपने शौक़ के लिए वक्त निकाला जाय। प्रोफेशन और पैशन के बीच तालमेल बिठाना एक बहुत बड़ी कला है जो डॉक्टर साहब को बखूबी आती है। 

पत्थरों में तुझे हीरा नहीं आता है नज़र 
तू मेरे दिल का ख़रीदार नहीं हो सकता 

हाल जैसा भी हो माहौल बना लेता है 
दिल क़लंदर हो तो बेज़ार नहीं हो सकता 
क़लंदर : फ़क़ीर
*
देखता रहता है क्यों बैठा परिंदों की तरफ़ 
तू अगर पर्वाज़ करना चाहता है पर निकाल

लौटने या रुख बदलने के तो हम क़ाइल नहीं 
रास्ता रोके अगर दीवार 'आसिम' दर निकाल
*
तअल्लुक़ात में लाज़िम है ताज़गी रखना 
ग़लत नहीं जो इबादत में तजर्बा किया जाए 

मैं कह रहा हूं दरिंदा है फ़ितरतन हर शख़्स 
मिरे बयान पे बेलाग तब्सिरा किया जाए 

अगर लगाव है तो बारहा भी जायज़ है 
अगर है इश्क़ तो बस एक मर्तबा किया जाए
बारहा: बार बार
*
एक जंगल ही उजाड़ा हमने 
शहर जब भी कोई आबाद किया
*
संभलता ही नहीं है वक्त हमसे 
बहुत करते हैं ख़ुद अपना जियाँ हम
जियाँ :नुकसान 
*
ये बताओ मुझे तुमसे कोई एहसान मेरा 
जब उठाया नहीं जाता तो उठाते क्यों हो

यू.ऐ.ई.के ही नहीं भारत और पाकिस्तान के युवा शायर डॉक्टर आसिम की शायरी के क़ायल हैं और कहीं न कहीं उनकी शैली अपनाते भी दिखाई देते हैं। उनकी शायरी के बारे में सय्यद सरोश साहब फरमाते हैं कभी हमें किसी शेर को पढ़ सुन कर हैरत होती है और कुछ वक़्त बाद हो के ख़तम हो जाती है लेकिन आसिम साहब के शेर की जो हैरत है उसे सुन कर आप घर पे आएंगे आप सोचते रहेंगे आप दूसरे दिन सो के उठेंगे तब भी ख़तम नहीं होगी। उनका शेर आपको देर तक बांधे रखता है। आसिम साहब के यहाँ शायरी बहुत लिबरल है याने वो सख़्त मिज़ाज़ी नहीं है कि शायरी में ऐसा हो ही नहीं सकता या आप ऐसा कर ही नहीं सकते। उनके यहाँ शायरी में फ्रीडम है और उन्हें नए-नए तजुर्बे करने से परहेज़ नहीं है। वो अपने शागिर्दों को बंधी बंधाई लीक को छोड़ कर अलग रास्ता बनाने को कहते हैं लेकिन इसके साथ ही लफ्ज़ को सलीके से बरतने, जम के पहलु से परहेज़ करने और उरूज़ की बंदिशों को मानने पर भी जोर देते हैं। शायरी में वो ज़बान को बहुत अहमियत देते हैं उनके यहाँ आपको बहुत सजे सजाये मिसरे मिलेंगे जैसे किसी से कोई बात कही जा रही हो। उनका ये भी कहना है कि जब भी किसी का शेर आपकी नज़र से गुज़रे तो पहले उसे चार ज़ानिब से देखें और फिर देखें कि क्या इसमें पांचवी जानिब कोई रास्ता निकल सकता है। बातें तो शायरी में लगभग सब कही जा चुकी हैं ऐसे में आप उन्हीं बातों को नए जाविये से पेश कर सकते हैं या नए लफ़्ज़ों के माध्यम से कह सकते हैं ताकि वही बात जो कई मर्तबा सुनी जा चुकी है सुनने वाले को एक दम नई सी लगे।

