Monday, February 1, 2016

किताबों की दुनिया -117

मुझे ये ज़िन्दगी अपनी तरफ़ कुछ यूँ बुलाती है 
किसी मेले में कुल्फी जैसे बच्चों को लुभाती है 

क़बीलों की रिवायत , बंदिशें , तफ़रीक़ नस्लों की 
मुहब्बत इन झमेलों में पड़े तो हार जाती है 
तफ़रीक़ : भेदभाव 
किसी मुश्किल में वो ताकत कहाँ जो रास्ता रोके 
मैं घर से जब निकलता हूँ तो माँ टीका लगाती है 

बच्चों को कुल्फी जैसे लुभाने की बात करने वाला शायर यकीनन उस्ताद ही होगा। किस सहजता से इस बाकमाल शायर ने अपनी बात पढ़ने वालों तक पहुंचा दी है। ऐसी दिलकश शायरी का हुनर उस्तादों की सोहबत और लगातार की गयी मेहनत के बिना आना असंभव है। हमारे आज के शायर हुनर मंद मेहनती तो हैं ही अपने काबिल उस्तादों के चहेते भी हैं।

दिखाते ही नहीं जो मुद्दतों तिश्नालबी अपनी 
सुबू के सामने आकर वो प्यासे टूट जाते हैं 

किसी कमज़ोर को मज़बूत से चाहत यही देगी 
कि मौजें सिर्फ छूती हैं , किनारे टूट जाते हैं 

गुज़ारिश अब बुजुर्गों से यही करना मुनासिब है 
ज़ियादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं 

असली शायर वो ही है जो अपने वक्त की अच्छी बुरी बातें सही ढंग से सबके सामने रखे। ज्यादा उम्मीद से बच्चों के टूट जाने की बात आज के दौर की तल्ख़ सच्चाई है और इस सच्चाई को बेहद शायराना अंदाज़ से शेर में पिरोया गया है ! ऐसे ढेर सी ग़ज़लें और लाजवाब शेर समेटे जिस किताब " वाबस्ता ' का जिक्र हम आज करने जा रहे हैं उसके शायर हैं जनाब 'पवन कुमार' साहब !



जब जब पलकें बंद करूँ कुछ चुभता है 
आँखों में इक ख्वाब सजा कर देख लिया 

बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है 
बच्चों को चुपचाप बिठा कर देख लिया 

कोई शख्स लतीफा क्यों बन जाता है 
सबको अपना हाल सुना कर देख लिया 

बेतरतीब सा घर वाला शेर मेरे दिल के बहुत करीब है , बच्चों पर बहुत से शेर पढ़ें हैं लेकिन ऐसा शेर बहुत कम नज़र से गुज़रा है जिसमें बच्चों की शैतानियों का लुत्फ़ उठाने की बात इस सलीके से की गयी हो। आप सोच रहे होंगे की ऐसे कमाल के शेर कहने वाले शायर आखिर हैं क्या ? चलिए बता देते हैं ,खूबसूरत पर्सनेलिटी के स्वामी श्री पवन कुमार जी का जन्म मैनपुरी उत्तर प्रदेश में 8 अगस्त 1975 को हुआ याने इस हिसाब से वो बहुत युवा शायर हैं। बी एस सी , लॉ ग्रेजुएशन -सेंट जॉन्स कालेज ,आगरा से करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (I A S ) की परीक्षा सं 2008 में उत्तीर्ण की और तब से वो उ प्र संवर्ग में सेवा रत हैं।

उतरा है खुदसरी पे वो कच्चा मकान अब 
लाज़िम है बारिशों का मियाँ इम्तिहान अब 
खुदसरी - मनमानी 

कुर्बत के इन पलों में यही सोचता हूँ मैं 
कुछ अनकहा है उसके मिरे दर्मियान अब 
कुर्बत - सामीप्य , नजदीकी 

