Tuesday, February 26, 2008

मन्दिर में दीप की तरह जलने की बात कर


(आज प्राण साहेब की वो ग़ज़ल पेश करता हूँ जो मुझे हमेशा हौसला देती है)

नफरत की हर गली से निकलने की बात कर
तू प्यार वाली राह पे चलने की बात कर

माना की हर तरफ ही अँधेरी है ज़ोर की
उसका न कर ख़याल संभलने की बात कर

आयी हुई मुसीबतें जाती कभी नहीं
ऐसे सभी ख़याल कुचलने की बात कर

चेहरे पे हर घड़ी ही उदासी भली नहीं
ये खुरदरा लिबास बदलने की बात कर

आएगी अपने आप ही चेहरे पे रौनकें
मन्दिर में दीप की तरह जलने की बात कर

पत्थर सा ही बना रहेगा कब तलक, मियाँ
तू मोम सा कभी तो पिघलने की बात कर

ऐ "प्राण" तेरे होने का एहसास हो जरा
अम्बर में मेघ जैसा मचलने की बात कर

11 comments:

काकेश said...

पत्थर सा ही बना रहेगा कब तलक, मियाँ
तू मोम सा कभी तो पिघलने की बात कर

वाह... !

प्राण साहब की गज़ल अच्छी लगी.

मोहिन्दर कुमार said...

नीरज जी,

बहुत ही सुन्दर और आशावादी रचना.... पढवाने के लिये धन्यवाद.

Udan Tashtari said...

प्राण साहेब की यह गज़ल अब हमारी डायरी में भी आपसे बिना पूछे अधिकारपूर्वक अंकित कर ली गई है. आभार.

पंकज सुबीर said...

चेहरे पे हर घड़ी ही उदासी भली नहीं
ये खुरदरा लिबास बदलने की बात कर
नीरज जी मुझे लगता है कि भली शब्‍द ठीक जगह पर प्रयोग नहीं हुआ है क्‍योंकि भली शब्‍द में और ठीक शब्‍द में फर्क होता है । उदासी को लगकर भली शब्‍द का प्रयोग ग़लत हो गया है

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया गजल. आपके ब्लॉग पर प्राण साहब की जितनी गजलें पढीं, एक से बढ़कर एक हैं. बहुत धन्यवाद भैया प्राण साहब की गजल पोस्ट करने के लिए.

ranju said...

bahut dino baad aapke blog par aane ka suawasar mila.antraal ki sabhi rachnayen padhin,kahna nahi padega ki kaisi lagi.Yun chahe apni likhi hui rachna ho ya kisi aur ki jo baaten apne man ki hoti hain wahi achchi lagti hain aur prerna deti hain.Itni sundar rachnayen padhane ke liye kotishah dhanyawaad.
ranjana

Dr. Chandra Kumar Jain said...

CHITTHON KEE DUNIYA KE MANDIR MEIN RAUSHAN DEEP KEE TARAHA HAI YAH GAZAL.PRERAK PRASTUTEE...BADHAI

Neeranjana said...

मन की दिद्ता प्रदान करने वाली भाव बहुत ही प्रेरणादायक है. मार्गदर्शन पे चलने की चेस्ता कर रहीं हुईं

Gyandutt Pandey said...

यह तो उदास मन को ब्वॉयेंसी प्रदान करने के लिये बहुत उम्दा रचना है। बहुत कुछ - "न मुंह छिपा के जियो, न सर झुका के जियो.. " की तरह।
धन्यवाद नीरज जी।

महावीर said...

प्राण शर्मा जी ग़ज़ल के बादशाह हैं। उनकी रचना पर क़लम चलाना मेरे लिए तो बहुत ही मुश्किल है। वह गुरू हैं, उस्ताद हैं - केवल नतमस्तक हो कर
प्रणाम ही कर सकता हूं।

Alpana Verma said...

पत्थर सा ही बना रहेगा कब तलक, मियाँ
तू मोम सा कभी तो पिघलने की बात कर

bahut hi umda likha hai--pran sahab ki ghazlon se parichay karane ke liye dhnywaad.
-alpana verma
[haan aap ke blog se madhubala ki tasveer maine save ki hai-hope aap bura nahin manenge.thnx.]