Saturday, January 5, 2008

फैसले की घड़ी जो आयी हो


झूठ कहने की चाह की जाए
ज़िंदगी क्यों तबाह की जाए

दिल लगाया तो ये ज़रूरी है
चोट खा करके वाह की जाए

वो अदाओं से मारते हैं पर
चाहते ये न आह की जाए

है खुदा गर बसा तेरे दिल में
काहे काबे की राह की जाए

हो न गर जो उमीद मरहम की
किस लिये फिर कराह की जाए

फैसले की घड़ी जो आयी हो
अपने दिल से सलाह की जाए

चाँदनी हो या रात हो काली
संग तुम्हारे निबाह की जाए

जो मिला उस में खुश रहो नीरज
ना किसी से भी डाह की जाए.