Monday, May 10, 2021

किताबों की दुनिया - 231


"एक मनुष्य संघर्षों से लड़कर ही सोने के समान चमक उठता है। उसका व्यक्तित्व भी संघर्षों के कारण ही निखरता है, जिसे जीवन में सब कुछ बिना परिश्रम किए मिल जाए उसे जीवन का सच्चा अर्थ ज्ञात नहीं हो पाता। जब हम संघर्ष करते हैं, तभी हमें अपने बल और सामर्थ्य का पता चलता है। संघर्ष करने से ही आगे बढ़ने का हौसला, आत्मविश्वास मिलता है और अंततः हम अपनी मंज़िल को हासिल कर लेते हैं।जब तक आप खुद से नहीं हारते आपको दुनिया की कोई ताकत नहीं हरा सकती" ।   

हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के गाँव नगरोटा बगवां की एक चाय की दुकान पर बैठे बुजुर्ग ने ये बात अख़बार से पढ़ कर अपने पास बैठे दूसरे बुजुर्ग को सुनाई। दूसरे बुजुर्ग ने अपने लगभग गंजे सर पर हाथ फेर कर मुस्कुराते हुए अपने दोस्त को देखा, चाय का हल्का सा एक घूँट भरा और कहा ' यार राजेश, मेरे से ज्यादा इस बात की गहराई कौन समझेगा भाई ? ये जो तूने अभी पढ़ा है वो बिलकुल सच है, संघर्ष मैंने भी किया है ,हाँ उसे कभी गाया नहीं है।' राजेश ने अपने दोस्त की बात सुन कर अखबार एक तरफ़ रख दिया और हैरानी से सामने बैठे दोस्त से पूछा 'तुमने ? कब ?"  'बचपन से' दोस्त ने एक बार फिर अपने सर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुरा कर जवाब दिया। राजेश ने चौंक कर कहा 'बचपन से ? हद है भाई मैं तो तुमको हमेशा मुस्कुराते देखता हूँ मुझे कभी लगा ही नहीं कि तुमने ज़िन्दगी में कभी संघर्ष किया होगा, आज मैं तुम्हारी कहानी सुन के ही मानूँगा।' 'अरे छोड़ यार राजेश क्या रखा है संघर्ष की कहानी सुनाने में' बुजुर्ग ने कहा। 'मान लिया कुछ नहीं रखा लेकिन आज तुझे अपनी कहानी सुनानी ही पड़ेगी' राजेश जी ने जिद ही पकड़ ली।  'अच्छा भाई सुनाता हूँ बचपन से ही सुनाता हूँ -खुश ? बुजुर्ग ने एक और चाय ऑर्डर देते हुए कहा 'वैसे ये कहानी वैसे मैं किसी को सुनाता नहीं'

आइये पाठकों हम भी इस बुजुर्ग की कहानी सुनने राजेश जी के पास बैठ जाएँ क्यूंकि हमारी आज की किताबों की दुनिया श्रृंखला में हम उन्हीं की ग़ज़लों की किताब में से चंद चुंनिदा शेर आपतक पहुंचाने वाले हैं। इन बुजुर्गवार का नाम है पवनेंद्र 'पवन' और उनकी ग़ज़लों की किताब 'उसे दुःख धरा का सुनाना पहाड़ो !" हमारे सामने खुली हुई है। इस किताब को आप बोधि प्रकाशन जयपुर से 9425522569 पर मायामृग जी को फोन कर मंगवा सकते हैं या फिर पवन जी से 9418252675 पर संपर्क करें उन्हें बधाई दें और किताब प्राप्ति के बारे में पूछें।


सड़कों पर सोते हैं ठिठुरते जो अधनंगे 
उन बच्चों की एक रजाई माँ का पेट 

जज़्ब हो जाते इसमें सारे घुड़की ताने 
जाने कितनी गहरी खाई माँ का पेट 

पहले मेहमाँ परिजन कुत्ता कौआ गाय 
अंत में जिस की बारी आई मां का पेट
*
नहीं है पेड़ पत्थर जीव जो बहते हैं दरिया में 
बहाई जा रही है टुकड़ा टुकड़ा लाश पर्वत की 

महीनों बाद हाज़िर हो रुगण अध्यापिका जैसी 
चली जाती है लेकर धूप फिर अवकाश, पर्वत की
*
 गालियां कुछ को मिली कुछ नहीं बटोरीं तालियाँ 
वक्त की पिच पर क्रिकेट की एक पारी ज़िंदगी 

दो क़दम चल कर ही थक कर हाँफने लगते हैं लोग 
किस ने इन पर लाद दी इनसे भी भारी ज़िंदगी 

वक्त का टी.टी. न जाने कब इसे चलता करे
बिन टिकट के रेल की जैसे सवारी ज़िंदगी
*
राज मगरमच्छों का है अब 
मछली जल की रानी मत लिख

