Monday, January 22, 2018

किताबों की दुनिया -161

माफ़ कर दो जो ख़ता मुझसे हुई है अब तक 
क्या ज़रूरी है उसे हर्फ़े बयानी कह दूँ 

ये ख़ता मुझसे हुई उसको जो चाहा मैंने 
जो ख़ता उसने करी वो मेहरबानी कह दूँ 

ये सबब है मेरे जीने का तो बरसों 'सागर' 
आज उन यादों को कैसे मैं पुरानी कह दूँ 

शायद आपको पता होगा कि आज़ादी से पहले उर्दू सरकारी जुबां हुआ करती थी ,सारे सरकारी फ़रमान उर्दू में आया करते थे ,अदालत की जुबां तो बरसों तक उर्दू रही। सिनेमा के गाने और संवाद ख़ालिस उर्दू में लिखे जाते थे हर मजहब के लोग उर्दू बोलते समझते थे। देश के अधिकतर अख़बार और रिसाले या तो उर्दू में छपते थे या अंग्रेजी में ,लेकिन जब से किसी साज़िश के तहत इस शीरीं ज़बान को एक खास मजहब के साथ जोड़ दिया गया तब से इस ज़बान को ज़बरदस्त नुक़सान हुआ और ये हाशिये पर चली गयी । अब फिर से इसे पटरी पर लाने के लिए सेमिनार आयोजित किये जा रहे हैं जश्न मनाये जा रहे हैं ,मुझे नहीं पता कि इस से उर्दू को फायदा हो रहा है या संयोजकों को।

इक उम्र गुज़ारी थी बस हमने अज़ाबों में 
मैं पढता रहा जीवन को यूँ ही किताबों में 

जीने का सलीका तो अहबाब सीखा देंगे 
इज़हार मुहब्बत का मिलता है गुलाबों में 

चुप चाप करो ख़िदमत तहरीर अदब 'सागर' 
कुछ मोल नहीं दुनिया के झूठे ख़िताबों में 

उर्दू ऐसी ज़बान है जिसे सीखने से ज़िन्दगी में तहज़ीब और सलीक़ा अपने आप आ जाता है। जिस दिन हम इस ज़बान को किसी धर्म विशेष की न मानते हुए अपनाएंगे उस दिन से इसकी वापसी बिना किसी सेमिनार या जश्न मनाने से हो जाएगी। हमारे आज के शायर जनाब " सागर सियालकोटी उर्फ़ हिन्दराज भगत " साहब को उर्दू से उतनी ही मुहब्बत है जितनी शायद कभी मजनूँ को लैला से रही होगी। सागर साहब की शायरी पढ़ते वक्त ये बात साफ़ हो जाती है कि उर्दू ज़बान के इस्तेमाल से किसी भी मज़हब का इंसान बेहतरीन शायरी कर सकता है। आज हम उनकी निहायत ही खूबसूरत किताब "एहतिज़ाज़-ए-ग़ज़ल" की बात करेंगे जिसकी पंच लाइन है "सुराही जाम को झुक कर ही मिलती है : ग़ज़ल कोई भी हो 'सागर' मज़ा देगी। तो आईये मज़े की शुरुआत करते हैं : 


ग़लत को ठीक कहना तो कभी अच्छा नहीं होता 
सही शिकवा शिकायत हो ये निस्बत में ज़रूरी है 

ये तिनके का सहारा डूबने वाले को काफ़ी है 
किसी को हौसला देना मुसीबत में जरूरी है 

मिरा किरदार ही 'सागर' निशानी है बुजुर्गों की 
अदब से पेश आयें हम अदावत में ज़रूरी है 

