Monday, January 25, 2010

फूल पर तितलियां



दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है
हौसलों की हमारे ये पहचान है

लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

गर न समझा तो 'नीरज' बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है


(लिखने वाले वो ही हम और संवारने वाले वो ही गुरुदेव पंकज सुबीर जी)

57 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है

बिलकुल सही. बहुत खूबसूरत गजल. हमेशा की तरह.

Murari Pareek said...

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है
लाजवाब नीरज जी !!!

अजय कुमार said...

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

सुंदर रचना , बधाई

पी.सी.गोदियाल said...

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है


ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है


गर न समझा तो 'नीरज' बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है
क्या कहूँ नीरज जी, शब्द नहीं , लाजबाब !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

वाह सही कहा सबसे महंगी तो हंसी ही हो गयी आज कल ..बहुत बढ़िया लिखा है आपने शुक्रिया

दिगम्बर नासवा said...

वाह नीरज जी .......... किसी एक शेर नही पालकी पूरी ग़ज़ल में ताज़ा तरीन शेर हैं .......... अनायास वाह, सुभान अल्ला निकल जाता है ..... हर शेर के बाद ...... और आखरी शेर ...... जितना सोच रहा हूँ उतना ही जिंदगी को समझने का प्रयास कर रहा हूँ .... सच कहा है ..... जिंदगी समझ आ जाए तो जीवन आसान है ..........

गर न समझा तो 'नीरज' बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है

वन्दना said...

लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

yun to poori gazal ka har sher lajawaab hai magar ye dono to dil ko chhoo gaye.........yaad ko jo upma di hai wo to kabil-e-tarif hai.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही लाजवाब. शुभकामनाएं.

रामराम.

सुलभ 'सतरंगी' said...

सर जी बहुत अच्छा है यह ग़ज़ल.
हर एक शे'र पर सौ दाद.

खासकर ये वाला..
ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

संजय भास्कर said...

बिलकुल सही. बहुत खूबसूरत गजल. हमेशा की तरह.

संजय भास्कर said...

क्या कहूँ नीरज जी, शब्द नहीं , लाजबाब !

डॉ .अनुराग said...

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

goya subhanallah......pate i baat ahi..


बस फिलहाल तो यही दुआ कीजिये के हमारे यहाँ सूरज रोज शक्ल दिखाता रहे ओर सचिन आज सेंचुरी मार दे ....

मनोज कुमार said...

इस ग़ज़ल को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा।

रश्मि प्रभा... said...

gazal har chhand me behtareen hai

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आदरणीय नीरज जी, आदाब
दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है.....
से शुरू हुआ सफर
लाख कोशिश करो आके जाती नहीं....
खिलखिलाता है जो आज के दौर में....
हर शेर पर वाह करने को रुककर-

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है...
यहां कयाम के लिये ठहर गया....
ये तो आपको ही नहीं, सभी के दिल को छूने वाला है-
ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
सादर
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

पारूल said...

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

sabse khuubsurat

seema gupta said...

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है
लाजवाब , सुंदर रचना
regards

गिरीश पंकज said...

sundar bhavnaon susajjit shern ke liye badaiyaan.

डॉ टी एस दराल said...

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

बहुत सही कहा, नीरज जी। आजकल हंसी भी बनावटी नज़र आती है।

Aman Tripathi said...

"ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है


मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है "

भई वाह! ज़फर तो उतने नहीं, मगर आगरे के मियां नजीर याद आ गये!

डॉ. मनोज मिश्र said...

लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है..
वाह सर जी ,वाह.

निर्मला कपिला said...

दोनो को सलाम इतना ही कहूँगी क्या गज़ल है एक ही शब्द निशब्द गण्तन्त्र दिवस की शुभकामनायें

सतीश सक्सेना said...

वाह ! हमेशा की तरह बेहतरीन और विनम्र !शुभकामनायें !

Mansoor Ali said...

खूब शेर निकाले है, नीरज जी , बहुत खूब...

थोड़ा दिल्लगी का मन कर रहा है!..........

''शहर में हूँ नया और नादान भी,
तितलियों का पता तो बता दीजिये!''

प्रवीण शाह said...