आसिम वास्ती साहब की ग़ज़लों की तीन किताबें 'किरण किरण अँधेरा' सं 1989 में , 'आग की सलीब' सन 1995 में 'तेरा एहसान ग़ज़ल है' सन 2009 में और नज़्मों की एक किताब 'तवस्सुल' सन 2017 में मंज़र ए आम पर आ चुकी हैं और उर्दू शायरी के दीवानों में काफ़ी मक़बूलियत हासिल कर चुकी हैं। हिंदी में उनकी एकमात्र किताब 'लफ़्ज़ मेहफ़ूज़ कर लिए जायँ' सन 2018 में रेख़्ता ने प्रकाशित की। अगर आप अच्छी शायरी पढ़ने के शौक़ीन हैं कुछ नया सा पढ़ना चाहते हैं तो आसिम वास्ती साहब की देवनागरी में छपी ये किताब आपके पास होनी ही चाहिए। इस किताब में उनकी लगभग 150 बेहतरीन ग़ज़लें शामिल हैं जिनका हर शेर आपको बेहद मुत्तासिर करेगा और आप उसके तिलस्म से आसानी से नहीं निकल पाएंगे।

डॉक्टर साहब क्यूंकि बेहद मसरूफ़ शख़्सियत हैं इसलिए हो सकता है वो आपका फोन न ले पाएं इसलिए अगर आप उन्हें इस किताब के लिए मुबारक़बाद देना चाहें तो जनाब सय्यद सरोश आसिफ़ साहब को +971 50 305 3146 पर व्हाट्सएप कर देंगे। आपका सन्देश डॉक्टर साहब तक शर्तिया पहुँच जायेगा।

आखिर में मैं जनाब सय्यद सरोश आसिफ़ साहब और रेख़्ता के जनाब सालिम सलीम साहब का बेहद शुक्रगुज़ार हूँ जिनकी मदद के बिना ये पोस्ट लिखनी मुमकिन नहीं होती।

पेश हैं डॉक्टर सबाहत आसिम वास्ती साहब की ग़ज़लों के कुछ और शेर :

ख़ुदाई के भरोसे आ गए हैं 
खुले सेहरा में ज़ेर-ए-आसमाँ हम 
ज़ेर ए आसमाँ: आसमाँ के नीचे 

कहानी में नुमायाँ हो रहे हैं 
परिंदे पेड़ आंधी आशियांँ हम
*
बूंद में देखती है बेचैनी 
आंख ठहरी हुई रवानी की 

बेगुनाहों को पहले क़त्ल किया 
फिर जनाजों पे गुल-फ़िशानी की 
*
मुसलसल गुफ्तगू करता रहा वाइज़ बदन की 
हमें उम्मीद ये थी बात रूहानी करेगा
*
घर के अंदर है बहुत खूब तेरा बाग़ीचा 
घर की दहलीज़ से बाहर भी तो फुलवारी रख
*
महाज़ ए जंग पे लाया हूं साथ चंद गुलाब 
दुआ करो कि ये हथियार कारगर हो जाए
महाज़ ए जंग: रणभूमि
*
घर के मुआमलात पे हर रात देर तक 
करते हैं गुफ़्तगू दर-ओ-दीवार और मैं
*
बताएंँ किस तरह तन्क़ीद में इंसाफ़ बरतेंगे 
अगर हम आपके मेयार से बेहतर निकल आए 
तन्क़ीद: आलोचना, मेयार :कसौटी
*
तमाम वक्त़ गुजरता है अपने साथ तिरा 
तू अपने आप से उकता गया तो क्या होगा



Monday, August 16, 2021

किताबों की दुनिया - 238

बस्ती बस्ती में सुनिए जिंदाबाद के नारे
पहले मुल्क होता था अब महान हैं चेहरे 
*
लालमन की हर कोशिश मिल गई न मिट्टी में
चार बीघा खेतों में बढ़ गई हवेली फिर
*
हर शख्स किसी तौर मिटाने पे तुला है 
चेहरे पे हुईं जब से नमूदार लकीरें
*
इन दिनों ख़ामोश रहता हूं
आ गया है गुफ़्तगू करना
*
रोशनी, ताज़ा हवा, खुशियां, सुकून 
ये हमारे हक़ नहीं है भीख हैं
*
 तब उल्टी बात का मतलब समझने वाले होते थे 
समय बदला, कबीर अब अपनी ही बानी से डरते हैं 

