
जियें खुद के लिये गर हम, मजा तब क्या है जीने में
बहे औरों की खातिर जो, है खुशबू उस पसीने में
है जिनके बाजुओं में दम, वो दरिया पार कर लेंगे
बहुत मुमकिन है डूबें वो, जो बैठे हैं सफीने में
ये कैसा दौर आया है, सरों पर ताज है उनके
नहीं मालूम जिनको फर्क, पत्थर औ' नगीने में
हमारे दोस्तोँ की महरबानी इक छलावा है
ज़हर पाया है अक्सर खूबसूरत आबगीने में
गए तुम दूर जब से, दिल ये कहता है करो तौबा
मज़ा आता नहीं, खुद ही उठा कर ज़ाम पीने में
लगाये टकटकी हम राह पर बैठे रहे सदियों
सुना था लौट आएगा, वो ज़ालिम इक महीने में
सितम सहने की आदत, इस कदर हम को पड़ी "नीरज"
कहीं कुछ हो, नहीं अब खौलता है, खून सीने में
सफीने: कश्ती , नाव
आबगीने: शराब की छोटी कांच की सुन्दर बोतलें