इस पीढ़ी की एक ही ज़िद है 
इक भी बात पुरानी मत लिख 

कौन पढ़ेगा बाल कथाएँ 
एक थे राजा रानी मत लिख

मैं गाँव कांगड़ा जिले के गाँव समलोटी मैं 7 मई 1945 को पैदा हुआ, पता है हमारे घर से सर उठाये दूर खड़ी धौलाधार पर्वत की बर्फ से ढकी चोटियाँ यूँ नज़र आती जैसे हाथ बढ़ाने से पकड़ में आ जाएँगी। हमारे घर से थोड़ा आगे ही एक पहाड़ी थी जहाँ से चीड़ का जंगल शुरू हो जाता था। पिता श्री सीताराम जी काँगड़ा में जिला म्युनिसिपल कमेटी के सचिव पद पर कार्यरत थे लिहाज़ा हम सब गाँव छोड़ कर काँगड़ा रहने लगे थे। जब कभी मैं गाँव आता तो सबसे पहले घर के पास वाली पहाड़ी पर चढ़ कर चीड़ के जंगलों में खो जाता।  जंगल की ख़ामोशी में मुझे प्रकृति का संगीत सुनाई देता। ये काम मैं आज भी, हाँ ,आज इस उम्र में भी करता हूँ।  मुझे जंगल की ख़ामोशी का संगीत पसंद है। 
हमारा काँगड़ा वाला घर देख कर, जिसमें सिर्फ़ बेहद जरुरत का सामान ही था, कोई भी अंदाज़ा लगा सकता था कि ये किसी बेहद ईमानदार सरकारी कर्मचारी का घर ही हो सकता है। पिता की सूखी तनख़्वाह के चलते जैसे तैसे हम बच्चों की पढाई और घर चल रहा था। जब मैं दसवीं जमात में आया उसी साल मेरे बड़े भाई नीलोखेड़ी में सिविल इंजीनियरिंग का कोर्स करने चले गए। उनके खर्चे का बोझ उठाने के लिए मेरा स्कूल छुड़वा दिया गया क्यूंकि पिताजी दो बच्चों की पढाई का खर्चा नहीं उठा पा रहे थे। स्कूल जाने की जगह मैं टाइप सीखने लगा। उन दिनों जिले के प्राइमरी स्कूलों में अध्यापकों की भारी कमी हुआ करती थी इसलिए स्कूल वाले नवीं या दसवीं पास बच्चों को अस्थाई तौर पर अध्यापक रख लेतेथे। उसी का फायदा मैंने उठाया और एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने लगा। सोलह साल का मैं उन दिनों कद काठी के लिहाज़ से बच्चा ही दिखता था इसलिए जब मैं स्कूल पढ़ाने के लिए घर से निकलता तो रास्ते में मुझे देख कर लोग हँसते कहते कि देखो बच्चों को बच्चा पढ़ाने जा रहा है। लोगों की हँसी मुझे चुभती इसलिए मैं ऐसे रास्तों से स्कूल जाने लगा जो भले ही लम्बे थे लेकिन उन रास्तों के लोग मुझे पहचानते नहीं थे। ये मेरे जीवन में आने वाली मुश्किलों की शुरुआत भर थी।.

कुबड़े बना दिए ख़ुदा ने आदमी वो सब 
जिनको ज़मीं पे कुछ कभी आता नज़र न था

जुल्फ़ों के साए में लिटा कुछ क्यों न मांगती 
वो प्रेमिका थी आपकी कोई शजर न था
*
समझे बदन पे हाथ फिराने को जिसका प्यार 
मक़सद तो उसका भेड़ की था ऊन देखना
*
कृषक मरने को खंजर ढूंढता है
 तू मस्जिद और मन्दर ढूंढता है
*
ईमानदार आदमी बस इक सिपहसलार है 
विराजमान तख्त़ पर हुआ रँगा सियार है
*
दाल रोटी मकां तो दे न सके 
चांद लाने की बात करते हो 

भांज लठ गोलियां रियाया पर 
मुस्कुराने की बात करते हो 

जानकी हम नहीं है क्यों हमको 
आज़माने की बात करते हो
*
लेता नहीं कोई कभी सुध इसकी इसलिए 
इस घर में जायदाद के हक़दार हैं बहुत
*
कैकइयों का क्या है भरोसा 
जाने कब हों कोप भवन में 

