Thursday, February 14, 2008

फूल देखूं जिधर खिलें

( भाई पंकज सुबीर ने इस ग़ज़ल की नोंक-पलक सवारने में अपना अमूल्य योगदान दिया है)

साल दर साल ये ही हाल रहा
तुझसे मिलना बड़ा सवाल रहा

याद करना खुदा को भूल गए
नाम पर उसके बस बवाल रहा

ना संभाला जो पास है अपने
जो नहीं उसका ही मलाल रहा

यूं जहाँ से निकाल सच फैंका
जैसे सालन में कोई बाल रहा

क्या ज़रूरत उन्हें इबादत की
जिनके दिल में तेरा खयाल रहा

ऐंठता भर के जेब में सिक्के
सोच में जो भी तंगहाल रहा

दिल की बातें हुई तभी रब से
बीच जब ना कोई दलाल रहा

चाँद में देख प्यार की ताकत
जब समंदर लहर उछाल रहा

फूल देखूं जिधर खिलें "नीरज"
ये तेरी याद का कमाल रहा