Monday, August 3, 2009

रात-दिन घंटियाँ बजाने से




गीत बचपन के वे सुहाने से
गुनगुनाओ किसी बहाने से

बातें सच्ची कभी -कभी यारो
झूठ लगती हैं फुसफुसाने से

हौंसले कातिलों के बढ़ते हैं
बाँध के हाथ गिड़गिड़ाने से

रब कभी कुछ नहीं दिया करता
रात-दिन घंटियाँ बजाने से

याद एहसान कौन रखता है
फायदा भूल जा गिनाने से

मायने ही न जो समझ पाए
बात बचिए उसे सुनाने से

इश्क भी बोझ सा लगे 'नीरज'
हर घडी यार को मनाने से


{"आदरणीय गुरु देव प्राण शर्मा जी का आर्शीवाद प्राप्त ग़ज़ल "}