Monday, November 15, 2010

तुम हुए जिस घड़ी हमसफ़र

फोटो: गूगल साभार

(दोस्तों पेश है एक और छोटी बहर की गज़ल)

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर

राह, मंजिल हुई उस घड़ी
तुम हुए जिस घड़ी हमसफ़र

घर जला कर मेरा झूमते
दोस्तों की तरह ये शरर

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र


मुख़्तसर: छोटी, शरर: चिंगारियां ,