मेरे मित्र विजय जी ने मिष्टी की फोटो देख कर ही उसपर इक रचना लिख कर मुझे भेजी है जिसे मैं ज्यूँ की त्यूँ आप सब को पढ़वा रहा हूँ. उनकी रचना कैसी लगी ये आप उन्हें जरूर बताएं
है प्यारी सी अपनी मिष्टी
जिसमें सारी अपनी सृष्टि
सपनो को साकार किया है
हमसब को उपहार दिया है
बिखरे बिखरे से जीवन को
इक सुंदर आकार दिया है
सारे घर की शान है मिष्टी
घर वालों की जान है मिष्टी
ठुमक ठुमक कर नाच दिखाए
तितली की जैसे मंडराए
छोटे छोटे से पावों से
लम्बी लम्बी दौड़ लगाये
लगती तो नादान है मिष्टी
पर बेहद शैतान है मिष्टी
बड़ी बड़ी हैं आँखें चंचल
जिनमें हरपल देखूं हलचल
मीठे मीठे गीत सुनाती
जैसे घर में गाती कोयल
सब का दिल बहलाए मिष्टी
ये सबकी कहलाये मिष्टी
