Monday, August 4, 2008

गिरे पत्ते शजर से धूल खायें




मिलेंगी तब हमें सच्ची दुआयें
किसी के साथ जब आंसू बहायें

बहुत बातें छुपी हैं दिल में अपने
कभी तुम पास बैठो तो सुनायें

फकीरों का नहीं घर बार होता
कहाँ इक गाँव ठहरी हैं हवायें

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

बिछुड़ कर घर से हम भटके हैं जैसे
गिरे पत्ते शजर से धूल खायें

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
चलो बदलें रफू कब तक करायें

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें
( प्राण साहेब से आशीर्वाद लिए बिना ये ग़ज़ल मुकम्मल नहीं हो सकती थी )

27 comments:

seema gupta said...

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें
" yes rightly said, these lines are essence of the poem, wonderful"

Regards

मीत said...

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

क्या बात है भाई. ये हुआ न रिश्ता. बहुत बढ़िया

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सुंदर गजल. एक-एक शेर मन को छूने वाला.
वाह!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

नीरज जी,
हमारा आपसे ऐसा ही रिश्ता है.
==========================
और यह भी कि -
बजाई बांसुरी अब हँसी दे दी
हम ये फ़ितरत बताओ कैसे पाएँ.
==========================
शुक्रिया...प्राण साहब का भी...
आपका
चन्द्रकुमार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

फकीरों का नहीं घर बार होता
कहाँ एक ठौर ठहरी हैं हवायें

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

पूरी गजल बहुत अच्छी है .पर यह विशेष रूप से पसंद आए

बाल किशन said...

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें"

सुंदर!
अति सुंदर!
उम्दा... बेहतरीन
उत्कृष्ट रचना.
बहुत खूब.
जवाब नहीं आपका.

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,
बकौल आप के ही
"एक बात मैंने अनुभव की, जो बहुत बढ़िया लगी.....दुनिया के सारे इंसान एक जैसे हैं.....मैं जहाँ कहीं गया...लोग मुझको देख कर हँसे."

कहीं यही बात तो आपके इस शेर में तो नही ............
अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

ग़ज़ल के सारे शेर एक से बढ़ कर एक है . बधाई स्वीकार करें
चन्द्र मोहन गुप्त

अनुराग said...

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें
bahut khoob....neeraj ji man moh liya is sher ne ...

Gyandutt Pandey said...

आपकी पोस्ट की बदौलत मैने उर्दू का एक शब्द सीखा - शजर। इण्टरनेट पर डिक्शनरी से पता चला "पेड़"।
यह अच्छा है - एक आध शब्द न समझ आये तो आदमी सीखता है। सिखाने के लिये धन्यवाद।
--------
ज्यादातर अपने को शजर के टूटे पत्ते की मानिन्द पाते हैं। कोई इलाज है यह सोच मिटाने का?!

swati said...

hamesha ki tarah is baar bhi aapka lekhan man moh gaya ,abhi bahut kuch sekhna hai aapse

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बहुत बढिया रचना है।

बिछुड़ कर घर से हम भटके हैं जैसे
शजर से टूट पत्ते धूल खायें

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

राज भाटिय़ा said...

बहुत गहरी बाते कहते हे आप अपने शेरॊ मे,अब किस किस शेर की चरचा करे, सभी एक से बड कर एक...
लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें
बहुत ध्न्यवाद

सुशील कुमार छौक्कर said...

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

अति सुन्दर। बहुत खूब।

रंजन गोरखपुरी said...

हर शेर अपने आप में गौहर समान है!!

मिलेंगी तब हमें सच्ची दु‌आयें
किसी के साथ जब आंसू बहायें

वाह हुज़ूर!! क्या सच्ची बात कही!! जब आगाज़ यूं हो तो आगे क्या कहें...

फकीरों का नहीं घर बार होता
कहाँ एक ठौर ठहरी हैं हवायें

क्या बात है!! बहुत खूब!!!

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

आफ़रीन!! बेहद खूबसूरत शेर!!

बिछुड़ कर घर से हम भटके हैं जैसे
शजर से टूट पत्ते धूल खायें

दिल छू लिया साहेब!!

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

बहुत सारी परतें लिये है ये शेर! हर बार और ज़्यादा कह जाता है!!