दुश्मन को है राह सुरक्षित 
मित्रों को व्यवधान वतन में

मेरा अध्यापन कार्य चलता रहा और बड़े भाई की पढाई भी तभी पिता को मुँह का कैंसर हो गया।  बड़े को दो छोटे भाइयों की जिम्मेवारी सौंप कर मेरी माँ श्रीमती कांता देवी मुझे बीमार पिताजी के साथ चंडीगढ़ मेरे मामा के घर ले आयी। चंडीगढ़ के.पी.जी.आई में पिताजी का इलाज चलने लगा ,लगभग तीन चार महीने मैं पिता के साथ हॉस्पिटल में ही दिन रात रहा और उन्हें तिल तिल मौत की तरफ़ क़दम बढ़ाते देखता रहा। पिता की असामयिक मृत्यु के बाद हमारे परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में रखा राशन ख़त्म हो गया बनिये ने कुछ भी उधार देने से मना कर दिया ,कभी कोई पड़ौसी आटा-दाल दे जाता तो घर में कुछ पकता वरना फ़ाक़े ही करने पड़ते। आख़िर बड़े भाई की नौकरी लग गयी। किसी तरह गुज़ारा होने लगा। बड़े भाई ने मुझे आगे पढ़ने के लिए कुरुक्षेत्र भेज दिया। 

कुरुक्षेत्र में मेरे तीन चार पक्के दोस्त बने जिनकी माली हालत मेरी ही तरह पतली थी।  घर से जो आता हम सब उसे एक साथ अपने पर किफ़ायत से ख़र्च करते। उनमें से एक थे जनाब 'प्रेम भारद्वाज' जिनसे भाइयों जैसा रिश्ता कायम हो गया।  'प्रेम' को शायरी का शौक था और वो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपनी वाली पतली पतली शायरी की किताबों का दीवाना था। उसे देख कर मेरा रुझान भी शायरी की तरफ होने लगा और मैं तुकबंदी करने लगा। इसी बीच हम दोस्तों का सम्बन्ध एक खास विचारधारा के संगठन हो गया जिसके लिए हम काम करते और बदले में वो समय समय पर हमारे खाने पीने की व्यवस्था कर देते। एक बार उस उस संगठन के बड़े नेता का आगमन हुआ उसने अपने एक ओज भरे भाषण में किसानों से अपील की कि वो भाखरा डैम का पानी सिंचाई के लिए इस्तेमाल न करें क्यूंकि सरकार ने उसमें से बिजली निकाल ली है। नेता की इस बेतुकी बात को सुन कर हम दोस्तों ने उस संगठन से किनारा कर लिया। उस संगठन के लिए काम करने से हमें जो कभी खाने पीने या आर्थिक मदद मिलती थी वो बंद हो गयी ऊपर से एक मित्र के घर से पैसे आने भी बंद हो गए. कंगाली में आटा गीला वाला बात हुई लेकिन हमने उसकी भरपूर मदद करने की प्रतिज्ञा ली, उसकी फ़ीस भरने की खातिर हॉस्टल के कमरे छोड़ दिए और एक पुराने मंदिर में बने कमरे में रहने लगे जिसकी बरसातों में छत खूब टपकती थी और हमें बरसातों के चार महीने हॉस्टल में किसी न किसी दोस्त के साथ उसके कमरे में गुज़ारने पड़ते। दो कपड़ों में गुज़ारा करते किसी दोस्त की कमीज़ कभी मिल जाती तो पहन कर हीरो लगते और क्लास में अकड़ कर जाते वरना फ़टे हाल फ़क़ीरों की तरह घूमते ।उन दिनों यूनिवर्सिटीज़ में वामपंथ विचारधारा से प्रेरित एस. एफ. आई. का बोलबाला था। हम लोग उससे जुड़ गए। बात बात पर कॉलेज में हड़ताल करवाते विद्यार्थियों के हक़ के लिए प्रशासन से लड़ते ,पोस्टर बनाते जुलूस निकालते, मार्क्स और लेलिन को कोट करते, केंटीन में चाय के साथ कभी डबलरोटी तो कभी बिस्कुट पर गुज़ारा करते। इन कामों को करने में वही हुआ जिसका डर था , हम लोगों की हाज़री कम पड़ गयी और हमें ग्रेजुएशन की फाइनल परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया।     .

दिनों, सालों, महीनों में नहीं ये लोग जीते 
ये बस्ती फ़ाक़ों की गिनती से उम्रें आंकती है
*
आदमी है या गुलाबों की टहनियां है भला 
काँटे ही काँटे बदन हैं और चेहरे फूल हैं
*
लुटेरा चोर था, तस्कर था या सितमगर था 
चुना गया वो जो नेता तो सबका दिलबर था 

विकासवाद की बातें भी झूठी लगती हैं 
कहाँ है आदमी अब भी जो पहले बंदर था 

कहां से ढूँढ के मिलता मुझे वो गै़रों में 
मेरा रक़ीब मेरे दोस्तों के अंदर था
*
नफरत की बाढ़ में हैं सभी बह रहे मगर 
सोए पड़े हैं नाख़ुदा लंगर लपेट कर 

