Monday, April 19, 2010

यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं



सब को अपना हाल सुनाना, ठीक नहीं
औरों के यूँ दर्द जगाना, ठीक नहीं

हम आँखों की भाषा भी पढ़ लेते हैं
हमको बच्चों सा फुसलाना, ठीक नहीं

ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

ज़िद पर अड़ने वालों को छोडो यारो
दीवारों से सर टकराना, ठीक नहीं

देने वाला घर बैठे भी देता है
दर दर हाथों को फैलाना, ठीक नहीं

सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं

(इस ग़ज़ल को,बिना छोटे भाई तिलक राज कपूर जी की मदद के, इस रूप में लाना मुमकिन नहीं था."धन्यवाद" शब्द उनके इस सहयोग के लिए बहुत छोटा है)

74 comments:

Shiv said...

अद्भुत! सुबह-सुबह पढ़कर धन्य हो गए. जब भी आते हैं सबकुछ यादगार ही लेकर जाते हैं. मिष्टी की फोटो ने चार चाँद लगा दिए हैं.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

बेहतरीन, नीरज जी, ऐसी ही मिलती जुलती आपकी एक और सुन्दर कविता मैंने करीब डेड-दो साल पहले भी पढी थी !

समयचक्र said...

सुन्दर कविता हमेशा की तरह..आभार

Apanatva said...

bahut sunder rkhe apane bhav.........abhar

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत ही बेहतरीन रचना बन पड़ी है। बहुत बहुत बधाई।

प्रवीण पाण्डेय said...

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

कहीं पढ़ा था

आज देखो हो गया बालक कितना सस्ता,
पाँच किलो का खुद है, दस किलो का बस्ता ।

vandan gupta said...

बेहतरीन्…………………लाजवाब्……………शानदार्।

बवाल said...

क्या बात है नीरज साहब ! एक बेहतरीन बात कही जी आपने। आपको और तिलक जी को भी बधाई।

kshama said...

Mishtiki pyari-si tasveer aur yah rachana..wah!

कंचन सिंह चौहान said...

सब को अपना हाल सुनाना, ठीक नहीं
औरों के यूँ दर्द जगाना, ठीक नहीं

सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं


आरंभ और अंत बेमिसाल....

Rajeev Bharol said...

बेहद सुंदर!

अजित गुप्ता का कोना said...

बहुत ही श्रेष्‍ठ, बधाई।

इस्मत ज़ैदी said...

नीरज जी ,नमस्कार,
बहुत उम्दा ग़ज़ल है ,मतला ही उस लिफ़ाफ़े की तरह है जिसे देख कर मज़मून समझ में आ जाए ,बहुत ख़ूब !


ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

बहुत सच्ची बात कही है आप ने ,

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

बच्चों की व्यथा को आप ने बहुत सुंदरता से पाठकों के समक्ष रखा है

इस सुंदर रचना के लिए बधाई

Neeraj Kumar said...

बहुत ही अच्छी और सामयिक ग़ज़ल है... और चिंताएं एवं सुझाव भी बेहद इमानदार है...

फुर्सत में एक बात आयें यहाँ---
http://knkayastha.blogspot.com/2010/04/blog-post.html

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Ankur:

" सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं "

Good night !!

राज भाटिय़ा said...

अरे बिटिया जेसे पूछ रही हो..... देखो अंकल मेरा वजन ज्यादा है या मेरे बस्ते का...
वेसे होना युं चाहिये कि बच्चो की कापियो की जगह हर स्व्जेकट के लिये एक दो पेज हो होम वर्क के लिये, जब होम वर्क पुरा हो तो उस पेज को चेक करने के बाद एक फ़ाईल मै लगा दे, ओर हर विषय की अलग अलग फ़ाईल हो... आधा वजन कम हो जायेगा. अभी बच्चा पुरे साल की कापियां साथ मै ठोता है...
कविता तो बहुत सुंदर है मगर बिटिया की मासुमियत उस से भी प्यारी लगी

दिगम्बर नासवा said...

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

लाजवाब ... नीरज जी आपको पढ़ना हमेशा सुकून देता है ... ताज़ा शेर आपकी ख़ासियत है ... शिल्प मे तो आप मास्टर हैं ही ... पूरी ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया बहुत ही ...