याद आ गयी किसी के तबस्सुम की इक झलक 
है दिल मेरा महकता हुआ ज़ाफ़रान अब 

नौकरी के सिलसिले में एक बार पवन जी का बरेली के मीरगंज कस्बे जाना हुआ जहाँ उनकी मुलकात जनाब 'अकील नोमानी' साहब से हुई , बकौल पवन जी " जनाब अकील नोमानी के साथ पहली मुलाकात से ही एक अजीब सा अज़ीज़ाना राब्ता कायम हो गया जो आज तक जारी-ओ-जारी है ! आज ये मज़मूआ 'वाबस्ता' अगर आपके हाथों में और आपकी नज़रों के सामने है तो इसका सबसे बड़ा श्रेय जनाब 'अकील नोमानी' को ही है। " अब अकील साहब पवन जी के बारे में क्या फरमाते हैं ये भी पढ़ लें " पवन कुमार एक खुशमिज़ाज इंसान , ज़िम्मेदार सरकारी अफसर और मोहतात लबोलहजे के शायर हैं। मुझे उनकी शायरी से भी कुर्बत हासिल है और अक्सर उनके किसी न किसी शेर ने ठहर कर मुझे गैरोफिक्र की दावत भी दी है।“

उदास रात के चौखट पे मुन्तज़िर आँखें 
हमारे नाम मुहब्बत ने ये निशानी की 

तुम्हारे शहर में किस तरह ज़िन्दगी गुज़रे 
यहाँ कमी है तबस्सुम की , शादमानी की 
शादमानी : ख़ुशी 

उसे बताये बिना उम्र भर रहे उसके 
किसी ने ऐसे मुहब्बत की पासबानी की 

शायरी के शुरूआती दौर में उनके मित्र 'मनीष शुक्ल , जी ने उनकी बहुत हौसला अफ़ज़ाही की। मनीष खुद बहुत उम्दा शायर हैं , उनकी किताब "ख्वाब पत्थर हो गए " का जिक्र आप हमारी किताबों की दुनिया श्रृंखला में पढ़ चुके हैं। याद न आ रहा हो या दुबारा पढ़ना चाहें तो इस लिकं पे क्लिक करें http://ngoswami.blogspot.in/2013_01_01_archive.html . 'मनीष शुक्ल ' जी के अलावा जनाब 'वसीम बरेलवी' साहब से भी उनका राब्ता है और आज भी वो उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। मेरा ये मानना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और जो इंसान सीखना छोड़ देता है उसकी तरक्क़ी वहीँ रुक जाती है।

खुला रहता है दरवाज़ा सभी पर 
तुम्हारा दिल है या बारहदरी है 

वही मसरूफ़ दिन बेकैफ लम्हे 
इसी का नाम शायद  नौकरी है 
बेकैफ : आनंद रहित 

भटकना भी नहीं बस में हमारे 
जिधर देखो तुम्हारी रहबरी है 

इस किताब पर रिजर्व बैंक अधिकारी जनाब 'मयंक अवस्थी' साहब जिनकी उर्दू शायरी पर कमाल की पकड़ है ने कहा है कि " पवन कुमार की ग़ज़लों के आँचल में इनकी गोद में और पलकों में इत्मीनान की वो धरती और वो आसमान इस आसानी से विस्तार ले जाता है कि आप खुद बहुत मुतमईन हो कर अपने आप को इनके हवाले कर देते हैं। पवन कुमार के शेर आपके शेर बन कर आपकी जुबान पर अपना रास्ता तय करते मिलते हैं। इनकी ग़ज़लों की एक खासियत यह भी है कि तमाम मुश्किलों झंझावातों के बावजूद उनके यहाँ एक उम्मीद की लौ निरंतर जलती सुलगती रौशनी देती मिलती है "

यूँ तो हरपल इन्हें भिगोना ठीक नहीं 
फिर भी आँख का बंज़र होना ठीक नहीं 

हर आंसू की अपनी कीमत होती है 
छोटी छोटी बात पे रोना ठीेक नहीं 

बेहतर कल की आस में जीने की खातिर 
अच्छे खासे आज को खोना ठीक नहीं 

आकर्षक कलेवर और आकार में छपी इस किताब की भूमिका में मशहूर शायर जनाब "शीन काफ निज़ाम' कहते हैं पवन की ग़ज़लें पढ़ कर कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने अहसास को सलीके से अलफ़ाज़ देने की कोशिश की है " शीन काफ निज़ाम साहब की ये बात पाठक द्वारा किताब के वर्क पलटते हुए और उन पर शाया अलफ़ाज़ से रूबरू होते हुए महसूस की जा सकती है।

