Monday, June 2, 2008

मत डरो तूफ़ान से





बांधती जो दायरों में काट डालें रस्सियाँ
दूर करदें अब दिलों में बस गयी जो तल्खियां

मत डरो तूफ़ान से ये बात रखना याद तुम
डूब जाती हैं किनारों पर खड़ी भी कश्तियाँ

इक सुकूँ मिलता है दिल को आज़मा कर देखिये
जब अजां के साथ बजती मंदिरों की घंटियाँ

मत बढाओ इस कदर आपस में यारों फासले
आग नफरत की करे है राख दिल की बस्तियां

अनसुनी करके बशर पछता रहा इस बात को
चार दिन की ज़िंदगी में खूब कर लो मस्तियां

तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते
कल बनेगीं वो सहारा देख लेना बच्चियां

पूछता है कौन "नीरज" गुलशनो के हाल को
छोड़ जाती हैं शजर को जब खिजां की पत्तियां
(ये ग़ज़ल प्राण शर्मा जी की इस्लाह के बिना कहना ना मुमकिन था। मैं उनका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.)