बात जयपुर की है. सन 1980-90 की. हमारे घर में बरसों से चले आ रहे जयपुर के एक प्रसिद्द समाचार पत्र के साथ साथ हमने 'नव भारत टाइम्स'' जो जयपुर से तब प्रकाशित होना शुरू हुआ था को दो कारणों से मंगवाना शुरू कर दिया. पहला मुख्य कारण था उसके अंतिम पृष्ठ पर स्व. श्री शरद जोशी जी का रोज़ प्रकाशित होने वाला एक कालम और दूसरा हर हफ्ते छपने वाली साप्ताहिक फिल्म समीक्षा. मुझे फरवरी 1990 में अमिताभ बच्चन की फिल्म "अग्नि पथ" के बारे में छपी समीक्षा जिसमें समीक्षक ने उनके लाजवाब अभिनय की बेजोड़ प्रशंशा की थी, अभी तक याद है. समीक्षक द्वारा की गयी प्रशंशा में सच्चाई थी तभी इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरुष्कार श्री "अमिताभ बच्चन" को मिला. इस से साबित हुआ कि फिल्म समीक्षक के पास अपने आस पास की चीजों को सही ढंग से देखने समझने की अद्भुत क्षमता है. फिल्म की समीक्षा करते हुए ये समीक्षक बीच बीच में ऐसे कमाल के शेर पिरोता था के पढ़ते हुए मुंह से बरबस वाह निकल जाया करती थी. किन्हीं कारणों से जयपुर का नवभारत टाइम्स बंद हो गया और फिर उसके बाद मैंने कभी किसी अखबार या पत्रिका में ऐसी शायराना फिल्म समीक्षा नहीं पढ़ी. ये फिल्म समीक्षा लिखा करते थे हमारी आज की "किताबों की दुनिया" श्रृंखला के अगले शायर जनाब "दिनेश ठाकुर" जिनकी हाल ही में प्रकाशित किताब "परछाइयों के शहर में" का जिक्र हम करने जा रहे हैं.
कभी तुम जड़ पकड़ते हो कभी शाखों को गिनते हो
हवा से पूछ लो न ये शजर कितना पुराना है
मरासिम वैसे ही कायम हैं अपने ठोकरों से भी
मेरा रस्ता, मेरा चलना, मेरा गिरना पुराना है
समय ठहरा हुआ सा है हमारे गाँव में अब तक
वही पायल, वही छमछम, वही दरिया पुराना है
दस दिसंबर 1963 को झीलों की खूबसूरत नगरी उदयपुर में जन्में युवा दिनेश जी की शायरी में गर्मी से तपती धरती पर बारिश की पहली बूंदों से उठी मिटटी की महक है, झीलों सी गहराई है,शादाब घने पेड़ों के नीचे मिलने वाली ठंडक है ज़र्द पत्तों के डाल से बिछुड़ने का दर्द है... वो अपने अशआर से हमें चौंकाते भी हैं और सोचने पर मजबूर भी करते हैं. दिनेश के पिता उन्हें इंजिनियर बनाना चाहते थे लेकिन होनी एक कामयाब शायर. इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में उतीर्ण होने के बावजूद उन्होंने अपने दिल का रास्ता चुना, विज्ञान विषयों को सदा के लिए छोड़ कर उन्होंने आर्ट विषयों में बी.ऐ. किया और जयपुर के एक प्रसिद्द दैनिक अखबार से जुड़ कर नौकरी के साथ साथ पत्रकारिता और मॉस कम्न्युकेशन में एम.ऐ.कर लिया. दुनिया को देखने की उनकी दृष्टि व्यापक होती चली गयी.
यही दस्तूर है शायद वफादारी की दुनिया में
जिसे जी जान से चाहो वही तकलीफ देती है
कज़ा का खौफ लेकर जी रहे हैं सब ज़माने में
हकीकत में सभी को ज़िन्दगी तकलीफ देती है
नुमूँ होते ही जिसको बागबाँ तकता है हसरत से
कई काँटों को वो ताज़ा कली तकलीफ देती है
दिनेश अपनी शायरी में बोलचाल की भाषा के लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हैं इसीलिए उनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए गुनगुनाने को दिल करता है. नए विचारों और शिल्प में नए प्रयोग करना उनका प्रिय शगल है. बंधी बँधाई लीक पर चलना उन्हें गवारा नहीं. अपने लिए नयी ज़मीन तलाशना किसी भी शायर के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है दिनेश इस चुनौती को स्वीकारते हैं और कामयाब भी होते हैं.