पुराने वक़्त में सुल्तान ख़ुद हैरान करते थे 
नए सुल्तान हम लोगों की हैरानी से डरते हैं 

न जाने कब से जन्नत के मज़े बतला रहा हूं मैं 
मगर कम-अक़्ल बकरे हैं कि कुर्बानी से डरते हैं
*
सब कहते हैं बस कुछ ही दिन 
सचमुच क्या ऐसा लगता है

ये शायद 2009 की बात होगी। मैं तब खोपोली में नौकरी कर रहा था कि किसी एक रविवार को मोबाइल की घंटी बजी ,अनजान नंबर था मैंने देख के अनदेखा ये सोच के कर दिया कि किसी बैंक वाले का होगा जो मुझे उसके बैंक से लोन लेने के हज़ार फायदे गिनवायेगा मेरे मना करने पर भी नहीं मानेगा। कुछ समय बाद मोबाइल की घंटी फिर से बजी वो ही नंबर था। मैंने सोचा कि बैंक वाले यूँ लगातार फोन नहीं करते कोई और ही होगा लिहाज़ा उसे उठा लिया। उधर से खनकदार आवाज़ आयी 'नीरज जी बोल रहे हैं ?' मैंने कहा 'जी हाँ -आप कौन ?' जवाब आया 'अरे हमें छोडो मियाँ ये बताओ हमने आपका क्या बिगाड़ा है ?' मैंने हैरान हो कर कहा कि 'भाई जब मैं आपको जानता ही नहीं तो आपका क्यों और क्या बिगाड़ूँगा ?' उधर से एक बड़े जोरदार कहकहे के साथ जवाब आया कि 'लगता है नीरज भाई आप हमारी दुकान बंद करवा के ही मानेंगे' अब मैं कुछ झल्लाया और बोला ' आप क्या बात कर रहे हैं ? कौनसी दुकान? फिर उसके बाद जो जवाब आया उसे सुन कर मेरी बांछें खिल गयीं क्यूंकि मुझे कहा गया कि नीरज जी आप बहुत अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं और अगर आप इसी तरह कहते रहे तो बहुत से उभरते शायरों की दुकानें बंद हो जाएँगी। मैंने हंस कर बात टाल दी और कहा कि आप मुझे चने के झाड़ पर न चढ़ाएं क्यूंकि मैं तो अभी ग़ज़ल का ककहरा सीख रहा हूँ। तब सोशल मिडिया पर झूठी वाह वाही करने का शुरूआती दौर था जो आज अपने पीक पर है। तब मुझे मालूम नहीं था कि जो शख़्स मेरी तारीफ़ कर रहा है वो खुद एक कद्दावर शायर है। 

मेरी बात सुन कर मोबाईल पर कुछ देर सन्नाटा रहा फिर आवाज़ आयी कि नीरज जी आप अगर सीखने के दौर में ऐसा कह रहे हैं तो यकीन मानिये आने वाले वक़्त में आप बेहतरीन कहेंगे। वो बेहतरीन वक्त तो खैर नहीं आया क्यूंकि थोड़े ही वक्त में मुझे ये बात समझ में आ गयी थी कि अच्छी शायरी क्या होती है और जब ये बात समझ में आयी तब मैंने ग़ज़लें कहना छोड़ दिया। 

उस दिन के बाद से फोन का सिलसिला अभी तक जारी है जिसमें शायरी की बात कम और कहकहों के अनार ज्यादा फूटते हैं।           

क़दम ठहरे तो उग आते हैं घास और फूस धरती पर 
क़दम बढ़ते रहें तो इससे पैदा लीक होती है 

बहुत से नाम है इमदाद राहत कर्ज़ हमदर्दी 
समझ पाना कठिन है कौन सी शै भीख होती है
*
 क्या कहा लेता नहीं कोई सलाम 
मशवरा मानो मेरा, सजदा करो
*
थोड़ा और उबर के देखो 
जीवन कारावास नहीं है 

बाहर तो सारे मौसम हैं 
आंगन में मधुमास नहीं है 

इक जीवन इतने समझौते 
हमको बस अभ्यास नहीं है
*
मैंने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूं 

मैं न पंडित न राजपूत न शेख़ 
सिर्फ़ इंसान हूं मैं, सहमा हूं
*
आइना हूं मैं दीवार पर 
आइए देखिए जाइए 

