
दो साल पहले ये ही दिन था जब मैंने अपना ब्लॉग शुरू किया. इसके एक साल पूरे करने के बाद मैंने एक पोस्ट डाली थी "नमन नमस्ते नमस्कार" उम्मीद है सुधि पाठक उसे भूल गए होंगे. वैसे भी आज के युग में सिर्फ काम की चीजें याद रक्खी जातीं हैं ,अनर्गल प्रलाप वाली नहीं.
मैं आपको वो पोस्ट पढने की दावत नहीं दे रहा बल्कि ये बता रहा हूँ की उस पोस्ट में जितने भी महानुभावों के नाम आये थे अब दूसरे साल के समापन पर उनकी संख्या में अप्रत्याशित बढोतरी हुई है.
( गैर शायराना किस्म के लोग कृपया नोट करें, लेकिन दिल पर ना लें )
दो साल और लगभग ढेड सौ पोस्ट...क्या कहते हैं ? ब्लॉग ठीक चल रहा है ना? मेरे विचार से तो बहुत ही बढ़िया चल रहा है. मैं खुश हूँ और इस ख़ुशी का कारण आप पाठक हैं. आते हैं पढ़ते हैं हौसला बढाते हैं सिखाते हैं...और क्या चाहिए?

दो साल और लगभग ढेड सौ पोस्ट...क्या कहते हैं ? ब्लॉग ठीक चल रहा है ना? मेरे विचार से तो बहुत ही बढ़िया चल रहा है. मैं खुश हूँ और इस ख़ुशी का कारण आप पाठक हैं. आते हैं पढ़ते हैं हौसला बढाते हैं सिखाते हैं...और क्या चाहिए?
...लेकिन हकीकत वो नहीं है जो नज़र आती है...सोच नहीं पा रहा की इसे आगे चलाया जाये या रोक दिया जाये... :)) कारण....ब्लॉग के दो साल पूरे होने पर जो आवाज़ मेरे दिल से आ रही है उसे ही ग़ज़ल पैरोडी के रूप में पेश कर रहा हूँ...ग़ज़ल पैरोडी का रदीफ़ जगजीत सिंह और चित्र सिंह जी की आवाज में गायी एक ग़ज़ल से प्रभावित है...(मारा हुआ है)
( ये ग़ज़ल पैरोडी सिर्फ मेरे ब्लॉग के लिए ही है इसे अपने लिए न समझें , ऐसा करने पर कहीं आपका अंतर्मन जाग गया तो?
झूटी सच्ची बात बताना, कब तक आखिर आखिर कब तक
उल्टी सीधी हांके जाना, कब तक आखिर आखिर कब तक
गीत नये सब ब्लोगर गाते, गा कर सबको खूब रिझाते
तेरा मेंडक सा टर्राना, कब तक आखिर आखिर कब तक
एक बरस में दो इक पेलो, मत हर हफ्ते ग़ज़लें ठेलो
पाठक को बेबात सताना, कब तक आखिर आखिर कब तक
साल गुज़ारे दो ये माना, खा हर पल बीवी से ताना
खा कर ताना ब्लॉग चलाना, कब तक आखिर आखिर कब तक
हम जा कर जिस को टिपियाये, क्या बदले में वो भी आये
इसमें 'नीरज' ध्यान लगाना, कब तक आखिर आखिर कब तक
( अरे ये क्या आप तो सिरिअस हो गए...हम तो केवल मजे के लिए ये ग़ज़ल लिखें हैं...बोलो तारारारा... )

