Monday, July 19, 2010

कोयले की आंच पे रोटी




तन्‍हाई की रातों में न तुम याद यूं आओ
हारूंगा मुझे मुझसे ही देखो न लडाओ

तुम राख करो नफरतें जो दिल में बसी हैं
इस आग से बस्ती के घरों को न जलाओ

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

76 comments:

पारूल said...

गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ..

badhiya baat hai ye..neeraj ji

स्वाति said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

sunder panktiya...

Avinash Chandra said...

आज तसल्ली से पढने का मन था...और आप ने सुन ली मन की बात..

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

कितना वजन है इनमे, उफ्फ्फ....
सच ही तो है, कैसे देखेगा वो..



और काश के हम सब ये देख पाते......


किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ


और ये क़यामत है..... सच में!
मैं बनाया करता हूँ जान बूझ के जली रोटियाँ...कच्चे आलू :)


बचपन की तुझे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ



शुक्रिया ऐसा लिखने के लिए .......

वन्दना said...

नीरज जी
आज तो ज़िन्दगी की दास्तान लिख दी………………अब किस शेर की तारीफ़ करूँ और किसे छोडूँ………………हर शेर एक कहानी कह रहा है।

सतपाल ख़याल said...

khoobsurat bahar aur khoobsurat ghazal..kya kahne

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

सुशीला पुरी said...

बचपन की तुझे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
..............
kitni sundar !!!!!

shikha varshney said...

बचपन की तुझे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
वाह नीरज जी बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ हैं .

शोभना चौरे said...

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

वाह
बहुत सच बात कही है |अब तो दाल रोटी भी जिनकी पहुँच से दूर हो गई उनके लिए क्या चांदनी? क्या ताज ?
बचपन की तुझे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

अब तो गैस पे भी रोटी नहीं पकाई जाती तो क्या कोयला ?क्या चूल्हा ?
bahut badhiya
abhar

रश्मि प्रभा... said...

koyle ki aanch per roti aur goithe mein litti...ghee daalke khao, piche laut hi jaoge minton me

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार २० जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

राजेश उत्‍साही said...

सचमुच आपने बचपन की याद दिला दी। हम तो कोयले पर पकी रोटी ही खाकर बड़े हुए हैं। बच्‍चों पर बोझ वाले शेर ने निदा फाजली के एक शेर की याददिला दी- इन नन्‍हें हाथों को चांद सितारे छूने दो,चार किताबें पढ़कर ये हम जैसे हो जाएंगे।

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी कठिन है डगर इस पनघट की।

rashmi ravija said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ
बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ...
पूरी ग़ज़ल ही शानदार
है..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

सत्य है ... बेहतरीन ग़ज़ल ...

राकेश कौशिक said...

"ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

बचपन की तुझे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ"

लाजवाब ग़ज़ल पढवाने के लिए आभार

PRAN said...

ACHCHHEE GAZAL HAI.EK- EK SHER PAR
MUNH SE " WAH , WAH " NIKLAA .

दिगम्बर नासवा said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

नीरज जी ... इस शेर ने सच में बहुत कुछ याद दिला दिया ... पुराने बीते हुवे वक़्त में जबरन खैंच ले गया .... वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी .... आपका शेर भी इन लाइनों से कम नही ..... वैसे तो पूरी ग़ज़ल कमाल के शेरों से लदी पड़ी है ...

हमारीवाणी.कॉम said...

हिंदी ब्लॉग लेखकों के लिए खुशखबरी -


"हमारीवाणी.कॉम" का घूँघट उठ चूका है और इसके साथ ही अस्थाई feed cluster संकलक को बंद कर दिया गया है. हमारीवाणी.कॉम पर कुछ तकनीकी कार्य अभी भी चल रहे हैं, इसलिए अभी इसके पूरे फीचर्स उपलब्ध नहीं है, आशा है यह भी जल्द पूरे कर लिए जाएँगे.

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हमारीवाणी.कॉम

Divya said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

beautiful couplets !

Rajendra Swarnkar said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

नीरजजी ,
इस चूहा प्रवृति से आदमियों को नजात मिलने की दुआएं हैं ।

आदरणीय प्राणजी की कसौटी पर खरा उतरना अपने आप में बहुत बड़ी बात है ।

पूरी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद !

