Monday, January 13, 2014

बच्चों से घर चहके यूँ

ग़ज़ल जंगल की कोयल है सर्कस की नहीं जो ट्रेनर के इशारे पे गाये सो जनाब अरसा गुज़र जाने पे भी जब कोई ग़ज़ल नहीं हुई तो मैं परेशान नहीं हुआ फिर अचानक ज़ेहन कि मुंडेर पे ये कोयल बैठी दिखी जिसने मुश्किल से एक तान लगाईं और फुर्र हो गयी. जैसी भी है, उसी तान को आपके साथ बाँट रहा हूँ बस।



अब रिश्तों में गहराई ? 
बहते पानी पर काई ? 

तुम कमरों में बंद रहे 
धूप नहीं थी हरज़ाई 

तुमसे मिल कर देर तलक 
अच्छी लगती तन्हाई 

बच्चों से घर चहके यूँ 
ज्यूँ कोयल से अमराई 

लाख बुराई हो जिसमें 
ढूंढो उसमें अच्छाई 

तन्हा काली रातों की 
बढ़ती क्यूँ उफ़ ! लम्बाई 

बीती बात उधेड़ो मत 
'नीरज' सीखो तुरपाई