Wednesday, September 5, 2007

फूल उनके हाथ में जँचते नहीं







झूठ को ये सच कभी कहते नहीं
टूट कर भी आइने डरते नहीं

हो गुलों की रंगो खुशबू अलहदा
पर जड़ों में फ़र्क तो दिखते नहीं

जिनके पहलू में धरी तलवार हो
फूल उनके हाथ में जँचते नहीं

अब शहर में घूमते हैं शान से
जंगलों में भेड़िये मिलते नहीं

साँप से तुलना ना कर इंसान की
बिन सताए वो कभी डसते नहीं

कुछ की होंगी तूने भी ग़ुस्ताखियाँ
खार अपने आप तो चुभते नहीं

बस खिलौने की तरह हैं हम सभी
अपनी मर्ज़ी से कभी चलते नहीं

फल लगी सब डालियाँ बेकार हैं
गर परिंदे इन पे आ बसते नहीं

ख़्वाहिशें नीरज बहुत सी दिल में हैं
ये अलग है बात कि कहते नहीं

9 comments:

Unknown said...

गुरुदेव - पिछली बार समय का संकोच था सो पहले पन्ने पर ही रह गया - इस बार सफर यहाँ तक चला - सच कहूं तो उद्गम की इस टीस में बहुत ज़्यादा ठहराव है - या लगाव है और ..इसमें ..और कुछ ज़र्द पत्तों की आँधियों से जद्दोजहद में ; या बडबडाने से दुनिया का बदलना ; और .. गुमनाम करने वाला भी सुना सुना सा है, आपको पढ़ना आसान नहीं है - समझने में लुत्फ़ है - सर्दी की धूप सा
(आपकी ही तर्ज़ में - डरते डरते
.. आपकी अमराईयों की शाख में
झूल कर भूलों में दम भरते नहीं ..).. मेरी मंद बुद्धि का मानना है कि अच्छी ग़ज़ल/ कविता बार बार पढी जाती है , शागिर्दों की बिरादरी में गिनती जुड़वा के , तो आना जाना लगा रहेगा
.. आदाब/ सलाम

Ratan said...

Hi Uncle,
This is really one of the best poems I have ever read. You are amazing with the words. And what we call in hindi "sahaj rup se aapno mann ki baat ko shabdon mein utaarana...". Its an amazing thing.

Thanks,
Ratan. 2006.ratan@gmail.com

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

ये ग़ज़ल बहुत ख़ास लगी मुझे.. अपनी सी लगी...

फल लगी सब डालियाँ बेकार हैं
गर परिंदे इन पे आ बसते नहीं

और ये शे'र तो.. वो क्या कहते हैं... हासिले-ग़ज़ल है.

Anamikaghatak said...

ati sundar shabd sanrachana

देवांशु निगम said...

वाह वाह क्या बात है !!! बहुत ही बढ़िया...

साँप से तुलना ना कर इंसान की
बिन सताए वो कभी डसते नहीं

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह................

बहुत खूबसूरत ...........

कुछ की होंगी तूने भी ग़ुस्ताखियाँ
खार अपने आप तो चुभते नहीं

लाजवाब गज़ल.
अनु

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह................

बहुत खूबसूरत ...........

कुछ की होंगी तूने भी ग़ुस्ताखियाँ
खार अपने आप तो चुभते नहीं

लाजवाब गज़ल.
अनु

यशवन्त माथुर said...

बहुत ही बढ़िया सर!


सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कुछ की होंगी तूने भी ग़ुस्ताखियाँ
खार अपने आप तो चुभते नहीं

बस खिलौने की तरह हैं हम सभी
अपनी मर्ज़ी से कभी चलते नहीं

बहुत खूबसूरत गजल