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

तिलक राज कपूर said...

हर शेर कह रहा है कि तारीफ़ कीजिये।

तिलक राज कपूर said...

इसी बह्र पर स्‍वर्गीय दुष्‍यन्‍त कुमार की ग़ज़ल थी:
तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्‍भरा
अब हो रही है शाम मगर दिल नहीं भरा।
उसके बाद शायद ये पहली ग़ज़ल पढ़ी है उसी बह्र पर। आनंद आ गया।

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Bhai ji,aap jab bhi likhte ho ,ekdam anubhav ki aanch par tapa kar likhtey ho,wakai bachpan ki yaad dilati roti ki hakikat samney lati hai yah gazal.bachpan ka bojh kam karne ki baat bahut khoobi se uthai hai aapne.swagat ek baar fir.
sader
bhoopendra
jeevansandarbh.blogspot.com

वाणी गीत said...

गर लौटना हो तो कदम ना बढाओ ...
सुन्दर ...
बचपन की याद आएगी ही जब कोयले की आंच पर रोटी पकेगी ...
बहुत कुछ याद आया ...!

महफूज़ अली said...

आपकी लेखनी को नमन .... बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आपने... हरेक शे 'र अपने आप में नायाब है...

Coral said...

बेहतरीन ग़ज़ल !

डॉ टी एस दराल said...

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

वाह , बहुत गहरी बात ।

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

कितनी मासूमियत है इन लाइनों में ।

Mrs. Asha Joglekar said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ ।
कितना सही ।
और भी सब के सब शेर दिल को छू लेने वाले ।

संजीव गौतम said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ
पूरी ग़ज़ल पर भारी है ये शेर इसमें भी किलकारियों का प्रयोग इसकी खू़बसरती में इजाफा कर रहा है. बधाई. अपने ब्लाग पर हरजीत जी की पांच ग़ज़लें पोस्ट की हैं देखें और हरजीत जी के विषय में और कुछ जानकारी हो तो बताने का कष्ट करें.

http://kabhi-to.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक एक शेर वज़नदार ..बहुत खूबसूरत गज़ल

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

ghazab ye khayal lazwaab hai .. aur poori tarah sach ..admi bhi jane kisi kis janwar se ispiration leta hai ...hehehe

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

ek dum nostalgic sher hai .. :)

mast maza aaya .. :)

Vivek VK Jain said...

very nice...
heart touching....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ
--
उपयोगी सन्देश देती है यह गजल!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

किताब के बोझ से दबा हुआ बच्चा का दरद आप गजब बयान किए हैं...अऊर कोयला का रोटी त सचमुह बचपन याद दिला दिया.. आपका त एक एक सेर हमरे मन पर अंकित हो जाता है..
टिप्पणी आपको लिखें कईसे
हाथ दिल से जुदा नहीं होता!

राज भाटिय़ा said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
बहुत ही सुंदर रचना जी, चित्र देख कर सच मै बचपन याद आ गया, जब भी गांव जाते थे मां चुल्हे पर युही रोटी बनाती थी

अल्पना वर्मा said...

बहुत अच्छी गज़ल कही है आप ने.
पसंद आई.
आभार.

अमिताभ मीत said...

वाह ! क्या बात है भाई. क्या शेर कहे हैं .....

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

लाजवाब !!

M VERMA said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ
यही रीत है .. कौन किसको आगे बढता देखना चाहता है
बेहतरीन गज़ल

अजय कुमार said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

पूर्ण सत्य ,अच्छी रचना ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

क्या कहूँ, सारे शेर उम्दा हैं। भाव में डूब कर जा रहा हूँ। शुक्रिया इस आनन्द के लिए।

अभिषेक ओझा said...

शीर्षक पढ़ के ही खुशबू आने लग गयी आज तो.

Shiv said...

बहुत खूब!!
सारे शेर एक से बढ़कर एक. जीवन जीने का पाठ है. याद रहना चाहिए.

sanu shukla said...

bahut hi ymda rachna hai bhaisahab...!!

Himanshu Mohan said...

वो शख़्स जो हर बात पे तारीफ़ ही करे
उस शख़्स की क्या राय-उसे कुछ भी सुनाओ

डूबे सुख़न में दिल तो लगे पार उतरता
बरसो इन्हीं अश'आर की मानिंद घटाओ

रोटी की सोंधी बात से रूमान गढ़े जो
नीरज के सिवा और कोई हो तो बताओ

ख़ूब नीरज साहब!

