
कुछ सदा में रही कसर शायद
वरना जाते वहीं ठहर शायद
दर्द तन्हाई का मत पूछ मुझे
उससे बदतर नहीं कहर शायद
तेज़ थी धूप छा गयी बदली
तेरे आने का है असर शायद
बोलती बंद है अभी उसकी
आईना आ गया नज़र शायद
गीत पत्थर भी हैं लगे गाने
तेरे छूने की है ख़बर शायद
सिल गए होंठ दुश्मनों के तभी
जबसे उसने कसी कमर शायद
फ़िर घटा याद की है गहराई
अब करेगी ये आँख तर शायद
सच अकेला चला सदा 'नीरज'
नहीं आसान ये डगर शायद
