नाच नहीं जिनको आता वो आँगन टेढ़ा कहते हैं
जिस किताब की शुरुआत ऐसे शेर से हो उसे बिना ख़रीदे रह पाना मुश्किल था. इसीलिए मैंने जनाब विजय वाते साहेब की की लिखी ग़ज़लों की किताब "ग़ज़ल" खरीद ली और यूँ समझिये इसके साथ ही अपनी अकलमंदी का सबूत दे दिया.
किताब के बारे में मेरे कुछ लिखने से पहले जो जनाब बशीर बद्र साहेब ने उसके बारे में लिखा है वो पढ़ें. बशीर साहेब लिखते हैं की" विजय वाते ग़ज़ल के नए लेकिन अच्छे शायर हैं. उनकी नज़र आज की ज़िन्दगी के बहुत से पहलुओं पर है. वो अपनी ग़ज़ल में सच्ची ज़िन्दगी जीते हैं, इसलिए उनकी ग़ज़ल में मोहब्बत की यादों के चिराग रोशन हैं, प्यार के ख्वाब हैं, ज़िन्दगी की धूप है, शहरों और सड़कों की दौड़- भाग है, गाँव की कच्ची पक्की पगडंडियाँ हैं. इनके अधिकतर पात्र ज़िन्दगी को जीने वाले पात्र हैं. मैं उनकी ग़ज़लों को लेकर ,उनके शेरों के झरोखे से ऐसे कितने ही मंज़र देख सकता हूँ जहाँ कस्बों का अपनापन है, बड़े बड़े शहरों की प्यारी प्यारी बेरहम बेगानगी है, और ये सब कुछ अपना है. सिर्फ़ खूबसूरत ख्वाब ही अपने नहीं हैं,जुल्म करती सच्चईयाँ भी अपनी हैं. "
किताब की पहली ग़ज़ल से ही पढने वाला वाते साहेब की कलम का दीवाना हो जाता है. पहली ग़ज़ल के तीन शेर मुलाहिज़ा फरमाएं और फ़िर बताएं की कैसा लगा पढ़ कर:
एक पल में जी लिए पूरे बरस पच्चीस हम
आज बिटिया जब दिखी साडी तेरी पहनी हुई
अब छुअन में वो तपन वो आग बेचैनी नहीं
तू न घर हो, तो लगे, घर वापसी यूँ ही हुई
घर के मानी और क्या बस ये ही दो आँखें तो हैं
द्वार पर अटकी हुई बस राह को तकती हुई
वाते साहेब ग़ज़ल की सारी खूबियों के साथ आज की ज़िन्दगी को पेश करने में देखिये कैसे कामयाब हुए हैं:
जो मिला, जब जब मिला, दुनिया के ग़म लेकर मिला
आज मन है, आपसे घर-बार की बातें करें
अब बड़े घर में बुजुर्गों के, नहीं तीमारदार
आओ, मिलके उनसे कुछ उपचार की बातें करें
छत के गुण गाते हैं हम,जो दे रही हैं आसरा
छत टिकी कांधे पे जिस दीवार की बातें करें
छोटी बहर में वाते साहेब का कमाल देखें, उन्होंने उस विषय पर कलम चलाई है जिस पर अमूमन शायर नहीं लिख पाए हैं, याद कीजिये क्या कभी आपने दादी अम्मा पर कोई ग़ज़ल पढ़ी है? कमसे कम मैंने तो इस से पहले कभी नहीं पढ़ी थी और वो भी इस कदर दिलकश अंदाज़ में:
भोले भाले सवाल करती है
दादी अम्मा कमाल करती है
भूरे कुत्ते का, श्यामा गैया का
हम सभी का ख्याल करती है
हम जो मुन्ने को डांट देते हैं
आँख रो रो के लाल करती है
देह अपनी नहीं संभलती है
सारे जग का संभाल करती है
इसी अंदाज़ को उन्होंने अपनी अगली ग़ज़ल में भी बरक़रार रखा है लेकिन इस बार बिल्कुल अलग हट के बात कही है:
फ़िर से मिलने की बात मत करना
पीर झिलती नहीं जुदाई की
एक तक़रीर सिर्फ़ काफी है