Mitali said...

bahut khoob likha aapne... Ek ek shabd apne mann me jhaank ke dekhne ko majboor karta hai... Anubhavon ko shabdon me bahut umda piroya hai aapne... Abhar...

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,
इन दो शेरों ने तो घायल कर दिया है,

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

और इसमें तो मासूमियत है, अहा
किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

कलम के जादूगर को सलाम

vishal said...

aapakee shayari aur usake saath-saath jab tak saree tippanee naa padh lo man naheen manata. matra 1 din men 46 comments. Dil karata hai aapakee door bell bajakar aapko badhai de aayen. :))

anjana said...

तन्‍हाई की रातों में न तुम याद यूं आओ
हारूंगा मुझे मुझसे ही देखो न लडाओ


बहुत खूबसूरत |

अनामिका की सदायें ...... said...

किसी एक शेर की क्या तारीफ करू ?

हर शेर, हर आशार लाजवाब है.

ज्योति सिंह said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ
shaandaar aur laazwaab .

Sadhana Vaid said...

हर शेर पर वाह वाह करने का दिल करता है ! हर शेर में वज़नदार सोच है और हर शेर का अंदाज़े बयां बहुत ही बेहतरीन है ! आपको ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाई !

Rohit Jain said...

बेहतरीन रचना... लाजवाब

विनोद कुमार पांडेय said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

बहुत खूब कही नीरज जी....हम तो आपके फ़ैन हुए..बढ़िया ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई

निर्मला कपिला said...

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

चपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
एक से एक बढ कर शेर निकाले हैं पूरी गज़ल बहुत अच्छे4ए लागी। बधाई

KK Yadava said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ
....अद्भुत...मन प्रसन्न हो गया पढ़कर.

रचना दीक्षित said...

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

बेहतरीन रचना दिल छू गयी.

Akanksha~आकांक्षा said...

बड़ी सोंधी खुशबू है....पसंद आयी आपकी ग़ज़ल.

कविता रावत said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ
.... umda rachna...
aajkal ka jamane mein kuch aisa hi ghatit ho raha hai...
Badhai

सर्वत एम० said...

वाह नीरज भाई वाह! गजल कही या सारा हिंदुस्तान दिखा दिया. सभी विसंगतियों को तो आप ने एक ही गजल के खूंटे से बाँध लिया, अब प्रार्थी क्या करे!
मैं शायद बहुत... बहुत.... बहुत ही ज्यादा दिनों के बाद आ सका हूँ. आप तो मुस्कुरा के माफ़ कर देने में माहिर हैं ही.
फिलहाल, फिर लौटते हैं इस गजल पर. ये अच्छा भला, हंसमुख, रोमांटिक, प्रकृति प्रेमी, छायाकार/शायर अचानक उबल क्यों पड़ा इन अशआर में, चिंता का विषय है. क्या मुंबई का तापमान ज्यादा बढ़ गया है या मानसून अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा? या किसी स्टील मिल ने प्लास्टिक का उत्पादन शुरू कर दिया स्टील के नाम पर! नीरज भाई, आप माशा अल्लाह अच्छे खासे हैंडसम, स्मार्ट, खूबसूरत नौजवान हैं, कहीं किसी ने दिल लेने इंकार तो नहीं कर दिया? वरना आप और ऐसी गजल?
कुछ है तो जरूर.
मुझे लखनऊ आ कर तलाश करने की कोशिश मत कीजिएगा, मिलूंगा नहीं. मुझे पता है यह पढने के बाद आप मुंबई में रुक नहीं सकते. और...यह आश्चर्य तो आपको भी हो रहा होगा कि मुझे इतनी सच्ची खबर कहाँ से मिली.

अर्चना तिवारी said...

बहुत सुंदर ग़ज़ल....

ओम आर्य said...

कमाल की गजल, नीरज भाई..
और आखिरी शेर का तो क्या कहना..

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

डायरी में नोट कर लिया है

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
क्या खूब कहा आपने,
अति सुन्दर,
आभार...।

hem pandey said...

"पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ"

-सुन्दर.