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लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है


वाह नीरज जी वाह, क्या शेर निकाले हैं... चिपकेंगे एकदम जुबान पर...
आभार!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर गजल ओर सभी शॆर बहुत अच्छॆ लगे
आप को गणतंत्र दिवस की मंगलमय कामना

"अर्श" said...

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है
इस अंदाज के हम दीवाने हैं नीरज जी ... हर शे'र जिस नाजुकी से आप कह जाते हैं दुसरे के बूते की बात नहीं होती है ...

अर्श

Devendra said...

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है
...वाह! क्या शेर है! इतना मासूम शेर तो वही लिख सकता है जिसपर गुरू की कृपा हो.

anitakumar said...

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

बिल्कुल सही फ़र्माया आप ने

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बढ़िया एक से बढ़कर एक शेरों से बुनी रचना पर, आपको मुबारकबाद नीरज भाई
गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में सभी भारत माता की संतानों को मेरी मंगल कामनाएं
स - स्नेह,
- लावण्या

गौतम राजरिशी said...

"मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है"

अरे वाह-वाह, नीरज जी! वाह-वाह!! क्या शेर लिखा है सरकार। हजारों दाद कबूल करें सर।

और इस मिस्रे पर "पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर" पर तो उफ़्फ़्फ़्फ़-हाय-आह वाली बात है।

वाणी गीत said...

जान लिया जिन्दगी को ...बहुत ही आसान है ...
तितलियाँ फूलो पर नहीं ...महलों पर मंडराती है आजकल ...
खोजा जिसने नादान है ....
अच्छी लगी आपकी कविता ....!!

संजीव गौतम said...

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है


पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है
iski kahan par to jitni daad doon sab kam hai.

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है
kitane sada lekin naye dhang se aapane kaha hai. aanand aa gaya. aaj ka di saarthak ho gayaa.

अजय कुमार झा said...

उफ़्फ़ शीर्षक ही कातिल थी , पूरी पंक्तियां तो पार्थिव देह ने पढी है । नीरज जी अद्भुत है रचना
अजय कुमार झा

shama said...

गर न समझा तो 'नीरज' बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है..
Pata nahee kaun samajh paya!
Aapko gantantr diwas mubarak ho!

श्रद्धा जैन said...

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

waah kya baat kahi hai

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

waah


मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है


पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है


ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है


kyaa kamaal ka sher hai

गर न समझा तो 'नीरज' बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है
maqta gazab ka kaha hai

Aadarneey Neeraj ji
kamaal ki gazal har sher khoobsurat

रविकांत पाण्डेय said...

लिखने वाले वो ही नीरज जी और संवारनेवाले वो ही गुरूदेव पंकज सुबीर जी....और पढ़कर घायल होने वाले वो ही मेरे जैसे कुछ सिरफ़िरे :)
अब इतनी कशिश भरी गज़ल लिखियेगा तो हमारा सर न फ़िरेगा तो क्या होगा ? सारे शेर बेजोड़ हैं। खड़े होकर तालियां बजाता हूं।

श्याम कोरी 'उदय' said...

..... बेहतरीन गजल!!!!!

sulbha said...

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

khud ko khuda maane, ya doosro ko murkh jaane,
bhul gaya hai, ki khud sirf ek insaan hai ;)))

sulbha said...

oye chacha, aap reply kaahaan pe karte ho.....

Kusum Thakur said...

सारे शेर एक से बढ़कर एक हैं !! बहुत बहुत बधाई !!

सर्वत एम० said...

यार इतने खूबसूरत अशआर, फंस कर रह गया हूँ. किसे छोडूं, किसे माथे लगाऊँ, जैसा हाल हो गया है. एक तो देर से आया, भाई लोगों ने कहने- सुनने को कुछ बाकी नहीं छोड़ा. फिर भी 'पांच करता है जो' का जवाब नहीं.
हम, बल्कि वो सभी, जो गणित के इन ताज़ा तरीन फार्मूलों से अनभिज्ञ हैं, इस युग में मिसफिट हैं.
आप के साथ सुबीर जी का शुक्रिया न अदा किया जाए तो शायद बेईमानी होगी.

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Om Prakash Sapra Ji:-

shri neeraj ji
namastey,
this is also a good gazal- "phool par titliyan"
The caption is also attractive one.
congrats,
also say our regards to pankaj subeer ji,
regards,
-om sapra,
delhi-9

Roshani said...

bahut acche...
ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है
.
.
ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है
ye line bahut acchi lagi....
Aabhar...