थोड़ी सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में
गुस्से से ही सीने में बगावत नहीं आती
किस बात का डर है तुम्हें क्यूँ चुप सी लगी है
सच बोलने भर से तो क़यामत नहीं आती
हर दर्द से बावस्ता हुआ जाता है पहले
इक सर को झुकाने से इबादत नहीं आती
"परछाइयों के शहर में" दरअसल दिनेश जी का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है , उनका पहला ग़ज़ल संग्रह "हम लोग भले हैं कागज़ पर " लगभग दस साल पहले शाया हुआ था जिसे बहुत सराहना मिली, उसका दूसरा संस्करण कुछ माह पहले ही प्रकाशित हुआ है जो दिनेश जी की ग़ज़लों की बढती लोकप्रियता को दर्शाता है. इस किताब की भूमिका में मशहूर शायर ज़नाब "शीन काफ निजाम" साहब ने बहुत कमाल की बात कही है " अगर सिर्फ बहर, रदीफ़ और काफिये से निर्मित दो पद शेर नहीं, तो अखबार की सुर्खी भी शेर नहीं. हेराक्लिटस ने कहा था- मेरी बात नहीं मेरे कहने में जो बात बोलती है उसे सुनो. वो बात अकथित है.कथन में अकथित को छुपाना अगर शेर साजी है तो कथन में अकथित को पढना ही ग़ज़ल पढना है " दिनेश जी की ग़ज़लें उनके इस कथन पर खरी उतरती हैं:
उसके ओझल होने तक मेरी आँखें थीं रस्ते पर
वो जाने किस ध्यान में गुम था, मुड़ कर जाना भूल गया
किस दर्ज़ा बेज़ार हुआ है गुलचीं अपने गुलशन से
ताज़ा मौसम के फूलों को गिनकर जाना भूल गया
गुलचीं : माली
बीवी, बच्चे, सड़कें, दफ्तर और तनख्वाह के चक्कर में
मैं घर से अपना ही चेहरा पढ़कर जाना भूल गया
इस किताब में दिनेश जी अधिकांश ग़ज़लें छोटी बहर में हैं और जैसा मैं हर बार कहता आया हूँ छोटी बहर में ग़ज़ल कहना जितना सरल दीखता है उतना ही मुश्किल काम है. गागर में सागर भरने की ये कला हर किसी के पास नहीं होती. थोड़े से लफ़्ज़ों में पुख्ता ढंग से कैसे बात कही जाती है ये आप इस किताब को पढ़ कर स्वयं देखें:
उलझने हैं सभी के सीने में
कौन अब इंकलाब रखता है
याद की धूप जब सताती है
सर पे मेरी किताब रखता है
गुनगुनाता है छुप के मेरी ग़ज़ल
शौक क्या लाजवाब रखता है
दिनेश जी की एक सौ चार लाजवाब ग़ज़लों से सजी इस किताब को यूँ तो फुल सर्कल पब्लिशिंग प्रा.ली.,जे- 40, जोरबाग लेन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है और वो शायद आपको वहां से मिल भी जाय लेकिन फिर भी इसे आसानी से प्राप्त करने के लिए आप दिनेश जी को, जो इन दिनों राजस्थान के बहुत पुराने और सबसे अधिक पाठकों वाले अखबार "राजस्थान पत्रिका" में वरिष्ठ समाचार संपादक के पद पर कार्य रत हैं, उनके मोबाइल नंबर 9024788857 पर संपर्क करें, मुझे उम्मीद है मृदु भाषी दिनेश जी से बात कर आपको अलग सा सुकून और किताब प्राप्ति का आसान तरीका भी मिल जायेगा.
