Monday, November 8, 2010

किताबों की दुनिया - 41

मैं तो गज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए
लफ़्ज़ों के एक से बढ़ कर एक आलिशान नगीनों से सजी नायाब किताब के शायर हैं मरहूम जनाब कृष्ण बिहारी "नूर" साहब, जिनका आज जनम दिन है. ये पोस्ट उनकी याद को ताज़ा करने की एक छोटी सी कोशिश है. आज हम उनकी किताब जिसे "आज के प्रसिद्द शायर" श्रृंखला के अंतर्गत राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है की चर्चा करेंगे. श्री कन्हैया लाल नंदन जी द्वारा सम्पादित इस किताब का एक एक लफ्ज़ पढ़ने वाले के दिल पर छा जाता है.

अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिसको छोड़ दिया
शिकन नसीब वो बिस्तर मेरी तलाश में है

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है

मैं जिसके हाथ में इक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है

खालिस शायरी का यह बहता हुआ दरिया जो कृष्ण बिहारी श्रीवास्तव नाम से जाना गया, लखनऊ की देन है और आठ नवंबर सन 1925 को जनाब कुंजबिहारी लाल श्रीवास्तव के बेटे के रूप में पैदा हुआ था. मात्र सत्रह साल की उम्र से उन्होंने शायरी करनी शुरू कर दी और अपने उस्ताद जनाब फज़ल नक़वी की रहनुमाई में "नूर" तख़ल्लुस से शेर कहने लगे.कृष्ण बिहारी नूर की ग़ज़लें जब बोलती है तो साफ साफ बोलती है, बिना किसी लाग लपेट के। ग़ज़ल की रवायत कृष्ण बिहारी नूर के यहाँ ग़ज़ल की रवायत जैसी ही नज़र आती है, न कम न ज़्यादा, ठीक उन्ही के इस शेर की तरह - सच घटे या बढ़े तो सच न रहे/झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं।

उस तश्नालब की नींद न टूटे,ख़ुदा करे
जिस तश्नालब को ख़्वाब में दरिया दिखाई दे

दरिया में यूँ तो होते हैं क़तरे-ही-क़तरे सब
क़तरा वही है जिसमें कि दरिया दिखाई दे

क्यूँ आईना कहें उसे, पत्थर न क्यूँ कहें
जिस आईने में अक्स न उनका दिखाई दे

क्या हुस्न है जमाल है, क्या रंग-रूप है
वो भीड़ में भी जाए तो तनहा दिखाई दे

नूर साहब की शायरी सुनते पढते कभी ये गुमां नहीं होता के वो सिर्फ उर्दू ज़बान के शायर है. वो हमारी गंगा जमनी तहजीब के शायर हैं और खालिस हिन्दुस्तानी में शायरी करते हैं. ये ही वजह है के नामी गरामी शोअराओं के बीच मुशायरे में पढते हुए उन्हें बार बार आवाज़ देकर बुलाया जाता था और जब वो आते तो बस सावन के बादलों की तरह सुनने वालों के दिलो दमाग पर छा जाते और अपने खूबसूरत अशआरों की रिमझिम से उन्हें सरोबार कर देते.

आते -जाते सांस हर दुःख को नमन करते रहे
उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे


दिन को आँखें खोल कर संध्या को आँखें मूंदकर
तेरे हर इक रूप की पूजा नयन करते रहे


खैर, हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना में भी गबन करते रहे


विनम्रता और सादगी में उनका कोई सानी नहीं था. असल में येही सादगी और विनम्रता उनकी शायरी के केन्द्र में है, जिसमें आध्यात्मिकता और उदात्तता हर पल सांस लेती है. उनके गज़ल संग्रह " दुःख-सुख", "तपस्या" और "समंदर मेरी तलाश में है" प्रकाशित हो कर धूम मचा चुके हैं.नूर साहब की शायरी किसी अवार्ड या ईनाम की मोहताज़ नहीं है, उन्हें अमीर खुसरो अवार्ड, ग़ज़ल अवार्ड, उर्दू अकेडमी अवार्ड, मीर अकादमी अवार्ड, दया शंकर नसीम अवार्ड, और इन सब से बड़ा पाठकों और श्रोताओं की बेपनाह मोहब्बतों का अवार्ड मिला है. उन्हें अमेरिका में एक साथ बारह स्थानों पर उनकी शान में रखे मुशायरों में शिरकत करने का मौका भी मिल चुका है जो उनकी अंतर राष्ट्रिय लोकप्रियता का परिचायक है.

