Friday, February 1, 2008

फ़िर घटा याद की है गहराई





कुछ सदा में रही कसर शायद
वरना जाते वहीं ठहर शायद

दर्द तन्हाई का मत पूछ मुझे
उससे बदतर नहीं कहर शायद

तेज़ थी धूप छा गयी बदली
तेरे आने का है असर शायद

बोलती बंद है अभी उसकी
आईना आ गया नज़र शायद

गीत पत्थर भी हैं लगे गाने
तेरे छूने की है ख़बर शायद

सिल गए होंठ दुश्मनों के तभी
जबसे उसने कसी कमर शायद

फ़िर घटा याद की है गहराई
अब करेगी ये आँख तर शायद

सच अकेला चला सदा 'नीरज'
नहीं आसान ये डगर शायद

12 comments:

बाल किशन said...

"सच अकेला है भीड़ में 'नीरज'
कल ज़माना करे कदर शायद "

वाह! वाह! वाह!
बहुत खूब.
एक - एक शेर लाजवाब है.

"आपके शेरों पर ही जीता-मरता हूँ मैं
ये दिल के मेरे सबसे करीब है शायद."

Ranjana said...

man ki atal gahraiyon se nikli baaten man ko chooti hi hain aur uspar se itne sundar dhang se kahi jayen to koi is ras me doobne se khud ko kaise bachaye......
bahut hi sundar.Ishwar aapke man aur kalam dono ko itna hi sundar banaye rakhen.

Krishan lal "krishan" said...

कुछ सदा मे रही कसर शाय्द वरना जाते वहीं ठहर शायद �। बहुत खूब �
तेरे दामन पकड़ने मे ही थोड़ी ढील दिखती है
वरना रब की क्या हिम्मत जो दामन तुझसे छुडा ले

Kakesh said...

क्या कहें...सिर्फ वाह वाह वाह....

Shiv Kumar Mishra said...

वाह ही वाह भैया....

रोज पढ़ ले जो आपकी गजलें
सुधर जाए कभी बशर शायद

रंजू said...

गीत पत्थर भी हैं लगे गाने
तेरे छूने की है ख़बर शायद

बहुत खूब.!!

कंचन सिंह चौहान said...

कुछ सदा में रही कसर शायद
वरना जाते वहीं ठहर शायद
badhiya.n

Gyandutt Pandey said...

बहुत सुन्दर नीरज जी। हमारा भी मन हो रहा है कि एक शेर जोड़ दें। रुक इस लिये रहे हैं कि वह इतनी सुन्दर कविता पर पैबन्द लगेगा।
बहुत अच्छी लाइन - गीत पत्थर भी हैं लगे गाने!

राज यादव said...

नीरज जी ,सादर नमस्कार..
क्या गज़ब की रचना है....इस उमर में इतनी प्रेम रंग में रंगी रचना !!!! गुरु देव !!! क्या बात है.....जो भी हो बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ हैं....अति सुंदर....एक शेर अर्ज़ है ..
'तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात.
तेरी आंखो के शिवा दुनिया में रक्खा क्या है"..

कभी हमारे ब्लॉग पर भी तस्रीफ लायें!!

राकेश खंडेलवाल said...

नीरज भाई

यों तो पूरी अदायगी ही बेहतरीन है लेकिन जो गहराई आप इस शेर में बरपा गये हैं वह काबिले दाद तो है ही साथ ही आपकी गहरी सोच को भी दर्शाती है. दाद कुबूल कीजिये

फ़िर जलाई हथेलियाँ उसने
शमः आंधी से बचाकर शायद

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

गीत पत्थर भी हैं लगे गाने
तेरे छूने की है ख़बर शायद


वाह क्या बात है। मजा आ गया।


(वैसे राकेश जी आपको दाद दे रहे है। अब अगली पोस्ट मुझे दाद-खाज के इलाज पर लिखनी होगी।) :)

हर्षवर्धन said...

बोलती बंद है अभी उसकी
आईना आ गया नज़र शायद

क्या बात है।