
गीत बचपन के वे सुहाने से
गुनगुनाओ किसी बहाने से
बातें सच्ची कभी -कभी यारो
झूठ लगती हैं फुसफुसाने से
हौंसले कातिलों के बढ़ते हैं
बाँध के हाथ गिड़गिड़ाने से
रब कभी कुछ नहीं दिया करता
रात-दिन घंटियाँ बजाने से
याद एहसान कौन रखता है
फायदा भूल जा गिनाने से
मायने ही न जो समझ पाए
बात बचिए उसे सुनाने से
इश्क भी बोझ सा लगे 'नीरज'
हर घडी यार को मनाने से
{"आदरणीय गुरु देव प्राण शर्मा जी का आर्शीवाद प्राप्त ग़ज़ल "}
