Monday, June 4, 2018

किताबों की दुनिया - 180

फिर इस दुनिया से उम्मीद-ए-वफ़ा है 
तुझे ऐ ज़िन्दगी क्या हो गया है 

बड़ी ज़ालिम निहायत बे-वफ़ा है 
यह दुनिया फिर भी कितनी खुशनुमा है 

हर इक अपने ही ग़म में मुब्तिला है 
किसी के दर्द से कौन आशना है 

बात 1969 की है ,20 मई का एक गर्म दिन ,दिल्ली में यमुना के किनारे लोगों की भीड़ लगी थी क्यूंकि एक लाश बहती हुई किनारे आ लगी थी। तब यमुना में पानी हुआ करता था ,कचरा नहीं , वो भी गर्मियों के दिनों में। लोग डुबकियां लगा लगा कर नहाया करते थे. किनारे खड़े लोग अधिकतर वही होंगे जो गर्मी से निज़ात पाने को नहाने आये होंगे और किनारे पर लाश देख कर शोर मचा दिया होगा। हम भारतीय पैदाइशी तमाशबीन हैं कोई हादसा हो या उत्सव कहीं झगड़ा हो या प्यार, फ़ौरन सब काम छोड़छाड़ कर उसे देखने खड़े हो जाते हैं. किसी ने पुलिस को खबर कर दी क्यूंकि उस वक्त मोबाईल तो होता नहीं था इसलिए शायद कहीं फोन करने की सुविधा तलाश की होगी या किसी और प्रकार से बताया होगा । अच्छे लोग हुआ करते थे उन दिनों क्यूंकि उनके पास ये सब करने की फुर्सत हुआ करती थी। अब किसी के पास फुर्सत कहाँ ?अब तो हम सड़क पर किसी को तड़पता देख बगल से गुज़र जाने का हुनर सीख गए हैं ,कौन रुके ? कौन पुलिस को बताये ? कौन झंझट में पड़े ? छोडो जी, चलो -देर हो रही है। ऐसा नहीं है कि अच्छे लोग अब नहीं हैं -हैं -जरूर हैं लेकिन पहले वो बहुतायत में थे अब वो लुप्तप्राय: प्राणियों की श्रेणी में आ गए हैं।

तू ऐ निगाह-ए-नाज़ कहाँ ले गयी मुझे 
मेरी नज़र भी अब नहीं पहचानती मुझे 

इस दिल-शकस्तगी में भी यह मेरा बांकपन 
हैरत से देखती है मेरी ज़िन्दगी मुझे 
दिल-शकस्तगी=घायल मन 

कुछ ऐसा खो गया हूँ तेरी जलवा-गाह में 
महसूस हो रही है खुद अपनी कमी मुझे 

खैर साहब पुलिस आयी-शायद कुछ देर से, क्यूंकि जैसा कि हमने उस दौर की फिल्मों में देखा है पुलिस वाले सीटियां बजाते तब आते थे जब हीरो विलेन की धुलाई कर चुका होता था. पुलिस वाले जैसा वो आमतौर पर करते हैं लाश को थाने ले गए। पोस्ट मार्टम करवाया, जिस्म पर कोई घाव नहीं मिला और दिल, ज़हन पर पड़े घाव पोस्टमार्टम में नज़र आते नहीं इसलिए इसे सीधासादा आत्महत्या का मामला समझ कर फ़ाइल बंद कर दी। पोस्टमार्टम से ये जरूर पता चला कि लाश के पेट में शराब भरी थी और शायद इसीलिए लिवर सिरोसिस की बीमारी से पीड़ित था। ये भी नज़र में आया कि लाश को कभी फालिज का दौरा भी पड़ा था। बस। हक़ीक़त ये है कि ये आत्महत्या का नहीं सौ फीसदी हत्या का मामला था और हत्या का ज़िम्मेदार कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि व्यक्तियों का वो समूह था जिसे हम आम तौर पर समाज के नाम से जानते हैं। समाज पर चाहे वो कहीं का कोई भी हो कभी हत्या का इल्ज़ाम नहीं लगता। कौन लगाएगा इल्ज़ाम ? लगाने वाले भी तो उसी का हिस्सा होते हैं।