लीजिए मुल्क जलने लगा 
अब तो सिगरेट सुलगाइए 

बात बात पर एक से बढ़ कर एक लाजवाब जुमले उछालने वाला कहकहे लगाने वाला और ग़ज़ब की सेन्स ऑफ हूयूमर वाला ये बंदा किसी दूसरे पर नहीं अपने ऊपर ही हँसता है। ये बंदा शायरी बहुत संजीदगी से करता है जिसमें न जुमले बाज़ी होती है न लफ़्फ़ाज़ी जिसमें होती है ज़िन्दगी की हक़ीक़त और इंसान की फ़ितरत की दास्तान। बतौर राम प्रकाश 'बेखुद' जिसकी शायरी में एक आम आदमी की समस्याएं , ग़रीब की बेबसी, मज़दूर के माथे का पसीना , अबला की चीखें ,समाज की विसंगतियाँ , सियासत की साज़िशें साफ़ साफ़ दिखाई दें तो समझिये वो शायर 'सरवत जमाल' है। 'सरवत जमाल' एक ऐसा शायर भी है जिसने उर्दू और हिंदी वालों की खेमा बंदी को तोड़ा है। उनकी शायरी की ज़बान खालिस हिंदुस्तानी है जिसमें हिंदी और उर्दू दोनों ज़बानों का अक्स नज़र आता है।

अभी हमारे सामने 'सरवत जमाल' साहब की पहली ग़ज़लों की किताब 'उजाला कहाँ गया' रखी है जिसे नमन प्रकाशन लखनऊ ने प्रकाशित किया है। इस किताब में सर्वत साहब की 83 ग़ज़लें शामिल हैं। इस किताब को आप नमन प्रकाशन से 9415094950 पर मंगवा सकते हैं और सरवत जमाल साहब को इन ग़ज़लों के लिए मुबारक़ बाद देते हुए उनसे 7905626983 पर बात कर सकते हैं।


कहीं भी सर झुका दिया, नया खुदा बना लिया 
ग़ुलाम क़ौम को मिलेगी कब निजात, देखिए
*
अगर है सब्र तो नेमत लगेगी दुनिया भी 
नहीं है सब्र अगर फिर तो जंग है दुनिया
*
कितने दिन, चार,आठ,दस, फिर बस 
रास अगर आ गया क़फ़स, फिर बस 

जम के बरसात कैसे होती है 
हद से बाहर गई उमस, फिर बस 

हादसे, वाक़यात, अफ़वाहें 
लोग होते हैं टस से मस, फिर बस
*
इस तरफ आदमी उधर कुत्ता
बोलिए, किसको सावधान करें
*
आंधी से टूट जाने का ख़तरा नज़र में था 
सारे दरख्त़ झुकने को तैयार हो गए
*
फिर यूं हुआ कि सब ने उठा ली कसम यहाँ 
फिर यूं हुआ कि लोग ज़बानों से कट गए
*
कुछ घरों में धुंआ ही उठता है 
हर जगह रोशनी नहीं होती
*
हमारे दौर के बच्चों ने सब कुछ देख डाला है 
मदारी को तमाशों पर कोई ताली नहीं मिलती

गोरखपुर निवासी जनाब जव्वाद अली और ज़ीनत बेग़म के यहाँ जब 29 ऑक्टूबर 1956 को सरवत का जन्म हुआ तब घर में कोई बैंड बाजे नहीं बजे। बस चुपके से सात बहन भाइयों में एक बेहद आम शक्ल-ओ-सूरत के बच्चे का शुमार हो गया। सब बच्चों के साथ इनकी भी परवरिश होती रही। कुछ सालों बाद उनकी माँ को अहसास हुआ कि, ये लोगों को अपने जुमलों से हंसा हंसा कर लोट-पोट कर देने वाला ,खूबसूरत आवाज़ में गाना गाने वाला, अपनी एक्टिंग से सबको हैरान कर देने वाला और भाषण देने में आगे रहने वाला बच्चा सबसे अलग है। कभी कभी संजीदा हो कर कुछ लिखता भी है। पिता जव्वाद अली साहब को उनके इस लिखने के हुनर का पता चलता उससे पहले ही वो इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुख़सत फ़रमा गए। जब तक 'सरवत' ग़ज़ल कार के रूप में शोहरत हासिल करते, माँ भी उन्हें छोड़ कर चली गयीं। 'सरवत' साहब को इस बात का आज भी बेहद मलाल है कि उनके माँ-बाप अपने बेटे के इस हुनर को बिना जाने ही उन्हें छोड़ गए।