Abhishek Ojha said...

सीधी काम की बातें शानदार तरीके से !

amritwani.com said...

bahut khub

achi rachana


shkehar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

ghughutibasuti said...

वाह, बहुत खूब कहा है। बस्तों का बोझ बहुत कम होना ही चाहिए।
घुघूती बासूती

तिलक राज कपूर said...

सरकार का नाम लेना तो ठीक न होगा लेकिन एक वाकया बच्‍चों पर पुस्‍तकों के बोझ से संबंधित है, कहे बिना नहीं रुक पाउँगा।
बच्‍चों पर किताबों का बोझ बहुत अधिक हो गया है इसपर विचार कर किताबों का बोझ कम करने का एक नायाब तरीका एक विद्वान मंत्रीजी ने निकाला कि दो-दो तीन-तीन विषयों को मिलाकर एक पुस्‍तक में कर दिया जाये। विषयवार पठन सामग्री कम किये बिना अमल भी हो गया।
मुझे आज तक समझ नहीं आया कि बोझ कम हुआ या बढ़ गया। ये कोई गणित का सवाल नहीं है, आप भी हल कर सकते हैं।
फोटो सेशन के लिये नीरज भाई साहब ने मिष्‍ठी को एक नया बस्‍ता भेंट किया है तभी वह इतना बोझ उठा कर भी सामान्‍य है।

M VERMA said...

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं
बेमिसाल की क्या मिसाल

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही बेहतरीन रचना बन पड़ी है। बहुत बहुत बधाई।

सुशीला पुरी said...

हम आँखों की भाषा भी पढ़ लेते हैं
हमको बच्चों सा फुसलाना, ठीक नहीं
..........अद्भुत ।

Randhir Singh Suman said...

nice

सुशील छौक्कर said...

वाह नीरज जी फिर से सिक्स सर लगा दिया।
बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

इस शेर से अपनी बॆटी की बात याद आती है जो हर रोज कहती पापा जी गोदी ले लो बैग भारी है। फिर मैं कहता हूँ कि बैग मुझे दे दो तो मना करती है। क्योंकि उसको बैग टाँगना अच्छा लगता है। वैसे गजल बहुत खूब लिखी है।

दीपक 'मशाल' said...

आदरणीय नीरज सर,
आपकी ग़ज़लों के पानी में आपके सुन्दर विचारों का सुन्दर प्रतिबिम्ब झलकता है. काश ऐसी ही सुलझी हुई, संवेदनशील और समझदार सोच सबकी होती.

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Dr.Bhoopendra Ji:--

बहुत सुंदर बहर के साथ कही ग़ज़ल /उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक धन्यवाद
सस्नेह
Dr.bhoopendra
Rewa M.P

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

सब को अपना हाल सुनाना, ठीक नहीं
औरों के यूँ दर्द जगाना, ठीक नहीं
वाह नीरज जी, बहुत खूब....

हम आँखों की भाषा भी पढ़ लेते हैं
हमको बच्चों सा फुसलाना, ठीक नहीं
हासिले-ग़ज़ल शेर लगा

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही श्रेष्ठतम रचना.

रामराम

डॉ टी एस दराल said...

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

बेशकीमती बात कही है नीरज जी ।
सुन्दर रचना ।

जितेन्द़ भगत said...

अपने तीन साल के बेटे को यही सोचकर इस बार एडमि‍शन नहीं करवाया। एक साल और मौज करले, फि‍र तो बोझ ही उठाना है।
सुंदर कवि‍ता बन पड़ी है।

संजय @ मो सम कौन... said...

" सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं "

छा गये, नीरज साहब।

बहुत बढ़िया।

Mansoor ali Hashmi said...

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं
बच्चो के बसतो से लेकर दुनिया के हर मसलो पर आपकी सोच का अंदाज़ और उस की अभिव्यक्ति लाजवाब है. अर्थपूर्ण शायरी.