काँटों से मैंने प्यार किया है कभी कभी 
फूलों को शर्मसार किया है कभी कभी 

अल्लाह रे बे-खुदी कि तेरे पास बैठ कर 
तेरा ही इंतज़ार किया है कभी कभी 

इतना तो असर है कि मेरे इज़्तिराब ने 
उनको भी बेकरार किया है कभी कभी 
इज़्तिराब=बेचैनी 

कौन था ये शख्स जो सिर्फ 42 साल की कम उम्र में यमुना में कूद कर अपनी ज़िन्दगी से किनारा कर गया ? और क्यों ? इसका जवाब पाने के लिए हमें फ्लैश बैक तकनीक का सहारा लेना पड़ेगा। तो चलते हैं जालंधर से लगभग 37 किलोमीटर दूर रेत के टीबों को पार कर एक कच्चे रस्ते पर जो हमें 'नकोदर' नाम के छोटे से कस्बे के अधबने मकान में ले जायेगा। इस मकान में "नोहरा राम" अपने परिवार के साथ रहते हैं। इस कच्चे अधूरे से मकान की हालत देख कर से हमें नोहरा राम जी की माली हालत समझने में ज्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़ता। कस्बे में नोहरा राम जी 'दर्द' नकोदरी के नाम से जाने जाते हैं। ये इसी कस्बे से निकलने वाले एक अखबार में मुलाज़िम हैं जो वहां के राजा महाराजाओं की तारीफ़ में लिखे कसीदे छापने के लिए मशहूर है। वैसे यहाँ ये बताना भी मुनासिब होगा कि ऐसा नेक काम आज के दौर में भी बहुत से अखबार रिसाले वाले बेशर्मी से करते हैं। 'दर्द' साहब अपना थोड़ा दर्द तो शायरी के माध्यम से और बहुतेरा दर्द शराब के माध्यम से दूर करते थे। आज 11 दिसंबर 1927 की दोपहरी में शराब नोशी करते हुए किसी को कह रहे हैं कि जाओ मेरे उस्ताद-ए-मोहतरम हज़रत जोश मलसियानी साहब को खबर कर दो की ईश्वर की कृपा से मेरे घर बेटा हुआ है।

चल तो पड़े हो राह को हमवार देख कर 
लेकिन ये राह-ए-शौक़ है , सरकार देख कर 
हमवार=समतल 

जैसे मेरी निगाह ने देखा न हो कभी 
महसूस ये हुआ तुझे हर बार देख कर 

ऐ अज़मत-ऐ-बशर मैं तेरा राज़दार हूँ 
पहचान ले मुझे मेरे अश'आर देख कर 
अज़मत-ऐ-बशर=मानव की महानता 

कहते हैं बच्चे की पहली पाठशाला घर होती है, सही कहते हैं। इस बच्चे ने जिसका नाम नरेश रखा गया था पांचवी क्लास तक आते आते ग़ज़ल कहना शुरू कर दिया था - ये बात सुनने में अजीब लगती हो लेकिन सच है। वो अपने शेर अपने पिता को दिखाने लगे। पिता ने उनका नामकरण "शाद नकोदरी" रख दिया। पिता के कहने पर वो अपना कलाम पत्राचार के माध्यम से रावलपिंडी में में बसे जनाब त्रिलोक चंद 'महरूम' साहब को दिखाने लगे. महरूम साहब उनकी शायरी के मयार को देखते हुए पहले तो उन्हें कोई बड़ा उस्ताद शायर ही समझते रहे और इस्लाह करते रहे बाद में उन्होंने शाद साहब को अपना कलाम जनाब जोश मलसियानी साहब को दिखाने की गुज़ारिश की। इस तरह पिता पुत्र दोनों गुरु भाई भी हो गए।

ज़िस्म साकित, रूह मुज़तर, आँख हैराँ, दिल उदास 
ज़िन्दगी का मज़हका है, ये हमारी ज़िन्दगी 
साकित=गतिहीन , रूह मुज़तर=बैचैन आत्मा ,मज़हका=मज़ाक 

ले के शबनम का मुकद्दर आये थे दुनिया में हम 
गुलशन-ऐ-हस्ती में रो-रो कर गुज़ारी ज़िन्दगी 