18 जनवरी 1951 को लुधियाना में जन्मे सागर साहब की उर्दू ज़बान और शायरी से दिलचस्पी उनके पिता जनाब करतार चंद जी की वज़ह से हुई। घर के अदबी माहौल से ये दिलचस्पी जूनून में तब्दील होती चली गयी और उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों से शेर कहना शुरू कर दिया। कॉलेज की मेगज़ीन में उनके कलाम गाहे बगाहे छपते रहे।साथ पढ़ने वाले दोस्तों और उस्ताद लोगों ने उनके कलाम को खूब पसंद किया। कालेज के बाद उन्होंने इंडियन ओवरसीज़ बैंक में नौकरी की और वहीँ से मैनेजर के पद से 2011 में रिटायरमेंट लिया। नौकरी के दौरान उन्हें जब भी थोड़ी बहुत फुर्सत मिलती वो लिखने पढ़ने बैठ जाते। ऊपर वाले की मेहरबानी से उन्हें जीवन साथी के रूप में निर्मल जी मिल गयीं जिन्होंने न सिर्फ उनके इस शौक की सराहा बल्कि हर कदम पर हौसला अफजाही भी की।

कभी लैला से पूछा था मुहब्बत चीज़ है कैसी 
कहा उसने ख़ुदा की ये इबादत ही इबादत है 

कहीं दंगे कहीं रिश्वत कहीं जिन्सी मसाइल हैं 
हकूमत में सभी अंधे सियासत ही सियासत है 

तुम्हारे पास जज़्बा है हकूमत को बदलने का 
सही इन्सान को चुन लो करामत ही करामत है 

सागर साहब ने शायरी की तालीम मरहूम जनाब याकूब मसीही सलाम लुधियानवी से हासिल की और सं 2000 से आप जनाब नामी नादरी साहब की सरपरस्ती में शेर कह रहे हैं। नादरी साहब की रहनुमाई में उनके दो ग़ज़ल संग्रह "एहसास" सं 2004 में और "आवाज़ें" सं 2013 में शाया हो कर मकबूलियत हासिल कर चुके हैं। " एहतिज़ाज़-ए-ग़ज़ल" याने ग़ज़ल की ख़ूबसूरती ,उनका तीसरा ग़ज़ल संग्रह है जो 2017 के शुरुआत में शाया हुआ है।सागर साहब ने अपने तीनों ग़ज़ल संग्रह "साहिर लुध्यानवी" साहब के इस शेर से मुत्तासिर हो कर लिखे हैं " दुनियां ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक़्ल में : जो कुछ मुझे दिया वही लौटा रहा हूँ मैं "

परिंदे को हवा पत्ता शजर भी जानता है 
जो राही थक के बैठा है सफ़र भी जानता है 

बशर साहिल पे जो भी घर बनाता है यकीनन 
वो तूफानों से लड़ने का हुनर भी जानता है

मुहब्बत में कहाँ अन्जाम की परवाह किसी को
मरीज़े इश्क़ तेशे का असर भी जानता है 

सागर साहब के शेर सच्चे हैं क्यूंकि वो ज़िन्दगी की तल्ख़ सच्चाइयों से गुज़र कर कहे गए हैं। उन्होंने ज़िन्दगी में जो देखा सुना और भोगा है वो ही अशआर में पिरो दिया है इसलिए उनके शेर पढ़ने वाले को आपबीती-जगबीती का अहसास भी करवाते हैं।हो सकता है आपको उनके शेर खुरदरे सपाट और तल्ख़ लगें क्यूंकि सच्चाई बिना मुलम्मे के होती है। नींव के पत्थरों की तरह जिनमें नक्काशी नहीं होती पर ईमारत को मजबूती से थामने की शक्ति होती है। हर तरफ रियाकारी ,क़तल-ओ-ग़ारत ,बढ़ती बेरोज़गारी और इन्सानियत की कमी के बीच मुलायम घुमावदार और मीठी बातें करना एक ईंमानदार शायर के लिए मुमकिन नहीं.

खिलौना सब का दिल बहला नहीं सकता मगर फिर भी 
वो बूढ़ा है खिलौने के लिए फिर भी मचलता है 

जिसे मालूम है सब कुछ वही ख़ामोश है लेकिन 
जिसे कुछ भी नहीं आता वही ज्यादा उछलता है

किसी के इश्क़ में 'सागर' क़दम ये सोच कर रखना 
ये वो जंगल यहाँ से कोई वापस कब निकलता है 