क्या जरूरत दियासलाई की
तितलियाँ चढ़ गयीं हैं रिक्शों पर
पहली तारीख है जुलाई की
अब देखते हैं की उनका शायरी और ग़ज़ल के बारे में क्या नज़रिया है, पहले के दो शेर शायरी के बारे में और फ़िर दो अलग अलग ग़ज़लों से उनके शेर ग़ज़ल के बारे में मुलाहिज़ा फरमाएं:
पीर जब बेहिसाब होती है
शायरी लाजवाब होती है
शायरी तो करम है मालिक का
शायरी ख़ुद खिताब होती है
ग़ज़ल क्या होती है इस पर आप के बहुत से शायरों के हजारों शेर मिल जायेंगे यहाँ तक की हास्य कवि काका हाथरसी जी भी ग़ज़ल क्या होती है पर लिख चुके हैं अब वाते साहेब क्या फरमाते हैं ये पढिये:
हिन्दी-उर्दू में कहो या किसी भाषा में कहो
बात का दिल पे असर हो तो ग़ज़ल होती है
ग़ज़लें अख़बार की ख़बरों की तरह लगती हैं
हाँ तेरा ज़िक्र अगर हो तो ग़ज़ल होती है
इसी बात को एक दूसरी ग़ज़ल में आप यूँ कहते हैं:
उड़ती रहती हैं घटायें तो बहुत सी छत पर
मेघ जो आँख में ठहरे तो ग़ज़ल होती है
आती-जाती तो है ये रेल सभी जगहों से
जब तेरे गाँव से गुज़रे तो ग़ज़ल होती है
छोटी सी ग़ज़ल की ये किताब ऐसी ही बेमिसाल शायरी से भरी पढ़ी है. इसे वाणी प्रकाशन वालों ने प्रकाशित किया है और इसका मूल्य मात्र चालीस रुपये रखा है.शायरी के दीवाने क्या इतनी सी रकम भी खर्च नहीं कर सकते? यदि कर सकते हैं तो फ़िर आप को रोक कौन रहा है जल्द ही वाणी प्रकाशन को लिखिए जिसका पता मेरी किताबों की दुनिया -१ पोस्ट पर मिल जाएगा और किताब मंगवा लीजिये...अब जब आपने पुस्तक मंगवाने का फ़ैसला कर ही लिया है तो ईनाम के तौर पर दो शेर और पढ़ते चलिए:
जैसे जैसे हम बड़े होते गए
झूठ कहने में खरे होते गए
जंगलों में बागबाँ कोई नहीं
इसलिए पौधे हरे होते गए
मिलते हैं एक नयी किताब के साथ कुछ समय बाद तब तक के लिए बाय बाय टाटा...
48 comments:
vijay vate ji m.p. ke bahut senior police officer hain...aur saath hi shaayar bhi kamaal ke hain. shukriya jo aapne unki kalam se sabhi ko rubru karwaya.
ये खजाना कहाँ से ला रहे हैं नीरज जी। वाह।
ग़ज़लें अख़बार की ख़बरों की तरह लगती हैं
हाँ तेरा ज़िक्र अगर हो तो ग़ज़ल होती है
ओए होए बेहतरीन गजल संग्रह है नीरज जी
बहुत बहुत धन्यवाद इन्हें पढवाने के लिए
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
......अद्भुत, भावों की सरस अभिव्यंजना. कभी हमारे 'शब्दशिखर' www.shabdshikhar.blogspot.com पर भी पधारें !!
बहुत बढ़िया है यह ..शुक्रिया इस किताब के बारे में बताने का
वाह नीरज जी
"नाच न आवे आंगन टेढा" रचना के साथ बेहद उम्दा रोचक पोस्ट प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.
बहुत आभार आपका इस नायाब जानकारी के लिये.
रामराम.
नीरज जी
क्या कहूँ कोन से शेर की तारीफ़ करूँ..........