ज़िन्दगी को मौत कह देना उसे मुश्किल नहीं 
गौर से देखे अगर कोई हमारी ज़िन्दगी 

जोश साहब की रहनुमाई में शाद की शायरी परवान चढ़ने लगी और उन्होंने अब अपनी शायरी नरेश कुमार 'शाद' के नाम से करनी शुरू कर दी। आज हम उनकी चुनिंदा ग़ज़लों से सजी किताब "शाद की शायरी " की बात करेंगे जिसे जनाब 'अमर' देहलवी ने संकलित किया है और स्टार पब्लिकेशन (प्रा) लि ने सं 1984 में प्रकाशित किया था। इस किताब में शाद साहब की लगभग 70 ग़ज़लें उर्दू और हिंदी लिपि में मुद्रित हैं। मैं यकीन से नहीं कह सकता कि अब ये किताब वहां से उपलब्ब्ध हो सकेगी या नहीं। शाद का लिखा हिंदी में शायद डायमंड बुक्स वालों ने शाद और अख्तर शिरानी की शायरी के नाम से प्रकाशित किया था। जो उर्दू पढ़ना जानते हैं उनके लिए तो शाद की ढेरों किताबें बाजार में हैं लेकिन हिंदी वालों के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं है । चलिए लौटते हैं वापस इसी किताब पर जो मुझे जयपुर शहर के अज़ीम शायर और उर्दू साहित्य पर अधिकार रखने वाले मेरे मित्र जनाब मनोज मित्तल 'कैफ़' साहब की बदौलत मिली :


होंठों की मुस्कान में ढलके
ग़म आया है भेस बदल के

देख के तुझको सोई आशा
जाग उठी है आँखें मल के

तेरे प्यार भरे नयनों में
आंसू हैं या शेर ग़ज़ल के 

मन में तेरे प्रेम की यादें 
आग में छीटें अमृत जल के 

लाहौर से मेट्रिक में फर्स्ट डिवीजन पाने के बाद घर लौटने पर , घर की बदहाली और पिता की शराब खोरी ने शाद को बेहद परेशान कर दिया और वो कर नौकरी की तलाश में रावलपिंडी और जालंधर जा कर धक्के खाते रहे लेकिन लिखते रहे। सरकारी नौकरी लगी तो सही लेकिन उसमें मन नहीं लगा लिहाज़ा उसे छोड़ छाड़ कर लाहौर लौट आये और वहां की एक मासिक पत्रिका 'शालीमार' का संपादन करने लगे। वहां रोज़ाना शाया होने वाली अख़बारों प्रताप और अजीत में होने वाले तरही मुशायरों में अपनी ग़ज़लें भेज वाह वाही लूटने लगे। सब कुछ थोड़ा ठीकठाक सा चल रहा था कि मुल्क का बंटवारा हो गया। उसके बाद जो हुआ वो शाद के लिए अकल्पनीय था। धर्म के नाम पर हिंसा के ऐसे तांडव की भला किसने कल्पना की होगी ? शाद का विश्वास पंडित मौलवियों पर से उठ गया। मन में गहरे घाव लिए वो एक अजनबी की तरह पाकिस्तान से हिंदुस्तान के शहर कानपुर अपने दोस्त हफ़ीज़ होशियारपुरी के पास आ गए। ये मुल्क अब वैसा नहीं था जैसा वो छोड़ कर गए थे। दोनों मित्रों ने मिल कर एक पत्रिका 'चन्दन' निकाली जो जल्द ही बंद हो गयी और शाद पर फिर से फ़ाकाकशी की नौबत आ गयी।

मेरे ग़म को भी दिलावेज़ बना देता है 
तेरी आँखों से मेरे ग़म का नुमायाँ होना 

क्यों न प्यार आये उसे अपनी परेशानी पर 
सीख ले जो तेरी ज़ुल्फ़ों से परेशां होना 

ये तो मुमकिन है किसी रोज खुदा बन जाए 
गैर मुमकिन है मगर शेख का इंसां होना 

खैर इसी मुश्किल दौर में उनकी मोहब्बत भी परवान चढ़ी तो कई नए दोस्त भी बने नए तजुर्बात भी हुए और तो और उनकी शादी भी हो गयी। शादी के बाद जीवन जीने की जद्दोज़ेहद बढ़ गयी। शराबी बाप, बूढी बीमार माँ और पत्नी। बाप की मयनोशी की आदत ने घर जैसे तबाह सा कर डाला। तभी उनकी मुलाकात उर्दू के नामवर शायर 'मज़ाज़' से हुई और उसके बाद उनका जो शराब से याराना हुआ वो उनकी मौत के बाद ही छूटा।

