Monday, June 7, 2010

मुश्किलों का गणित ये कैसा है



हाल बेताब हों रुलाने को
तू मचल कहकहे लगाने को

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को

सांस लेना मुहाल कर देगा
सर चढ़ाया अगर ज़माने को

बिजलियों का है खौफ़ गर तारी
भूल जा आशियाँ बनाने को

हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को

63 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर रचना लिखी है आपने!

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

एक उम्दा ग़ज़ल... हर शेर ख़ूबसूरत !!

संजय भास्‍कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

इस्मत ज़ैदी said...

नीरज जी ,

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा इतनी ख़ूबसूरती से बयान किया है आप ने वाह!
मतला भी बहुत उम्दा है

हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को

ख़ुदग़र्ज़ी का ये रूप भी बहुत अच्छी तरह शेर में ढाला गया है
अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई

वर्तिका said...

bahut achhi ghazal neeraj ji ..matla aur uske baad ka sher to lazawaaaaaaaabb ....

संजय भास्‍कर said...

लाजवाब ग़ज़ल है ... एक एक शेर जैसे एक एक अनमोल मोती ..

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

बिजलियों का है खौफ़ गर तारी
भूल जा आशियाँ बनाने को


हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को
Waah !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल....सच को दर्शाती...

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

सांस लेना मुहाल कर देगा
सर चढ़ाया अगर ज़माने को !!

वाह्! क्या बात है! बेहतरीन गजल नीरज जी....

स्वप्निल तिवारी said...

bahut achhi ghazal hai ..par mushkilon ka ganit mera sabse pasandeeda sher hua.. :)

दिगंबर नासवा said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को
बहुत उम्दा नीरज जी .. रोज़मर्रा की बोलचाल के शब्दों से बुनी ... सादा सी ग़ज़ल पर गहरे अर्थ संजोय .... हर शेर खिलते हुवे गैन्दे के फूल के समान ...

pran sharma said...

ACHCHHEE GAZAL KE LIYE AAPKO
BADHAAEE.

vandan gupta said...

बेहद खूबसूरत गज़ल्………………हर शेर उम्दा।

shikha varshney said...

सांस लेना मुहाल कर देगा
सर चढ़ाया अगर ज़माने को

लाख टके की बात कही है आपने.

रंजन (Ranjan) said...

bahut sundar..

अर्चना तिवारी said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को
बात सच कही आपने ...vo bhi बड़ी सुन्दरता से

kshama said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को

Laajawaab to har lafz hai,par chup rahne ka hunar kaise seekhen?

Ankit said...

नमस्कार नीरज जी,
इस शेर के क्या कहने, बिना घुमाये फिराए सच बयानी................
मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

Udan Tashtari said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को

-हाय!! मगर चुप रहा भी तो नहीं जाता...:)


बहुत बेहतरीन गज़ल जनाब!! वाह!

तिलक राज कपूर said...

हाल बेताब हों रुलाने को, तू मचल कहकहे लगाने को; वाह साहब वाह क्‍या मुकाबला है।

मुश्किलों का गणित ये कैसा है, बढ़ गयीं जब चला घटाने को;
हुजूर
जिन्‍दगी को गणित नहीं समझो,
गो कि पल का हिसाब रहता है।

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन, थम गये थे तुझे उठाने को; अब हुजूर ये तो ज़माने की चाल है लेकिन: कोई गिर जाये रस्‍ते में तो रुक जाना, उठा लेना
मज़ा कुछ और आता है रकीबों को उठाने में।

सांस लेना मुहाल कर देगा, सर चढ़ाया अगर ज़माने को;
सम्‍हल कर सर चढ़ायें, यहॉं तो:
वो जो अंगुली पकड़ के चलते थे
आज छाती पे मूँग दलते हैं।

गंभीरता से न लें।

M VERMA said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को
बहुत सुन्दर
जीवन का सत्य है शायद
कहीं गुणक में होती तो

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाहवा.. वाहवा.. भाईजी, क्या बात है.... मज़ा आ गया.... ला..ज..वा..ब.. ग़ज़ल.....