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,
बहुत खूबसूरत मतला है और उससे अगला ही शेर "लाख कोशिश करो................." वाह वाह वाह वाह,
यादों के बारे क्या thought निकला है,
इस शेर के बारे में क्या कहेंगे,
खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है
अब इसे अगर आप से जोड़े तो मालूम चलेगा की आप कितने महान हैं जो हर वक़्त ख़ुशी बाटते रहते हैं.
आप मुंबई आ गए हैं क्या?

BrijmohanShrivastava said...

वाह साहव ""जिनके होंठो पे हंसी पांव मे छाले होगे,वो तेरे चाहने वाले होंगे । आके जाते नही ऐसे महमान जैसी याद ""आप बुधबार को पधारे है आज है सोमबार हद करदी ।खिलखिलाता है +आज के माहौल मे हंसने वाले ,तेरा कलेजा पत्थर का होगा ।यह जानते हुए कि पडोसी भूखा है ( उपवास नही ) कैसे लोगों के गले मे रोटी उतर जाती है ।उर्दू शायर मीर हिन्दी कवियत्री मीरा और उर्दू शायर जोश और हिन्दी लेखक जोशी । दो और दो का मिलकर पांच हुआ करता है ,पढा लिखा तो बहुत है थोडी नादानी भी सीख ।नादान तो है ही क्योंकि भंवरों ने तितलियों को जगह ही कहां छोडी है ।जिन्दगी आसान है लेकिन "जिन्दगी से बडी सजा ही नही और क्या जुर्म है पता ही नही ।आपकी गजल बहुत अच्छी लगी

Dr. Chandra Kumar Jain said...

फिर एक कमाल की ग़ज़ल,
नीरज जी !
ये तितलियाँ ढूँढने वाली नादानी है
वह यकीनन बड़ी नेमत है न ?
==========================
शुक्रिया
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Manish Kumar said...

behtareen ghazal !

दीपक 'मशाल' said...

हर शेर दाद मांग रहा है.... इसे ही कहते हैं संपूर्ण ग़ज़ल..धन्यवाद नीरज सर... सुबीर सर को भी अभिवादन..
जय हिंद...

sanjaygrover said...

फूल खिलता है तितली की तारीफ़ में
और तितली की भी फूल में जान है

लोकेन्द्र said...

आपकी इस रचना को पढ़ के तो पहले मैंने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया.......
और फिर इसे अपने मित्रो को सुनाने के लिए याद करके भी जा रहा हूँ.....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गर न समझा तो 'नीरज' बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है

अरे वाह, इतनी सहज फिर भी इतनी कठिन!

Babli said...

वाह बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ! इस लाजवाब और उम्दा रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

रचना दीक्षित said...

बेमिसाल,लाजवाब बस और क्या लिखूं

तिलक राज कपूर said...

ये पोस्‍ट मिस हो गयी थी, आज देखी। अब इतनी सारी टिप्‍पणियॉं आपको इस पोस्‍ट पर मिल चुकी हैं कि दाता तो क्‍या किसी के भी नाम से मॉंगो, नहीं दूँगा-बिल्‍कुल नहीं दूँगा। हॉं इतना तो कह ही सकता हूँ कि हर शेर दहाड़ रहा है।
आपके तीसरे शेर के मुताबिक आप-हम तो अजूबे ही हैं।
चलिये अब आप रास्‍ते की धूल का मजा लें और कुछ झाड़ें या दहाड़ें।

KESHVENDRA said...

नीरज जी, आपकी ग़ज़ल कि शान में पेश है उसी कि तर्ज़ पर लिखा मेरा एक शेर-

हम को ग़म भी मिले तो नही ग़म कोई
तुमको खुशियाँ मिले ये ही अरमान है.

vishal said...

जैसे खुशबू मिले गुलाबों में
जब कभी मेरी याद आए तो
मैं मिलूँगा इन्हीं किताबों में - अज़ीज़ अंसारी

आपका शायरी और ग़ज़लों का कीमती खज़ाना पढ़ने की बहुत ख्वाहिश है। खोज-खोज कर पढ़ूँगा।