Monday, November 29, 2010

जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रौशनी

दीपावली के शुभ अवसर पर गुरुदेव पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर एक तरही मुशायरे का आयोजन हुआ था जो अत्यंत सफल रहा. उस्ताद शायरों के बीच इस नाचीज़ को भी उस तरही मुशायरे में शिरकत का मौका मिला था. उस अवसर पर कही गयी अपनी गज़ल आप सब के लिए यहाँ पेश कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आएगी.



संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही
आसूदगी, इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी
वाबस्तगी: सम्बन्ध, लगाव, शाइस्तगी: सभ्यता, खुद-आगही: आत्मज्ञान, आसूदगी:संतोष

ये खीरगी, ये दिलबरी, ये कमसिनी, ये नाज़ुकी
दो चार दिन का खेल है, सब कुछ यहाँ पर आरिजी
खीरगी: चमक, दिलबरी: नखरे, आरिजी:क्षणिक

हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं
हमको लडाता कौन है ? ये सोचना है लाजिमी

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी

हो तम घना अवसाद का तब कर दुआ उम्मीद के
जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रौशनी

पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली

फ़ाक़ाजदा इंसान को तुम ले चले दैरोहरम
पर सोचिये कर पायेगा ‘नीरज’ वहां वो बंदगी ?

45 comments:

निर्मला कपिला said...

नीरज जी उस दिन भी कई बार पढी और आज भी। आप खुद अब गज़ल उस्ताद हैं और मेरा आपकी गज़लों पर टिप्पणी करना कहाँ तक वाज़िब है लेकिन आपसे कुछ सीखने के लिये बार बार आपके ब्लाग पर आती हूँ।
ये खीरगी, ये दिलबरी, ये कमसिनी, ये नाज़ुकी
दो चार दिन का खेल है, सब कुछ यहाँ पर आरिजी
पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली
वाह वाह बहुत खूबसूरत शेर हैं। बधाई।

इस्मत ज़ैदी said...

नीरज जी बेहद ख़ूबसूरत मतले से इस ग़ज़ल की शुरूआत हुई और रफ़्ता रफ़्ता आब ओ ताब बढ़ते बढ़ते मक़ते तक पहुंची ,

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी
परंपरागत ग़ज़ल के तक़ाज़ों को पूरा करता हुआ नाज़ुक शेर

फ़ाक़ाजदा इंसान को तुम ले चले दैरोहरम
पर सोचिये कर पायेगा ‘नीरज’ वहां वो बंदगी ?

ये शेर इस बात की तस्दीक़ करता है कि कभी कभी हालात ही हमारे हर अमल के कारण बन जाते हैं
बहुत ख़ूब!

प्रवीण पाण्डेय said...

तीन बार पढ़नी पड़ी, पूरी समझ में आ भी गयी, बस प्रणाम ही कर सकते हैं।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

नीरज जी मैं क्या कहूँ ... इतनी बेहतरीन ग़ज़ल और हर एक शेर जैसे एक एक खूबसूरत संगमरमरी ईमारत हो ...
मैं तो आपका फेन हो गया हूँ ... आपके प्रतिभा का एक कण भी मिल जाए तो खुद को खुशकिस्मत समझूंगा ...
"हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी"

कहीं सरल शब्दों में आप बहुत कुछ कह जाते हैं तो कहीं शब्दों से खिलवाड़ करते हैं ... सच में आपके पास जादू है ...

वन्दना said...

उस दिन भी पढी थी और आज भी सिर्फ़ इतना ही कह सकती हूँ ---------आपके फ़न को मेरा नमन है।

रश्मि प्रभा... said...

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी
main marije shame gam hun , mera dil dahal n jaye

दिगम्बर नासवा said...

वाह नीरज जी ... दुगना मज़ा हो गया ... हसीं ग़ज़ल दुबारा पढने के बाद ...

Navin C. Chaturvedi said...

भाई नीरज गोस्वामी जी, जैसा कि मैने मुशायरे के दौरान भी लिखा था कि काफिया के लिए संघर्षरत मित्रों के लिए एक अच्छी नज़ीर है ये ग़ज़ल आपकी तरफ से| बधाई|
आपसे निवेदन है कि मित्र मंडली सहित ओबिओ के दूसरे महा इवेंट में ज़रूर पधारें| पूरी जानकारी के लिए ये लिंक दे रहा हूँ:
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/obo-2

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी हर गज़ल बहुत उम्दा होती है ....हर शेर गज़ब की कशिश लिए हुए ....सुन्दर गज़ल के लिए आभार

इमरान अंसारी said...