सियासत भी तवायफ़ है मोहब्बत क्यूँ करेगी वो
भला किस वक्त घुंघरू इसके मक्कारी नहीं करते
दुपट्टा उसने ये कह कर उड़ा फैंका हवाओं में
हम हर मौसम में परदे की तरफदारी नहीं करते
कसीदे सुनते सुनते रक्स करने लगते हैं साहिब
तमाशा कौनसा महफ़िल में दरबारी नहीं करते
प्रसिद्द रचनाकार श्री नन्द चतुर्वेदी जी ने इस किताब की दूसरी भूमिका में जो लिखा है कि "दिनेश ठाकुर के छोटे छोटे शेर सहसा ज़िन्दगी के उन सवालों से रूबरू कर देते हैं,जिनके जवाब देने के लिए हम तैयार नहीं थे,लेकिन अब जिनसे बचना संभव नहीं है.दिनेश की शायरी मौज-शौक की शायरी की नहीं है. वहां एक फलसफा भी है, बात ज़िन्दगी की बैचेनियों की है जो देर तक परेशान भी करती हैं " उनकी इस बात की तस्कीद के लिए हाज़िर हैं उनकी छोटी बहर की एक ग़ज़ल के ये शेर :-
सिलसिला है तो टूटता क्यूँ है
इस जहाँ में ये सिलसिला क्यूँ है
खींच लाया है जब तू मकतल में
फिर तेरा हाथ काँपता क्यूँ है
मकतल: वधस्थल
मैं भी हैरान हूँ कि बात है क्या
चलते चलते वो भागता क्यूँ है
आईये चलते चलते सुनते हैं दिनेश ठाकुर की वो मशहूर ग़ज़ल जिसे मोहम्मद हुसैन अहमद हुसैन भाइयों ने अपने दिलकश अंदाज़ में गाया है. शायरी और मौसिकी का ये मिलन अद्भुत है और देर तक ज़ेहन में गूंजता रहता है .
37 comments:
यही दस्तूर है शायद वफादारी की दुनिया में
जिसे जी जान से चाहो वही तकलीफ देती है
कज़ा का खौफ लेकर जी रहे हैं सब ज़माने में
हकीकत में सभी को ज़िन्दगी तकलीफ देती है
वाह ! बहुत खूब !!
इतनी सुंदर किताब से परिचय करवाने के लिए आपका बहुत शुक्रिया नीरज जी.
उसके ओझल होने तक मेरी आँखें थीं रस्ते पर
वो जाने किस ध्यान में गुम था, मुड़ कर जाना भूल गया
बेहतरीन गज़लें....शानदार समीक्षा.....
शुक्रिया.
अनु
फिर वही किताबें और राहत देती पंक्तियाँ -
किस बात का डर है तुम्हें क्यूँ चुप सी लगी है
सच बोलने भर से तो क़यामत नहीं आती
कज़ा का खौफ लेकर जी रहे हैं सब ज़माने में
हकीकत में सभी को ज़िन्दगी तकलीफ देती है..
क्या खूबसूरत शेर है!
और : याद की धूप जब सताती है
सर पे मेरी किताब रखता है.. वाह! इन मोतियों को चुनकर इस ब्लॉग में सजाने के लिए शुक्रिया नीरज जी।
badhiya lage sher...
समय ठहरा हुआ सा है हमारे गाँव में अब तक
वही पायल, वही छमछम, वही दरिया पुराना है
वाह!
जानकारी देती रचना |
आशा
दिनेश ठाकुर जी न केवल फिल्मों पर वरन शब्दों पर भी पकड़ रखते हैं।
आदरणीय नीरज जी
नमस्कार !!
कज़ा का खौफ लेकर जी रहे हैं सब ज़माने में
हकीकत में सभी को ज़िन्दगी तकलीफ देती है
बेहतरीन गज़लें.
सुंदर किताब से परिचय करवाने के लिए आपका बहुत शुक्रिया !!!
पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...!!
परिचय हुआ एक और शायर से।
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - चुनिन्दा पोस्टें है जनाब ... दावा है बदहजमी के शिकार नहीं होंगे आप - ब्लॉग बुलेटिन
♥
आदरणीय नीरज भाईजी
प्रणाम !