संजीदगी से 'सरवत' साहब का यूँ तो छत्तीस का आंकड़ा रहता है सिर्फ ग़ज़ल कहते वक्त ही वो संजीदा रहते हैं इसीलिए वो अपनी ग़ज़लों को भी संजीदगी से नहीं लेते। उनके बेहद क़रीबी दोस्त जनाब 'मलिक ज़ादा जावेद' साहब उनके बारे में लिखते हैं कि 'सरवत जमाल को न सिले की परवाह है न सताइश की तमन्ना है इसलिए वो शोहरत के पीछे नहीं भागते बल्कि शोहरतें इनके इर्द गिर्द तवाफ़ करती हैं। ,

भला तोता और इंसानों की भाषा
 मगर पिंजरे के मिट्ठू बोलते हैं 

जिधर घोड़ों ने चुप्पी साध ली है 
वहीं भाड़े के टट्टू बोलते हैं
*
उसकी चुप क्या है, कोई सोचने वाला ही नहीं 
लोग ख़ुश हैं कि सवालात कहां तक पहुंचे
*
तुम तो यही कहोगे निकाला कहाँ गया
फिर ये सवाल है कि उजाला कहाँ गया

यह ठीक है कि आप की ख़ूराक बढ़ गई 
लेकिन हमारे मुंह का निवाला कहाँ गया 

चोरी हुई तो इसकी कोई फ़िक्र ही नहीं 
सबको यही पड़ी है कि ताला कहाँ गया
*
इक हवेली भी गिरी छप्पर के साथ 
हौसले देख़ो ज़रा तूफ़ान के
*
तमाम चर्चे, तमाम ख़र्चे, तमाम कर्ज़े 
मगर हमारा वतन अभी तक महान है ना
*
महाभारत में अबकी कौरवों ने शर्त यह रख दी 
बिना रथ युद्ध होगा सारथी का क्या भरोसा है
*
यह जीवन है कि बचपन की पढ़ाई 
ज़रा सी चूक पर सौ बार लिखना

सरवत साहब अपनी शायरी को लेकर किस कदर लापरवाह थे इसका अंदाजा आपको उनके एक पुराने दोस्त रवि राय की इस बात से लग जाएगा रवि लिखते हैं कि "मैं काफी दिनों बाद शायद ईद के मौके पर इनके घर गया था। हम दोनों बेडरूम में ही बैठे थे ।मुझे तकिए के नीचे एक पर्ची दिखी जिस पर एक मुकम्मल ग़ज़ल लिखी हुई थी ।लिखावट सरवत की ही थी । मेरी सवालिया निगाहों के जवाब में बोले 'ये तो कल रात अचानक बन गई'। मैं पर्ची पढ़ रहा था तभी नाश्ता लेकर भाभी कमरे में आईं । उन्होंने तकिए के गिलाफ में हाथ डालकर वैसी ही 10-12 पर्चियां बिस्तर पर रख दीं । 'ये क्या है' मैंने हैरत से पूछा 'बैठे-बैठे यही सब तो करते रहते हैं दिनभर' कह कर भाभी चाय रख कर चली गईं।