लहरों को भेजता है तकाज़े के वास्ते 
साहिल है कर्ज़दार समंदर मुनीम है 

वो खुश कि उसके हिस्से में आया है सारा बाग़ 
मैं खुश कि मेरे हिस्से में बादे -नसीम है 

साया है कम तो फ़िक्र नहीं क्यों कि वो शजर 
ऊँचाई की हवस के लिए मुस्तक़ीम है 
मुस्तक़ीम - सीधा खड़ा हुआ 

 'वाबस्ता' में पवन जी की करीब 50 ग़ज़लें और करीब 35 नज़्में शामिल हैं। इस किताब को 'प्रकाशन संस्थान , 4268 -B /3 , अंसारी रोड , दरियागंज , नयी दिल्ली -द्वारा छापा गया है। किताब प्राप्ति के लिए या तो आप प्रकाशन संस्थान को उनके फोन :011 -23253234 पर संपर्क करें, उन्हें info @prakashansansthan .com पर मेल करें या फिर वर्तमान में सहारनपुर में जिलाधिकारी के पद पर कार्यरत पवन जी को सीधा उनके मोबाईल न 09412290079 पर संपर्क करें और किताब प्राप्ति का आसान रास्ता पूछ लें। अगली किताब की तलाश पे निकलने से पहले लीजिये पढ़िए इस किताब में दी गयी एक ग़ज़ल के ये शेर :

ख्वाब गिरते ही टूट जाते हैं 
कैसी फिसलन है तेरी राहों में 

शाम चुपचाप आके बैठ गयी 
तेरे जलवे लिए निगाहों में 

ऐसी तकदीर ही न थी वरना 
हम भी होते किसी की चाहों में

19 comments:

शिवम् मिश्रा said...

नीरज भाई साहब,
कृपया गौर करें कि इस समय पवन भाई साहब सहारनपुर मे जिलाधिकारी के पद पर तैनात हैं|
बाकी सभी जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार |
सादर|

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

एक अफ़सर न दिखा जब मैं पवन जी से मिला । उनकी शख़्सियत उनके शायरी आइना है उनकी सादगी की । और आपने उनके जो कलाम चुने है वह कमाल है

Dr. Amar Jyoti said...

क़बीलों की रिवायत , बंदिशें , तफ़रीक़ नस्लों की
मुहब्बत इन झमेलों में पड़े तो हार जाती है

बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है
बच्चों को चुपचाप बिठा कर देख लिया

वो खुश कि उसके हिस्से में आया है सारा बाग़
मैं खुश कि मेरे हिस्से में बादे -नसीम है

एक से बढ़ कर एक अनमोल नगीने. शायर को बधाई और आपका आभार.

Parul Singh said...

वही मसूरफ़ दिन बेकैफ लम्हे
इसी का नाम शायद नौकरी है।
वाह एक से बढ़कर एक शेर..
कभी अनमने से हों आप अपने आप से ही सवालों जवाबों मे उलझे, और तभी कुछ ऐसा पढ़ने, देखने या सुनने को मिल जाए कि आप अपने सवालों जाए। ऐसा ही अहसास इस पोस्ट को पढ़ कर हुआ। शेरों का शानदार चुनाव । शेर इशारा कर रहे है कि वाबस्ता बेहतरीन शायरी की किताब है। पवन कुमार जी को ढेरों शुभकामनाएँ ।
आशा है अगली पोस्ट मे देरी नही होगी सर। वरना तो हम पढ़ने मे देरी कर देंगे। हा हा हा ।

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " प्रेम से बचा ना कोई " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Dr. P.C. Giri said...

पवन जी की रचनाएं उनके गंभीर और श्रेष्ठ शायर होने का प्रमाण हैं ।आप बहुत खूबसूरती से ग़ज़ल के सितारों को प्रस्तुत करते हैं।पवन जी को बधाई और आप को धन्यवाद।

नीरज गोस्वामी said...

इस जानकारी के लिये तहे दिल से शुक्रिया , मैंने आवश्यक संशोधन कर दिया है । स्नेह बनाये रखें !

Ankit said...