चहका खुशी से चूजा यूँ पहली उड़ान भर 
लाया परों में जैसे हो अंबर लपेट कर 

दुनिया में अम्न ख़ुद ब ख़ुद हो जाएगा 'पवन' 
धर दें सभी जो अपने पयंबर लपेट कर
*
वक्त ने हँफाया है साथ यूँ हमें अपने
दौड़ता है गाड़ी के साथ इक कुली जैसे
*
रहती है तब से ख़ाली ही दरिया बिछी हुईं 
जलसों का बहरे जब से बहिष्कार कर गए

ऐसी सूरते हाल में वापस गाँव लौटना तो संभव ही नहीं था इसलिए मैंने और प्रेम भारद्वाज ने तय किया कि दोनों बचपन के दोस्त 'मदन मोहन सेठी'  के पास चलते हैं जो हमीरपुर जिले के गाँव 'कांगू' के किसी स्कूल में अध्यापक लगा हुआ था। हमने कॉलेज से एक चिठ्ठी ली जिसमें लिखवा लिया कि हमने ग्रेजुएशन की पढाई की है लेकिन उसकी परीक्षा हम किसी कारण पास नहीं कर पाए। हमारी जेब में इतने पैसे नहीं थे कि हम दोनों बस से कांगू जाते इसलिए एक ट्रक ड्राइवर को जो कांगू से आगे जा रहा था किसी तरह हाथ पाँव जोड़ कर अपने साथ ले जाने को मनाया। धुल मिट्टी से सने जब हम हिचकौले खाते कांगू पहुंचे तो थकान और भूख से हमारी हालत बहुत ख़राब थी। 'कांगू' उतर कर दोस्त का पता किया तो लोगों ने बताया कि वो चार दिन पहले ही एक महीने के लिए कोई कोर्स करने सोलन चला गया है। इसे कहते हैं सर मुँडाते ही ओले पड़ना। 

किस्मत अच्छी थी कि वो अपने कमरे की चाबी पड़ौस में किसी को दे गया था। पड़ौसी को जब यकीन दिलाया कि हम दोनों उसके बचपन के दोस्त हैं तो हमारी हालत देख कर उसे रहम आया और उसने कमरे की चाबी देदी। रहने का बंदोबस्त होने से हम थोड़ा आश्वस्त हुए। कमरे के सामने लगे नल पर जा कर नहाये धोये तो भूख तेज हो गयी , कमरे में जा कर ढूँढा तो एक छोटी सी मटकी में थोड़ा सा नमक रखा मिला, बस। जेब में जितने पैसे बचे थे उनसे एक मुठ्ठी चावल और दाल मिली कमरे में रखे स्टोव पर रखी हांड़ी में खिचड़ी तो क्या बनाई हाँ दोनों को मिला कर उबाला नमक डाला और खा कर सो गए। . 

कहते हैं मुसीबत कभी अकेले नहीं आती साथ में मुसीबतों की सुनामी ले कर आती है। दूसरे दिन ये सोच कर कि शायद जहाँ मदन पढ़ाता है उस स्कूल में हमें भी नौकरी मिल जाए उसके स्कूल पहुँच गए। स्कूल जा कर पता लगा की स्कूल में साइंस के अध्यापकों की ज़रूरत तो है लेकिन प्रिंसिपल साहब जो नौकरी दे सकते थे एक हफ्ते के लिए अपने गाँव, पँजाब गए हुए हैं। ये हफ्ता काटना सबसे मुश्किल काम था। उधार किसी ने दिया नहीं ,जेब में धेला नहीं याने खाने को कुछ भी नहीं। भीख माँगना ज़ेहन ने ग़वारा नहीं किया ,अनजान जगह, किसके आगे हाथ फैलाते ? यकीन करो राजेश भाई हमने पाँच दिन घासफूस और पेड़ से पत्ते तोड़ कर उबाल कर खाये। आज जब ये बात याद कर रहा हूँ तो खुद को यक़ीन नहीं आ रहा। 
 
कोई देता न ध्यान हो जैसे 
मां भी हिंदी ज़ुबान हो जैसे 

राज़े दिल आंख खोल देती है 
घर से लगती दुकान हो जैसे 

जो भी चाहे वो करना पड़ता है 
मन भी आलाकमान हो जैसे
*
जानकी का जो हरण करते हैं नेपथ्य में वो
मंच पर राम का किरदार संभाले हुए हैं
*
भूल जाए ना कहीं शक्ल भी असली अपनी 
ये मुखौटा भी किसी पल तो उतारा करना
*
हर बार मिलते हैं बाहें पसारे 
इक दूजे की काटकर हम भुजाएं 

दोनों तरफ़ जीत के हैं ठहाके 
ग़मगीन हैं खोए बेटों की माएं
*
होंठ सी कर आदमी के बोलने देंगे नहीं 
बोलना तोतों को लेकिन खूब से सिखलाएंगे लोग
*
पहाड़ी मौसमों सा है बदलता रंग हर तेरा 
कभी इंकार चुटकी में कभी इकरार चुटकी में 

