Wednesday, January 9, 2008

दूध पी के भी नाग डसते हैं



ये न समझो के अश्क सस्ते हैं
जान लेकर ही तो बरसते हैं

दलदली है ज़मीन चाहत की
लोग क्यों जाके इसपे बसते हैं

टूटते गर करें ज़रा कोशिश
आज कल के ऊसूल खस्ते हैं

यार आदत बदल नहीं सकते
दूध पी के भी नाग डसते हैं **

है बड़ी दूर प्यार की मंजिल
खार वाले जनाब रस्ते हैं

नाते रिश्ते हैं रेत से "नीरज"
हम जिन्हें मुटठियों में कसते हैं



(** ये कथन ग़लत है क्यों की सांप दूध नहीं पीते)