कहने वाले दो मिसरों में सारा किस्सा कहते हैं
नाच नहीं जिनको आता वो आँगन टेढ़ा कहते हैं
या फ़िर
एक पल में जी लिए पूरे बरस पच्चीस हम
आज बिटिया जब दिखी साडी तेरी पहनी हुई
या फ़िर
आती-जाती तो है ये रेल सभी जगहों से
जब तेरे गाँव से गुज़रे तो ग़ज़ल होती है
बहूत मुश्किल है तय करना, क्या कहूँ
बस आसान है बातें करना, क्या कहूँ
सारे शेर इतने खूबसूरत हैं
मन करता है बार बार पढ़ना, क्या कहूँ
सलाम आप को भी और वाते साहब को भी
वाह... क्या बात है.. नीरज जी.......... आपकी प्रस्तुति का जवाब नहीं.......
अकलमंद तो आप हैं ही और यह बात भी सही लाख अस्लूब निभाओ अगर ग़ज़ल में दिल की बात नहीं तो उसमें कोई अस्लूब नहीं!
---मेरा पृष्ठ
तख़लीक़-ए-नज़र
घर के मानी और क्या बस ये ही दो आँखें तो हैं
द्वार पर अटकी हुई बस राह को तकती हुई
वाते साहेब je likhey sher sach mein kamaal ke hain--
aap ne ek nayee kitab se parichay karaya-dhnywaad--
जंगलों में बागबाँ कोई नहीं
इसलिए पौधे हरे होते गए
wah!!!!!!behad umda !
mann khush ho gaya padhte hue,
humen bhi kareeb lakar achha kiya aapne
नीरज जी फिर लौटे हैँ एक उम्दा शायर और उन्की अर्थ सभर गज़लोँ से रुबरु करवाने -
ये सारी series of books & write up
सहेजने लायक हैँ
बहुत ही बढ़िया सारे शेर बहुत पसंद आए जो अब किताब तो मगवानी पड़ेगी लेकिन एक बात आपकी पसंद का जवाब नही सर....
अक्षय-मन
Aaj ghar se door Bhilai ke daure par hoon. Office se aa kar aapki is post padhne ka mauqa mila aur din bhar ki sari thakan jati rahi.
Vijay Vat ki ghazlon ke sath aapki peshkash bhi jabardast rahi.
जंगलों में बागबाँ कोई नहीं
इसलिए पौधे हरे होते गए...
वाह वाह ....
यही हाल मेरे देश का हो रहा है, यह देश भी एक जंगल की तरह से हो गया है, ओर यहां भी कोई बागबां नही रहा......
नीरज जी बहुत खुब हमेशा की तरह से, हमे भी कभी समय मिला तो *विजय वाते जी की किताब ज्रुरुर खरीदेगे, ओर पढेगे.
धन्यवाद
नीरज भाई बढिया ग़ज़लों का संग्रह। आप जिसकी तारीफ़ करेंगे तो किताब तो बढ़िया होगी ही। ऐसी बढ़िया किताब पढ़वाने के लिए आपका आभार।
बहुत आभार आपका इस नायाब जानकारी के लिये.
नीरज जी आप तो बहुत अच्छे समीक्षक भी हैं और आपके ब्लाग पर आये पिछली पोस्ट के कमेंट देख कर तो ऐसा लगता है कि अपनी ग़ज़लों को नेट पर प्रकाशित करने का कापीराइट आपके ब्लाग को ही देना होगा । विजय वाते जी भोपाल के ही हैं लेकिन उनका पेशा ऐसा है कि संयोग वश आज तक भेंट नहीं हुई या शायद मिलना ही नहीं चाहा ।
वाते साहब जैसे मुक्कमल गज़लकार के बारे में बता के और उनके ग़ज़ल वाली किताब के बारे में परिचय देखर आपने तो जैसे उपकार ही किया है नीरज जी देरी से आने के लिए मुयाफी चाहूँगा कल स्य्स्तेम में थोड़ा प्रोबलेम्म था इसलिए कुछ कह नही पाया ....
ढेरो बधाई और आभार ...अपनी नै ग़ज़ल पे आपका प्रोत्साहन चाहूँगा अगर पसंद आए तो ...
अर्श
इस संग्रह की जानकारी के लिए शुक्रिया ....
ओह क्या अहसास है. आपने सारी किताब का जूस का सवाद जो पिलाया है अब किताब खरीदे बिना कहा रहना है. बहुत अच्छी समीक्षा है ग़ज़ल की किताब पर इस तरह.