हम अपने दर्द की तौहीन कर गए होते 
अगर शराब न होती तो मर गए होते 

कहाँ निशात-ए-ग़म-ए-जाविदां हमें मिलती 
तेरी नज़र से जो बचकर गुज़र गए होते 
निशात-ए-ग़म-ए-जाविदां=अमिट ग़म की ख़ुशी 

हमारा राज़-ए-मोहब्बत तो खैर छुप जाता 
तेरी नज़र के फ़साने किधर गए होते 

हमें निगाह-ए-तमसखुर से देखने वालो 
ये हादसात जो तुम पर गुज़र गए होते ? 
निगाह-ए-तमसखुर=उपेक्षित नज़र 

शाद ने खूब लिखा। वो एक बार जो ग़ज़ल लिखना शुरू करते तो तो उसे मतले से मक़्ते तक पूरा कर के ही उठते।अगर नस्र की बात करें तो उनकी ढेरों किताबें उर्दू में उपलब्ध है जैसे :सुर्ख हाशिये, राख तले, सिर्क़ा और तावारुद, डार्लिंग, जान पहचान, मुताला-ए-ग़ालिब और उसकी शायरी ,पांच मक़बूल शायर और उनकी शायरी ,पांच मक़बूल तंज़ व मिज़ाह निगार. बाल साहित्य: शाम नगर में सिनेमा आया ,चीनी बुलबुल और समुन्द्री शहज़ादी. मुशायरों में भी उनकी भागेदारी होने लगी लेकिन इस सब से घर चलना मुमकिन नहीं हो पा रहा था. जिस पर भरोसा किया उसी ने धोका दिया। जिस से मदद की गुहार की उसी ने दुत्कार दिया।

जब बेखुदी से होश का याराना हो गया 
दैरो-ओ-हरम का नाम भी मयखाना हो गया 
दैरो-ओ-हरम=मंदिर-मस्जिद 

इन गुलरुखों को जब से हुआ शौक़-ऐ-मयकशी 
जो फूल था चमन में वो पैमाना हो गया 
गुलरुखों=फूल से चेहरे वालों 

ये रौनकें कहाँ मेरे दिल को नसीब थीं 
आबाद तेरे ग़म से ये काशाना हो गया 
काशाना=झोंपड़ी 

 दिल्ली में रहते हुए उनकी मुलाकात जनाब महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' साहब से हुई जिन्होंने उन्हें सरकारी प्रकाशन विभाग में नौकरी पर लगा दिया। सरकारी नौकरी बिना चापलूसी के चलनी मुश्किल लगने लगी। तनख्वाह भी कुछ ऐसी नहीं थी कि गुज़र बसर सही ढंग से हो पाता। सारी दुनिया में उन्हें सिर्फ शराब ही एक मात्र सहारा लगती। धीरे धीरे यूँ हुआ कि शराब उन्हें पीने लगी और वो एक दिन फालिज के ऐसे शिकार हुए कि सात दिनों तक बेहोश रहे। बीमारी और उसके इलाज़ के खर्चे ने उनकी कमर तोड़ दी ,लिहाज़ा वो दूसरे ऐसे शायरों के लिए लिखने लगे जिनमें खुद लिखने की कुव्वत नहीं थी लेकिन उनके पास पैसा था। एक जनाब ने तो उन्हें अपने लिए 60 ग़ज़लें लिखने की एवज़ में 60 रु देने का वादा किया तो उन्होंने पूरी रात जग कर 60 ग़ज़लें लिख डालीं ,क्यों की 60 रु से उनके घर का खर्चा किसी तरह एक महीने चल जाता। उन हज़रात ने वो ग़ज़लें तो ले लीं लेकिन बाद में पैसा देने के नाम पर मुकर गए। अजनबी तो अजनबी उनके दोस्तों ने भी उनके हुनर को खरीदा। अपनी अना बेचने के बाद भी उनके हाथ खाली ही रहे।