मनों में पड़ती खाई अरसे तक गहराती है पहले 
नहीं होती खड़ी आँगन में है दीवार चुटकी में

छठे दिन जैसे ही पता लगा कि प्रिंसिपल साहब गाँव से लौट आये हैं तो हम दोनों दौड़ते हुए उनके घर पहुँचे। मुझे आज भी याद है प्रिंसिपल साहब अपने घर के बरामदे में चारपाई पर बैठे खाना खा रहे थे। उनकी थाली में गरमागरम मक्की की रोटी रखी थी जिस पर मख़्खन तैर रहा था सामने कटोरी में दही रखा था। थाली में आम का आचार और प्याज़ के टुकड़ों के साथ हरी मिर्च भी रखी थी। ये सब देख कर हम उनके पास किस काम से आये थे ये ही भूल गए। रोटी, वो भी इस तरह थाली में, देखे हमें अरसा हो गया था। हैडमास्टर साहब बिना हमारी और देखे मज़े से खाये जा रहे थे और हमारी हालत उन कुत्तों जैसी हो रही थी जो खाना देख कर उसे खाने की बेसब्री में राल गिराते हैं और दुम हिलाते हैं। दिल में आया कि हे भगवान ये प्रिंसिपल साहब किसी तरह आधी नहीं तो इस रोटी का एक टुकड़ा ही हमें डाल दें। ये भी ख़्याल आया कि हैडमास्टर साहब को धक्का दे कर उनके सामने पड़ी थाली छीन के भाग जाएँ। किसी शायर का कतआ है कि "भूख इंसान को मज़बूर बना देती है , हद्दे तहज़ीब से कम्बख़्त निकल जाता है , शहर की आग में जलते हैं मकानात मगर , भूख की आग से ईमान भी जल जाता है "। हमने किसी तरह अपना ईमान बचाये रखा। प्रिंसिपल साहब ने आखिर डकार लेकर हमारी और देखा और बोले कि कल से स्कूल आकर ज्वाइन कर लो साथ ये भी कहा कि आपकी तनख़्वा शिमला से अप्रूवल आने के बाद ही दी जाएगी। जैसे ही ये बात गाँव में फैली, बनिए ने हमें थोड़ा बहुत राशन उधार में दे दिया। हमारी ख़ुशी कुछ ही दिन क़ायम रह पायी क्यूंकि शिमला से हमारे लिए अप्रूवल नहीं आया। हमने सोचा दर दर की ठोकरें खाने से अच्छा है कि घर ही चला जाय ,वहाँ जो होगा वो यहाँ जो हो रहा है उससे बुरा तो नहीं ही होगा और हम दोनों अपने अपने घरों को रवाना हो गए।    
घर वालों ने जब हमारी दास्तान सुनी तो कुछ नहीं कहा।  बड़े भाई साहब ने जबरदस्त डाँट पिलाई और ज़िन्दगी में कुछ बनने के लिए फिर से कॉलेज जा कर पढाई में ध्यान देने की सीख दी। आज मैं जो कुछ हूँ उसी सीख का नतीजा है ! 
   .
दिन बहुत हो गए हँसे जब भी 
खुद ही खुद को है गुदगुदी कर ली
*
आते जाते हैं फेंकता पत्ते 
पेड़ गुंडे सा छेड़ता है मुझे 

खींचता है कभी हटाता है 
वो रजाई सा ओढ़ता है मुझे 

गर है हिम्मत तो मुझ से हो के गुज़र 
पुल के जरिए क्यों लाँघता है मुझे
*
कचरा तमाम शहर की गलियों में भर गया
गंगा के तट की आज सफ़ाई हुई तो है 

पानी की बाल्टी लिए आए हैं किसलिए 
ये आग आपकी ही लगाई हुई तो है
*
हर बदरिया जा बरसती है चमकते शैल पर 
कौन हरियाली बिछाए धूल-मंडित देश में 

कुछ ही सैयादों ने है बस क़ैद कर रक्खा इन्हें 
सोने की चिड़ियां तो अब भी हैं हमारे देश में
*
मसला नहीं है हिंदू मुसलमान का यहां 
मसला है खुद को दोनों ने कट्टर बना लिया