इस सज़ा से तो तबियत ही नहीं भरती है
जिंदगी कैसे गुनाहों की सज़ा है यारो


कोई करता है दुआएं तो ये जल जाता है
मेरा जीवन किसी मंदिर का दिया है यारो


मैं अँधेरे में रहूँ या मैं उजाले में रहूँ
ऐसा लगता है कोई देख रहा है यारो


इस संकलन में नूर साहब की अब तक हिंदी में अप्रकाशित चार पांच ग़ज़लें भी हैं, जिन्हें मुशायरों के ज़रिये लोगों ने भले सुना हो लेकिन पढ़ने का अवसर इस संकलन से ही मिलेगा. शाश्वत सच्चाइयां पिरोई उनकी गज़लें बार बार पढ़ने को जी करता है. छोटी बहर की उनकी एक कामयाब गज़ल के चंद शेर देखें:-

जिंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं


इतने हिस्सों में बाँट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आईना झूट बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो जिंदा है
'नूर'संसार से गया ही नहीं.

सच फरमा गए हैं नूर साहब ऐसा हर दिल अज़ीज़ शायर कभी संसार से जा ही नहीं सकता, लखनऊ की एक सड़क दुर्घटना में 30 मई 2003 को ये देह छोड़ कर नूर साहब सदा के लिए अपने चाहने वालों के दिल में बस गए हैं. मेरी शायरी के चाहने वालों से गुज़ारिश है के राजपाल एंड संस् द्वारा प्रकाशित इस किताब को अपने लाइब्रेरी में जरूर जगह दें. किताब प्राप्ति के लिए आप राजपाल की वेब साईट www.rajpalpublishing.com अथवा उनके इ-मेल mail@rajpalpublishing.com पर संपर्क करें. इस किताब की भरपूर जानकारी के लिए आप http://pustak.org/bs/home.php?bookid=1533 पर क्लिक करें.
इस किताब में संकलित गज़लें इतनी खूबसूरत हैं के उन्हें आप तक न पहुंचा कर लगता है जैसे मैं कोई अधूरा काम कर रहा हूँ.मेरी मजबूरी है के छह कर भी मैं ये पूरी किताब आपके समक्ष नहीं रख सकता, हाँ कुछ गज़लों के चुनिन्दा शेर आपतक जरूर पहुंचा रहा हूँ, उम्मीद है पसंद आयेगें...मुझे तो दीवानगी की हद तक पसंद आये हैं...सच...इस किताब का खुमार शायद ही उतरे...

गुज़रे जिधर जिधर से वो पलटे हुए नक़ाब्
इक नूर की लकीर सी खींचती चली गयी

***
लब क्या बताएं कितनी अज़ीम उसकी ज़ात है
सागर को सीपीयों से उलचने की बात है

***
मैं तो अपने कमरे में तेरे ध्यान में गुम था
घर के लोग कहते हैं सारा घर महकता था

***
शख्श मामूली वो लगता था मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था

***
तमाम ज़िस्म ही घायल था घाव ऐसा था
कोई न जान सका रख रखाव ऐसा था

***
ज़मीर काँप जाता है आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले कि हो गुनाह के बाद

***

लीजिए अब सुनिए ये शेर उन्हीं कि जुबानी...मैं बीच में से हट जाता हूँ और तलाशता हूँ आपके लिए एक और किताब. .


***

33 comments:

Manish aka Manu Majaal said...

शख्श मामूली वो लगता था मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था

क्या बात है, बढिया समीक्षा, जारी रखिये ....

तिलक राज कपूर said...