दुश्मनों ने तो दुश्मनी की है 
दोस्तों ने भी क्या कमी की है 

जिसने पैदा किये हंसी उसने 
क्या दिलावेज़ शायरी की है 
दिलावेज़= मनभावन 

आपसे यूँ तो और भी होंगे 
आपकी बात आप ही की है 

लोग लोगों का खून पीते हैं 
हमने तो सिर्फ़ मयकशी की है 

मुश्किलें जितनी बढ़ती गयीं उनके लेखन की रफ़्तार भी उसी के साथ बढ़ती रही ग़ज़लों के अलावा उनके लिखे कत'आत उर्दू शायरी में बहुत ऊंचा मुकाम रखते हैं। शाद मुशायरों के भी शायर रहे ,शराब के नशे में धुत्त उन्हें लोग उठा कर लाते वो कलाम पढ़ते और फिर लोग उन्हें उठा कर ले जाते। उन्हें शायद ही कभी किसी ने होश में देखा होगा। जिस तरह किसी ने भी एल्युमीनियम धातु को नहीं देखा है जिसे हम एल्युमीनियम कहते हैं दरअसल वो एल्युमीनियम पर चढ़ी एल्युमीनियम ऑक्साइड की परत होती है उसी तरह शाद साहब को भी किसी ने पूरा नहीं देखा उन पर कभी दुःख की तो कभी शराब की परत चढ़ी मिलती।

यही सीखा है मैंने ज़िन्दगी से
कि नादानी है बेहतर आगही से
आगही=ज्ञान

बता दो आबिदान-ऐ-बे-अमल को
खुदा उकता चुका है बंदगी से 
आबिदान-ऐ-बे-अमल =दिखावे की इबादत करने वाले 

खुदा से क्या मुहब्बत कर सकेगा 
जिसे नफरत है उसके आदमी से 

शाद जिनकी पहली किताब 'दस्तक़' तब मंज़र-ए-आम पर आयी जब वो सिर्फ 22 साल के थे।'दस्तक' ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों पे जा बिठाया। उसके बाद तो उनके 'बुतकदा','फरियाद' , 'ललकार', 'आहटें', 'क़ाशें', 'आयाते जुनूं', 'फुवार', 'संगम', 'मेरा मुन्तखिब कलाम', 'मेरा कलाम नौ ब नौ' और 'विजदान' मजमूओं ने उन्हें उर्दू लेखकों की पहली कतार में जा बिठाया। जिसकी शायरी की तारीफ जोश मलीहाबादी , फ़िराक़ गोरखपुरी और साहिर लुधियानवी जैसे शायरों ने खुले दिल से की उसी शायर की शायरी की चमक को शराब और उनके हलके शेरों पर मुशायरों में बजने वाली तालियों ने धीरे धीरे धुंधला कर दिया,अगर ऐसा न होता तो वो आज उर्दू के अमर शायरों की जमात में खड़े नज़र आते।

दिल-ए-पुर आरज़ू नाकाम हो कर 
ज्यादा खूबसूरत हो गया है 
दिल-ए-पुर आरज़ू =अभिलाषाओं से भरा मन 

करम ऐसे किये हैं दोस्तों ने 
कि हर दुश्मन पे प्यार आने लगा है 

जब आये तो उजाला हो गया था 
गए तो फिर वही घर की फ़ज़ा है 

आखिर वही हुआ जिसका डर था , शराब जीत गयी और नरेश कुमार शाद हार गए। शराब छोड़ देने की तमाम कोशिशें भी नाकाम हो गयीं। सिरोसिस ऑफ लिवर की बीमारी ने रही सही कसर पूरी कर दी। मुकम्मल इलाज़ के लिए पैसे नहीं होने से बीमारी बढ़ती गयी और एक दिन इस बीमारी से लड़ने की बजाये वो ज़िन्दगी की जंग हारने के इरादे से यमुना के पुल से कूद गए। सिर्फ वो अपने उपनाम में ही शाद (प्रसन्न ) रहे वैसे सारी उम्र नाशाद (उदास ) रहे। उनकी मौत के बाद तो उनकी याद में बहुत से कार्यक्रम देश में ही नहीं विदेश में भी होते हैं। हम लोग हैं ही ऐसे ज़िंदा लोगों को दुत्कारते हैं और मुर्दा लोगों के गले में हार डालते हैं। खैर शायद ये सब ही उनकी किस्मत में लिखा था सोच कर इस किस्से को यहीं विराम देते हैं और नयी किताब की तलाश के लिए निकलने से पहले पढ़वाते हैं उनके कुछ फुटकर शेर :

