
गुरुदेव पंकज सुबीर जी ने अपने ब्लॉग पर एक तरही मुशायरे का आयोजन किया था जिसमें बहुत से नामी गिरामी शायरों ने अपने बेमिसाल कलामों के साथ शिरकत की, उसी मुशायरे में खाकसार ने भी अपनी ग़ज़ल भेजी जिसे उसमें कुछ नए शेर जोड़ कर यहाँ पेश किया जा रहा है.
मुस्कुरा कर डालिए तो इक नज़र बस प्यार से
नर्म पड़ते देखिये दुश्मन सभी खूंखार से
नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से
फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से
जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से
दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से
जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से
ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से
पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से
झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से
