बंद रखिए तो इक अँधेरा है
खोलिए आँख तो सवेरा है
सांप यादों के छोड़ देता है
शाम का वक्त वो सँपेरा है
फ़ासला इक बहुत जरूरी है
यार के भेष में बघेरा है
ताजपोशी उसी की होनी है
मुल्क में जो बड़ा लुटेरा है
मरहला है सरायफानी ये
चार दिन का यहाँ बसेरा है
रूह बेरंग क्यों ना हो साहब
हर कोई जिस्म का चितेरा है
शाम दर पे खड़ी है ऐ 'नीरज'
अब समेटो जिसे बिखेरा है
(मयंक भाई आपके मिडास टच को सलाम )