मैं 'सागर' साहब की इस बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ कि "बड़े से बड़ा शायर भी फ़िक्री तौर पर कुछ भी नया नहीं कह सकता क्यूंकि खुदा की इस क़ायनात में तमाम ख्याल पहले से मौजूद हैं " लेकिन फिर भी 'सागर' साहब ने अपनी तरह से कुछ नया कहने की कोशिश जरूर की है। बेहतरीन तरन्नुम के मालिक 'सागर' साहब मुशायरों में शिरकत नहीं करते ,मेरे ये पूछने पर कि "क्यों ?" उन्होंने बेबाक अंदाज़ में जवाब दिया "क्यूंकि नीरज जी कोई हमें बुलाता नहीं और हम बिन बुलाये कहीं जाते नहीं " उन्हें कोई इसलिए नहीं बुलाता कि वो किसी धड़े से नहीं जुड़े हुए हैं और उन्हें अपनी ख़ुद्दारी बहुत प्यारी है।
आज के इस दौर में जहाँ शायरी के नाम पर कुछ लोग बाजार सजा कर बैठे हैं, कुछ लोग मठाधीश बने बैठे हैं और कुछ लोग एक गुट बना लेते हैं वहीँ सागर साहब जैसे लोग भी हैं जो एकला चालो रे की तर्ज़ पर शायरी सिर्फ शायरी की खातिर कर रहे हैं। अदब की ख़ामोशी से ख़िदमत करने वाले सागर साहब जैसे इंसान बड़ी मुश्किल से मिलते हैं , मेरे दिल में उन लोगों के लिए बहुत आदर है जिनकी सोच कबीर दास जी की उस सोच से मेल खाती जिसे उन्होंने अपने एक दोहे में यूँ व्यक्त किया है :" .कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी मांगे खैर ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर"
मज़ाहिब कब सिखाते हैं किसी से बैर तकरारी 
अगर फ़िरक़ा परस्ती है तो फिर लड़ना जरूरी है 

अदब का काम लोगों को तो बस बेदार करना है 
जो कर पायें न तहरीरें तो फिर जलना जरूरी है 

अदीबों में सियासत बढ़ गई एजाज़ पाने की 
यही हालत रही 'सागर' तो फिर बचना जरूरी है 

सागर साहब की इस किताब को ' साहित्य कलश पब्लिकेशन' पटियाला ने प्रकाशित किया है, इसकी प्राप्ति के लिए आप उन्हें 9872888174 पर संपर्क कर सकते हैं या फिर sahitykalash@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। जैसा मैं हमेशा कहता आया हूँ बड़ा अच्छा हो अगर आप सागर साहब को इस किताब के लिए मुबारकबाद देते हुए उन्हें 9876865957 पर कॉल करें। यकीन मानिये उनकी आवाज़ में उनकी ग़ज़ल सुनना एक ऐसा अनुभव है जिस से आप बार बार गुज़रना चाहेंगे। अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले पेश हैं सागर साहब की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर :

आपका ख़त संभाल कर रख्खा 
और शिकवा निकाल कर रख्खा 

कब कहा था के वो पराया है 
सांप उसने जो पाल कर रख्खा 

फाश पर्दा कहीं ना हो 'सागर' 
जाल रिश्तों पे डाल कर रख्खा

7 comments:

नकुल गौतम said...

क्या कहने sir
एक से बढ़ कर एक नगीना चुन लाये आप।

एक और पुस्तक से भेंट करवाने के लिए शुक्रिया।

सादर,
नकुल

SagarSialkoti said...

नमस्कार नीरज भाई आप की मुहबबतो का शुक्रिया आप ने इस ख़ाकसार को अपने ब्लॉग में जगह दी इस के लिए तहेदिल से शुक्रगुजार हू आप जेसे ज़हीन लोग ही ऐसी नायाब चीज़े पेश करने की कुव्वत रखते है परमात्मा आप को अच्छी सेहत और लम्बी उम्र दे शुक्रिया सागर सियालकोटी लुधियाना

Unknown said...

आपका ख़त संभाल कर रख्खा
और शिकवा निकाल कर रख्खा
बहुत सुंदर
शायर भी
इन्हें पेश करने वाला भी

Amit Thapa said...