पत्थर को देवता किया हमने तराश कर
तूने बुतों को तोड़ के पत्थर बना लिया

कुरुक्षेत्र लौट कर भौतिकी में बी.एस.सी. आनर्स किया फिर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से बी.एड के बाद एम.एड किया।सरकारी स्कूल में लम्बे अर्से तक बच्चों को गणित पढ़ाई और मुख्याध्यापक के पद से रिटायर हुआ। मुझे ख़ुशी है कि मेरे विद्यार्थी बहुत से सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं। एक बार मेरे विद्यार्थियों की परीक्षा का सेंटर किसी दूसरी स्कूल में आया जहाँ के अध्यापक अपने और दूसरे स्कूल के विद्यार्थियों को गणित के पेपर में खुले आम नक़ल करवा रहे थे। उन्होंने जब मेरे विद्यार्थियों को मदद की पेशकश की तो सभी ने एक स्वर से ठुकरा दिया और कहा कि हम पवनेंद्र गुप्ता जी के विद्यार्थी हैं हमें परीक्षा में किसी की मदद की जरुरत नहीं। ये बात जिले में आग की तरफ फैली और मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया। रिटायरमेंट के बाद मैंने गैर सरकारी स्कूलों में प्रधानाचार्य पद पर भी काम किया लेकिन वहां जब मुझे मेरे आदर्शों से समझौता करने को कहा गया तो मैंने वो पद छोड़ दिया। अब फुर्सत में साहित्य सृजन करता हूँ और जंगल की लम्बी सैर करते हुए आनंद उठाता हूँ। 

चाय का अंतिम घूँट भरते हुए पवन जी ने राजेश की और देख कर कहा 'मेरे संघर्ष की कहानी कोई अनोखी नहीं है राजेश भाई इसीलिए मैं किसी को ये कहानी सुनाता नहीं। मेरे जैसे पता नहीं कितने हैं जिन्होंने जीवन में मुझसे भी ज्यादा संघर्ष किया है और अभी तक कर रहे हैं।' राजेश ने हामी में सर हिलाते हुए कहा 'जी आप सही कह रहे हैं लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि एक कवि और शायर के जीवन में संघर्ष की ऐसी कहानी है। इतने मुश्किल हालात में आपने शायरी कब शुरू की ये भी बता दें'। 'शायरी ?' पवन जी हँसते हुए बोले 'ये भी बता देता हूँ. शायरी में मेरी दिलचस्पी मुझे जैसा मैंने पहले बताया मेरे मित्र प्रेम भारद्वाज के जरिये हुई। पहले मैं आम शायरों की तरह तुकबंदी किया करता था मेरी शायरी को निखारने में हिमाचल प्रदेश के जाने माने शायर स्वर्गीय सागर पालनपुरी जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।धर्मशाला बी.एड. कॉलेज में पढाई के दौरान मेरा सागर साहब से संपर्क हुआ था। मेरी शायरी में जो भी कुछ अच्छा है वो उन्हीं की बदौलत है वो उस दौर में अगर मेरी ऊँगली न थामते तो शायद मैं इस मुक़ाम पर न होता। जब तक सागर साहब रहे वो मुझे संभाले रहे बाद में उनके दो होनहार पुत्र जो आज देश के नामी शायर हैं 'द्विजेन्द्र द्विज' और 'नवनीत शर्मा' जी ने समय समय पर मेरा साथ दिया। मेरी हिंदी ग़ज़लों की किताब 'उसे दुःख धरा का सुनाना पहाड़ो ! में उन्होंने भूमिकाएं भी लिखी हैं। हिंदी के अलावा पहाड़ी में भी ग़ज़लें, मुक्तक और कवितायेँ लिखी हैं। दूरदर्शन जालंधर और शिमला से उनका प्रसारण भी हुआ है। कहानियाँ, लोक संस्कृति पर लेख और नाटक भी लिखे हैं। 

'कमाल है पवन जी मुझे तो आपकी इन खूबियों का पता ही नहीं था , मुझे आज इस बात की ख़ुशी है कि एक इतना बड़ा इंसान मुझे अपना मित्र मानता है' राजेश जी ने गदगद होते हुए कहा। पवन जी हँसते हुए राजेश जी से बोले 'इंसान बड़ा नहीं, अच्छा होना चाहिए राजेश बाबू ,अब चलो उठो घर भी जाना है।  

अपना हित था जब तक, धरती सबको मां थी मीठा अमृत 
खाड़ी तक जब आ पहुँची तो गंगा सबको लगती खारी

कोई ना कहता आओ बैठो, कोई ना सुनता माँ की बात 
ये घर जैसे घर न रह कर हो कोई दफ्तर सरकारी 

होठों पर आ पाए ताकि कभी ना आँखों देखी बात 
राज महल की हर माता को होना पड़ता है गाँधारी

खांसी आहें बलगम मांँ के देख बहुत चिंतित है बेटा बीवी, बच्चे, नौकर को भी लग ना जाए ये बीमारी
*
जिंदा रखा है अभी पुरखों को हमने 
अपने भीतर अब भी बंदर रह रहा है
*
कहाँ से आए हैं, क्यों आए हैं, कब जाएंगे हम 
नहीं खुलते हैं ये ताले हमारी तालियों से
*
मिला चिराग़ न घर के लिए कभी जिनको 
मरे तो होने लगे उनके मक़बरे रोशन
*
हाक़िमों से सवाल करता है 
यार तू भी कमाल करता है

नागपाशों से पड़ता है बंधना
धर्म कितना निढाल करता है
*
बड़े घर के हर एक अर्जुन के पीछे
कई एकलव्यों का इतिहास होगा 

उसे दु:ख धरा का सुनाना पहाड़ों !
की अम्बर तुम्हारे बहुत पास होगा








26 comments:

नीरज गोस्वामी said...