मैंने सारी पर्चियां तरतीबवार देखीं ।एक से बढ़कर एक ग़ज़लें । मैं हक्का-बक्का रह गया ।'अबे तू कब से शायर बन गया?' सरवत का मुंह देखने लायक था, जैसे चोरी करते रंगे हाथ पकड़े गए हों ।'अरे ये सब ऐसे ही है ' । 'गजब हो भाई, इसको कम से कम किसी कॉपी या डायरी में लिख डालो । एक किताब छप जाएगी। 'छोड़ो यार, किताब का क्या करेंगे?  कहते हुए सरवत ने लापरवाही भरे अंदाज़ में इस बार पलंग के गद्दे के नीचे हाथ घुसेड़ कर रखी वैसी ही ढेर सारी पर्चियां निकाल कर मेरे सामने बिखेर दीं । भाभी ने बताया कि पहले ऐसी न जाने कितनी पर्चियां झाड़ू मार कर कूड़ेदान के हवाले की जा चुकी हैं। ये तो मैं हूँ जो उन्हें बटोर बटोर कर गद्दे के नीचे डालती रहती हूँ वरना इनकी फिलॉस्फी तो ग़ज़लें लिख कूड़े में डाल वाली है। ये बात माननी पड़ेगी कि सरवत साहब बहुत खुशकिस्मत हैं इतनी समझदार और लगातार हौसला बढ़ाने वाली शरीके हयात उन्हें नसीब हुई वरना ज्यादातर शायरों की बीवियां उनकी शायरी पर कुढ़ती ही मिलेंगी। इस बात को सरवत साहब फ़क्र से सबको बताते भी हैं। बीवी ही नहीं उनके बच्चों ने भी हमेशा उन्हें उत्साहित किया है। उनकी ज़िंदादिली का सबसे बड़ा राज़ भी शायद यही है।
 
रवि लिखते हैं कि 'बहरहाल शायद मेरे बार-बार कहने और कुछ इनकी एक दोस्त की मेहरबानी से सरवत जमाल की ये सारी पर्चियां रेलवे की एक काली डायरी में दर्ज हो गईं । लंबे वक्त तक यह डायरी मेरे पास रही।'

सफर आसान पहले भी नहीं था
 मगर तब ज़िंदगी भी ज़िदगी थी
*
 वह कह रहा है कि दरवाजे बंद ही रखना 
मैं सोचता हूं कि इस घर में खिड़कियां होती
*
दिन बुरे भी हों तो ये हैं दिन ही 
रात रोशन भी हो तो काली है
*
जिंदा है सभी लेकिन 
किस बदन में जुंबिश है 

खाली पेट और ईमान 
सख़्त आजमाइश है 

फिर वो धीरे से बोला 
पास में सिफारिश है

सन 2006 के आसपास सोशल मिडिया लोकप्रियता की और बढ़ रहा था। उसी दौर में सरवत साहब की ग़ज़लें फेसबुक और ब्लॉग में पोस्ट होने लगीं। धीरे लोग उन्हें पहचानने और पसंद करने लगे और उन्हें दिल्ली, भोपाल, पटना, इलाहबाद लखनऊ के अलावा देश के छोटे बड़े शहरों में होने वाले मुशायरों में बुलाया जाने लगा। पत्र-पत्रिकाओं में में भी उनके छपने की रफ़्तार बढ़ने लगी। उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा आप रवि राय जी द्वारा बयां की एक घटना से लगा सकते हैं। शिमला में आल इण्डिया मुशायरा था वसीम बरेलवी सहित देश के तमाम बड़े शायर उसमें शिरकत कर रहे थे। सरवत साहब ने अपने कलाम से मुशायरा लूट लिया। उनके शेरों पर दाद देने के लिए वसीम साहब अपनी कुर्सी से उठ कर माइक तक आये और उन्हें गले लगा लिया। मुशायरा ख़तम होने के बाद सारे शायर और आयोजक डिनर के लिए चले गए लेकिन सरवत जमाल को उनके चाहने वाले घेरे रहे। इतनी लोकप्रियता हासिल करने के बावजूद सरवत को मुशायरों का माहौल ज्यादा रास नहीं आया। अपने उसूलों से समझौता न करने वाले सर्वत का दिल मुशयरों में होने वाली चाटुकारिता को देख दुखी होता। उन्हें किसी ख़ेमे से जुड़ना ग़वारा नहीं है और मुशायरों में किस क़दर खेमे बाज़ी है ये बात आज किसी से छुपी नहीं है इसलिए मुशायरों में उन्होंने जाना बहुत ही कम कर दिया।