नीरज जी,

वाह....वाह....उम्मीद है आपने मुशायरे में समां बांध दिया होगा इस ग़ज़ल के साथ.....ये शेर बेहतरीन लगे......

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी

पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली

फ़ाक़ाजदा इंसान को तुम ले चले दैरोहरम
पर सोचिये कर पायेगा ‘नीरज’ वहां वो बंदगी ?

Kailash C Sharma said...

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी...

बेहतरीन गज़ल.हरेक शेर दिल को छू लेता है ..आभार

मुदिता said...

नीरज जी ,
संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही
आसूदगी, इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी

हासिले गज़ल शेर है यह......बहुत बधाई

Udan Tashtari said...

वहाँ भी दिल खुद कह उठा था वाह!!
और आज यहाँ फिर वही वाह!!

-बहुत उम्दा गज़ल निकाली.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी इस रचना का लिंक मंगलवार 30 -11-2010
को दिया गया है .
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

अमिताभ मीत said...

गुरु जी,

प्रणाम !!

नाचीज़ को शागिर्द बना लीजिये. एहसान होगा !!

उस्ताद जी said...

7.5/10

शुभानअल्लाह ...
क्या ग़ज़ल पेश की है आपने ..बहुत खूब
इस शेर से आगे बढ़ने में ही बहुत वक़्त लग गया :
"संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही
आसूदगी, इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी"
हर शेर वजनदार बन पड़ा है.

shikha varshney said...

वाह वाह वाह बहुत ही उम्दा.

अभिषेक ओझा said...

बिन अर्थ तो समझ में नहीं आ पाती. अच्छा किया आपने जो शब्दों के अर्थ दे दिए. बढ़िया.

Manish Kumar said...

हर शेर अच्छा बन पड़ा है...

ताऊ रामपुरिया said...

वाह बहुत लाजवाब, शुभकामनाएं.

रामराम

डॉ .अनुराग said...

अब तो किसी दिन रूबरू बैठकर सुनेगे......ज़नाब.......

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी


शानदार फ़न के मालिक हैं आप। लाजवाब कहा आपने।
जितनी भी दाद दी जाय कम है।

"अर्श" said...

नमस्कार ,
आपके मतले ने ही पूरी तरही लूट ली थी ! और सच कहूँ तो मैं भी इस मतले पर बिखर गया था , बेहद खुबसूरत मतला ... और शे'र हर बार जब .... ये भी खूब पसंद आया .. फिर से बधाई कुबूल फरमाएं !

अर्श

Mansoor Ali said...

लाजवाब कलाम, आपकी संजीदा सोच को सलाम. बेहद पसंद आई, दीप-पर्व पर रौशनी फेलाती हुई यह ग़ज़ल.
m.hashmi

रचना दीक्षित said...

बेहतरीन ग़ज़ल हर शेर एक से बढ़कर एक

प्रवीण शाह said...

.
.
.
शानदार !

"हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी"

याद कर लिया है यह शेर...


...

वाणी गीत said...

हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं
हमको लडाता कौन है ? ये सोचना है लाजिमी...
सोचने की दरकार है ....

पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली
सच है !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

फ़ाक़ाजदा इंसान को तुम ले चले दैरोहरम
पर सोचिये कर पायेगा ‘नीरज’ वहां वो बंदगी ?

--

सुन्दर गजल!

vins said...

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी

लाजवाब ग़ज़ल...

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

ये खीरगी, ये दिलबरी, ये कमसिनी, ये नाज़ुकी
दो चार दिन का खेल है, सब कुछ यहाँ पर आरिजी


इसके बाद भी ये तेरा - ये मेरा.... हाय-हाय, फ्ला ने ये कहा - फ्ला ने वो कहा .
भागम-भाग - रेल पेल..... क्यों ?


खुद में खुद का वजूद तलाशने को प्रेरित करती अच्छी नज़म .

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

नीरज जी,
बड़े ही खूबसूरत शेर कहे हैं आपने !
मुबारक हो!
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

निशांत बिसेन said...

बेहतरीन.. बेहतरीन... बेहतरीन।।

अनुपमा पाठक said...

