ग़ज़ल जंगल की कोयल है सर्कस की नहीं जो ट्रेनर के इशारे पे गाये सो जनाब अरसा गुज़र जाने पे भी जब कोई ग़ज़ल नहीं हुई तो मैं परेशान नहीं हुआ फिर अचानक ज़ेहन कि मुंडेर पे ये कोयल बैठी दिखी जिसने मुश्किल से एक तान लगाईं और फुर्र हो गयी. जैसी भी है, उसी तान को आपके साथ बाँट रहा हूँ बस।
अब रिश्तों में गहराई ?
बहते पानी पर काई ?
तुम कमरों में बंद रहे
धूप नहीं थी हरज़ाई
तुमसे मिल कर देर तलक
अच्छी लगती तन्हाई
बच्चों से घर चहके यूँ
ज्यूँ कोयल से अमराई
लाख बुराई हो जिसमें
ढूंढो उसमें अच्छाई
तन्हा काली रातों की
बढ़ती क्यूँ उफ़ ! लम्बाई
बीती बात उधेड़ो मत
'नीरज' सीखो तुरपाई