सरवत साहब से मेरा हालाँकि दस सालों से ज्यादा का राबता है एक बार उनके दोस्त मालिक जादा जावेद के साथ उनसे दिल्ली के बुक फ़ेयर में मुलाक़ात भी हुई है ।उनसे फोन पर इतनी बार बात हुई है कि रूबरू न मिल पाने का कभी मलाल नहीं रहा ।जब मैंने इस लेख के लिए उनसे उनकी ज़िन्दगी के मुश्किल दौर के बारे में पूछा तो बोले ' यार क्या करेंगे लोग मेरे और मेरी दुश्वारियों के बारे में जानकर, वो मुझे पढ़ लें इतना ही बहुत है।' सरवत साहब से बरसों से हो रही बातचीत के बाद मुझे पता लग चुका है कि ये इंसान बला का खुद्दार इंसान है और जब किसी की मदद का मौका आता है तो उस पर सब कुछ न्यौछावर करने में गुरेज़ नहीं करता। लोगों ने सरवत की इस भलमनसाहत का भरपूर फायदा उठाया है. बदले में बजाय उसका शुक्रगुज़ार होने के उसकी टांग ही खींची है। जिन्हें सरवत ने क़लम पकड़ना सिखाया वही उसे शायर मानने को तैयार नहीं हैं।  ऐसे लोगों के मानने न मानने से सरवत साहब को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता उनका मानना है कि वक़्त अच्छे बुरे का फैसला खुद कर देगा। बहुत से लोकप्रिय वाह वाही लूटने वाले बड़े बड़े शायर आज गुमनामी के अँधेरे में खो गए हैं याद सिर्फ वो रह जाते हैं जिनके क़लाम में जान होती है लफ़्फ़ाज़ी नहीं। 

सरवत साहब और उनकी की शायरी पर दैनिक जागरण के हिमांचल प्रदेश राज्य के संपादक श्री नवनीत शर्मा ने जो लिखा है उसके बाद और किसी के लिखने को कुछ खास नहीं बचता। वो लिखते हैं है कि 'सरवत जमाल किसी भी तौर आरी से घबराने का नाम है ही नहीं। ग़ज़ल हो या जीवन पेशेवर क्षेत्र हो या निजी इलाक़ा सरवत जमाल पत्थर खाते हुए ही आगे बढे हैं। ' उजाला कहाँ गया' कहने वाले रौशनी के तलबगार तो कई मिलेंगे लेकिन उजाले के मुरझाने के कारणों की तलाश करने वाला विरला ही होता है। सरवत की शायरी में आपको थके या घिसे पिटे शब्द नहीं मिलेंगे। शायद ही कोई ऐसा शब्द उनकी ग़ज़ल में हो जिसके लिए शब्दकोश देखना पड़े। ग़ज़ल की सकारात्मक प्रयोगशाला का बड़ा नाम है सरवत जमाल।'

सरवत जमाल जैसा कि मैंने पहले बताया अपने बारे में ज्यादा कुछ बताने में विश्वास नहीं रखते। आत्मप्रचार और यश लोलुपता से उनका तअल्लुक़ नहीं है इसलिए उनके बारे में जो कुछ भी लिख सका हूँ वो सब इसी किताब 'उजाला कहाँ गया' से ही लिया हुआ है। आखिर में पेश हैं और चुनिंदा शेर :

जो मेरे हाथ में माचिस की तीलियां होतीं 
फिर अपने शहर में क्या इतनी झाड़ियां होतीं 

पचास साल इसी ख़्वाब में गुज़ार दिए 
बहार होती, चमन होता, तितलियां होतीं 
*
सफर आसान पहले भी नहीं था 
मगर तब जिंदगी भी जिंदगी थी 

विभीषण और विभीषण बस विभीषण 
भरत से कब किसी की दोस्ती थी 

वो पत्थर पत्थरों पर मारता है 
कभी ये भूल हमसे भी हुई थी
*
बचा है कोई भी, जो आज खुद को 
बिना तोड़े मरोड़े पालता है
*
रोशनी की बहार है फिर भी 
रोशनी का अकाल पहले सा
*
जश्न है, ख़मोशी है सब पड़े हैं सजदे में 
इस जगह से राजा का क़ाफ़िला निकलता है

उम्र बीत जाती है सिर्फ ये समझने में 
चक्रव्यूह से कैसे रास्ता निकलता है
*
सफाया जंगलों का हो गया फिर 
अकेली सिर्फ़ आरी रूबरू थी