हक़ उसी को है मुस्कुराने का 
जिसके दिल में है ग़म ज़माने का 
*** 
चौंक उठे हादसात दुनिया के
मेरे होंठों पे जब हंसी आयी 
हादसात=दुर्घटनाएं 
*** 
सीने में दिल नहीं कोई नासूर है 
मगर मैं फिर भी जी रहा हूँ ये मेरा कमाल है 
*** 
इन ज़ाहिदों का ज़ोहद तकाज़ा है उम्र का
वरना ये हम से कम तो नहीं थे शबाब में 
 ज़ाहिदों=भक्तों , ज़ोहद= भक्ति 
*** 
तुम तो मिल जाओगे कहीं न कहीं 
हम मेरी जान ! फिर कहाँ होंगे
*** 
जैसे मेरी निगाह ने देखा न हो कभी
महसूस ये हुआ तुझे हर बार देख कर
*** 
शेख साहब का बस नहीं चलता 
वरना परवर दिगार हो जाएँ 
*** 
पीता हूँ इस ग़रज़ से कि जीना है चार दिन
मरने के इंतज़ार ने पीना सिखा दिया 
*** 
हमने समां लिया है तुझे सांस सांस में 
ये और बात है कि तुझे आगही नहीं
आगही =ज्ञान

16 comments:

MAHI said...

उफ़्फ़ शायरों को कैसे कैसे दिन देखने पड़ते हैं

लेकिन आपने एक शानदार शायर का चुनाव किया है और रूबरू कराया है ।

बेहतरीन शायरी पढ़ने देने के लिए आपको साधुवाद आदरणीय नीरज गोस्वामी जी ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-06-2018) को "हो जाता मजबूर" (चर्चा अंक-2992) (चर्चा अंक-2985) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Unknown said...

इस बार की पोस्ट का पहला शे'र पढ़ते ही याद आ गया कि ये पोस्ट नामवर शायर नरेश कुमार शाद के बारे में है और इसी के साथ ज़ेह्न माज़ी की यादों में खो गया कि हम लोग किस शानो-शौकत से उनके साथ एक दोस्त की शादी में शरीक हुए थे। तब नाचीज़ 'जमाल' क़ाइमी के नाम से लिखता था और उस दोस्त की शादी के मुबारक मौक़े पर दूल्हा-दुल्हन की शान में सेहरा भी पेश किया था। आज बरसों बाद आपकी पोस्ट ने उन ख़्वाबीदा यादों को नागहाँ जगा दिया। शाद भाई के साथ गुज़रे खुशगवार लम्हे रूबरू आ गये।

आपने बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज़ से उनका तआरुफ़ कराया है और उनके दिलकश अश्आर की जानकारी भी दी है। साधुवाद.....

'अमर' देहलवी साहिब की मेह्नत को सलाम जिन्होंने शाद साहिब के कलाम को यकजा करके अदब की ख़िदमत की है।

'शाद' साहिब के इस शे'र के साथ.....

आप-से यूँ तो और भी होंगे
आपकी बात आप ही की है

--'दरवेश' भारती। मो. 9268798930.

Unknown said...

विभाजन के कारण शाद साहब का विश्वास पंडित, मौलवियों पर से उठ गया ? ये जुमला समझ में नहीं आया। मौलवी ने तो बंटवारा माँगा और पूज्य मातृभूमि के अंग्रेज़ों और कोंग्रेसियों की मदद से टुकड़े करवा लिए। पंडित ने विभाजन में क्या किया ? हिंदुओं को क्यों लतियाया जा रहा है ? क्या कोंग्रेस जॉइन कर ली है ? सच बोलने से पहले उसे हिन्दू-मुसलमान के बराबरी के टुकड़े करके ख़ुद को सच के पक्ष में खड़े होने की जगह स्वयं को झुटा तटस्थ दिखाना ज़ुरूरी है ?

SATISH said...