पंकज सुबीर said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को
इन दिनों मेंढ़कों की तरह ग्रीष्‍म निष्‍क्रियता में हूं । गर्मी के समापन की प्रतीक्षा में । लेकिन आपके इस मकते ने ग्रीष्‍म निष्‍क्रियता से बाहर निकाल दिया । इसमें रंग-ए-नीरज है । खपोली में तो शायद बरसात आ गई होगी । हमारे यहां तो इतनी सड़ी हुई गर्मी पड रही है कि बस । एक और बेहतरीन ग़ज़ल पर बधाई ।

शारदा अरोरा said...

बहुत खूब ,
मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को
चुप रहने की बाबत कितना कुछ कह दिया है ...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

भाईजी ,नमस्कार !
तरस गया था मैं आपकी ताज़ा ग़ज़ल पढ़ने को । …ख़ैर अवसर तो मिला ।

ज़िंदादिली के पैग़ाम को बहुत ख़ूबसूरती के साथ मत्ले में ढाला है…
हाल बेताब हों रुलाने को
तू मचल कहकहे लगाने को


और यहां बोल रही है एक ख़ूबसूरत इंसान की इंसानियत एक ख़ूबसूरत शे'र के माध्यम से…

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को


…और ऐसी कहन और कहीं नज़र नहीं आई

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को


अगली ग़ज़ल का इंतज़ार आज ही शुरू हो गया है , यह याद रखिएगा भाईसाहब !
हालांकि तब तक तीन-चार बार तो इसी ग़ज़ल के हुस्न-ओ-फ़न से खिंचा हुआ यहां आऊंगा ही आऊंगा ।
नमन आपको और आपकी क़लम को !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ said...

Bau jee,
Namaste!
Maine kaha bahut khoob.....
Bina kisi laag-lapet ke khari-khari!

डॉ .अनुराग said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को

to kya mulakaat ka intzaam kare fir?
dekhiye shayad us aor aana ho....hamara....

डॉ टी एस दराल said...

चुप रहकर भी इतना कुछ कह गए ।
वाह नीरज जी ।
बहुत बढ़िया ।

अमिताभ मीत said...

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को

कमाल है भाई.... बस कमाल है

टिप्पणी क्या करे कोई इस पर
आप जब आये आज़माने पर

Dev K Jha said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को


बहुत सही नीरज जी... एकदम मजा आ गया इस लाईन पर तो.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कल मंगलवार को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है



http://charchamanch.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर लिखा है ।

राज भाटिय़ा said...

बेहतरीन गजल जी , धन्यवाद

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आज आप हमसे बदला ले लिए नीरज जी! आपका फैन हो गए ई गजल पढकर... हमरा जईसा अनपढ अदमी का भी दिमाग में दूगो शेर आ गया है... बुरा मत मानिएगा...

पाप जी भर के करते जाओ तुम
बहती गंगा तो है नहाने को.
हमने सच बोलने की खाई कसम
आ गए झूठ कल डराने को.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

उम्दा गज़ल का लाजवाब मक्ता...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को
...आज तबियत प्रसन्न हो गयी आपकी गज़ल पढ़कर.
.. वाह! क्या बात है !!

शोभित जैन said...

Waah waah...bahut khoob

संजीव द्विवेदी said...

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को ।

बेहतरीन

MAHAVEER B SEMLANI said...

बहुत सुन्दर रचना * * * * * *

एक बेहद साधारण पाठक said...

बहुत सुन्दर रचना

R.Venukumar said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को

बिजलियों का है खौफ़ गर तारी
भूल जा आशियाँ बनाने को


हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को


bahut sunder aur sarthak shej hain--sabhi k sabhi...inme bar bar dil aayaa...

Shiv said...

बहुत सुन्दर गजल है.
हर बार सोचते हैं टिप्पणी में कुछ नया लिखें लेकिन अब शब्द कम पड़ते हैं तो क्या करें?

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

कट पेस्ट करु तो पूरी गज़ल यहा उतारनी होगी . सुन्दर सुन्दर सुन्दर

स्वाति said...

हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को
सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को
ख़ूबसूरत गजल ..
अगली ग़ज़ल का इंतज़ार है ..

माधव( Madhav) said...

बहुत ही अच्छी रचना.

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी said...

'सांस लेना मुहाल कर देगा
सर चढ़ाया अगर ज़माने को'
har sher umda, magar ye bahut khoob hai..........

Dr. Amar Jyoti said...

सभी शेर एक से बढ़ कर एक। बधाई।

Satish Saxena said...