नूर साहब का ही शेर है कि:
अपनी रचनाओं में वो जिन्‍दा है
नूर संसार से गया ही नहीं।
मेरे पसंदीदा शायर को प्रस्‍तुत करने के लिये शुक्रिया।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दरिया में यूँ तो होते हैं क़तरे-ही-क़तरे सब
क़तरा वही है जिसमें कि दरिया दिखाई दे
************
आते -जाते सांस हर दुःख को नमन करते रहे
उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे

आपके द्वारा कि गयी समिल्षा पुस्तक को पढने के लिए मजबूर करती है ...बहुत चुन कर शेर दिए हैं ..अच्छी समीक्षा

निर्मला कपिला said...

इस बार की समीक्षा तो सब से लाजवाब रही वीडिओ ने तो और भी मुग्ध कर दिया। हर एक शेर काबिले तारीफ चुना। अभी जाते हैं उस साईट पर । धन्यवाद।

सदा said...

शख्श मामूली वो लगता था मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तु‍ति, हर प्रकार लाजवाब .....।

Kailash Sharma said...

ज़मीर काँप जाता है आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले कि हो गुनाह के बाद...

बहुत ही सुन्दर समीक्षा ...

दिगम्बर नासवा said...

नूर साहब को जनम दिल पर धमाकेदार समीक्षा ... पहला शेर ही दिल ले गया .... ज़िन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं .... ये तो शायद जगजीत जो ने गाया भी है .... बहुत ही गज़ब के शेर हैं सब जो आपने उतारे हैं ... किताब की दीवानगी बड़ा देते हैं आप नीरज जी ...

vandana gupta said...

आज तो नायाब मोती ढूँढकर लाये हैं……………हर शेर अपनी ही महक छोड रहा है और हम उसमे भीग गये हैं किसी एक की तारीफ़ कैसे करूँ……………सीधे रूह मे उतर रहे हैं……………………बहुत बहुत आभार्।

अरुण चन्द्र रॉय said...

कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब को पढ़ते सुनते बड़ा हुआ हूँ.. आपने परिचय कराया.. अच्छा लगा.. कुछ नए शेर पढवाने के लिए आभार !

Shiv said...

आपकी किताबों की दुनियां सीरीज पर शायद दूसरी बार कह सकता हूँ कि यह किताब मेरे पास भी है. पहली किताब वसीम बरेलवी साहब की थी.
बहुत बढ़िया संकलन है. मैं साल २००४ में गाँव गया था. वहां रेडिओ पर 'नूर' साहब का इंटरव्यू सुना था. बहुत गज़ब शायर थे.

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब, सुनकर आनन्द आ गया।

Unknown said...

इस सज़ा से तो तबियत ही नहीं भरती है
जिंदगी कैसे गुनाहों की सज़ा है यारो

जिंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

wah saab! once again you have meet with us a good personality, good shayar and fantastic book..Thnx a lot..:))

pran sharma said...

NOOR SAHIB NOOR HEE THE . VAH SAAREE UMR NOOR HEE BARSAATE RAHE,
APNEE GAZALON KE DWAARAA . UNKEE
GAZALON SE BAHUT KUCHH SEEKHA JAA
SAKTAA HAI .

Abhishek Ojha said...

बहुत खूब. कुछ शेर तो नोट करके रखने लायक हैं. खूब पसंद आये. तुलना तो नहीं करना चाहिए लेकिन मेरी पसंद के हिसाब से पिछली कई किताबों में से ये मुझे बहुत पसंद आई.

shikha varshney said...

मैं जिसके हाथ में इक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है
वाकई दिल पर छ जाने वाली पंक्तियाँ
नूर साहब से रूबरू करने का आभार.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

मैं तो गज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए



मैं जिसके हाथ में इक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है

खैर, हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना में भी गबन करते रहे

लब क्या बताएं कितनी अज़ीम उसकी ज़ात है
सागर को सीपीयों से उलचने की बात है
नीरज जी, ये ऐसे अश’आर हैं, जो जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहब की पहचान बन चुके हैं उनकी शायरी को पढ़कर पाठक गर्व महसूस करता है....
ऐसी शख़्सियत के बारे में जितना भी लिखा जाए कम है...
आपके इस जज़्बे को सलाम.