-mansoor ali hashmi
http://aatm-manthan.com

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

पूरी ग़ज़ल शानदार ! सारे अश्आर बेहतरीन !
ख़ास तौर से ये …

ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

और इस शे'र में व्यक्त ख़ुद्दारी बहुत भायी ।

देने वाला घर बैठे भी देता है
दर दर हाथों को फैलाना, ठीक नहीं

आप जयपुर रहे हैं ,
शायद राजस्थानी भाषा समझ लेते होंगे ।
इसी मिज़ाज का मेरा लिखा राजस्थानी दोहा
आपकी शान में -
घर-घर, दर-दर जाय क्यूं, म्हैं फैलावूं हाथ!
माथै रो कांईं करूं ? नाक कट्यां' हे नाथ !!
- राजेन्द्र स्वर्णकार

पारुल "पुखराज" said...

ज़िद पर अड़ने वालों को छोडो यारो
दीवारों से सर टकराना, ठीक नहीं ...bilkul theek ...

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत ही बेहतरीन रचना.

Puja Upadhyay said...

bachpan ki tarah masoom aur bahut hi pyaari gazal hai...dil khush ho gaya. muskura uthe ham...aap jab bhi likhte hain aisa hi khoobsoorat likhte hain.

अमिताभ मीत said...

हमेशा की तरह ... लाजवाब.

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Shukla Ji:--

Respected Neeraj Jee,

Bahut sundar rachana ban padi hai.
Aap aur Kapoor Sahab bahut hee achchhe vichar pathkon ke samne
rakhte hain.

Sahitya premiyon ke liye to ye Murli ki dhun jaisi hai aur sahitya premi gwaal-baal...Aap ki hi tarz par...
"Gwaal-Baal Sun Daudh padhe murli ki dhun"

Aur Jin logon ka kavya jagat aur sahitya se door-door tak koyee rishta naheen wo to bas ek bhains ki tarah hain...
Phir, aap ki hi tarz par...doosree line un ke liye...

"Bhains Ke Aage Been Bajana Theek Naheen"

Bahut bahut mubaraq...

Satish Shukla"Raqeeb"

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Gurudev Pran Sharma JI:--

ACHCHHEE GAZAL KE LIYE BADHAAEE.YE SHER KHOOB HAI---
BAATON SE BHEE MASLE HAL SAKTE HAIN
UNKE KAARAN BAM BARSAANA THEEK NAHIN
-- PRAN SHARMA

वीनस केसरी said...

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं


नीरज जी आपने बिलकुल मेरे दिल की बात कह दी

स्कूल खुल गए है और हम दूकान में जब १२ किलो १५ किलो का बण्डल बाँध कर कापी किताब अभिवावक को देते है तो उसे उठा कर अभिवावक जिस बेचारगी से हमारी तरफ देखते है बस जी मुस्कुरा कर रह जाते है ,,,कुछ कहते नहीं

Alpana Verma said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल है.

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं
-और ये हाल सभी बच्चों का है क्या करें!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

पूरी गज़ल बहुत अच्छी है
मतले और मक्ते का शेर तो लाज़वाब है।

विनोद कुमार पांडेय said...

नीरज जी बहुत बढ़िया रचना...बेहतरीन भाव और शब्द तो हैं ही कमाल के....प्रभावी ग़ज़ल के लिए ढेरो सारी बधाई

Udan Tashtari said...

शानदार गज़ल..और बिटिय रानी मिष्टी की तस्वीर देख दिन बन गया....


जाने क्यूँ...

हमेशा देर कर देता हूँ मैं आने में..

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Ratan Kumar -Newzealand.

Maja aa gaya. .Neeraj Uncle..

Mishti ki kya amazing pic lagayi hai aapne.. wah .. sooooo cute..

प्रवीण said...

.
.
.
बेहतरीन…………………लाजवाब……………शानदार !

अति सुन्दर गजल !

एक अर्से के बाद कुछ मन को भाता पढ़ने को मिला...

बहुत-बहुत आभार,
आज दिन अच्छा बीतेगा मेरा!

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

---------पूरी ग़ज़ल सुन्दर है.
कुछ ऐसी ही एक ग़ज़ल मैंने भी कही है, इसी रदीफ़ पर, आपको जल्द सुनाऊंगा..

शुक्रिया!!

Ankit said...