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

और ये तो कत्ल है!! हासिल-ए-गज़ल है ये मक्ता!!

बस आपके शेरों पर यही कहूंगा कि

इसे कहते हैं खूबी सादगी की,
हंसी आए पर आंखें भीग जाएं

Udan Tashtari said...

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

-इसे तो यूं मानें कि हमने आपके लिये यह सत्य वचन कहे हैं. :) बहुत उम्दा. बधाई.

Parul said...

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें---वाह!! बहुत खूब!!
इस पर एक पंक्ति याद आ रही है किसी गज़ल की-
"परखना मत परखने से कोई अपना नही रहता "।

राजीव रंजन प्रसाद said...

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

वाह!!! नीरज जी, हर शेर गहरा है। हर शेर में सागर है..


***राजीव रंजन प्रसाद

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

बहुत अच्छी है आपकी यह ग़ज़ल, जैसे दिल में लहू बहे!

Mired Mirage said...

बहुत गजब की गहरी व सुन्दर रचना रची है आपने। कहने को शब्द नहीं हैं।
घुघूती बासूती

योगेन्द्र मौदगिल said...

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

बिछुड़ कर घर से हम भटके हैं जैसे
शजर से टूट पत्ते धूल खायें

वाह बंधुवर आनंद आ गया
सधी हुई रचना
प्राण साहब को प्रणाम
आपको साधुवाद

Smart Indian said...

बहुत सुंदर!

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें


हर पंक्ति सुंदर है मगर इन लाइनों में उस मुस्कान का ज़िक्र है जो आपकी कविता (और टिप्पणी भी) हमारे चेहरे पर लाती है. सचमुच अच्छे लोगों की अच्छाई को मीलों दूर से बिना मिले भी महसूस किया जा सकता है.

निम्न पंक्तियों में बहुत सच्चाई है:

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

Excellent, Keep it up!

Harshad Jangla said...

Neerajbhai
Bahut khub.
I got the meaning of Shajar from the comments.
Now what is Chamdeka Labada?
-Harshad Jangla
Atlanta, USA

vipinkizindagi said...

मिलेंगी तब हमें सच्ची दुआयें
किसी के साथ जब आंसू बहायें

बहुत बातें छुपी हैं दिल में अपने
कभी तुम पास बैठो तो सुनायें

फकीरों का नहीं घर बार होता
कहाँ एक ठौर ठहरी हैं हवायें

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

बिछुड़ कर घर से हम भटके हैं जैसे
शजर से टूट पत्ते धूल खायें

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें

bahut achchi ........
mazedaar rachna.....

haidabadi said...

अजब रिश्ता है अपना तुमसे "नीरज"
करें जब याद तुमको मुस्कुरायें
वाह वाह किया कहने हैं नीरज साहिब
अर्ज़ किया है

मैं ख़यालों में उसके रहता हूँ
वो मेरे दिल में मुस्कुराती है
बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें
अर्ज़ किया है
दोस्त होते हैं चाँद शीशे से
दोस्तों को न आज़माया कर
नीरज भाई आया तो था आपकी खुबसूरत ग़ज़ल पर कुछ कहने
लेकिन अपने २ अशआर भी ठोक दिए
बड़ा मलाल सा हो रहा है
अपने किये पे क्यों अब पछता रहा हूँ मैं
चाँद शुक्ला डेनमार्क

rakhshanda said...

फकीरों का नहीं घर बार होता
कहाँ एक ठौर ठहरी हैं हवायें

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

क्या बात है, क्या कहूँ,पूरी ग़ज़ल दिल में उतर गई,बहुत खूब नीरज जी,

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत बातें छुपी हैं दिल में अपने
कभी तुम पास बैठो तो सुनायें

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें

लगा गलने ये चमड़े का लबादा
उसे बदलें रफू कब तक करायें

दिल को छू लेने वाले शेर कहे हैं आपने। बधाई स्वीकारें।

मीनाक्षी said...

बनालें दोस्त चाहे आप जितने
मगर हरगिज़ ना उनको आजमायें --
बहुत पते की बात कही..

बिछुड़ कर घर से हम भटके हैं जैसे
गिरे पत्ते शजर से धूल खायें --
हम भी सालो से भटक रहे है अपने देश से दूर.

वैसे पूरी गज़ल लाजवाब है.