Tuesday, February 5, 2008

घोंसलों में परिंदे



खार राहों के फूलों में ढलने लगे
याद करके तुझे हम जो चलने लगे

सब नियम कायदे यार बह जायेंगे
इश्क का गर ये दरिया मचलने लगे

दुश्मनों से निपटना तो आसान था
तीर तो अपने घर से ही चलने लगे

घोंसलों में परिंदे थे महफूज़ पर
आसमाँ जब दिखा तो उछलने लगे

बस समझना की उसकी गली आ गयी
साँस रुकने लगे जिस्म जलने लगे

दिल तो बच्चे सा सीधा लगे है मगर
हाल करता है क्या जब मचलने लगे

इतने मासूम हैं हम किसे क्या कहें
फ़िर से बातों में उनकी बहलने लगे

तेरी चाहत का मुझपे असर ये हुआ
दिल में फूलों के गुलशन से खिलने लगे

वक्त का खेल देखो तो 'नीरज' जरा
जिनकी चाहत थे उनको ही खलने लगे

10 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

शानदार!
बहुत ही बढ़िया.

Ranjana said...

kya baat hai,kya kahne..........lajawaab

Parul said...

bahut khuub...

Gyandutt Pandey said...

नीरज जी, मन के विचार वास्तव में चलायमान होते हैं। यही प्रसन्न करते हैं, यही आशा दिलाते हैं, यही मायूस करते हैं और यही बहलाते हैं।
आपकी यह गजल हमें अपने मन की प्रतीत होती है।

राकेश खंडेलवाल said...

दुश्मनों से निपटना तो आसान था
तीर तो अपने घर से ही चलने लगे

कॄष्ण बिहारी नूर का एक शेर याद आ गया:

मैं जिसके हाथ में देकर गुलाब आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है

बहुत खूब नीरज भाई

Udan Tashtari said...

बेहतरीन, नीरज भाई.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

घोंसलों में परिंदे थे महफूज़ पर
आसमाँ जब दिखा तो उछलने लगे

भला कैसे लिख पाते है आप ऐसा? क्या बात है!!!

महावीर said...

वैसे तो सारी ही ग़ज़ल नपी तुली और बा-असर है। ये दो अशा'र बड़े पसंद आये।
इतने मासूम हैं हम किसे क्या कहें
फ़िर से बातों में उनकी बहलने लगे

वक्त का खेल देखो तो 'नीरज' जरा
जिनकी चाहत थे उनको ही खलने लगे
बहुत ख़ूब!

जोशिम said...

bahut khoob "जिनको खलने लगे, उनकी कसम का दम खाली /खुलते अल्फाज़ खिले, हाथ ले साथ टहलने लगे" - सादर -मनीष

madhu said...

aaj hi aapka blog dekha.
bahut sunder rachanaaeyeiN hain.
bahut see badhai.