कहने वाले दो मिसरों में सारा किस्सा कहते हैं
नाच नहीं जिनको आता वो आँगन टेढ़ा कहते हैं
नीरज भाई साहब
मज़ा आ गया
यह शेर ग़ज़ल विधा के पक्ष में एक अत्यंत सटीक दलील है
.
और किताब को आपने बहुत ही ख़ूबसूरत अन्दाज़ में पेश किया है.
बधाई
सादर
द्विज
किताब की रिव्यू ने उसे पढने की इच्छा पैदा कर दी है। जानकारी का शुक्रिया।
बड़ी अच्छी किताब लगती है, कभी समय मिला तो जरूर पढ़ा जायेगा ! आभार इस प्रस्तुति के लिए.
बहुत अच्छी गज़ले हैं ये सारी... हम आपके तहे दिल आभारी हैं कि आपने हम तक इन्हे पहुंचाया.
-रतन
हस्तीमल जी 'हस्ती' के बाद विजय वाते जी और उनकी गजल की किताब की जानकारी बहुत खूब रही भइया. वाते साहब बहुत गजब लिखते हैं. उनके बारे में बशीर बद्र जी का कहा पढ़कर मन प्रसन्न हो गया. अभी तो लिस्ट बना रहा हूँ लेकिन ये सारे किताबें जल्द ही ले आऊंगा.
अगली किताब के बारे में पढ़ने का इंतजार है.
घर के मानी और क्या बस ये ही दो आँखें तो हैं
द्वार पर अटकी हुई बस राह को तकती हुई
क्या बेहतरीन शायर से मिलवा दिया आपने जनाब.
क्या ही ख़ूबसूरत शेरों से दो चार कराया आपने.
पर एक बात कहूं नीरज साहब जो बात हमारे नीरज जी (आप) में है, हम क़ाइल तो उन्हीं के हैं.
नीरज जी, कभी मिले तो आपसे गज़ल की बारीकियां समझूंगा।
subhan allah! Niraj ji aap to jabardast samikchak ho gaye....?
अब जब आपने पुस्तक मंगवाने का फ़ैसला कर ही लिया है तो ईनाम के तौर पर दो शेर और पढ़ते चलिए:
जैसे जैसे हम बड़े होते गए
झूठ कहने में खरे होते गए
जंगलों में बागबाँ कोई नहीं
इसलिए पौधे हरे होते गए
lalach bhi acchi de rahe hain bhyi meri pustak ki bhi samikcha kr den...!!
भाई नीरज जी,
किताबों की दुनिया-3 पढ़ा. विजय वाते साहेब की की लिखी ग़ज़लों से रु-ब्-रु होने का मौका जिस रोचक अंदाज़ में आपने कराया, मन अभिभूत हो गया. तहे दिल से आपका शुक्रिया अदा कर रहा हूँ.
आपने अपने ब्लॉग में लिखा है कि
"शायरी के दीवाने क्या इतनी सी रकम भी खर्च नहीं कर सकते? यदि कर सकते हैं तो फ़िर आप को रोक कौन रहा है जल्द ही वाणी प्रकाशन को लिखिए जिसका पता मेरी किताबों की दुनिया -१ पोस्ट पर मिल जाएगा और किताब मंगवा लीजिये...अब जब आपने पुस्तक मंगवाने का फ़ैसला कर ही लिया है तो ईनाम के तौर पर दो शेर और पढ़ते चलिए:"
इसके बाद जब निम्न शेर पढ़े
जैसे जैसे हम बड़े होते गए
झूठ कहने में खरे होते गए
तो सोचने लगे कि कही समीक्षा जो इतनी खरी-खरी से लग रही है, झूठ का पुलिंदा तो नही, लेकिन ज्यों ही ये शेर पढ़ा कि
जंगलों में बागबाँ कोई नहीं
इसलिए पौधे हरे होते गए
तो लगा कि माननीय विजय वाते साहेब का भी कोई बागबाँ नहीं ,इसीलिये उनके हर शेर लाजवाब और दिल -दिमाग को छू लेने वाले हैं.
अंत में आपको एवं ब्लॉग के सभी पाठकगणों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.
चन्द्र मोहन गुप्त
अरे बाप रे हम भो कायल हो गए....विजय जी के शेरों से हाय घायल हो गए.....!!