एक बेहतरीन शायर होने के साथ सादा-दिली और बेमिसाल शख़्सियत के मालिक पवन साहब के शेर और ग़ज़लें कमाल हैं। वाबस्ता की ग़ज़लें अपनी खुश्बू बिखेरती चलती हैं।

Unknown said...

हर दिल अज़ीज़ इंसान और एक बहुत उम्दा शायर ..सह्ले- मुमतना में कहे गए अशआर सीधे दिल में उतरते हैं . बड़े भाई पवन कुमार साहब को बधाई और आपका शुक्रिया
कान्हा

Unknown said...

Mr.Ultimate ....Sh pawan kumar
Many many congratulations..

जयकृष्ण राय तुषार said...

आदरनीय पवन कुमार जी की ग़ज़लों को पढ़ना बहुत ही अच्छा लगता है |उम्दा समीक्षा के लिए आपका आभार |

नीरज गोस्वामी said...

Received on e-mail :-

DEAR NEERAJ GOSWAMI JI
NAMSATEY- I HOPE U R HAPPY AND ENJOYING THE LIFE TO THE FULLEST-
WE COULD NOT MEET IN BOOK FAIR- ALTHOUGH\
I ALSO VISITED BOOK FAIR TWO TIMES AND MET A LARGE NUMBER OF
LITERARY FRIENDS THERE-
THE POETRY OF SHRI PAWAN KUMAR IS REALLY TOUCHING AND
IMPRESSIVE, ESPECIALLY THESE LINE :_

दिखाते ही नहीं जो मुद्दतों तिश्नालबी अपनी
सुबू के सामने आकर वो प्यासे टूट जाते हैं

किसी कमज़ोर को मज़बूत से चाहत यही देगी
कि मौजें सिर्फ छूती हैं , किनारे टूट जाते हैं

गुज़ारिश अब बुजुर्गों से यही करना मुनासिब है
ज़ियादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं

AND ALSO THESE LINE :-

यूँ तो हरपल इन्हें भिगोना ठीक नहीं
फिर भी आँख का बंज़र होना ठीक नहीं

हर आंसू की अपनी कीमत होती है
छोटी छोटी बात पे रोना ठीेक नहीं

बेहतर कल की आस में जीने की खातिर
अच्छे खासे आज को खोना ठीक नहीं
CONGRATS TO THE SHAYER FOR SUCH A NICE AND
BEAUTIFUL POETRY
AND ALSO A LOT OF
THANX TO U FOR SHARING IT.
REGDS
- OM SAPRA
SP.METROPOLITAN MAGISTRATE- DELHI
M- 98181 80 932

नीरज गोस्वामी said...

Received on fb :

बहुत ही खूबसूरत गजलें ...............शुक्रिया


Pramod Kumar
Delhi

नीरज गोस्वामी said...

Received on mail :-

हाँ, बेहतरीन इंसान और कामयाब शायर पवन जी से मई वाबस्ता रहा हूँ। एक बार फिर उन्हें बधाई। आभार आपका।


Devendra Arya

नीरज गोस्वामी said...

Received on fb:-


Pawan Kumar. Ki. Bahutsari. Ghazlein. Shaandar. Haien.

Gyan Prakash Vivek

नीरज गोस्वामी said...

Received on fb:-

वाह जी वाह , बधाई इस सार्थक प्रयास हेतु

Alok Chaturvedi

Jaipur

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर कृति, सुन्दर समीक्षा।

vijay sharma said...

Nice bhut accha laga padh kar. Mera blog findchuru.com

Anonymous said...

nadiyon ka sringar nahi hai, na hariyali hai sindur,
vidhwa hokar apni dharti dekho rone par majboor,
chheen kar peron k kangan vasundhara k hatho se,
mahrum kiya insaan ne khud ko mausam k barsaton se,
parvaton k gahne bhi ho gye prakrati se dur,
vidhwa hokar apni dharti dekho rone par majboor,
panchiyon k kalrav ki payal ka sur toota h.
hawaniyat se milkar insano ne har jangal to loota h.
hawaon k mehndi ki khushboo ho gyi h ab benoor,
vidhwa hokar apni dharti dekho rone par majboor,
nadiyon ka sringar nahi hai, na hariyali hai sindur,
गुंजन लखनवी