दिनेश ठाकुर जी के परिचय और उनके कलाम से रूबरू कराने के लिए आभार !
मोहम्मद हुसैन अहमद हुसैन भाइयों की आवाज़ का आनंद कल लेंगे …
निश्चय ही बहुत ख़ूबसूरतीसे गाया होगा …
मंगलकामनाओं सहित…
-राजेन्द्र स्वर्णकार
dinesh ji ko bahut bahut badhi inke likhe sher lajavan hote hain aapne bahut sunder tarike se pustak ke bare me likha hai dhnyavad
rachana
Msg received on e-mail:-
shri neeraj ji
namastey
dinesh thakur ki sunder gazalon se parichay karene ke liye
aapke dhanyavad,
kafi sunder aur bhavpoorn poetry hai, dinesh ji ko badhai
aapko shayad maloom ho ke prof kuldip salil ki pichley dino,
poetry/urdu gazalon ki do kitaben bhi pull circle, jor bagh ke
shri shekhar malhotra ji ne shaya ki hain,
dobara se badhai-
-om sapra, delhi-9
थोड़ी सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में
गुस्से से ही सीने में बगावत नहीं आती
यही दस्तूर है शायद वफादारी की दुनिया में
जिसे जी जान से चाहो वही तकलीफ देती है
किस बात का डर है तुम्हें क्यूँ चुप सी लगी है
सच बोलने भर से तो क़यामत नहीं आती
बहुत ही बढ़िया शायर से मुलाकात करवाई हैं आपने नीरज जी 'राजस्थान पत्रिका 'मैने अक्सर कोटा में पढ़ी हैं !दिनेश जी की शायरी के क्या कहने ...उन्हें बहुत -बहुत बधाई और साथ ही आपको भी जिनके जरिए हम खुबसूरत कलाम पढ़ पाते हैं ...
उसके ओझल होने तक मेरी आँखें थीं रस्ते पर
वो जाने किस ध्यान में गुम था, मुड़ कर जाना भूल गया………………दिनेश जी का परिचय पाकर अच्छा लगा और हर शेर दिल मे हलचल सा मचाता है …………और आप ऐसे शायर ढूँढने मे माहिर्………हार्दिक आभार
नीरज भाई जी, बहुत-बहुत शुक्रिया !
श्री दिनेश ठाकुर जी से मुलाकात कराने का और मेरी
मनपसंद गज़ल मेरे मनपसंद गुलूकारों की आवाज़ में सुनवाने का ....बहुत सुकून मिला !
एक बार फिर से ..
आभार !
उलझने हैं सभी के सीने में
कौन अब इंकलाब रखता है
याद की धूप जब सताती है
सर पे मेरी किताब रखता है
गुनगुनाता है छुप के मेरी ग़ज़ल
शौक क्या लाजवाब रखता है
वाह बहुत खूब..दिनेश जी और उनकी पुस्तक का परिचय पाकर बहुत अच्छा लगा.आभार आपका.
दिनेश जी के सभी शेर दिल में जगह बना लेते हैं. क्या खूब कहा है...
थोड़ी सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में
गुस्से से ही सीने में बगावत नहीं आती
खींच लाया है जब तू मकतल में
फिर तेरा हाथ काँपता क्यूँ है
जिंदगी से बाबस्ता उनका हर शेर बहुत कमाल हैं. पुस्तक और दिनेश जी के बारे में जानकारी देने के लिए बहुत आभार.
कल 18/04/2012 को आपके ब्लॉग की प्रथम पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.
आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!
... सपना अपने घर का ...
bahut khub Neeraj Goswami jee___bahut achchha likha hay aap ne sir ki kitab par__jitni tareef ki jaaye, kum hogi___really ''parchhaiyo.n ke shehar mei.n' ki aik aik ghazal lajawab hay____aur mai.n bhi navbharat times mei.n Dinesh sir ke reviews ki mureed rahi huu.n____ waise reviews ab kahi.n paDhne ko nahi.n milte___thanx for such a nice sharing.