भाई साहब
किसी महान शायर का शेर है:
'ग़म-ए- हयात ने ऐसे हमें संभाल दिया
किसी ने दिल भी दुखाया तो हँस के टाल दिया।
पवनेंद्र 'पवन' जी के द्वारा आत्मकथ्यात्मक शैली में उनके जीवन संघर्षों को आपने जिस सहजता से उकेरा है मुझे बरबस ही ऊपर लिखे शेर का स्मरण हो आया।वाक़ई दुख आदमी को कैसा मांजता है संस्कारित करता है उसे देखना हो तो कोई आप द्वारा प्रस्तुत(समीक्षित नही) पुस्तक 'उसे दुख धरा का सुनाना पहाड़ो' को पढ़े।कितनी सहजता और वांग्मय के साथ पुस्तक की ग़ज़लें और शेर, ज़िन्दगी की पोथी के एक एक अध्याय का बयान करते हैं गोया किसी साफ़ पानी की नदी की तलहटी को देखा जा रहा है ।फिर उस पर आप जैसा कुशल प्रस्तोता हो जो पूरे घटनाक्रम पर सजग नज़र तो रखता है पर मज़ाल कि कहीं दिखाई दे जाय।सिर्फ़ शायर और उसके शेर ही पाठकों से बात करते हैं। ख़ैर! ये कारनामा तो अब आपकी स्थायी पहचान जैसा हो चला है।
फिर एक शानदार पुस्तक चयन और उससे हमे रूबरू कराने के लिए शुक्रिया। पवनेंद्र 'पवन'जी को बधाइयां।
सादर
अखिलेश तिवारी जयपुर

Ramesh Kanwal said...

आज भी एक अच्छे शायर से रूबरू कराया |

शुक्रिया | तेवर वही अंदाज़ वही

कचरा तमाम शहर की गलियों में भर गया
गंगा के तट की आज सफ़ाई हुई तो है

पानी की बाल्टी लिए आए हैं किसलिए
ये आग आपकी ही लगाई हुई तो है
*
मिला चिराग़ न घर के लिए कभी जिनको
मरे तो होने लगे उनके मक़बरे रोशन
*
हाक़िमों से सवाल करता है
यार तू भी कमाल करता है

नागपाशों से पड़ता है बंधना
धर्म कितना निढाल करता है
*

नीरज गोस्वामी said...

बहुत धन्यवाद रमेश जी...आपकी प्रतिक्रिया से हौंसला मिलता है

Onkar said...

शानदार

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद ओंकार जी

नीरज गोस्वामी said...

आपकी रची बसी दुनिया की सैर कराने के लिये हार्दिक आभार नीरज जी सर 💐💐🙏🙏

क्या यात्रा थी? क्या बताऊँ आपको?
अप्रतिम अद्भुत 🙏💐

विवेकपाल सिंह

SHAYAR AYUB KHAN "BISMIL" said...

नस्र और नज़्म दोनो बा कमाल
,दिल खुश हुआ पढ़कर

Unknown said...

आप ऐसे ही ये सब साझा करते रहें नीरज सर।बहुत अच्छा लगता है,सच में।

Unknown said...

कभी कभी लगता है, सुर्खरू होता है इंसा ठोकरे खाने के बाद... वाकई पवन जी की कहानी बहुत आहत कर देती है, । बहुत अच्छा तो नही लगा किसी का दुख सुनकर, मगर नीरज जी आपने जो लिखा, वो तारीफे काबिल है।

Anand Khare said...

कैसी कैसी ज़िन्दगी। कितना कठिन सफर। जब ये सब पढ़ता हूँ तो लगने लगता है कि मैं कुछ भी नहीं। सारा अभिमान अहंकार चूर चूर हो जाता है। बहुत बढ़िया लेख। बहुत अच्छे शायर और शायरी।

नीरज गोस्वामी said...

शुक्रिया आनंद भाई...🙏

नीरज गोस्वामी said...

जी शुक्रिया... आपका नाम पता नहीं लग पाया

नीरज गोस्वामी said...

जी धन्यवाद...

नीरज गोस्वामी said...

शुक्रिया बिस्मिल भाई

Mumukshh Ki Rachanain said...

इंसान बड़ा नहीं, अच्छा होना चाहिए राजेश बाबू....
आपने एक जुझारू और अच्छे इंसान की कहानी बता आँखे नम कर दी।
पवनेंद्र जी को सादर नमन
आपका भी आभार एक ऐसे बड़े और अच्छे शायर से रूबरू हेतु।

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद चंद्र मोहन जी ...

Simran Sharma said...

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How do we know said...

bahut achha laga inhe padh kar

नीरज गोस्वामी said...