नमस्कार नीरज जी,
बहुत खूबसूरत मतला और जिस अंदाज़ से कहा गया है उसकी तारीफ करने के लिए लफ्ज़ नहीं हैं.
मतले को बारहां पढ़ के मन झूम रहा है,
सब को अपना हाल सुनाना, ठीक नहीं
औरों के यूँ दर्द जगाना, ठीक नहीं
मिष्टी की फोटो ने इस शेर की कीमत कई गुना और बड़ा दी.
बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं
वाह, एक आम बात को बहुत अच्छे से पिरोया है...........
ज़िद पर अड़ने वालों को छोडो यारो
दीवारों से सर टकराना, ठीक नहीं
जैसे मतले की तारीफ के लिए लफ्ज़ नहीं मिल रहे थे वैसे ही परिस्थिति मकते के साथ भी है, एक मासूम सा ख्याल एक खूबसूरत शेर कि शक्ल में निखार गया है, एक बेहतरीन शेर..........जिसका कोई जवाब नहीं, सलाम आपको.
सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं

Anonymous said...

सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं!
आपको पढना जैसे -गंगा की मंथर निर्मल
शीतल गति ! एक अनोखा सुकून ! मेरी कविता
को आपने पसंद किया ! मेरे पास धन्यवाद के शब्द नही हैं !
ऐसा लगता है जैसे झरने पर से किसी पत्थर हटा दिया !

haidabadi said...

जनाबे नीरज साहिब
आपकी नई नवेली ग़ज़ल का हर शेर कारी के साथ
गुफ्तो शनीद करता दिखाई देता है कवि ने जिंदगी के
फलसफे को उजागर किया है और अपने नायक को नींद
में मुस्कराने के लिए आमादा कर लिया है वोह उसे दीवारों
पे सर टकराने की इजाज़त भी नहीं देता हिंदी के शब्दों ने
ग़ज़ल की रूह को बड़े सकून से सहलाया है दुलारा है
और ग़ज़ल मुस्करा रही है
हम तो बहुत ख़ुश थे तुझे दिल से भुला कर
देखा तो तिरी याद का हर ज़ख्म नया है

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

Sadhana Vaid said...

सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना, ठीक नहीं

बहुत हृदयस्पर्शी रचना है ! विशेष रूप से यह बंदिश दिल को गहराई तक छू गयी !

http://sudhinama.blogspot.com
http://sadhanavaid.blogspot.com

KESHVENDRA IAS said...

नीरज जी, बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है. इसी काफिये पर पवन जी ने भी एक ग़ज़ल लिखी थी जिसका पहला शेर था-
यूँ तो हर पल इन्हें भिगोना ठीक नही
लेकिन आँख का बंजर होना ठीक नही.

ग़ज़ल के शेरों में आपने अपने समय के कई ज्वलंत प्रश्नों को उठा कर पाठकों को सोचने पर मजबूर किया है. ढेर सारी बधाई.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं
बहुत सुन्दर गज़ल है नीरज जी. बहुत से लोग इस समय चिंगारियां उड़ाने का ही काम कर रहे हैं.

Manish Kumar said...

सहज और सुंदर भावों से परिपूर्ण लगी ये रचना...

अनामिका की सदायें ...... said...

pahli baar aapko padha. aap ki ye rachna bahut acchhi lagi. badhayi.

Akshitaa (Pakhi) said...

बहुत सुन्दर कविता !!

______________
'पाखी की दुनिया' में इस बार माउन्ट हैरियट की सैर करना न भूलें !!

अपूर्व said...

पहले तो इतनी खूबसूरत फोटो ही दिल ले लेती है..फिर यह ग़ज़ल..उसमे भी यह शे’र हमारे वक्त के सबसे समझदार माने जाने वाले लोगों की समझ पर सवालिया निशान लगाता है..
बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

और इन बढ़ते वजन वाले बस्तों मे है क्या..माँ-बाप की ही बढ़ती उम्मीदों और अनर्गल अपेक्षाओं का बोझ..कि बस्ते बढ़ते जाते हैं और बचपन छोटा होता जाता है..

पूनम श्रीवास्तव said...

kya khoobsurati bilkul satya baat kah di aapne par is par sabhi amal karen to baat bane.
ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

बहुत सच्ची बात कही है आप ने ,

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं
poonam

Roshani said...

Neeraj ji bahut hi kam shabdon me apne bahut hi badi baat kahi.
बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं

yah line wakai me bahut sahi hai.
ise me nacsal samsya ke liye dekhti hun.
.
बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं
yah line bhi sahi hai...
bahut hi acchi lagi yah post..
aapko bahut sari shubhkamnayen.