:Antima Kinger
दिनेश ठाकुर जी की ग़ज़ल जब-जब पढ़ीं, आनन्द आया। आज भी। बिना किसी दॉंव-पेंच के सीधे सीधे विषय सम्प्रेषण में सफ़ल।
प्रस्तुति पर आपका आभार।
वाह ... आज तो नीरज जी आपके हाथ चूमने कों दिल कर रहा है ... ऐसे शार से मिलवाया जिसकी गज़ल मेरे पसंदीदा गायकों ने गाई है ... और लाजवाब गाई है ....
इन किताबों से परिचय करवाने में आपका जो श्रम लगा उसे नमन। दिनेश जी को तो कई जगह पढ़ चुका हूँ, बहुत खूबसूरत और अलहदा ग़ज़लें हैं उनकी।
कभी तुम जड़ पकड़ते हो कभी शाखों को गिनते हो
हवा से पूछ लो न ये शजर कितना पुराना है
बहुत खूब
किताबों से परिचय करवाने का आपका प्रयास सराहनीय है
उलझने हैं सभी के सीने में
कौन अब इंकलाब रखता है
वाह ! दिनेश ठाकुर जी की शायरी लाजवाब है और आपकी समीक्षा ने उसमें चार चाँद लगा दिये हैं. बहुत रोचक पोस्ट!
सचमुच लाजवाब!
Exams की वजह से मैं आपके ब्लॉग को काफी दिनों बाद पढ़ रहा हूँ... पढ़ के दिल खुश हो गया
नुमूँ होते ही जिसको बागबाँ तकता है हसरत से
कई काँटों को वो ताज़ा कली तकलीफ देती है
गुनगुनाता है छुप के मेरी ग़ज़ल
शौक क्या लाजवाब रखता है
एक बार फिर आपने बहुत ही अच्छी किताब का परिचय दिया ... बहुत ही लाजवाब हैं सारे के सारे शेर...
आभार
Behatreen prastuti
यही दस्तूर है शायद वफादारी की दुनिया में
जिसे जी जान से चाहो वही तकलीफ देती है
LAJABAB POST KE LIYE BADHAI GOSWAMI JI .
,बेहतरीन प्रस्तुति,...
MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...
bahut achhi post .....aabhar,
आदरणीय नीरज जी,
दिनेश जी के ग़ज़ल संग्रह परछाइयों के शहर में यक़ीनन एक संग्रह योग्य शेरी मजमुआ है आपकी अति सुन्दर समीक्षा चार चाँद लगा देती है कुछ शे'र बहुत अच्छे लगे...
नुमूँ होते ही जिसको बागबाँ तकता है हसरत से
कई काँटों को वो ताज़ा कली तकलीफ देती है
वाह...वाह
दुपट्टा उसने ये कह कर उड़ा फैंका हवाओं में
हम हर मौसम में परदे की तरफदारी नहीं करते
क्या कहने...
यूँ तो दिनेश जी को फ़ोन पर मुबारकबाद दे चुका हूँ
पुनः दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं.
खूबसूरत अशआर पढ़वाने के आपका सादर आभार,
सतीश शुक्ला 'रक़ीब'
जुहू, मुंबई-49.
नीरज जी
ठाकुर साहब से मिलाने का शुक्रिया. नायब शख्स से मिलवाया इस बार आपने
कोई एक शेर हो तो कहूं सब तो एक से बढ़ कर एक.......!
कभी तुम जड़ पकड़ते हो कभी शाखों को गिनते हो
हवा से पूछ लो न ये शजर कितना पुराना है
अब इस शेर के बाद क्या कहूं......?????
दिनेश ठाकुर जी से परिचय कराने का आभार । जितने शेर आपने उध्दृत किये हैं सब हीरे हैं किसे चुने किसे छोडें ।
समीक्षा तो आप ऐसे करते हैं कि वह अपने आप में एक अलग सा लेख बन जाता है ।
अच्छा रहा यह अंक भी। रचनाकार से पहचान नहीं थी परंतु रचना सुनी थी।
कज़ा का खौफ लेकर जी रहे हैं सब ज़माने में
हकीकत में सभी को ज़िन्दगी तकलीफ देती है..
खूबसूरत शेर.........
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