कमाल की ग़ज़ल है नीरज भाई ! हर शेर रुकने को विवश करता हुआ ! शुभकामनायें !

Dr.Ajmal Khan said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को


दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को

बेहद खूबसूरत फल्सफा बयान किया आप ने
मुबारक हो.....

और आप मेरे ब्लोग पर तशरीफ लाये, और चंद अल्फाज़ कहे, सलाह भी दी, आप का बहुत बहुत शुक़्रिया.

shyam gupta said...

सभी कहरहे , कमाल की गज़ल है,
क्या रहगया कहने , बताने को ।

Himanshu Mohan said...

क्या करें चुप न जब बने रहते
और कुछ भी न हो बताने को

लोग जज़्बात निभाते हैं, यहाँ-
एक रिश्ता नहीं निभाने को

आशियाँ है यहीं, रहेगा यहीं
बर्क़ जा - ढूँढ सर छिपाने को

कुछ तकल्लुफ़ था कुछ थी मजबूरी
सर चढ़ाना पड़ा ज़माने को

ज़िन्दगी रेस है, जीतेंगे ज़रूर
भले तुझको ही हार जाने को

घटाना-जोड़ना हिकमत ही सही
कर वो जो हो नफ़ा पाने को

दिल में कुछ दर्द न हो पर रस्मन
रोता रह फ़ोटुएँ खिंचाने को

आपकी ग़ज़ल बहुत पसन्द आई नीरज साहब, मगर इस दिल का क्या करूँ जो आज बच्चे की तरह ज़िद कर बैठा उल्टा सोचने की - सो सब उलट-पलट दिया - और आख़री शे'र से शुरू होकर पहले तक गया। गुस्ताख़ी माफ़ कीजिएगा।
ख़ैर, बच्चों का नटखट-पन तो छोड़िए, मगर आपकी आज की ग़ज़ल बहुत पसन्द आई है। बहुत-बहुत।
बधाई!

Himanshu Mohan said...

और वाह! मेरा कमेण्ट 50वाँ था - अब 51वाँ भी ये हो जाएगा। यानी आधा सैकड़ा। इतनी तो पोस्टें लिखना मुहाल हो जाता है बहुतों को।
वाह!

नीरज मुसाफ़िर said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को
...
सही कह रहे हो जी।

Pawan Kumar said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

वाह!


हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को


अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई

कुमार संभव said...

एक हलचल सी मच गई है .............. बेहतरीन लिखा है आपने ..........

Manish Kumar said...

बहुत अच्छे...

Urmi said...

बहुत ख़ूबसूरत और शानदार ग़ज़ल! हर एक शेर लाजवाब लगा! उम्दा प्रस्तुती!

शोभना चौरे said...

BEHD SUNDAR GJAL .
SACH AAJ SARA GNIT HI GDBDA GYA HAI .

Mumukshh Ki Rachanain said...

सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को
लाजवाब ग़ज़ल.............
सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक आभार

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर

ankur goswamy said...

wah !! wah wah !!

निर्मला कपिला said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन
थम गये थे तुझे उठाने को
लाजवाब शेर हैं नीरज जी।
आपके ब्लाग पर बहुत दिनो बाद आने के लिये क्षमा चाहती हूँ दूसरी बात आपने कह दी है
सबसे बहतर है चुप रहें 'नीरज'
जब नया कुछ न हो सुनाने को
मेरे पास भे3ए इतने दिन कुछ नया नही था सुनाने को इस लिये नेट से दूर रही
बहुत अच्छी गज़ल है बधाई

Abhishek Ojha said...

बहुत बढ़िया ! हम भी बस यही कह पाते हैं हर बार :)

Omnivocal Loser said...

मुश्किलों का गणित ये कैसा है
बढ़ गयीं जब चला घटाने को

हमसे दम भर रहे थे रिश्ते का
चल दिए जब कहा निभाने को


Beautiful shers sir... so simple yet so effective

गौतम राजऋषि said...

अरे वाह-वाह नीरज जी...वाह-वाह! जबरदस्त काफ़ियों वाली कहर ढ़ाती ग़ज़ल। तू मचल कहकहे लगाने को वाले मिस्रे पे तो पहले सौ दाद कबूल फरमायें। बहुत खूब!

इतनी छोटी-सी बहर में जैसे कुछ नहीं छोड़ा आपने। मक्त एकबार फिर लाजवाब करता हुआ....