आपकी अध्ययनशीलता को नमन। आप की समीक्षा शैली बहुत ही रोचक होती है। पढ़ने लगो तो पढ़ते चले जाओ। माही संदेश पत्रिका में भी आपकी समीक्षाएँ पढ़ता रहता हूँ। अशआरों का आपका चयन भी क़माल का है।
लाज़वाब 👌👌💐🌹💖💕

नरेश शांडिल्य

Krishna Kumar Naaz said...

आदरणीय भाईसाहब नीरज गोस्वामी जी प्रणाम
आप किसी रचनाकार को सिर्फ़ पढ़ते नहीं, बल्कि भावों की गहराई में जाकर उसके जीवन के ताने-बाने को महसूस करते हैं। आपकी लेखन शैली बहुत रोचक होती है। आपने आदरणीय पवनेन्द्र पवन जी की समीक्षा बहुत सुंदरता के साथ की है। शेरों का चुनाव भी बहुत सुंदर है-

नहीं है पेड़ पत्थर जीव जो बहते हैं दरिया में
बहाई जा रही है टुकड़ा टुकड़ा लाश पर्वत की

दो क़दम चल कर ही थक कर हाँफने लगते हैं लोग
किस ने इन पर लाद दी इनसे भी भारी ज़िंदगी

एक बार फिर आपको और आपकी लेखनी को नमन।
डॉ. कृष्णकुमार 'नाज़', मुरादाबाद

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद नाज़ साहब

Manisha Goswami said...

सर आपके इस लेख की जितनी तारीफ की जाए कम है सच में लेख को पढ़ते वक्त सारे दृश्य आंखों के सामने नाच रहें थे! सर आप बहुत ही अच्छा लिखते हो सच में बहुत ही बेहतरीन लेख👍👍👍👍👍👍
हमारे ब्लॉग पर भी आइएगा आपका स्वागत है🙏🙏

नीरज गोस्वामी said...

धन्यवाद मनीषा जी...

Unknown said...

नीरज जी , बड़े ही ह्र्दयतल से आपका धन्यवाद करता हूँ आपने तो मुझ जैसे नौसिखिए को इतने गुणीजनों की ज़िंदगी के तजुर्बों से रूबरू करवा दिया । पवनेंद्र पवन जी को पढ़ने की जिज्ञासा मन में उत्पन्न हो गई है । और क़माल तो ये है कि ऐसे ऐसे धुरन्धर शायरों के कमैंट्स पढ़ने को मिल रहे हैं की पढ़ कर मज़ा आ जाता है , मैं अपने को भाग्यशाली महसूस कर रहा हूँ कि मेरा आपसे सम्पर्क हुआ । पवनेंद्र जी से फ़ोन पर अवश्य बात करूंगा । ऐसे सुंदर लेख के लिए आपको तहे दिल से बधाई व शुभकामनाएं ।

नीरज गोस्वामी said...

किताबों की दुनिया231
"उसे दुख धरा का सुनाना पहाड़ों को"शायर जनाब पवनेंद्र'पवन'जी दिल मुबारकबाद मैं अपनी बात पवन जी के इस शेर से करता हूं"पत्थर को देवता किया हमने तराश कर
तुने बुतों को तोड कर पत्थर बना लिया"
पवन जी को पढ़ने के बाद मैं एक बात कह देता हूं जो चीज़ दुश्वारियों के साये से निकली होती है यकीनन पुख़्ता होती है। पवन जी और संघर्ष एक तरह से पर्यायवाची शब्द हैं
नीरज गोस्वामी जी ने अपने ब्लॉग"तुझको रखे राम तुझ को अल्लाह रक्खे
दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रक्खे"की मार्फ़त लेखन को चार चांद लगा दिए हैं मुबारकबाद है नीरज गोस्वामी जी के बैनर के ज़ेरे साया जो शायर /शाइरा आ जाता है वो फिर मकबूलियत की ज़ामिन हो जाता है जैसे किसी ज़माने में आर के स्टुडियोज और यश चोपड़ा बैनर के तले जो भी फिल्म आएगी,हिट होगी यही ख़ासियत नीरज गोस्वामी जी के ब्लॉग की है। मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा कि मुझे सच कहना अच्छा लगता है। इन्हीं शब्दों अपनी वाणी को विराम देता हूं और दोनों मायानाज़ शख़िसयात को नमन। किताब का टाइटल और नाम दोनों ही खूबसूरत है। तख़लीक़ करते वक्त कुछ ख़ामिया ज़ेरे नज़र होंगी,छोटा भाई समझ कर नज़र अंदाज़ कर देना। शुक्रिया

सागर सियालकोटी

राकेश गुप्ता , नागपुर said...

कमाल है ! ,इतनी रवानी है आपके अंदाजेबयां में कि एक साँस में पूरी रचना पढे बिना रहा नहीं जाता ।