डॉ .अनुराग said...

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ

subhanallah!!

ek roj kal ke blogger aapki kitab ka bhi jikr karege sarkaar.......

शहरोज़ said...

किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

यूँ तो कई शेर अच्छे हैं लेकिन यह इसलिए भाया कि रोज़ बच्चे को स्कूल छोड़ने जाता हूँ.इसमें शिक्षकों और vyavastha का भी dosh है.

बेचैन आत्मा said...

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ
...वाह. क्या मक्ता तलाशा है.

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

इस शेर से भी कुछ याद आ गया...

यहाँ किसी का कोई साथ नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम संभल सको तो चलो
...............................
बहुत कठिन है सफर जो चल सको तो चलो.

गौतम राजरिशी said...

है तो पूरी ग़ज़ल ही लाजवाब नीरज जी मगर इस शेर ने "किलकारियां दबती हैं कभी गौर से देखो
बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ" और मक्ते ने जैसे कयामत उठा दी है।

एक बेमिसाल ग़ज़ल बुनने पर करोड़ों बधाईयां...!

singhsdm said...

नीरज जी वैसे तो पूरी ग़ज़ल ही बहुत ही प्रभावी है मगर हमें यह शेर बहुत पसंद आया...
ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ
आज की सच्चाई को शेर के दो मिसरों में कैसे उतरा जा सकता है आपसे सीखना होगा.

Vijay Kumar Sappatti said...

sir ji , namaskar;
deri se aane ke liye maafi ..

gazal ko kayi baar padh chuka hoon , tasweer ne beeti hui zindagi ke kuch lamhe yaad dila diye hai.. aankhe geeli ho gayi hai ek jagah ..jahan aapne likha hai :

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

sach kahun to maa ki yaad aa gayiu hai ..

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

ye sher to aaj ke rat race ka jeeti jaagti misaal hai ..

aur ye :
पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ
this is ultimate neeraj ji .. waah waah .. dil ki duniya kitni khatarnaak hai , iska ishara aapne de diya hai ..

poori gazal hi shaandar bani hui hai .. kya kahun. aapki lekni ko naman hai ..

aapka
vijay

R.Venukumar said...

तुम राख करो नफरतें जो दिल में बसी हैं
इस आग से बस्ती के घरों को न जलाओ
बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है
चांदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ


बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

नीरज भाई, आपकी ग़ज़ल का हर शेर तराशा हुआ है । हर शेर अपनी जगह ठोस है मगर इन अशआर ने तो सचमुच गजब किया है

MUFLIS said...

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

आज की ग़ज़ल के शिल्प में आधुनिकता के
सारे नियमों को सफलतापूर्वक निभाती हुई
आपकी ये कामयाब ग़ज़ल पढ़ कर
मन आंदोलित हो उठा है
भाषा के रख-रखाव का निर्वहन भी
खूब झलक रहा है
बचपन की यादों को
कोयले की आंच से बाँधने के लिए
ग़ज़ल-सम्राट 'नीरज' को हज़ारों सलाम !!

ankur goswamy said...

wah !

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Sh: Om Sapra Ji

shri neeraj ji
good gazal
really very good, especially follwoing lines:-

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ
regd.
-om sapra, delhi-9

Rajeev Bharol said...

नीरज जी,
१९ जुलाई की गज़ल और मैं अभी तक पढ़ी नहीं? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर याद आया की उन दिनों मैं भारत में था, इन्टरनेट कभी कभी देखता था, और फिर गर्मी से भी जूझ रहा था..


यह गज़ल बहुत अच्छी लगी.
ये दो शेर तो दिमाग में गूँज रहे हैं.

"बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ

पुरपेच मुहब्बत की हैं गलियां बड़ी 'नीरज'
गर लौटने का मन है तो मत पाँव बढ़ाओ"

सत्यम शिवम said...

बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

Kunwar Kusumesh said...

बचपन की तुम्‍हे फिर से बड़ी याद आयेगी,
तुम कोयले की आंच पे रोटी तो पकाओ.

एकदम ज़मीन से जुड़ा हुआ ये शेर कोई मंजा हुआ कलमकार ही कह सकता है.आपको इस शेर की बल्कि यूँ कहूं की पूरी ग़ज़ल की दिल से बधाई देता हूँ.