जंहा तक मेरा ख्याल है कोई भी जुबां किसी मज़हब की नहीं होती है, जुबां होती है तो वो ईलाको की होती है; जैसे बंगाल में रहने वालो की जबान बंगाली और पंजाब में रहने वालो की जबान पंजाबी।

उर्दू जैसी तहजीबी रवायत वाली मीठी जुबां को मज़हबी दायरे में लाने का काम अंग्रेजी पढ़े लिखे सियासतदानों का है जिन्होंने शायद ख्वाब भी अंग्रेजी में ही देखे, नहीं तो ये देश आज दो हिस्सों में तकसीम नहीं होता।

आज शायद ही हम बिना उर्दू के हिंदी की कल्पना कर पाए। डॉ. कुमार विश्वास की कुछ पंक्तिया है

ये उर्दू बज़्म है और मैं तो हिंदी माँ का जाया हूँ
ज़बानें मुल्क़ की बहनें हैं ये पैग़ाम लाया हूँ
मुझे दुगनी मुहब्बत से सुनो उर्दू ज़बाँ वालों
मैं हिंदी माँ का बेटा हूँ, मैं घर मौसी के आया हूँ

खैर अब बात करते है उस शायर की जिनकी बात नीरज जी इस बार किताबों की बात में कर रहे है जनाब सागर सियालकोटी साहब

एक बेहतरीन मक्ता

ये सबब है मेरे जीने का तो बरसों 'सागर'
आज उन यादों को कैसे मैं पुरानी कह दूँ


जिन्दगी की उलझनों में उलझे हुए लोगो के लिए इस से अच्छा शेर नही हो सकता है

इक उम्र गुज़ारी थी बस हमने अज़ाबों में
मैं पढता रहा जीवन को यूँ ही किताबों में

खुद के लिए कहा गया सागर साहब का एक और बेहतरीन शेर

चुप चाप करो ख़िदमत तहरीर अदब 'सागर'
कुछ मोल नहीं दुनिया के झूठे ख़िताबों में

ना जाने कितनी ही बार हुमारे बड़े बुजुर्ग हम से कहते है डूबने वाले को तिनके का ही सहारा होता है, किसी की मुसीबत में मदद करना भी जरुरी है और ये ही बात इस शेर में कह दी गयी है

ये तिनके का सहारा डूबने वाले को काफ़ी है
किसी को हौसला देना मुसीबत में जरूरी है

जहे - नसीब हमारे जो नीरज जी ने इस बेहतरीन शायर को हम सबके सामने लाने की जर्रा नवाजी की नहीं तो मुशायरों में तो इन्हें खोज पाते नहीं और हजारों लाखो किताबों के बीच में हम कहा इन्हें खोज पाते

क्या बेहतरीन बात है कही है; शायद वो शायर और कवि इस बात को समझ ले जो फिरकापरस्ती को अपने कलाम में पेश करते है

अदब का काम लोगों को तो बस बेदार करना है
जो कर पायें न तहरीरें तो फिर जलना जरूरी है


और ये शेर शायद उनके मुशायरे में ना जाने का कारण

अदीबों में सियासत बढ़ गई एजाज़ पाने की
यही हालत रही 'सागर' तो फिर बचना जरूरी है


और आज के हालात पे ये छोटी बहर की ये ग़ज़ल

आपका ख़त संभाल कर रख्खा
और शिकवा निकाल कर रख्खा

कब कहा था के वो पराया है
सांप उसने जो पाल कर रख्खा

फाश पर्दा कहीं ना हो 'सागर'
जाल रिश्तों पे डाल कर रख्खा

बस ये ही कह सकते है सुभानअल्लाह, माशाअल्लाह,

एक बार फिर से नीरज जी और सागर साहब का तहेदिल से शुक्रिया;

haidabadi said...

Dharam yug

SagarSialkoti said...

अमित थापा जी आप की मुहबबतो का शुक्रिया आप ने इस ख़ाकसार को पढा ख़ुदा आप को हमेशा तरक्की दे अच्छी सेहत और लम्बी उम्र की दुआ करता हू

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

तमाम अशआर मिठास की पैरोकारी कर रहे हैं। बहुत ख़ूब। जिस दिन से खुसरो की हिन्दवी को उर्दुआने की कोशिशें शुरू हुईं उस ही दिन से नफ़रत दोबाला हो गई।