Neeraj Sahib...bahut maza aaya...alfaaz hee nahee ki kuchh kahoon."Shaad" Sb ki shayari aur aapka andaaz e bayaan dono men kante ki takkar hai... Raqeeb

तिलक राज कपूर said...

"अल्लाह रे बेखुदी" में "रे" extra आ गया है।

आनन्द पाठक said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति है गोस्वामी जी-बधाई आप को ।
शाद की शायरी का एक संकलन मेरे पास भी है
मैं भी उनकी गजलों की मुरीद हूँ एक अच्छे शायर थे

SagarSialkoti said...

नमस्कार आज नरेश कुमार शाद के बारे मे पढा अच्छा लगा आप की मुहबबतो को सलाम मुबारकबाद

नीरज गोस्वामी said...

प्रभु किताब मे भी रे है और रेख्ता मे भी रे ही दिया है...अब मैं क्या करुं...🤔

Shivna Prakashan said...

तिलक जी वहाँ पर उच्चारण अल्लह रे है, मतलब अल्लाह को 22 के वज़न पर बाँधा है 221 पर नहीं। हालाँकि यह प्रयोग बहुत कम किया गया है लेकिन मिलता है। अल्लह रे बे-खुदी कि तेरे पास बैठ कर 221 2121 1221 212

नीरज गोस्वामी said...

जय हो गुरूदेव...

Unknown said...

क्यों न प्यार आये उसे अपनी परेशानी पर
सीख ले जो तेरी ज़ुल्फ़ों से परेशां होना ..........बहुत ही उम्दा है सर

Amit Thapa said...

नरेश कुमार 'शाद' का नाम पहले सुना तो था और शायद उनका इक्का दुक्का शेर पढ़ा तो था पर उनके विषय में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। आज नीरज जी के ब्लॉग पर पढ़ कर उनके बारे में और ज्यादा जानकारी प्राप्त हुई।

पता नहीं क्यों ऐसा है की शायरों को शराब से इतनी मोहब्बत होती है चाहे मजाज हो या जिगर मुरादाबादी या फिर खुद शाद साहब। गर शाद साहब को शराबखोरी की लत मजाज से लगी थी तो शायद ही ये उनसे छूट पाती।

मज़ाज के बारे एक किस्सा मशहूर है

मजाज़ लखनवी बहुत पीने लगे थे। एक दिन उनके दोस्त जोश मलीहाबादी ने कहा, “मजाज़ तुम घड़ी रखकर पिया करो, ताकि वक़्त का अन्दाज़ा रहे।” छूटते ही मजाज़ ने कहा, “अमां हम घड़ी नहीं घड़ा रखकर पीने वालों में से हैं।”

खैर अब बात करते है शाद साहब की जिनकी पहली किताब २२ साल की उम्र में शाया हुई थी और ४२ की छोटी उम्र में वो दुनिया-फानी से कूच कर गए पर इस दुनिया में मुझ जैसे पढ़ने वालों के लिए बहुत कुछ छोड़ गये।

ज्यादातर मैं जब भी टिप्पणी लिखता हूँ तो शायर की गजलों और शेरों को मद्देनज़र रख कर करता हूँ पर आज मेरा मन इस बात से विचलित है की हम अपने यहाँ के साहित्य के पुरोधाओं को यूँ ही मरने के लिए छोड़ देते है

बाबा नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है जो उन्होंने निराला के लिए लिखी थी

बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।

मरने के बाद किसी की मूर्ति लगवा दो या फिर उसके नाम पे कोई सम्मान देना शुरू कर दो पर जीते जी उसे कुछ मत दो ये ही शायद इन साहित्य के पुजारियों की नियति है।

ऐसे कितने ही नाम मुझे याद आते है चाहे वो मज़ाज हो या दुष्यंत हो या फिर खुद शाद साहब जो बहुत कम उम्र में दुनिया छोड़ गए पर काम बहुत बड़े कर गए।

शाद साहब की शेरों शायरी और गजलों की तारीफ मैं क्या करू जब की उन्हें बड़े बड़े शायरों ने नवाज़ दिया है।

Unknown said...

Uncle ji kya baat aajkl neeraj musafir ke blog pe nhi aate

mgtapish said...

Bojhal kar Gaya is baar ka lekh lekin Sach to Sach hi Hai
Naman

Surinder Singh said...

Well said...