
बांधती जो दायरों में काट डालें रस्सियाँ
दूर करदें अब दिलों में बस गयी जो तल्खियां
मत डरो तूफ़ान से ये बात रखना याद तुम
डूब जाती हैं किनारों पर खड़ी भी कश्तियाँ
इक सुकूँ मिलता है दिल को आज़मा कर देखिये
जब अजां के साथ बजती मंदिरों की घंटियाँ
मत बढाओ इस कदर आपस में यारों फासले
आग नफरत की करे है राख दिल की बस्तियां
अनसुनी करके बशर पछता रहा इस बात को
चार दिन की ज़िंदगी में खूब कर लो मस्तियां
तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते
कल बनेगीं वो सहारा देख लेना बच्चियां
पूछता है कौन "नीरज" गुलशनो के हाल को
छोड़ जाती हैं शजर को जब खिजां की पत्तियां
(ये ग़ज़ल प्राण शर्मा जी की इस्लाह के बिना कहना ना मुमकिन था। मैं उनका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.)