बहुत सुन्दर!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

गज़ल का मतला ही रोक कर बैठा लेता है और बाकी के अशार हाथ पकडकर रोक लेते हैं कि जब तक गज़ल मुकम्मल न हो जाए उठने न दें!!
कमाल की गज़ल!!

Priya said...

Ham is haal mein nahi ki kuch kah sake...yakeen jaaniye....jab blogs padhte hain to thage se rah jaate hain....Sach! hamare desh mein kabiliyat ki kami nahi...aapki gazal ka aagaz se anzaam sab kamaal hai

मेरे भाव said...

हो तम घना अवसाद का तब कर दुआ उम्मीद के
जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रौशनी
........
आपकी शुभिच्छा सबकी इच्छा बने. बहुत उम्दा शेर हैं. शुभकामना

अरुण चन्द्र रॉय said...

सर आपके ब्लॉग पर आके ग़ज़ल में रूचि बढ़ी है.. जो बात कहने में पूरी कविता लग जाती है.. ग़ज़ल एक शेर में कह देता है... जैसे... साम्प्रदायीकता पर यह शेर पूरी कहानी लिए हुए है...
"हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं
हमको लडाता कौन है ? ये सोचना है लाजिमी "

बहुत उम्दा ग़ज़ल... शब्दों के अर्थ दे कर नए पाठको के लिए काम आसान कर रहे हैं..

अंकित "सफ़र" said...

"नमस्कार नीरज जी,
आप के एक अलग अंदाज़ से मुखातिब करवा रही है ये ग़ज़ल.
शायरी किसे कहते हैं अगर किसी को समझना हो तो ये ग़ज़ल पढ़ ले.
सीधे-साधे लफ़्ज़ों के दायरों से आगे जाकर उर्दू अल्फाजों को सधे अंदाज़ में पिरोना..............अहा, आनंद ही आनंद.
मतला और हुस्न-ए-मतला इसी अंदाज़ के गवाह हैं.

ये शेर झकझोरने वाला शेर है,
"पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली"

Mrs. Asha Joglekar said...

Pehale bhee aaker padh kar gaee thee par kisee tarah tippani ho nahee paee.
हो तम घना अवसाद का तब कर दुआ उम्मीद के
जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रौशनी

पहरे जुबानों पर लगें, हों सोच पर जब बंदिशें
जुम्हूरियत की बात तब लगती है कितनी खोखली

aap ko kya kahen aap to bas aap hain.

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

बाऊ जी,
नमस्ते!
आनंद! आनंद! आनंद!
आशीष
---
नौकरी इज़ नौकरी!

पंकज सुबीर said...

चीन वालों को आप ग़ज़ल सिखाने गये थे, अगली पोस्‍ट में कुछ वहां के संस्‍मरण भी बताएं कि किस प्रकार चीनी लोगों को आपने ग़ज़ल सिखाई । ये ग़ज़ल तो हमेशा की तरह से रंग-ए-नीरज लिये हुए है जिसके लिये पूर्व में भी वाह वाह टाइप का कार्य हम कर चुके हैं तथा एक बार फिर कर रहे हैं और बार बार करते रहेंगें ( सौ साल पहले हमें ....टाइप से )

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

matle ne he wo sama baandh diyahai ki...bas pichle 5 minute se wah wah kar raha hun neeraj sir...beinteha khubsoorat matla....

chautha sher padh kar gulzar saba ki nazm ka ek misra yaad ho aaya ki

'hawaa kee tarah kabhi tum bhi aaya jaya karo"

bahut khub laga yah sher bhi


poori ghazal kamaal ki hui hai.....waah

तिलक राज कपूर said...

एक ओर संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही, आसूदगी, इंसानियत जेसे शब्‍दों को एक ही शेर में पिरो ले जाना दूसरी ओर अहसासों का इंद्रधनुष लिये ये ग़ज़ल आपकी चुनिंदा ग़ज़लों मे गिनी जा सकती है।

श्रद्धा जैन said...

हर बार जब दस्तक हुई उठ कर गया, कोई न था
तुझको कसम, मत कर हवा, आशिक से ऐसी दिल्लगी

waah waah ... aapne sabit kar diya ki bahut baar ki kahi hui baat bhi alag andaaz mein kahe jaane par nayi lagti hai... log chounk jaate hain

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सिद्धार्थ जी की टिप्‍पणी मेरी भी मान लें, प्‍लीज।


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ईश्‍वर ने दुनिया कैसे बनाई?
उन्‍होंने मुझे तंत्र-मंत्र के द्वारा हज़ार बार मारा।