रचना दीक्षित said...

मैं तो गज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तु‍ति और समीक्षा

संजय @ मो सम कौन... said...

एक अलग ही नूर झलकता है ’नूर साहब’ के लफ़्जों में।
नीरज भाईसाहब, आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं जो रूबरू करवा रहे हैं ऐसी खूबसूरत किताबों से।

Anonymous said...

नीरज जी,

हर बार की तरह शानदार पेशकश है आपकी......खुदा आपको महफूज़ रखे.....'नूर' साहब के ये शेर बहुत पसंद आये....

मैं जिसके हाथ में इक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है

खैर, हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना में भी गबन करते रहे

मैं अँधेरे में रहूँ या मैं उजाले में रहूँ
ऐसा लगता है कोई देख रहा है यारो

शख्श मामूली वो लगता था मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था

तमाम ज़िस्म ही घायल था घाव ऐसा था
कोई न जान सका रख रखाव ऐसा था

Unknown said...

उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे

Alpana Verma said...

क्यूँ आईना कहें उसे, पत्थर न क्यूँ कहें
जिस आईने में अक्स न उनका दिखाई दे

वाह! वाह! हर शेर गज़ब का लगा .
बहुत ही सुन्‍दर समीक्षा.
आभार.

शारदा अरोरा said...

रूह को सुकून देने वाले शेर आप ने चुन चुन के हमारे सामने रक्खे ...शुक्रिया

डॉ .अनुराग said...

मैं तो गज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए

subhanallah!!!!!

पहला शेर ही लाजवाब है.....पूरी पोस्ट में ढेरो कमाल है......देर रात सुनने वाले विडियो भी .....

महेन्‍द्र वर्मा said...

मैं जिसके हाथ में इक फूल देके आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।

एक से बढ़कर एक शे‘र...नूर जी की शायरी से परिचय कराने के लिए आभार।

कविता रावत said...

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है

मैं जिसके हाथ में इक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है
लाजवाब समीक्षा.... हर एक शेर काबिले तारीफ चुना ......धन्यवाद।

डॉ० डंडा लखनवी said...

मरहूम शायर जनाब कृष्ण बिहारी "नूर" को जितनी बार पढ़ा जाए अथवा सुना जाए तबीयत नहीं भरती। आपने अपने ब्लाग पर उन्हें प्रस्तुत कर उनके साथ बिताई गई यादों को ताजा करा दिया । अत्यत सुन्दर और सजीव प्रस्तुति के लिए आपको बार-बार साधुवाद!
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

वीरेंद्र सिंह said...

बहुत अच्छी समीक्षा प्रस्तुत की है आपने .आभार.

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

नूर साहब का लखनऊ से भी ताल्‍लुक रहा है। अच्‍छा लगा उनकी कृति के बारे में जानना।


---------
मिलिए तंत्र मंत्र वाले गुरूजी से।
भेदभाव करते हैं वे ही जिनकी पूजा कम है।

Anand Rathore said...

sir .. shayri kya hoti hai, koi noor sahab se sikhe...aapne unhe yahan pesh kar ke sach ..jitna bhi kahun kam hai.. dil khush kar diya.. anand ko bahut anand aaya.. laga humjaaton ke beech aa gaya hoon... shukriya

राम त्यागी said...

आप बधाई के पात्र हैं कि आपने हमें इनसे रूबरू कराया !!

स्वप्निल तिवारी said...

noor saahab ko jab bhi pdha hai .....main kisio duniya me raha hun ...kheenchkar wapis yaheen le aate hain ... aaj bhi yahaan baanten hue unke ash'aar padh kar aisa hi hua.... :)

Akhil said...

aaj pahli baar is pooja sthal par aane ka saubhagya mila..ek saath kai sari kitabon ke baare men padh dalaa..apni late-latifi par koft ho rahi hai...
aapka bahut bahut sadhuwaad is pooja sthal ko sajaane ke liye..

Er.Jayant Sharma said...

bahut hee khoob neeraj bhai...