इंटरनेट पर आते-जाते ग़ज़ल बहुत पढ़ी,
रेल ' कब' ग़ज़ल है जाना जो यहाँ नज़र पड़ी ||
धन्यवाद वाते साहब क़ी ग़ज़लों से परिचय कराने के लिए...
neeraj ji , sabse pahle badhai sweekar karen ki , aapne hamen itni achi gazal ki kitaab ke baaren mein jaankari di, main late ho gaya comments dene mein ,kyonki main tour par tha. par ye jaankari wakai ,bahut kabile tareef hai , aur sabse badi baat ,
एक पल में जी लिए पूरे बरस पच्चीस हम
आज बिटिया जब दिखी साडी तेरी पहनी हुई
ise padkar aankh nam ho gayi , meri bitiya bhi badi ho rahi hai .. aaj 12 baras ki hai , kuch saal baad pachees ki ho jayengi .. tab ye sher bahut yaad aayenga .
itni ache sher se rubaru karane ke liye main aapka shukrgujar hoon.
aapka
vijay
मज़ा आ गया सरजी...
शुरुआत ही इतनी ज़बरदस्त है की क्या कहूं...
- आभार
नीरज जी हम तो नत-मस्तक हुये सर...जितनी सुंदर किताब है उतने ही सुंदर शब्दों में आपकी प्रस्तुती
चलिये एक और किताब मंगवाते हैं वाणी से
... प्रसंशनीय शेर व प्रसंशनीय समीक्षा है, विजय जी एवँ नीरज जी दोनों को शुभकामनाएँ।
अतिसुन्दर प्रस्तुति, साधुवाद !! मेरे ''यदुकुल'' पर आपका स्वागत है....
aapne bahut accha likha hai.aap aise hi likhte rahe.
नीरज जी,
बेहद नायाब मोती चुन-चुनकर
ले आते हैं आप और हमारी झोली भर जाते हैं.
विजय वाते साहब की असरदार शायरी और
उनकी संवेदशीलता सर्व विदित है.
आपकी इस प्रस्तुति ने उन्हें कुछ अलहदा अंदाज़ में
सुनने-समझने का अवसर दिया....शुक्रिया आपका.
===================================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन
Koi shk nahi, shaayri bahot achhi hai....lekin aapki iss umda tanqeed aur tabsire se iss pr aur bhi nikhaar aa gya hai...
bahot hi nafees peshkaari hai...
mubarakbaad qubool farmaaeiN.
---MUFLIS---
बेहद खूबसुरत अल्फ़ाज. शुभकामनाएं.
नीरज जी,
विजय वाते जी का उम्दा लेखन और तिसपर आपकी मोहक प्रस्तुति। वाह! आनंद आ गया।
''स्वामी विवेकानंद जयंती'' और ''युवा दिवस'' पर ''युवा'' की तरफ से आप सभी शुभचिंतकों को बधाई. बस यूँ ही लेखनी को धार देकर अपनी रचनाशीलता में अभिवृद्धि करते रहें.
"Ek palme jee liye ..."! Uf ! Kitnaa pyaraa izhaar hai, us ek palki khusheeka jisme 25 saal simat aaye !
Aisa likha padhke mere rongate khade ho jaate hain !!!
Sach to ye hai, ki itnee saaree tippaniyon ke baad mujh jaisee adnaasi wyakti ki tippanee pata nahee kya mayne rakhti hai, par kahe bina reh nahee paayee...balki saashru nayanon se likh rahee hun...us ek lamhen ko jo rachnakaarne jiya, apnee nigahon ke aage moort kar sak rahee hun...dhundlaahee sahee...
कहने वाले दो मिसरों में सारा किस्सा कहते हैं
नाच नहीं जिनको आता वो आँगन टेढ़ा कहते हैं
नीरज जी मुझको यह शेर कितना पसंद आया मई कह नही सकता बस इतना बोलूँगा की मैंने इसे अपने ब्लॉग पर लगा लिया है वाते जी का नाम डाल कर
आपका वीनस केसरी
वाते जी की पुस्तक पढ़ने का मौका अब तक नहीं लगा हालांकि हमारे ही प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं. आपने जो समिक्षा पेश की है कि अब जल्द ही यह पुस्तक खरीदना होगी.
आपके खजाने में तो खदाने हैं,
हीरे निकलते ही रहते हैं ।
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