Urmi said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

डॉ० डंडा लखनवी said...

///////////////////////////////////
इसे "टी" न कहिए यही शुध्द है "घी"।
विचारों की जो चेतना आपने दी॥
बहुत खूबसूरत कलम है चलाई॥
बधाई.....बधाई.....बधाई....बधाई!!
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
///////////////////////////////////
आपकी रचना के समर्थन में एक
हिंदी टप्पा नज़र करता हूँ-
इस पढ़ाई से बड़ों-बड़ों की हालत हो गई खस्ता।
पाँच किलो के शिशु के ऊपर बीस किलो का बस्ता॥
कि मैं कोई झूठ बोलया?
कि मैं कोई कुफ़र तोलया?
कि मैं कोई जहर घोलया?
भाई कोई ना,भाई कोई ना,भाई कोई ना,

कुमार संभव said...

कितनी सीधी, सदा, सच्ची बातें बहुत अच्छा लगा पढ़ कर ......... आप की गजल बेहतरीन है.

Akshitaa (Pakhi) said...

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं

कित्ती सुन्दर बात कही ..अच्छा लगा.

************
'पाखी की दुनिया में' पुरानी पुस्तकें रद्दी में नहीं बेचें, उनकी जरुरत है किसी को !

लोकेन्द्र विक्रम सिंह said...

वाह....
पहले की तरह आज भी पढ़कर नतमस्तक हूँ मै.....
हर बार एक सोच दी है आपकी नज्मो ने.........

Asha Joglekar said...

बातों से जो मसले हल हो सकते हैं
उनके कारण बम बरसाना, ठीक नहीं ।
पूरी की पूरी रचना खूबसूरत पर ऊपर वाला बहुत ही सामयिक ।

manu said...

सोते में ही ये मुफलिस मुस्काता है
'नीरज' इस को अभी जगाना,theek nahin...


DOOG MORNING.............

:)

गौतम राजऋषि said...

उलझन में डाल देते हैं आप नीरज जी...अब बताइये हम ग़ज़ल की तारीफ़ करें कि क्योट मिष्टी की?

सर्वत एम० said...

नीरज भाई, आप नाचीज़ का जर्रा बराबर ख्याल नहीं रखते. इस गजल को पढने के बाद मुझ पर बिजली सी गिर पड़ी. अभी तक सदमे में डूबा हुआ हूँ. आप से ऐसी उम्मीद कभी नहीं थी. लेकिन जब बुरे दिन आते हैं तो साया भी साथ छोड़ जाता है. आपने भी वही किया.
मैं ईर्ष्या जल-भुन कर खाक होने के कगार पर हूँ. आप ऐसी नायब गजलें कहेंगे, उन्हें पोस्ट भी करेंगे, फिर खाकसार को पूछेगा कौन? कुछ तो ध्यान रखा होता, उम्र में भी छोटा हूँ, ब्लोगिंग में भी जूनियर हूँ, फिर आप तो जाने-माने, प्रतिष्ठित शायर हैं. इस नाचीज़ की पहचान बन जाने से आपका कोई नुकसान थोड़ी हो जाता.
अब तो सिर्फ गाता फिर रहा हूँ--------
जो दर्द मिला अपनों से मिला, गैरों से शिकायत कौन करे
जो जख्म दिया, फूलों ने दिया, काँटों से शिकायत कौन करे.

Unknown said...

itni behtrin ghazal padke !
Chup-Chap chle jana, tik nhi !!

Udan Tashtari said...

अरे वाह, कसम से न बताते तो आपकी फोटो देखकर हम समझते कि ग्रेड केनियन में घूम रहे हैं.

अब तो पक्का समझो कि अगली भारत यात्रा में समीर लाल धमक रहे हैं आपके पास माथेरन जाने के लिए.

आप खुद ही जिम्मेदार हैं ऐसा वृतांत देकर हमारे धमकने के लिए. :)

झेलो झेलो भाई.. हमें...:)

Omnivocal Loser said...

बेहतरीन रचना...

http://rohitler.wordpress.com

प्रदीप कांत said...

हम आँखों की भाषा भी पढ़ लेते हैं
हमको बच्चों सा फुसलाना, ठीक नहीं